न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति विनोद चंद्रन की पीठ ने केंद्र सरकार को डिजिटल मंचों पर नाबालिगों को दर्शाने वाली यौन रूप से स्पष्ट सामग्री की पहचान करने और उसे हटाने के लिए एक राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार करने का निर्देश दिया।
यह मामला गैर-सरकारी संगठन ‘जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन एलायंस’ की याचिका से संबंधित था। इस याचिका में सोशल मीडिया मंचों पर बाल यौन शोषण एवं दुर्व्यवहार से संबंधित सामग्री (CSEAM) के प्रसार में चिंताजनक वृद्धि की ओर न्यायालय का ध्यान आकर्षित किया गया था।
इंटरनेट का महत्त्व और बच्चों के लिए इसकी उपयोगिता
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि इंटरनेट विचारों के आदान-प्रदान, रचनात्मक अभिव्यक्ति और सूचना प्राप्त करने का एक महत्त्वपूर्ण माध्यम है। इसका महत्त्व केवल इसमें उपलब्ध जानकारी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लोगों को ज्ञान, शिक्षा और विभिन्न विचारों तक पहुँचने का अवसर भी प्रदान करता है।
वर्तमान समय में इंटरनेट बच्चों की शिक्षा और बौद्धिक विकास का एक महत्त्वपूर्ण साधन बन चुका है। इसके माध्यम से बच्चे ऑनलाइन कक्षाओं में भाग ले सकते हैं, शैक्षिक सामग्री प्राप्त कर सकते हैं, नई भाषाएँ सीख सकते हैं और देश-दुनिया की घटनाओं से परिचित हो सकते हैं।
विशेष रूप से दूरदराज के ग्रामीण और दुर्गम क्षेत्रों में रहने वाले बच्चों के लिए इंटरनेट शिक्षा एवं सूचना का एक प्रमुख माध्यम है। जहाँ गुणवत्तापूर्ण शैक्षिक संस्थानों, पुस्तकालयों और अन्य संसाधनों की उपलब्धता सीमित है, वहाँ इंटरनेट बच्चों को सीखने के अतिरिक्त अवसर प्रदान करता है।
इसलिए, इंटरनेट तक पहुँच को पूरी तरह समाप्त करना बच्चों के शैक्षिक अवसरों, सूचना प्राप्त करने की स्वतंत्रता और व्यक्तित्व विकास को प्रभावित कर सकता है।
बच्चों के लिए इंटरनेट की सुरक्षा एक गंभीर चुनौती
न्यायालय ने इस तथ्य को भी स्वीकार किया कि वर्तमान स्वरूप में इंटरनेट बच्चों के लिए पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। डिजिटल मंचों पर बाल यौन शोषण से संबंधित सामग्री, अनुचित विज्ञापन, अज्ञात व्यक्तियों के संपर्क और अन्य हानिकारक सामग्री बच्चों की सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती प्रस्तुत करते हैं।
सोशल मीडिया के माध्यम से ऐसी सामग्री तेजी से प्रसारित हो सकती है। एक बार किसी सामग्री के डिजिटल मंच पर प्रसारित हो जाने के बाद उसकी प्रतियाँ विभिन्न खातों, वेबसाइटों और अन्य मंचों पर पहुँच सकती हैं। इससे पीड़ित बच्चों की निजता, गरिमा और मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
न्यायालय के अनुसार, बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी उपाय करना आवश्यक है। हालाँकि, इन उपायों का उद्देश्य बच्चों के अधिकारों को समाप्त करना नहीं, बल्कि उन्हें डिजिटल वातावरण में सुरक्षित रखना होना चाहिए।
बच्चों की इंटरनेट पहुँच पर पूर्ण प्रतिबंध उचित नहीं
सर्वोच्च न्यायालय ने बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के नाम पर एक निश्चित आयु से कम बच्चों के लिए इंटरनेट अथवा सोशल मीडिया पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त की।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि बच्चों को इंटरनेट से दूर रखना समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। यदि इंटरनेट पर हानिकारक सामग्री उपलब्ध है, तो उस सामग्री को बनाने, प्रसारित करने, बेचने या जानबूझकर खोजने वाले व्यक्तियों के विरुद्ध कार्रवाई की जानी चाहिए।
इसी प्रकार, डिजिटल मंचों और मध्यस्थ संस्थाओं की भी जिम्मेदारी है कि वे अपने मंचों पर उपलब्ध अवैध सामग्री की पहचान करें और उसे हटाने के लिए प्रभावी व्यवस्था बनाएँ।
न्यायालय के विचार का मूल आधार यह है कि बच्चों को इंटरनेट पर होने वाले अपराधों का जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। यदि कुछ व्यक्ति या डिजिटल मंच अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करने में विफल रहते हैं, तो उसके कारण बच्चों के अधिकारों को पूरी तरह सीमित करना पीड़ित को ही समस्या मानने के समान होगा।
अनुच्छेद 21 के अंतर्गत इंटरनेट तक पहुँचने का अधिकार
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण प्रदान करता है। इसके अंतर्गत व्यक्ति को विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही उसके जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित किया जा सकता है।
सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 21 को अनुच्छेद 19(1)(a) के साथ पढ़ते हुए इंटरनेट तक पहुँचने और उसका उपयोग करने के अधिकार को प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार माना।
अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों को वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है। इस स्वतंत्रता का अर्थ केवल अपने विचार व्यक्त करना नहीं है, बल्कि इसमें सूचना प्राप्त करने, विचारों को जानने तथा सूचनाओं और विचारों का आदान-प्रदान करने का अधिकार भी शामिल है।
आज इंटरनेट इन अधिकारों के प्रयोग का एक महत्त्वपूर्ण माध्यम है। इसके जरिए नागरिक समाचार प्राप्त करते हैं, शैक्षिक सामग्री का अध्ययन करते हैं, अपने विचार व्यक्त करते हैं और सार्वजनिक विमर्श में भाग लेते हैं।
इस प्रकार, इंटरनेट तक पहुँच और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच गहरा संबंध है। इंटरनेट पर अनुचित या व्यापक प्रतिबंध लगाने से सूचना प्राप्त करने और विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता भी प्रभावित हो सकती है।
अनुच्छेद 19(1)(a) और अनुच्छेद 19(1)(g) का संबंध
संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों को वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है, जबकि अनुच्छेद 19(1)(g) उन्हें कोई भी पेशा अपनाने अथवा कोई व्यवसाय, व्यापार या रोजगार करने का अधिकार देता है।
डिजिटल युग में इंटरनेट सूचना के आदान-प्रदान के साथ-साथ व्यापार, रोजगार और व्यावसायिक गतिविधियों का भी महत्त्वपूर्ण माध्यम है। ऑनलाइन शिक्षा, डिजिटल सेवाएँ, ई-कॉमर्स और अन्य इंटरनेट आधारित गतिविधियाँ इन अधिकारों के व्यावहारिक महत्त्व को दर्शाती हैं।
हालाँकि, इन अधिकारों का अर्थ यह नहीं है कि इंटरनेट पर किसी भी प्रकार की सामग्री या गतिविधि को बिना किसी नियमन के अनुमति दी जा सकती है। संविधान के अंतर्गत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अनुच्छेद 19(2) में निर्धारित आधारों पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। इसी प्रकार, व्यवसाय करने की स्वतंत्रता पर अनुच्छेद 19(6) के अंतर्गत उचित प्रतिबंध संभव हैं।
इसलिए, इंटरनेट के उपयोग को नियंत्रित करने वाले उपाय संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप, उचित और आनुपातिक होने चाहिए।
अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ मामला, 2020
इंटरनेट तक पहुँच और मौलिक अधिकारों के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय का एक महत्त्वपूर्ण निर्णय अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ मामले में आया था।
वर्ष 2020 में सर्वोच्च न्यायालय की तीन न्यायाधीशों की पीठ ने इंटरनेट सेवाओं के निलंबन की वैधता पर विचार किया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि इंटरनेट के माध्यम से वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रयोग अनुच्छेद 19(1)(a) के अंतर्गत संवैधानिक संरक्षण प्राप्त करता है। इसी प्रकार, इंटरनेट के माध्यम से व्यापार या व्यवसाय करने की स्वतंत्रता अनुच्छेद 19(1)(g) के अंतर्गत संरक्षित है।
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि इंटरनेट सेवाओं को अनिश्चितकाल तक निलंबित नहीं रखा जा सकता तथा ऐसे प्रतिबंधों की वैधता की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है।
इस निर्णय ने इंटरनेट के माध्यम से मौलिक अधिकारों के प्रयोग और इंटरनेट सेवाओं पर लगाए जाने वाले प्रतिबंधों के लिए संवैधानिक मानदंडों को स्पष्ट करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
वर्तमान मामले में बच्चों के इंटरनेट अधिकारों पर दिया गया निर्णय इसी व्यापक संवैधानिक दृष्टिकोण को आगे बढ़ाता है।
बच्चों को भी समान मौलिक अधिकार प्राप्त हैं
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि बच्चे भी संविधान द्वारा संरक्षित अधिकारों के हकदार हैं। केवल कम आयु होने के कारण उन्हें मौलिक अधिकारों से पूरी तरह वंचित नहीं किया जा सकता।
बच्चों की आयु और उनकी समझ के स्तर के अनुसार कुछ विशेष सुरक्षा उपाय आवश्यक हो सकते हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि उनके सूचना प्राप्त करने, विचार व्यक्त करने और शिक्षा हासिल करने के अधिकारों को पूरी तरह समाप्त कर दिया जाए।
न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि बच्चों की स्वतंत्रता और उनकी सुरक्षा एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। बच्चों को दोनों अधिकार प्राप्त हैं और राज्य तथा डिजिटल मंचों की जिम्मेदारी है कि वे इनके बीच उचित संतुलन स्थापित करें।
इस दृष्टिकोण के अनुसार, बच्चों के लिए ऐसी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए जो उन्हें इंटरनेट के लाभों से वंचित किए बिना ऑनलाइन खतरों से बचा सके।
बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा और आनुपातिकता का सिद्धांत
न्यायालय ने बच्चों के इंटरनेट उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने वाले उपायों को अनुचित और अनुपातहीन बताया। किसी प्रतिबंध का उद्देश्य यदि बच्चों की सुरक्षा है, तो यह भी देखना आवश्यक है कि क्या वही उद्देश्य कम प्रतिबंधात्मक उपायों से प्राप्त किया जा सकता है।
इसे संवैधानिक कानून में आनुपातिकता का सिद्धांत कहा जाता है। इसके अनुसार, किसी अधिकार पर लगाया गया प्रतिबंध अपने उद्देश्य की तुलना में आवश्यकता से अधिक व्यापक नहीं होना चाहिए।
उदाहरण के लिए, यदि बच्चों को यौन शोषण से संबंधित सामग्री से बचाना है, तो उस सामग्री को हटाना, उसके प्रसार को रोकना, दोषियों की पहचान करना और बच्चों के खातों की सुरक्षा बढ़ाना अधिक लक्षित उपाय हो सकते हैं।
इसके विपरीत, सभी बच्चों के लिए इंटरनेट तक पहुँच पूरी तरह बंद कर देना शिक्षा, सूचना और अभिव्यक्ति के अवसरों को भी प्रभावित करेगा।
इसलिए, न्यायालय का दृष्टिकोण बच्चों की सुरक्षा और उनकी स्वतंत्रता के बीच संतुलन स्थापित करने पर केंद्रित है।
बच्चों के लिए आयु-आधारित प्रतिबंध और सुरक्षा उपाय
सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि इंटरनेट तक पहुँचने के अधिकार को मौलिक अधिकार मानने का अर्थ यह नहीं है कि बच्चों के लिए किसी भी प्रकार के आयु-आधारित प्रतिबंध नहीं लगाए जा सकते।
बच्चों की आयु, समझ और डिजिटल परिपक्वता को ध्यान में रखते हुए उचित सुरक्षा उपाय अपनाए जा सकते हैं। इन उपायों का उद्देश्य बच्चों को हानिकारक सामग्री और ऑनलाइन शोषण से बचाना होना चाहिए।
न्यायालय ने ऐसे संभावित उपायों की ओर संकेत किया, जिनमें निम्नलिखित शामिल हो सकते हैं।
1. माता-पिता की सहमति और मार्गदर्शन: कम आयु के बच्चों को सोशल मीडिया मंचों पर खाते बनाने या उनका उपयोग करने की अनुमति देने से पहले माता-पिता की सहमति और मार्गदर्शन को महत्त्व दिया जा सकता है।
2. अभिभावकीय निगरानी: बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर उनकी निजता और आयु के अनुरूप उचित निगरानी की व्यवस्था की जा सकती है, जिससे उन्हें संभावित खतरों से बचाया जा सके।
3. विशेष ‘चाइल्ड मोड’: बच्चों के खातों में एक विशेष बाल-सुरक्षा मोड उपलब्ध कराया जा सकता है। इसके माध्यम से बच्चों को दिखाई देने वाली सामग्री और उपलब्ध सुविधाओं को उनकी आयु के अनुसार नियंत्रित किया जा सकता है।
4. खातों को डिफॉल्ट रूप से निजी रखना: बच्चों के सोशल मीडिया खातों को प्रारंभ से ही निजी रखा जा सकता है, ताकि उनकी व्यक्तिगत जानकारी और गतिविधियाँ अनजान लोगों के लिए आसानी से उपलब्ध न हों।
5. अज्ञात वयस्कों से संपर्क पर नियंत्रण: अनजान वयस्कों द्वारा बच्चों को संदेश भेजने, उनसे संपर्क स्थापित करने या उन्हें अनुचित बातचीत में शामिल करने की संभावनाओं को सीमित किया जा सकता है।
6. विज्ञापनों और सामग्री का नियमन: बच्चों को दिखाई जाने वाली सामग्री और विज्ञापनों की प्रभावी निगरानी की जा सकती है, ताकि उन्हें अनुचित, शोषणकारी या उनकी आयु के लिए अनुपयुक्त सामग्री से बचाया जा सके।
7. अभिभावकीय सहमति का सत्यापन: कम आयु के बच्चों के लिए माता-पिता की सहमति सुनिश्चित करने हेतु ऐसी व्यवस्था बनाई जा सकती है, जो प्रभावी होने के साथ-साथ उचित और आनुपातिक भी हो।
न्यायालय ने विशेष रूप से कम आयु के बच्चों, अर्थात् किशोरावस्था से पहले के बच्चों (प्री-टीन्स), के लिए ऐसे उपायों पर विचार करने की आवश्यकता बताई।
बाल यौन शोषण संबंधी सामग्री की पहचान और हटाने के लिए राष्ट्रीय डेटाबेस
इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को डिजिटल मंचों पर नाबालिगों को दर्शाने वाली यौन रूप से स्पष्ट सामग्री की पहचान और उसे हटाने के लिए राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार करने का निर्देश दिया।
इस पहल का प्रमुख उद्देश्य ऐसी सामग्री के प्रसार को रोकना तथा उसकी पहचान और निष्कासन की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाना है।
डिजिटल मंचों पर ऐसी सामग्री की बार-बार प्रतियाँ अपलोड किए जाने की समस्या को देखते हुए, एक व्यवस्थित राष्ट्रीय डेटाबेस संबंधित संस्थाओं को संदिग्ध सामग्री की पहचान करने और उसके विरुद्ध कार्रवाई करने में सहायता प्रदान कर सकता है।
हालाँकि, ऐसी व्यवस्था बनाते समय बच्चों की पहचान, निजता और व्यक्तिगत जानकारी की सुरक्षा भी सुनिश्चित करनी होगी। डेटाबेस का उपयोग कानूनी प्रावधानों के अनुसार और पर्याप्त सुरक्षा उपायों के साथ किया जाना आवश्यक है।
इसके साथ ही, डिजिटल मंचों की जवाबदेही, त्वरित शिकायत निवारण, सामग्री हटाने की प्रभावी प्रक्रिया और अपराधियों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई भी महत्त्वपूर्ण होगी।
डिजिटल मंचों और मध्यस्थ संस्थाओं की जिम्मेदारी
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि इंटरनेट पर बच्चों की सुरक्षा की जिम्मेदारी केवल बच्चों या उनके माता-पिता पर नहीं डाली जा सकती। डिजिटल मंचों और मध्यस्थ संस्थाओं की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका है।
ऐसे मंचों को अपनी सेवाओं पर उपलब्ध हानिकारक सामग्री की पहचान करने, उसकी शिकायतों पर कार्रवाई करने और लागू कानूनों के अनुसार अवैध सामग्री को हटाने के लिए प्रभावी व्यवस्थाएँ विकसित करनी चाहिए।
इसके अतिरिक्त, उन्हें ऐसी तकनीकी व्यवस्थाओं पर विचार करना चाहिए, जो बच्चों को संदिग्ध खातों, अनुचित संदेशों और हानिकारक सामग्री से बचाने में सहायक हों।
यदि किसी मंच की सुरक्षा व्यवस्था में कमियाँ हैं, तो उन कमियों को दूर करना आवश्यक है। बच्चों को इंटरनेट से दूर रखने के बजाय इंटरनेट को उनके लिए अधिक सुरक्षित बनाना इस दृष्टिकोण का प्रमुख उद्देश्य है।
निर्णय का व्यापक सामाजिक और संवैधानिक महत्त्व
सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय डिजिटल अधिकारों, बाल संरक्षण और संवैधानिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण है।
इसके प्रमुख निहितार्थ निम्नलिखित हैं:
-
डिजिटल अधिकारों की मान्यता: इंटरनेट तक पहुँच को शिक्षा, सूचना प्राप्त करने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े अधिकारों के संदर्भ में महत्त्वपूर्ण माना गया है।
-
बाल अधिकारों का संरक्षण: बच्चों को केवल उनकी आयु के आधार पर मौलिक अधिकारों से पूरी तरह वंचित नहीं किया जा सकता।
-
लक्षित सुरक्षा उपाय: बच्चों की सुरक्षा के लिए इंटरनेट पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के बजाय हानिकारक सामग्री और उसके प्रसार को रोकने पर जोर दिया गया है।
-
डिजिटल मंचों की जवाबदेही: सोशल मीडिया और अन्य डिजिटल मंचों को बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए प्रभावी उपाय अपनाने की आवश्यकता है।
-
अभिभावकों की भूमिका: माता-पिता की सहमति, मार्गदर्शन और उचित निगरानी को बच्चों की डिजिटल सुरक्षा का महत्त्वपूर्ण हिस्सा माना गया है।
-
संवैधानिक संतुलन: बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करते समय उनकी स्वतंत्रता, शिक्षा और सूचना प्राप्त करने के अधिकारों का भी ध्यान रखा जाना चाहिए।
निष्कर्ष
सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय का मूल संदेश यह है कि बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा और इंटरनेट तक उनकी पहुँच को परस्पर विरोधी नहीं माना जाना चाहिए। इंटरनेट बच्चों के लिए शिक्षा, ज्ञान, संवाद और रचनात्मक विकास का महत्त्वपूर्ण माध्यम है। इसलिए, उन्हें इससे पूरी तरह दूर करना उचित समाधान नहीं है।
आवश्यकता ऐसी डिजिटल व्यवस्था विकसित करने की है, जिसमें बच्चों को इंटरनेट के लाभ मिलें और उन्हें यौन शोषण, अनुचित सामग्री तथा अन्य ऑनलाइन खतरों से प्रभावी सुरक्षा भी प्राप्त हो।
इस प्रकार, न्यायालय का दृष्टिकोण बच्चों को इंटरनेट से दूर रखने के बजाय इंटरनेट को बच्चों के लिए सुरक्षित बनाने पर केंद्रित है। यह दृष्टिकोण मौलिक अधिकारों, बाल संरक्षण और डिजिटल उत्तरदायित्व के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है।