शामिल किए गए तीन नए स्थल
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बाराटांग कार्स्ट एवं मड वोल्केनो कॉम्प्लेक्स — अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह।
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अंडमान सबडक्शन ज्वालामुखी — नारकोंडम और बैरन द्वीप।
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सिरपुर सांस्कृतिक एवं पुरातात्त्विक परिदृश्य — छत्तीसगढ़।
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यूनेस्को के नियमों के अनुसार, किसी स्थल को विश्व धरोहर सूची में शामिल करने के लिए नामांकित करने से पहले उसका अस्थायी सूची में शामिल होना आवश्यक है।
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अस्थायी सूची में शामिल होना अंतिम मान्यता नहीं है, बल्कि विश्व धरोहर सूची में शामिल किए जाने की दिशा में एक प्रारंभिक प्रक्रिया है।
विश्व धरोहर स्थल क्या है?
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संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (UNESCO) का उद्देश्य विश्व की उन सांस्कृतिक और प्राकृतिक धरोहरों की पहचान, सुरक्षा तथा संरक्षण को प्रोत्साहित करना है, जिनका संपूर्ण मानवता के लिए असाधारण महत्त्व है।
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इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए वर्ष 1972 में यूनेस्को ने ‘विश्व की सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक धरोहर के संरक्षण संबंधी अभिसमय’ (Convention Concerning the Protection of the World Cultural and Natural Heritage) को अपनाया।
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विश्व धरोहर स्थल ऐसा स्थान होता है, जिसका सांस्कृतिक, ऐतिहासिक या प्राकृतिक महत्त्व असाधारण हो तथा जो संपूर्ण मानवता के लिए उत्कृष्ट सार्वभौमिक मूल्य रखता हो।
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विश्व धरोहर स्थल में कोई भवन, शहर, पुरातात्त्विक परिसर, रेगिस्तान, जंगल, द्वीप, झील, स्मारक या पर्वत शामिल हो सकता है।
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जिन स्थलों को उत्कृष्ट सार्वभौमिक मूल्य वाला माना जाता है, उन्हें निर्धारित मानदंडों के आधार पर विश्व धरोहर सूची में शामिल किया जाता है।
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किसी स्थल को विश्व धरोहर सूची में शामिल होने के लिए निर्धारित 10 चयन मानदंडों में से कम-से-कम एक को पूरा करना आवश्यक है।
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इन मानदंडों की समय-समय पर समीक्षा की जाती है, ताकि विश्व धरोहर की अवधारणा में होने वाले विकास को प्रतिबिंबित किया जा सके।
विश्व धरोहर स्थलों की सूची कौन तैयार करता है?
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यूनेस्को की विश्व धरोहर समिति (UNESCO World Heritage Committee) विश्व धरोहर स्थलों की सूची में शामिल किए जाने वाले स्थलों के संबंध में निर्णय लेती है।
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इस समिति में अभिसमय के सदस्य देशों में से महासभा द्वारा निर्वाचित 21 देशों के प्रतिनिधि शामिल होते हैं।
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समिति विश्व धरोहर सूची में शामिल स्थलों के संरक्षण की स्थिति से संबंधित रिपोर्टों की समीक्षा करती है।
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यदि किसी स्थल का उचित संरक्षण या प्रबंधन नहीं किया जा रहा है, तो समिति संबंधित देश को आवश्यक कदम उठाने के लिए कह सकती है।
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समिति यह भी निर्णय लेती है कि किसी स्थल को संकटग्रस्त विश्व धरोहर सूची में शामिल किया जाए या उससे हटाया जाए।
1. बाराटांग कार्स्ट एवं मड वोल्केनो कॉम्प्लेक्स
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बाराटांग द्वीप अंडमान द्वीपसमूह में स्थित है। यह श्री विजयपुरम (पूर्व नाम पोर्ट ब्लेयर) से लगभग 100 किलोमीटर उत्तर में स्थित है।
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इसका भौगोलिक क्षेत्रफल लगभग 299.57 वर्ग किलोमीटर है।
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यह द्वीप ग्रेट अंडमान की मुख्य द्वीप शृंखला का हिस्सा है और दक्षिण अंडमान तथा मध्य अंडमान के बीच स्थित है। यह मध्य जलडमरूमध्य और होमफ्रे जलडमरूमध्य के निकटवर्ती मार्गों से जुड़ा हुआ है।
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प्रस्तावित कार्स्ट एवं मड वोल्केनो कॉम्प्लेक्स द्वीप के दक्षिण-पश्चिमी भाग में स्थित है। इसमें चूना पत्थर की कई गुफाएँ और सक्रिय कीचड़ ज्वालामुखी शामिल हैं।
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यहाँ अनेक चूना पत्थर की गुफाएँ हैं, जिनमें से अधिकांश दुर्गम भूभाग के कारण आसानी से पहुँच योग्य नहीं हैं।
कार्स्ट स्थलाकृति क्या है?
कार्स्ट स्थलाकृति मुख्यतः चूना पत्थर जैसी घुलनशील चट्टानों के जल द्वारा धीरे-धीरे घुलने और अपरदन से विकसित होती है। इससे गुफाएँ, भूमिगत मार्ग और अन्य विशिष्ट भू-आकृतियाँ बनती हैं।
कीचड़ ज्वालामुखी की विशेषताएँ
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बाराटांग के कीचड़ ज्वालामुखियों को स्थानीय लोग ‘जलकी’ कहते हैं।
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ये भूकंपीय गतिविधियों से संबंधित कीचड़ ज्वालामुखीय प्रक्रियाओं के महत्त्वपूर्ण उदाहरण हैं।
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सामान्य आग्नेय ज्वालामुखियों के विपरीत, इनमें मैग्मा या पिघली हुई चट्टान के स्थान पर कीचड़, पानी और गैसों का मिश्रण बाहर निकलता है।
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इस मिश्रण में मुख्यतः मीथेन और हाइड्रोजन सल्फाइड जैसी गैसें हो सकती हैं।
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भूमिगत दबावयुक्त शेल चट्टानों की परतों में होने वाली गतियों के कारण कीचड़ और गैसें सतह की ओर आ सकती हैं।
इस स्थल का महत्त्व इसकी विशिष्ट भूवैज्ञानिक संरचनाओं, चूना पत्थर की गुफाओं और सक्रिय कीचड़ ज्वालामुखीय प्रक्रियाओं के कारण है।
2. अंडमान सबडक्शन ज्वालामुखी — नारकोंडम एवं बैरन द्वीप
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अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह लगभग 5,000 किलोमीटर लंबे बर्मा (म्यांमार)-अंडमान-जावा सबडक्शन तंत्र के मध्य भाग में स्थित हैं।
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नारकोंडम और बैरन द्वीप इस क्षेत्र की ज्वालामुखीय शृंखला के महत्त्वपूर्ण भाग हैं।
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ये दोनों द्वीप ज्वालामुखीय गतिविधियों, पारिस्थितिक विकास और स्थानिक प्रजातियों (Endemic Species) के अध्ययन के लिए विशेष महत्त्व रखते हैं।
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दोनों द्वीपों की भूवैज्ञानिक विशेषताएँ एक-दूसरे से भिन्न हैं और क्षेत्र के ज्वालामुखीय इतिहास को समझने में सहायता करती हैं।
नारकोंडम द्वीप
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नारकोंडम एक समुद्री द्वीप है, जिसका क्षेत्रफल लगभग 6.8 वर्ग किलोमीटर है।
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यह श्री विजयपुरम से लगभग 240 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में स्थित है।
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‘नारकोंडम’ नाम की उत्पत्ति ‘नरक-कुंडम’ शब्द से मानी जाती है।
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इस द्वीप का ज्वालामुखीय पर्वत समुद्र की गहराई से ऊपर उठता है और समुद्र तल से इसकी ऊँचाई लगभग 710 मीटर है।
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यह द्वीप अपनी विशिष्ट ज्वालामुखीय संरचना और जैव विविधता के लिए महत्त्वपूर्ण है।
बैरन द्वीप
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बैरन द्वीप अंडमान सागर में श्री विजयपुरम से लगभग 138 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में स्थित है।
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इसका क्षेत्रफल लगभग 8.34 वर्ग किलोमीटर है।
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इसकी ऊँचाई समुद्र तल से लगभग 354 मीटर है।
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बैरन द्वीप दक्षिण एशिया के एकमात्र सक्रिय ज्वालामुखी के लिए प्रसिद्ध है।
सबडक्शन ज्वालामुखी क्या है?
सबडक्शन वह भूवैज्ञानिक प्रक्रिया है, जिसमें एक टेक्टोनिक प्लेट दूसरी प्लेट के नीचे धँसती है। इस प्रक्रिया से उत्पन्न परिस्थितियों में मैग्मा बन सकता है, जो पृथ्वी की सतह तक पहुँचकर ज्वालामुखीय गतिविधियों को जन्म देता है।
अंडमान क्षेत्र में भारतीय प्लेट और बर्मा माइक्रोप्लेट से जुड़ी टेक्टोनिक गतिविधियाँ इस क्षेत्र की ज्वालामुखीय संरचनाओं को समझने में महत्त्वपूर्ण हैं।
3. सिरपुर सांस्कृतिक एवं पुरातात्त्विक परिदृश्य
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सिरपुर गाँव छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में स्थित है। यह एक संरक्षित पुरातात्त्विक स्थल है।
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यह महानदी के पूर्वी तट पर स्थित है और राज्य की राजधानी रायपुर से लगभग 78 किलोमीटर दूर है।
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सिरपुर प्राचीन काल में कोसल राज्य का एक महत्त्वपूर्ण नगर था।
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इसका विकास शरभपुरीय राजवंश के शासनकाल में हुआ और बाद में यह पांडुवंशी राजवंश की राजधानी बना।
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सिरपुर का महत्त्व केवल इसके ऐतिहासिक और पुरातात्त्विक अवशेषों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी विशिष्ट भूवैज्ञानिक संरचना भी इसे विशेष बनाती है।
भूवैज्ञानिक विशेषताएँ
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सिरपुर छत्तीसगढ़ बेसिन में स्थित है, जो प्रोटेरोज़ोइक भूवैज्ञानिक काल की चट्टानों से संबंधित है।
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इस क्षेत्र की भू-आकृति पर रायपुर चूना पत्थर समूह का महत्त्वपूर्ण प्रभाव है।
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यहाँ स्ट्रोमैटोलाइट नामक विशिष्ट संरचनाएँ पाई जाती हैं।
स्ट्रोमैटोलाइट क्या हैं?
स्ट्रोमैटोलाइट परतदार अवसादी संरचनाएँ हैं, जिनका निर्माण प्राचीन काल में सूक्ष्मजीवों, विशेषकर सायनोबैक्टीरिया, की गतिविधियों से हुआ। इन संरचनाओं का संबंध पृथ्वी पर प्राचीन जीवन और पर्यावरण के विकास के अध्ययन से है।
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स्ट्रोमैटोलाइट संरचनाएँ एक अरब वर्ष से भी अधिक पुराने भूवैज्ञानिक इतिहास से जुड़ी हैं।
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समय के साथ इन संरचनाओं में खनिजों का जमाव और कैल्सीकरण हुआ, जिससे विशिष्ट बनावट वाली चट्टानें विकसित हुईं।
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सिरपुर के अनेक पुरातात्त्विक स्थलों पर इन चट्टानों का उपयोग निर्माण सामग्री के रूप में दिखाई देता है।
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इस प्रकार, सिरपुर का सांस्कृतिक परिदृश्य प्राकृतिक भूवैज्ञानिक विरासत और प्राचीन मानव सभ्यता के बीच संबंध को दर्शाता है।
भारत के लिए इन तीन स्थलों का महत्त्व
भारत के इन तीन स्थलों को यूनेस्को की अस्थायी सूची में शामिल किया जाना देश की प्राकृतिक, भूवैज्ञानिक, सांस्कृतिक और पुरातात्त्विक विरासत की विविधता को रेखांकित करता है।
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बाराटांग: चूना पत्थर की गुफाओं और सक्रिय कीचड़ ज्वालामुखियों के लिए महत्त्वपूर्ण।
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नारकोंडम एवं बैरन द्वीप: ज्वालामुखीय गतिविधियों, भूवैज्ञानिक प्रक्रियाओं और विशिष्ट जैव विविधता के लिए महत्त्वपूर्ण।
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सिरपुर: प्राचीन इतिहास, पुरातात्त्विक अवशेषों और विशिष्ट स्ट्रोमैटोलाइट भूवैज्ञानिक संरचनाओं के लिए महत्त्वपूर्ण।
इन स्थलों की अस्थायी सूची में प्रविष्टि इनके संरक्षण, वैज्ञानिक अध्ययन और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बढ़ाने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है। हालाँकि, इन्हें अंतिम विश्व धरोहर सूची में शामिल करने के लिए यूनेस्को की निर्धारित मूल्यांकन प्रक्रिया पूरी करनी होगी।