लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने 26 अक्टूबर को संसद भवन परिसर स्थित ऐतिहासिक संविधान सदन (Samvidhan Sadan) में इस मंच का उद्घाटन किया।
इस वर्ष के मंच का मुख्य विषय “जन-केंद्रित विकास के लिए संसदों को सशक्त बनाना” (Strengthening Parliaments for People-Centric Development) था।
इस मंच का उद्देश्य सदस्य देशों की संसदों के बीच संवाद, सहयोग और आपसी समझ को बढ़ावा देना था। इसके अंतर्गत लचीलापन (Resilience), नवाचार (Innovation), सहयोग (Cooperation) और सतत विकास (Sustainability) जैसे विषयों पर आधारित चार उच्चस्तरीय सत्र आयोजित किए गए।
12वें ब्रिक्स संसदीय मंच की प्रमुख विशेषताएँ
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आयोजन स्थल: संविधान सदन, संसद भवन परिसर, नई दिल्ली।
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आयोजन की अवधि: 26-27 अक्टूबर।
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उद्घाटनकर्ता: लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला।
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मुख्य विषय: जन-केंद्रित विकास के लिए संसदों को सशक्त बनाना।
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समापन: 27 अक्टूबर को संयुक्त घोषणा-पत्र अपनाया गया।
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प्रमुख विषय: लचीलापन, नवाचार, सहयोग और सतत विकास।
संयुक्त घोषणा-पत्र (Joint Declaration) के प्रमुख बिंदु
12वें ब्रिक्स संसदीय मंच के समापन पर सदस्य देशों ने एक संयुक्त घोषणा-पत्र अपनाया। इसमें वैश्विक अर्थव्यवस्था, अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा, आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन और संयुक्त राष्ट्र में सुधार जैसे महत्त्वपूर्ण मुद्दों को शामिल किया गया।
एकतरफा आर्थिक प्रतिबंधों का विरोध
संयुक्त घोषणा-पत्र में एकतरफा आर्थिक प्रतिबंधों (Unilateral Economic Sanctions) और द्वितीयक प्रतिबंधों (Secondary Sanctions) की निंदा की गई।
सदस्य देशों ने कहा कि इस प्रकार के दबावपूर्ण आर्थिक उपायों का मानवाधिकारों पर व्यापक नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
इन प्रतिबंधों से विशेष रूप से निम्नलिखित अधिकार प्रभावित हो सकते हैं:
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विकास का अधिकार (Right to Development)।
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स्वास्थ्य का अधिकार (Right to Health)।
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खाद्य सुरक्षा (Food Security)।
घोषणा-पत्र में इस बात पर जोर दिया गया कि आर्थिक प्रतिबंधों का प्रभाव केवल संबंधित देशों की अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आम नागरिकों के जीवन और विकास के अवसरों पर भी पड़ सकता है।
संयुक्त राष्ट्र में व्यापक सुधार का समर्थन
ब्रिक्स संसदीय मंच ने संयुक्त राष्ट्र (United Nations – UN) में व्यापक सुधारों का समर्थन किया। इसमें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UN Security Council) में सुधार को भी शामिल किया गया।
इसका उद्देश्य संयुक्त राष्ट्र की संस्थाओं को अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण, प्रभावी और समकालीन वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप बनाना है।
विशेष रूप से विकासशील देशों को वैश्विक निर्णय लेने की प्रक्रिया में उचित प्रतिनिधित्व देने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।
आतंकवाद की कड़ी निंदा
संयुक्त घोषणा-पत्र में आतंकवाद के सभी स्वरूपों और अभिव्यक्तियों की कड़ी निंदा की गई।
इसमें कहा गया कि आतंकवाद किसी भी परिस्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता, चाहे उसे किसी भी उद्देश्य, स्थान या व्यक्ति द्वारा अंजाम दिया गया हो।
घोषणा-पत्र में यह भी स्पष्ट किया गया कि आतंकवाद को किसी धर्म, राष्ट्रीयता, सभ्यता या जातीय समूह से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।
इसके अतिरिक्त आतंकवादी गतिविधियों में शामिल व्यक्तियों तथा उन्हें सहायता प्रदान करने वालों को संबंधित राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के अनुसार जवाबदेह ठहराने और न्याय के कटघरे में लाने पर जोर दिया गया।
इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष के शांतिपूर्ण समाधान का समर्थन
ब्रिक्स संसदीय मंच ने इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष के शांतिपूर्ण समाधान के प्रति अपना समर्थन दोहराया।
घोषणा-पत्र में दो-राष्ट्र समाधान (Two-State Solution) का समर्थन किया गया। इस समाधान के अनुसार इजराइल और फिलिस्तीन दो स्वतंत्र राष्ट्रों के रूप में शांति एवं सुरक्षा के साथ एक-दूसरे के साथ अस्तित्व में रहें।
इसका उद्देश्य क्षेत्र में स्थायी शांति, सुरक्षा और स्थिरता स्थापित करना है।
जलवायु परिवर्तन और सतत विकास पर जोर
संयुक्त घोषणा-पत्र में जलवायु परिवर्तन (Climate Change) की चुनौती से निपटने की तात्कालिक आवश्यकता को स्वीकार किया गया।
सदस्य देशों ने संवाद और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से जलवायु परिवर्तन से संबंधित प्रयासों को तेज करने पर जोर दिया।
इसके अंतर्गत निम्नलिखित प्रमुख विषयों को शामिल किया गया:
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राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (Nationally Determined Contributions – NDCs) को लागू करना।
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जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के प्रयासों को मजबूत बनाना।
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जलवायु अनुकूलन (Climate Adaptation) से संबंधित उपायों को बढ़ावा देना।
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संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा अभिसमय (UNFCCC) के उद्देश्यों को प्राप्त करने की दिशा में कार्य करना।
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पेरिस जलवायु समझौते (Paris Agreement) के लक्ष्यों को लागू करने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाना।
ब्रिक्स (BRICS) क्या है?
ब्रिक्स (BRICS) उभरती अर्थव्यवस्थाओं और विकासशील देशों का एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय समूह है। इसका उद्देश्य सदस्य देशों के बीच आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक और तकनीकी सहयोग को बढ़ावा देना है।
प्रारंभ में इस समूह में ब्राजील, रूस, भारत और चीन शामिल थे। वर्ष 2010 में दक्षिण अफ्रीका के शामिल होने के बाद इसका नाम BRIC से बदलकर BRICS हो गया।
ब्रिक्स देशों को वैश्विक मंचों, विशेष रूप से G20 में उभरती अर्थव्यवस्थाओं और विकासशील देशों की आवाज के रूप में महत्त्वपूर्ण माना जाता है।
विस्तार के बाद इस समूह में नए सदस्य देशों के शामिल होने से इसका दायरा बढ़ा है। दिए गए विवरण के अनुसार, इसमें मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और इंडोनेशिया को नए सदस्यों के रूप में शामिल किया गया है।
ब्रिक्स की स्थापना एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
1. वर्ष 2001 – BRIC शब्द का प्रयोग
BRIC शब्द का पहली बार प्रयोग वर्ष 2001 में गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs) के अर्थशास्त्री जिम ओ’नील द्वारा एक शोध पत्र में किया गया था।
इस शोध पत्र का शीर्षक था— The World Needs Better Economic BRICs।
इसमें आर्थिक विश्लेषण के आधार पर अनुमान लगाया गया था कि ब्राजील, रूस, भारत और चीन की अर्थव्यवस्थाएँ आने वाले लगभग 50 वर्षों में वैश्विक अर्थव्यवस्था में अधिक महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर सकती हैं।
2. वर्ष 2006 – पहली उच्चस्तरीय बैठक
ब्राजील, रूस, भारत और चीन के नेताओं की पहली बैठक जुलाई 2006 में रूस के सेंट पीटर्सबर्ग में आयोजित G8 आउटरीच शिखर सम्मेलन के अवसर पर हुई थी।
इसके बाद सितंबर 2006 में न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा की सामान्य बहस के दौरान पहली BRIC विदेश मंत्रियों की बैठक आयोजित हुई। इसी के साथ BRIC समूह को औपचारिक स्वरूप मिला।
3. वर्ष 2009 – पहला BRIC शिखर सम्मेलन
BRIC देशों का पहला शिखर सम्मेलन 16 जून 2009 को रूस के येकातेरिनबर्ग (Yekaterinburg) में आयोजित किया गया।
इस बैठक में चारों देशों ने आपसी सहयोग को मजबूत बनाने और वैश्विक आर्थिक एवं राजनीतिक मुद्दों पर साझा दृष्टिकोण विकसित करने पर जोर दिया।
4. वर्ष 2010-2011 – दक्षिण अफ्रीका का समावेश
सितंबर 2010 में न्यूयॉर्क में आयोजित BRIC विदेश मंत्रियों की बैठक में दक्षिण अफ्रीका को समूह में शामिल करने पर सहमति बनी।
इसके बाद 14 अप्रैल 2011 को चीन के सान्या (Sanya) में आयोजित तीसरे शिखर सम्मेलन में दक्षिण अफ्रीका ने पहली बार BRICS सदस्य के रूप में भाग लिया।
इसके साथ ही BRIC का नाम बदलकर BRICS हो गया।
न्यू डेवलपमेंट बैंक (New Development Bank – NDB)
ब्रिक्स समूह की एक प्रमुख उपलब्धि न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) की स्थापना है।
इस बैंक की स्थापना वर्ष 2015 में ब्रिक्स देशों द्वारा की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य उभरते बाजारों और विकासशील देशों में बुनियादी ढाँचे तथा सतत विकास से संबंधित परियोजनाओं के लिए वित्तीय संसाधन जुटाना है।
NDB के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं:
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सदस्य देशों में बुनियादी ढाँचे के विकास के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध कराना।
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सतत विकास से संबंधित परियोजनाओं को वित्तपोषित करना।
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विकासशील देशों में आर्थिक एवं सामाजिक प्रगति को प्रोत्साहित करना।
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स्वच्छ ऊर्जा, परिवहन, जल एवं अन्य आधारभूत सुविधाओं के विकास में निवेश को बढ़ावा देना।
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उभरती अर्थव्यवस्थाओं के बीच वित्तीय सहयोग को मजबूत बनाना।
इस प्रकार ब्रिक्स ने केवल एक आर्थिक एवं राजनीतिक सहयोग समूह के रूप में ही नहीं, बल्कि विकासशील देशों के लिए वैकल्पिक वित्तीय सहयोग व्यवस्था विकसित करने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।