193 सदस्यीय संयुक्त राष्ट्र महासभा में यह प्रस्ताव 130 मतों के पक्ष में और 17 मतों के विरोध में पारित हुआ, जबकि 25 देशों ने मतदान में भाग नहीं लिया (Abstained)। वर्ष 2025 में यह प्रस्ताव 165 मतों के पक्ष में, 7 मतों के विरोध में पारित हुआ था, जबकि 12 देशों ने मतदान में भाग नहीं लिया था।
यह मतदान ऐसे समय में हुआ, जब क्यूबा गंभीर ऊर्जा संकट से जूझ रहा है। वेनेजुएला के राष्ट्रपति को न्यूयॉर्क ले जाए जाने की घटना के बाद अमेरिका द्वारा ईंधन आपूर्ति पर लगाए गए प्रतिबंधों ने क्यूबा की स्थिति को और कठिन बना दिया है। इससे पूरे द्वीप के लोगों का दैनिक जीवन प्रभावित हुआ है।
छह दशकों से जारी अमेरिकी प्रतिबंध
अमेरिका ने क्यूबा पर व्यापक आर्थिक प्रतिबंध लगा रखे हैं। इन प्रतिबंधों की जड़ें शीत युद्ध (Cold War) के दौर में हैं। जनवरी 1959 में फिदेल कास्त्रो और उनके क्रांतिकारियों ने क्यूबा में सत्ता पर अधिकार कर लिया था।
अक्टूबर 1960 में अमेरिकी राष्ट्रपति ड्वाइट डी. आइजनहावर के प्रशासन के विदेश विभाग ने क्यूबा पर पहला व्यापार प्रतिबंध लगाया।
फरवरी 1962 में अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ. कैनेडी ने क्यूबा सरकार की कुछ कार्रवाइयों के जवाब में दोनों देशों के बीच व्यापार पर प्रतिबंध की घोषणा की। उन्होंने वाणिज्य विभाग और वित्त विभाग को इसे लागू करने का निर्देश दिया। यह प्रतिबंध आज भी लागू है।
क्यूबा के विरुद्ध अमेरिकी प्रतिबंध आधुनिक इतिहास के सबसे लंबे समय तक जारी रहने वाले प्रतिबंधों में से एक है। ये आर्थिक, वाणिज्यिक और वित्तीय प्रतिबंध कई दशकों में बनाए गए अमेरिकी कानूनों के माध्यम से लागू किए गए हैं।
1992 — क्यूबन डेमोक्रेसी एक्ट (Cuban Democracy Act): इस कानून ने प्रतिबंधों से संबंधित नियमों को विधायी आधार प्रदान किया। इसे टॉरिसेली एक्ट (Torricelli Act) भी कहा जाता है। इसके तहत केवल अमेरिकी कंपनियों ही नहीं, बल्कि तीसरे देशों में स्थित उनकी सहायक कंपनियों के लिए भी क्यूबा की कंपनियों के साथ व्यापार करने पर प्रतिबंध लगाया गया। इसके अतिरिक्त, क्यूबा के बंदरगाहों पर ठहरने के बाद छह महीने की अवधि पूरी होने तक किसी वाणिज्यिक जहाज के अमेरिकी क्षेत्र में प्रवेश पर रोक संबंधी प्रावधान ने क्यूबा के समुद्री व्यापार के लिए कठिनाइयाँ उत्पन्न कीं।
1996 — हेल्म्स-बर्टन एक्ट (Helms-Burton Act): राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के कार्यकाल में क्यूबन लिबर्टी एंड डेमोक्रेटिक सॉलिडैरिटी (LIBERTAD) एक्ट पारित किया गया। इस कानून के तहत क्यूबा में राष्ट्रीयकृत अमेरिकी संपत्तियों से जुड़े लेन-देन करने वाली विदेशी कंपनियों के अधिकारियों पर प्रतिबंध लगाने तथा अमेरिकी अदालतों में मुकदमे दायर करने संबंधी प्रावधान शामिल किए गए।
ओबामा प्रशासन का दौर: राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में अमेरिका और क्यूबा के बीच तनाव कम हुआ। दोनों देशों ने राजनयिक संबंध बहाल किए और दूतावास दोबारा खोले। क्यूबा पर लागू कुछ यात्रा प्रतिबंधों में ढील दी गई, उसे आतंकवाद को प्रायोजित करने वाले देशों की अमेरिकी सूची से हटाया गया तथा दोनों देशों के बीच नियमित सीधी उड़ानें और प्रत्यक्ष डाक सेवाएँ बहाल की गईं।
ट्रंप प्रशासन की नीति: राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने ओबामा काल में दी गई कई रियायतों को पलट दिया और क्यूबा पर प्रतिबंधों को और कड़ा किया।
संयुक्त राष्ट्र के क्यूबा स्थित रेजिडेंट कोऑर्डिनेटर के अनुसार, इन प्रतिबंधों ने ऊर्जा संकट को गंभीर बनाया है और मानवीय संकट की आशंका बढ़ाई है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने भी चेतावनी दी है कि ऊर्जा की कमी का स्वास्थ्य सेवाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।
मई में संयुक्त राष्ट्र के वरिष्ठ अधिकारियों ने बताया कि क्यूबा में 1 लाख से अधिक शल्य चिकित्सा प्रक्रियाएँ (Surgical Procedures) स्थगित करनी पड़ी थीं।
क्यूबा के अधिकारियों ने स्वास्थ्य व्यवस्था को हुए अन्य नुकसान की ओर भी ध्यान आकर्षित किया है। इनमें टीकाकरण कार्यक्रमों में देरी तथा पुरानी बीमारियों से पीड़ित मरीजों को नियमित रूप से दवाएँ उपलब्ध न हो पाना शामिल है।
वर्ष 2026 में राष्ट्रपति ट्रंप ने क्यूबा में सैन्य हस्तक्षेप की संभावना का भी उल्लेख किया है।
संयुक्त राष्ट्र महासभा में 34वीं बार मतदान
प्रत्येक वर्ष इस अवधि के आसपास संयुक्त राष्ट्र महासभा में अमेरिका द्वारा क्यूबा पर लगाए गए आर्थिक, वाणिज्यिक और वित्तीय प्रतिबंधों को समाप्त करने की आवश्यकता से संबंधित प्रस्ताव पर चर्चा और मतदान होता है।
संयुक्त राष्ट्र के सभी 193 सदस्य देशों को महासभा में एक-एक मत देने का अधिकार है।
क्यूबा द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव में देशों की संप्रभु समानता, उनके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने के सिद्धांत तथा अंतरराष्ट्रीय व्यापार और नौवहन की स्वतंत्रता की पुष्टि की गई है। ये सिद्धांत अनेक अंतरराष्ट्रीय कानूनी दस्तावेजों में निहित हैं।
प्रस्ताव सभी देशों से ऐसे प्रतिबंधात्मक उपाय अपनाने से बचने और पहले से लागू ऐसे उपायों को समाप्त करने का आह्वान करता है।
राजनीतिक परिस्थितियाँ चाहे जैसी भी हों, यह मुद्दा हर वर्ष अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में व्यापक चर्चा का विषय बनता है। इस पर बहस सामान्यतः दो दिनों तक चलती है, जिसमें विभिन्न देश और क्षेत्रीय समूह अपने विचार प्रस्तुत करते हैं।
संयुक्त राष्ट्र महासभा में इस मुद्दे पर पहली बार वर्ष 1992 में मतदान हुआ था।
पहले मतदान में 59 देशों ने प्रस्ताव के पक्ष में, 3 देशों ने विरोध में मतदान किया था। 71 देश मतदान से अनुपस्थित रहे और 46 देशों ने मतदान नहीं किया था।
वर्ष 2015, 2016 और 2017 में इस प्रस्ताव को सर्वाधिक 191 मतों का समर्थन मिला। यह वह अवधि थी, जब अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में अमेरिका और क्यूबा के संबंधों में सुधार हुआ था।
वर्ष 2015 और 2017 में अमेरिका तथा इज़राइल ने प्रस्ताव के विरुद्ध मतदान किया था। वर्ष 2016 में दोनों देशों ने मतदान में भाग नहीं लिया था।
समय के साथ कुछ देशों की सरकारें बदलने के कारण उनके मतदान रुख में परिवर्तन आया है, जबकि कई देशों ने दशकों से अपना रुख बनाए रखा है।
कनाडा, चीन और रूस लंबे समय से प्रस्ताव के पक्ष में मतदान करते रहे हैं। वहीं, इज़राइल के समर्थन के साथ अमेरिका ने एक वर्ष को छोड़कर प्रत्येक वर्ष प्रस्ताव के विरुद्ध मतदान किया है।
इस मुद्दे पर भारत का रुख क्या है?
भारत ने क्यूबा के विरुद्ध अमेरिका द्वारा लगाए गए आर्थिक, वाणिज्यिक और वित्तीय प्रतिबंधों को समाप्त करने की मांग करने वाले प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया।
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन की काउंसलर सौम्या नायर ने भारत का पक्ष रखते हुए कहा कि संयुक्त राष्ट्र महासभा बार-बार इन प्रतिबंधों को समाप्त करने की मांग कर चुकी है।
उन्होंने ऐसे कानूनों और नियमों को भी अस्वीकार किए जाने की आवश्यकता पर जोर दिया, जिनका प्रभाव दूसरे देशों की सीमाओं से बाहर तक पड़ता है और जो उन देशों की संप्रभुता, विकास तथा नागरिकों की समृद्धि को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करते हैं।
संयुक्त राष्ट्र महासचिव की रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए भारत ने इस बात पर प्रकाश डाला कि इन प्रतिबंधों का क्यूबा की अर्थव्यवस्था और आवश्यक सेवाओं पर गंभीर प्रभाव पड़ा है।