7वाँ विश्व कृषि-वोल्टाइक सम्मेलन (AgriVoltaics World Conference–AWC 2026)
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7वें विश्व कृषि-वोल्टाइक सम्मेलन (AWC 2026) का आयोजन नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) द्वारा 21 से 23 अक्टूबर, 2026 तक नई दिल्ली में किया गया।
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सम्मेलन में नई दिल्ली से यह आह्वान किया गया कि वैज्ञानिक अनुसंधान, व्यवहार्य वित्तपोषण और किसानों के साथ निरंतर सहयोग के माध्यम से कृषि-वोल्टाइक प्रणाली को खेतों तक पहुँचाया जाए।
कृषि भूमि में सौर ऊर्जा उत्पादन की संभावनाएँ
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भारत की अर्थव्यवस्था में कृषि की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। देश की लगभग 46.1% आबादी की आजीविका कृषि पर निर्भर है।
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इस महत्त्वपूर्ण क्षेत्र को बनाए रखने के लिए सिंचाई तथा अन्य कृषि कार्यों हेतु विश्वसनीय और किफायती ऊर्जा की आवश्यकता होती है।
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सौर ऊर्जा इन दैनिक आवश्यकताओं को पूरा करने के साथ-साथ भारत के स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन को भी गति प्रदान कर सकती है।
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भूमि उपयोग सांख्यिकी (Land Use Statistics) 2023-24 के अनुसार, देश का कुल रिपोर्टेड क्षेत्रफल 306.96 मिलियन हेक्टेयर है, जिसमें लगभग 55% भूमि कृषि के अंतर्गत आती है।
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देश का शुद्ध बोया गया क्षेत्रफल (Net Sown Area) 138.99 मिलियन हेक्टेयर, जबकि सकल फसल क्षेत्रफल (Gross Cropped Area) 217.88 मिलियन हेक्टेयर है।
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कृषि भूमि का यह विशाल क्षेत्र कृषि उत्पादन के साथ-साथ सौर विद्युत उत्पादन के लिए भी व्यापक अवसर प्रदान करता है।
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किसान सौर ऊर्जा का उपयोग सिंचाई पंप चलाने, पारंपरिक बिजली पर निर्भरता कम करने तथा अतिरिक्त बिजली ग्रिड को बेचकर आय अर्जित करने के लिए कर सकते हैं।
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उदाहरण के लिए, सौर ऊर्जा से संचालित सिंचाई पंप दिन के समय फसलों की सिंचाई के लिए बिजली उपलब्ध करा सकते हैं तथा डीजल से चलने वाले पंपों पर निर्भरता कम कर सकते हैं।
कृषि-वोल्टाइक (Agrivoltaics) क्या है?
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कृषि-वोल्टाइक एक ऐसी प्रणाली है, जिसमें एक ही भूमि पर फसल उत्पादन और सौर फोटोवोल्टाइक (PV) तकनीक के माध्यम से बिजली उत्पादन एक साथ किया जाता है।
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इसे एग्रीसोलर (Agrisolar) अथवा दोहरे उपयोग वाली सौर प्रणाली (Dual-use Solar) भी कहा जाता है।
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इस प्रणाली का उद्देश्य भूमि का अधिकतम उपयोग करना, फसलों को आंशिक छाया उपलब्ध कराना तथा किसानों को अतिरिक्त आर्थिक लाभ प्रदान करना है।
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इसमें सौर पैनलों को फसलों के ऊपर ऊँचे ढाँचे पर या फसलों की कतारों के बीच स्थापित किया जाता है, जिससे खेती जारी रखते हुए बिजली का उत्पादन किया जा सके।
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फसल के प्रकार, सौर पैनलों की संरचना और स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर आंशिक छाया मिट्टी से नमी के नुकसान को कम करने में भी सहायक हो सकती है।
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यह प्रणाली भूमि उपयोग की दक्षता बढ़ाने, किसानों की आय के स्रोतों में विविधता लाने तथा खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने में सहायक है।
भारत में कृषि-वोल्टाइक का विकास
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अनुसंधान, क्षेत्रीय प्रदर्शन परियोजनाओं और नीतिगत विकास के माध्यम से भारत विभिन्न कृषि-जलवायु परिस्थितियों के अनुकूल कृषि-वोल्टाइक प्रणाली विकसित करने की दिशा में प्रयास कर रहा है।
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यह प्रणाली किसानों की आजीविका को भारत के व्यापक नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्यों के साथ जोड़ने का एक प्रभावी माध्यम बन सकती है।
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अगस्त 2025 तक भारत में 37.54 मेगावाट की कुल स्थापित क्षमता वाली 36 कृषि-वोल्टाइक परियोजनाएँ संचालित थीं, जबकि 10 पायलट परियोजनाएँ विकास के चरण में थीं।
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ये परियोजनाएँ देश के विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों में फैली हुई हैं। इनमें ऊँचे ढाँचों पर लगाए गए सौर पैनल, फसलों की कतारों के बीच सौर पैनलों की स्थापना तथा ट्रैकिंग प्रणाली जैसी तकनीकें शामिल हैं।
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ये परियोजनाएँ भारत में कृषि उत्पादन और सौर ऊर्जा उत्पादन के एकीकरण के लिए अपनाए जा रहे विभिन्न तरीकों को दर्शाती हैं।
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भारत में कृषि-वोल्टाइक की अपार संभावनाएँ हैं।
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विभिन्न अनुमानों के अनुसार, भारत में कृषि-वोल्टाइक की संभावित क्षमता 3,000 गीगावाट से लेकर लगभग 14,000 गीगावाट तक हो सकती है। यह कृषि और नवीकरणीय ऊर्जा के संगम पर उपलब्ध विशाल अवसरों को दर्शाता है।
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कृषि-वोल्टाइक प्रणाली किसानों की आय के स्रोतों में विविधता लाकर उनकी आर्थिक स्थिति को मजबूत कर सकती है।
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कुछ परिस्थितियों में इस प्रणाली से किसानों की वार्षिक आय लगभग ₹60,000 प्रति एकड़ से बढ़कर ₹1 लाख प्रति एकड़ से अधिक हो सकती है।
कृषि-वोल्टाइक के विकास हेतु सरकारी पहल
भारत सरकार ने देश में कृषि-वोल्टाइक प्रणाली को बढ़ावा देने और इसका विस्तार करने के लिए नीतिगत, अनुसंधान, तकनीकी विकास तथा कार्यान्वयन से संबंधित अनेक कदम उठाए हैं।
1. प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान (PM-KUSUM)
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इस योजना की शुरुआत फरवरी 2019 में की गई थी।
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इसका उद्देश्य कृषि क्षेत्र में सौर ऊर्जा को बढ़ावा देना, डीजल पर निर्भरता कम करना तथा किसानों के लिए आय के अतिरिक्त अवसर उपलब्ध कराना है।
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इस योजना के अंतर्गत लगभग ₹34,422 करोड़ की केंद्रीय वित्तीय सहायता का प्रावधान किया गया है।
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यह योजना विकेंद्रीकृत सौर ऊर्जा उत्पादन और कृषि पंपों के सौरकरण को प्रोत्साहित करती है।
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इसके माध्यम से कृषि क्षेत्र में सौर ऊर्जा के एकीकरण और कृषि-वोल्टाइक प्रणाली के विकास के लिए नए अवसर उत्पन्न होते हैं।
2. कृषि-वोल्टाइक उत्कृष्टता केंद्र (Centre of Excellence–CoE)
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राष्ट्रीय सौर ऊर्जा संस्थान (NISE) ने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) के सहयोग से कृषि-वोल्टाइक के क्षेत्र में अनुसंधान, प्रदर्शन और क्षमता निर्माण के लिए उत्कृष्टता केंद्र की स्थापना की है।
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इस केंद्र द्वारा कृषि-वोल्टाइक से संबंधित विभिन्न पायलट परियोजनाएँ संचालित की गई हैं।
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इनमें भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) में स्थापित 100 किलोवाट क्षमता की कृषि-वोल्टाइक प्रणाली भी शामिल है।
3. इंडिया एग्रीवोल्टाइक एलायंस (India Agrivoltaics Alliance–IAA)
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इसका संचालन नेशनल सोलर एनर्जी फेडरेशन ऑफ इंडिया (NSEFI) के नेतृत्व में किया जाता है।
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यह एक बहु-हितधारक मंच है, जिसका उद्देश्य सौर ऊर्जा उत्पादन और कृषि के लिए भूमि के दोहरे उपयोग को बढ़ावा देना है।
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इसकी शुरुआत वर्ष 2023 में की गई थी।
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इस गठबंधन में 40 से अधिक सदस्य शामिल हो चुके हैं।
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यह सरकारी मंत्रालयों और उद्योग जगत के विभिन्न हितधारकों के साथ मिलकर नीतिगत समर्थन, अनुसंधान तथा जमीनी स्तर पर कृषि-वोल्टाइक परियोजनाओं के कार्यान्वयन को बढ़ावा देता है।