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ISRO ने GSLV-F18 से नेविगेशन उपग्रह NVS-03 को सफलतापूर्वक कक्षा में स्थापित किया

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (Indian Space Research Organisation – ISRO) ने भारत की स्वदेशी उपग्रह आधारित नेविगेशन प्रणाली को मजबूत करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है।

30 अक्टूबर, 2026 को ISRO ने आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (Satish Dhawan Space Centre – SDSC) से GSLV-F18 रॉकेट के माध्यम से NVS-03 नेविगेशन उपग्रह का सफल प्रक्षेपण किया।

यह प्रक्षेपण रात 11 बजकर 51 मिनट पर अंतरिक्ष केंद्र के दूसरे लॉन्च पैड (Second Launch Pad) से किया गया।

लगभग 50 मीटर ऊँचे GSLV-F18 रॉकेट ने लगभग 18 मिनट की उड़ान के बाद NVS-03 उपग्रह को निर्धारित भू-समकालिक स्थानांतरण कक्षा (Geosynchronous Transfer Orbit – GTO) में सफलतापूर्वक स्थापित किया।

इस अभियान की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता यह रही कि प्रक्षेपण यान के तीनों चरणों ने सफलतापूर्वक कार्य किया, जिनमें स्वदेशी क्रायोजेनिक ऊपरी चरण (Cryogenic Upper Stage) भी शामिल था।

GSLV-F18 भारत के भू-समकालिक उपग्रह प्रक्षेपण यान (GSLV) की 20वीं उड़ान थी।

NVS-03 दूसरी पीढ़ी की भारतीय नेविगेशन उपग्रह शृंखला का तीसरा उपग्रह है। इसे भारत की क्षेत्रीय उपग्रह नेविगेशन प्रणाली NavIC (Navigation with Indian Constellation) की निरंतरता, विश्वसनीयता और परिचालन क्षमता को बढ़ाने के लिए विकसित किया गया है।

चर्चा में क्यों?

ISRO द्वारा NVS-03 का सफल प्रक्षेपण इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि भारत की स्वदेशी नेविगेशन प्रणाली NavIC पिछले कुछ समय से परिचालन उपग्रहों की कमी का सामना कर रही थी।

NVS-03 के प्रक्षेपण से पहले NavIC प्रणाली में स्थिति निर्धारण, नेविगेशन और समय संबंधी सेवाएँ प्रदान करने के लिए केवल तीन परिचालन उपग्रह उपलब्ध थे।

ये उपग्रह थे:

  1. IRNSS-1B

  2. IRNSS-1I

  3. NVS-01

स्वतंत्र उपग्रह आधारित त्रि-आयामी स्थिति निर्धारण और समय संबंधी गणना के लिए सामान्यतः कम-से-कम चार परिचालन उपग्रहों की आवश्यकता होती है।

NVS-03 को इसी कमी को दूर करने और NavIC की न्यूनतम परिचालन क्षमता बहाल करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

नवीनतम स्थिति (4 नवंबर, 2026): प्रक्षेपण के बाद NVS-03 के चार कक्षीय परिवर्तन सफलतापूर्वक पूरे हो चुके हैं। उपग्रह लगभग 35,765 × 36,196 किलोमीटर की भू-समकालिक कक्षा में पहुँच गया है और उसकी स्थिति सामान्य बताई गई है। हालाँकि, कक्षा में पहुँचने और नेविगेशन सेवाओं के लिए पूर्ण रूप से परिचालित घोषित होने में अंतर होता है।

GSLV-F18/NVS-03 मिशन की प्रमुख विशेषताएँ

प्रमुख तथ्य

विवरण

मिशन का नाम

GSLV-F18/NVS-03

प्रक्षेपण की तिथि

30 अक्टूबर, 2026

प्रक्षेपण का समय

रात्रि 11:51 बजे (IST)

प्रक्षेपण स्थल

सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र, श्रीहरिकोटा, आंध्र प्रदेश

लॉन्च पैड

दूसरा लॉन्च पैड

प्रक्षेपण यान

GSLV-F18

रॉकेट की ऊँचाई

लगभग 50 मीटर

प्रक्षेपण के समय रॉकेट का द्रव्यमान

लगभग 420 टन

उपग्रह का द्रव्यमान

लगभग 2,250 किलोग्राम

GSLV की उड़ान संख्या

20वीं

उपग्रह की श्रेणी

दूसरी पीढ़ी का नेविगेशन उपग्रह

प्रारंभिक कक्षा

Geosynchronous Transfer Orbit (GTO)

नियोजित कक्षीय स्थान

111.75° पूर्व देशांतर के निकट

नेविगेशन संकेत

L1, L5 और S-बैंड

प्रमुख उद्देश्य

NavIC प्रणाली को मजबूत करना

संबंधित संगठन

ISRO

GSLV-F18 प्रक्षेपण यान क्या है?

GSLV का पूरा नाम Geosynchronous Satellite Launch Vehicle (भू-समकालिक उपग्रह प्रक्षेपण यान) है।

यह ISRO द्वारा विकसित एक महत्त्वपूर्ण प्रक्षेपण यान है, जिसका उपयोग मुख्य रूप से उपग्रहों को भू-समकालिक स्थानांतरण कक्षा और अन्य निर्धारित कक्षाओं में स्थापित करने के लिए किया जाता है।

GSLV विशेष रूप से अपेक्षाकृत भारी उपग्रहों को अंतरिक्ष में पहुँचाने के लिए विकसित किया गया है।

GSLV-F18 रॉकेट की प्रमुख तकनीकी विशेषताओं में तीन चरणों वाली प्रणोदन प्रणाली, लगभग 50 मीटर की ऊँचाई और लगभग 420 टन प्रक्षेपण द्रव्यमान शामिल हैं।

इस रॉकेट की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता इसका स्वदेशी क्रायोजेनिक ऊपरी चरण है।

GSLV-F18 रॉकेट के तीन चरण

GSLV एक तीन-चरणीय प्रक्षेपण यान है, जिसमें ठोस, तरल और क्रायोजेनिक प्रणोदन तकनीकों का उपयोग किया जाता है।

प्रथम चरण (First Stage)

इस चरण में ठोस प्रणोदक आधारित मुख्य रॉकेट मोटर और चार तरल प्रणोदक आधारित स्ट्रैप-ऑन बूस्टर का उपयोग किया जाता है।

यह चरण प्रक्षेपण के शुरुआती समय में रॉकेट को पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध ऊपर उठाने के लिए आवश्यक बल प्रदान करता है।

द्वितीय चरण (Second Stage)

दूसरे चरण में तरल प्रणोदक आधारित इंजन का उपयोग किया जाता है।

इसका कार्य रॉकेट की गति और ऊँचाई को आगे बढ़ाना है, ताकि उपग्रह को निर्धारित कक्षा तक पहुँचाया जा सके।

तृतीय चरण (Third Stage)

तीसरा चरण क्रायोजेनिक ऊपरी चरण (Cryogenic Upper Stage) कहलाता है।

इसमें अत्यंत कम तापमान पर संग्रहित तरल हाइड्रोजन (Liquid Hydrogen – LH₂) और तरल ऑक्सीजन (Liquid Oxygen – LOX) का उपयोग होता है।

इस चरण की सहायता से उपग्रह को आवश्यक ऊर्जा प्रदान करके उसकी निर्धारित स्थानांतरण कक्षा में स्थापित किया जाता है।

NVS-03 मिशन में तीनों चरणों का सफल प्रदर्शन ISRO की प्रक्षेपण तकनीक की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है।

क्रायोजेनिक तकनीक क्या है?

क्रायोजेनिक तकनीक (Cryogenic Technology) अत्यंत कम तापमान पर पदार्थों के भंडारण और उपयोग से संबंधित तकनीक है।

रॉकेट प्रणोदन में क्रायोजेनिक इंजन तरल हाइड्रोजन और तरल ऑक्सीजन का उपयोग करते हैं।

तरल हाइड्रोजन को लगभग -253°C तथा तरल ऑक्सीजन को लगभग -183°C तापमान पर संग्रहित किया जाता है।

क्रायोजेनिक इंजन उच्च विशिष्ट आवेग (Specific Impulse) प्रदान करते हैं, जिससे रॉकेट को ईंधन के प्रभावी उपयोग के साथ आवश्यक गति प्राप्त करने में सहायता मिलती है।

इस तकनीक का विकास अत्यंत जटिल है, क्योंकि इसमें अत्यधिक कम तापमान, विशेष सामग्री और उच्च परिशुद्धता वाली इंजीनियरिंग की आवश्यकता होती है।

भारत ने स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन विकसित करके अंतरिक्ष प्रक्षेपण के क्षेत्र में अपनी तकनीकी आत्मनिर्भरता को मजबूत किया है।

भू-समकालिक स्थानांतरण कक्षा (GTO) क्या है?

भू-समकालिक स्थानांतरण कक्षा (Geosynchronous Transfer Orbit – GTO) एक दीर्घवृत्ताकार कक्षा होती है, जिसका उपयोग उपग्रहों को भू-समकालिक अथवा भू-स्थिर कक्षाओं तक पहुँचाने के लिए किया जाता है।

GTO में उपग्रह पृथ्वी के चारों ओर एक ऐसी कक्षा में घूमता है, जिसमें पृथ्वी से उसकी दूरी लगातार बदलती रहती है।

इस कक्षा के दो प्रमुख बिंदु होते हैं।

उपभू (Perigee): पृथ्वी के सबसे निकट स्थित कक्षीय बिंदु।

अपभू (Apogee): पृथ्वी से सबसे दूर स्थित कक्षीय बिंदु।

प्रक्षेपण यान उपग्रह को प्रारंभिक स्थानांतरण कक्षा में पहुँचाता है। इसके बाद उपग्रह अपने प्रणोदन तंत्र की सहायता से निर्धारित अंतिम कक्षा तक पहुँच सकता है।

NVS-03 को भी पहले GTO में स्थापित किया गया और बाद में उसके ऑनबोर्ड इंजन की सहायता से कक्षीय परिवर्तन किए गए।

भू-स्थिर और भू-समकालिक कक्षा में अंतर

भू-स्थिर कक्षा (Geostationary Orbit – GEO)

भू-स्थिर कक्षा पृथ्वी की भूमध्यरेखीय सतह के लगभग 35,786 किलोमीटर ऊपर स्थित एक विशेष वृत्ताकार कक्षा होती है।

इस कक्षा में उपग्रह पृथ्वी के घूर्णन के समान कोणीय गति से परिक्रमा करता है।

इसलिए पृथ्वी से देखने पर वह आकाश में लगभग एक ही स्थान पर स्थिर दिखाई देता है।

भू-समकालिक कक्षा (Geosynchronous Orbit – GSO)

इस कक्षा में भी उपग्रह की परिक्रमा अवधि पृथ्वी के घूर्णन काल के बराबर होती है।

हालाँकि, यह कक्षा झुकी हुई अथवा दीर्घवृत्ताकार भी हो सकती है।

इस कारण पृथ्वी से देखने पर उपग्रह का स्थान बदलता हुआ दिखाई दे सकता है।

महत्त्वपूर्ण अंतर: प्रत्येक भू-स्थिर कक्षा भू-समकालिक होती है, लेकिन प्रत्येक भू-समकालिक कक्षा भू-स्थिर नहीं होती।

NVS-03 उपग्रह क्या है?

NVS-03 भारत की दूसरी पीढ़ी की नेविगेशन उपग्रह शृंखला का तीसरा उपग्रह है।

इसे पहली पीढ़ी की भारतीय क्षेत्रीय नेविगेशन उपग्रह प्रणाली (Indian Regional Navigation Satellite System – IRNSS) की सेवाओं को जारी रखने तथा मजबूत करने के उद्देश्य से विकसित किया गया है।

इस उपग्रह को विशेष रूप से स्थिति निर्धारण (Positioning), मार्गदर्शन (Navigation) और सटीक समय निर्धारण (Timing) के लिए तैयार किया गया है।

NVS-03 में आधुनिक नेविगेशन पेलोड, परमाणु घड़ियाँ और विभिन्न रेडियो आवृत्ति बैंडों पर संकेत भेजने की क्षमता शामिल है।

यह उपग्रह भारतीय भूभाग तथा भारत की भौगोलिक सीमाओं से लगभग 1,500 किलोमीटर तक विस्तृत प्राथमिक सेवा क्षेत्र में नेविगेशन सुविधाओं को मजबूत करने के उद्देश्य से विकसित किया गया है।

NVS-03 की प्रमुख तकनीकी विशेषताएँ

1. स्वदेशी परमाणु घड़ी

NVS-03 में भारत में विकसित परमाणु घड़ी (Indigenous Atomic Clock) लगाई गई है।

इसके अतिरिक्त इसमें अन्य स्रोतों से प्राप्त परमाणु घड़ियाँ भी शामिल हैं।

ये घड़ियाँ अत्यंत सटीक समय संबंधी संकेत प्रदान करती हैं, जो उपग्रह आधारित नेविगेशन के लिए आवश्यक हैं।

2. L1 फ्रीक्वेंसी बैंड

NVS-03 में L1 आवृत्ति बैंड पर संकेत प्रसारित करने की क्षमता शामिल की गई है।

इसका उद्देश्य आधुनिक नेविगेशन रिसीवरों और स्मार्टफोन जैसे उपकरणों के साथ NavIC की अनुकूलता बढ़ाना है।

3. L5 और S-बैंड संकेत

उपग्रह में पहले से उपयोग किए जा रहे L5 और S-बैंड पर भी नेविगेशन संकेत उपलब्ध हैं।

विभिन्न आवृत्ति बैंडों पर संकेत उपलब्ध होने से अलग-अलग प्रकार के नेविगेशन उपकरणों और सेवाओं के विकास में सहायता मिलती है।

4. क्षेत्रीय नेविगेशन सेवाएँ

NVS-03 को भारत और उसके आसपास के निर्धारित क्षेत्र में सटीक स्थिति तथा समय संबंधी सेवाओं को मजबूत करने के लिए विकसित किया गया है।

5. दूसरी पीढ़ी की उपग्रह तकनीक

यह उपग्रह भारत की अगली पीढ़ी की नेविगेशन तकनीक का प्रतिनिधित्व करता है, जिसका उद्देश्य सेवाओं की विश्वसनीयता और निरंतरता बढ़ाना है।

परमाणु घड़ी (Atomic Clock) क्या है?

परमाणु घड़ी अत्यंत उच्च परिशुद्धता के साथ समय मापने वाली वैज्ञानिक घड़ी होती है।

यह समय मापने के लिए परमाणुओं की निश्चित आवृत्ति वाले ऊर्जा संक्रमणों का उपयोग करती है।

सामान्य घड़ियों की तुलना में परमाणु घड़ियाँ अत्यधिक सटीक होती हैं।

उपग्रह आधारित नेविगेशन प्रणालियों में सटीक समय निर्धारण अत्यंत महत्त्वपूर्ण होता है।

इसका कारण यह है कि नेविगेशन उपग्रह पृथ्वी पर स्थित रिसीवरों को रेडियो संकेत भेजते हैं।

इन संकेतों को उपग्रह से रिसीवर तक पहुँचने में लगने वाले समय का उपयोग दूरी निर्धारित करने के लिए किया जाता है।

यदि समय की गणना में छोटी-सी भी त्रुटि हो जाए, तो स्थिति निर्धारण में महत्त्वपूर्ण अंतर उत्पन्न हो सकता है।

उदाहरण के लिए, एक नैनोसेकंड की समय त्रुटि प्रकाश की गति के आधार पर लगभग 30 सेंटीमीटर की दूरी के बराबर होती है।

इसलिए नेविगेशन उपग्रहों में अत्यधिक सटीक परमाणु घड़ियों का उपयोग किया जाता है।

स्वदेशी परमाणु घड़ियों का महत्त्व

भारत के लिए स्वदेशी परमाणु घड़ियों का विकास केवल एक वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं, बल्कि रणनीतिक दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है।

पहली पीढ़ी के कई भारतीय नेविगेशन उपग्रहों में परमाणु घड़ियों से संबंधित तकनीकी समस्याएँ सामने आई थीं।

इन समस्याओं के कारण कुछ उपग्रहों की नेविगेशन सेवाएँ प्रभावित हुईं।

इसी अनुभव को ध्यान में रखते हुए भारत ने अगली पीढ़ी के नेविगेशन उपग्रहों में स्वदेशी परमाणु घड़ियों को शामिल करने पर जोर दिया।

इसका उद्देश्य तकनीकी आत्मनिर्भरता बढ़ाना, विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता कम करना और नेविगेशन प्रणाली की दीर्घकालिक विश्वसनीयता सुनिश्चित करना है।

NVS-01 उपग्रह की प्रमुख विशेषताएँ

NVS-01 दूसरी पीढ़ी की भारतीय नेविगेशन उपग्रह शृंखला का पहला उपग्रह था।

इसे 29 मई, 2023 को GSLV-F12 प्रक्षेपण यान के माध्यम से सफलतापूर्वक लॉन्च किया गया।

यह पहली बार था जब NavIC की नई पीढ़ी के उपग्रह में भारत द्वारा विकसित रुबिडियम परमाणु घड़ी (Rubidium Atomic Clock) को शामिल किया गया।

इस घड़ी का विकास अहमदाबाद स्थित अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र (Space Applications Centre – SAC) द्वारा किया गया था।

NVS-01 में L1, L5 और S-बैंड पर नेविगेशन संकेत प्रसारित करने की क्षमता शामिल है।

इसका अनुमानित मिशन जीवन 12 वर्ष निर्धारित किया गया था।

NVS-01 का सफल प्रक्षेपण भारत की स्वदेशी नेविगेशन तकनीक के विकास में एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि था।

NVS-02 उपग्रह और उसकी तकनीकी समस्या

NVS-02 दूसरी पीढ़ी की नेविगेशन उपग्रह शृंखला का दूसरा उपग्रह था।

इसे 29 जनवरी, 2025 को GSLV-F15 रॉकेट के माध्यम से प्रक्षेपित किया गया था।

प्रक्षेपण यान ने उपग्रह को निर्धारित भू-समकालिक स्थानांतरण कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित किया।

हालाँकि, इसके बाद उपग्रह को अंतिम परिचालन कक्षा में पहुँचाने की प्रक्रिया सफल नहीं हो सकी।

उपग्रह के कक्षीय परिवर्तन के लिए आवश्यक इंजन में प्रयुक्त ऑक्सीडाइजर लाइन के पायरो वाल्व (Pyro Valve) तक आवश्यक विद्युत संकेत नहीं पहुँच पाया।

इसके कारण संबंधित वाल्व नहीं खुल सका और कक्षा परिवर्तन करने वाला इंजन निर्धारित रूप से कार्य नहीं कर पाया।

ISRO द्वारा गठित उच्चस्तरीय समिति ने इस समस्या का अध्ययन किया।

समिति ने पाया कि संबंधित कनेक्टरों के संपर्क में व्यवधान इस समस्या का सबसे संभावित कारण था।

इस तकनीकी समस्या के कारण NVS-02 अपने निर्धारित परिचालन कक्षीय स्थान तक नहीं पहुँच सका।

NVS-03 मिशन में तकनीकी सुधार

NVS-02 की समस्या के बाद ISRO ने उपग्रहों के प्रणोदन और पायरो प्रणाली से संबंधित विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए विभिन्न सुधार किए।

इनमें आवश्यक विद्युत संकेतों की उपलब्धता, कनेक्टरों की विश्वसनीयता तथा प्रणोदन प्रणाली से जुड़े जोखिमों को कम करने पर ध्यान दिया गया।

NVS-03 मिशन में इन अनुभवों से प्राप्त तकनीकी जानकारी का उपयोग किया गया।

प्रक्षेपण के बाद उपग्रह का सफल कक्षीय परिवर्तन यह दर्शाता है कि उसकी प्रणोदन प्रणाली ने निर्धारित कार्य सफलतापूर्वक पूरा किया।

आगामी NVS-04 और NVS-05 उपग्रह

ISRO दूसरी पीढ़ी की नेविगेशन उपग्रह शृंखला में कुल पाँच उपग्रह विकसित करने की योजना पर कार्य कर रहा है।

इस शृंखला में NVS-01, NVS-02 और NVS-03 के बाद NVS-04 तथा NVS-05 को शामिल किया जाना है।

अक्टूबर 2026 में व्यक्त योजना के अनुसार NVS-04 को लगभग पाँच महीने और NVS-05 को लगभग दस महीने के भीतर लॉन्च करने का लक्ष्य रखा गया था।

ये समय-सीमाएँ प्रस्तावित हैं और तकनीकी तैयारियों तथा प्रक्षेपण कार्यक्रम के अनुसार बदल सकती हैं।

इन उपग्रहों का प्रमुख उद्देश्य NavIC प्रणाली में परिचालन उपग्रहों की संख्या बढ़ाना और सेवाओं की विश्वसनीयता मजबूत करना है।

NavIC क्या है?

NavIC (Navigation with Indian Constellation) भारत की स्वदेशी क्षेत्रीय उपग्रह नेविगेशन प्रणाली है।

इसे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) द्वारा विकसित किया गया है।

NavIC का पूर्व नाम भारतीय क्षेत्रीय नेविगेशन उपग्रह प्रणाली (Indian Regional Navigation Satellite System – IRNSS) था।

इस प्रणाली का प्रमुख उद्देश्य भारत को स्थिति निर्धारण, मार्गदर्शन और सटीक समय संबंधी सेवाओं के लिए स्वतंत्र उपग्रह आधारित सुविधा उपलब्ध कराना है।

NavIC को अमेरिका की GPS प्रणाली की तरह नेविगेशन सेवाएँ प्रदान करने के लिए विकसित किया गया है, लेकिन दोनों के सेवा क्षेत्र में अंतर है।

जहाँ GPS एक वैश्विक नेविगेशन प्रणाली है, वहीं NavIC मुख्य रूप से भारत और उसके आसपास के निर्धारित क्षेत्र में सेवाएँ प्रदान करने वाली क्षेत्रीय प्रणाली है।

NavIC प्रणाली की आवश्यकता क्यों पड़ी?

उपग्रह आधारित नेविगेशन आधुनिक समय में एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण तकनीक बन चुकी है।

इसका उपयोग परिवहन, संचार, सैन्य गतिविधियों, समुद्री सुरक्षा, विमानन तथा आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में किया जाता है।

भारत लंबे समय तक नेविगेशन संबंधी सेवाओं के लिए मुख्य रूप से विदेशी उपग्रह प्रणालियों पर निर्भर रहा है।

विदेशी प्रणालियों पर अत्यधिक निर्भरता विशेष रूप से राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक क्षेत्रों में चुनौती उत्पन्न कर सकती है।

इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए भारत ने अपनी स्वतंत्र क्षेत्रीय उपग्रह नेविगेशन प्रणाली विकसित करने का निर्णय लिया।

NavIC का प्रमुख उद्देश्य भारत को महत्वपूर्ण नेविगेशन और समय संबंधी सेवाओं के लिए अधिक तकनीकी स्वायत्तता प्रदान करना है।

NavIC का सेवा क्षेत्र

NavIC का प्राथमिक सेवा क्षेत्र (Primary Service Area) भारत का संपूर्ण भूभाग और भारत की भौगोलिक सीमाओं से लगभग 1,500 किलोमीटर तक विस्तृत क्षेत्र है।

इस सेवा क्षेत्र में संगत उपकरणों को स्थिति निर्धारण, नेविगेशन और समय संबंधी सेवाएँ उपलब्ध कराई जा सकती हैं।

NavIC का डिजाइन अपने प्राथमिक सेवा क्षेत्र में बेहतर स्थिति निर्धारण सटीकता प्रदान करने के लिए किया गया है।

इसकी मानक स्थिति निर्धारण सेवा के लिए 20 मीटर से बेहतर स्थानिक सटीकता का डिजाइन लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

वास्तविक सटीकता उपग्रहों की उपलब्धता, रिसीवर की गुणवत्ता, संकेतों की स्थिति और स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करती है।

NavIC की उपग्रह संरचना

NavIC का मूल डिजाइन सात उपग्रहों के समूह (Satellite Constellation) पर आधारित है।

इनमें तीन उपग्रहों को भू-स्थिर कक्षा तथा चार उपग्रहों को झुकी हुई भू-समकालिक कक्षा में स्थापित करने की व्यवस्था बनाई गई थी।

भू-स्थिर कक्षा के तीन निर्धारित स्थान

32.5° पूर्व देशांतर, 83° पूर्व देशांतर और 129.5° पूर्व देशांतर।

झुकी हुई भू-समकालिक कक्षा

चार उपग्रहों के लिए दो कक्षीय तल निर्धारित किए गए, जिनके भूमध्यरेखीय पारगमन देशांतर 55° पूर्व और 111.75° पूर्व हैं।

इन कक्षाओं का झुकाव लगभग 29° निर्धारित किया गया था।

इस प्रकार उपग्रहों की व्यवस्था भारत और आसपास के क्षेत्रों को नेविगेशन सेवाएँ उपलब्ध कराने के उद्देश्य से तैयार की गई थी।

यह NavIC का मूल नियोजित कक्षीय विन्यास है; सभी सात स्थानों पर वर्तमान में पूर्ण परिचालन क्षमता उपलब्ध होने का दावा नहीं किया जाना चाहिए।

NavIC की जमीनी नियंत्रण प्रणाली

NavIC केवल अंतरिक्ष में मौजूद उपग्रहों पर आधारित नहीं है।

इसमें एक विस्तृत जमीनी नियंत्रण नेटवर्क (Ground Segment) भी शामिल है, जो उपग्रहों की निगरानी और नेविगेशन सेवाओं के संचालन में सहायता करता है।

इस नेटवर्क में उपग्रह नियंत्रण केंद्र, सटीक समय निर्धारण सुविधाएँ, दूरी मापन केंद्र तथा संकेतों की निगरानी करने वाले स्टेशन शामिल हैं।

जमीनी नेटवर्क का कार्य उपग्रहों की कक्षीय स्थिति की निगरानी करना, नेविगेशन संबंधी डेटा तैयार करना और उपग्रहों के माध्यम से प्रसारित संकेतों की विश्वसनीयता बनाए रखना है।

इसके अतिरिक्त यह व्यवस्था उपग्रहों के संचालन और तकनीकी स्थिति की लगातार निगरानी करती है।

NavIC द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाएँ

NavIC मुख्य रूप से दो प्रकार की नेविगेशन सेवाएँ प्रदान करने के लिए विकसित किया गया है।

1. मानक स्थिति निर्धारण सेवा (Standard Positioning Service – SPS)

यह नागरिक उपयोगकर्ताओं के लिए उपलब्ध खुली नेविगेशन सेवा है।

इसका उपयोग स्थान संबंधी जानकारी, मार्गदर्शन, परिवहन, वाहन निगरानी और अन्य नागरिक कार्यों में किया जा सकता है।

यह सेवा संगत रिसीवरों के माध्यम से प्राप्त की जा सकती है।

2. प्रतिबंधित सेवा (Restricted Service – RS)

यह एक एन्क्रिप्टेड नेविगेशन सेवा है, जिसे विशेष रूप से अधिकृत रणनीतिक उपयोगकर्ताओं के लिए विकसित किया गया है।

इसका उपयोग रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित निर्धारित गतिविधियों में किया जा सकता है।

इस प्रकार NavIC नागरिक तथा रणनीतिक दोनों प्रकार की आवश्यकताओं को पूरा करने के उद्देश्य से विकसित की गई है।

NavIC में L1, L5 और S-बैंड का महत्त्व

नेविगेशन उपग्रह पृथ्वी पर स्थित रिसीवरों को रेडियो आवृत्ति संकेतों के माध्यम से जानकारी भेजते हैं।

इन संकेतों में उपग्रह की स्थिति और सटीक समय से संबंधित डेटा शामिल होता है।

NavIC की पहली पीढ़ी के उपग्रह मुख्य रूप से L5 और S-बैंड का उपयोग करते थे।

दूसरी पीढ़ी के उपग्रहों में इनके अतिरिक्त L1-बैंड को भी शामिल किया गया है।

आवृत्ति बैंड

प्रमुख आवृत्ति

L1-बैंड

1575.42 MHz

L5-बैंड

1176.45 MHz

S-बैंड

2498.028 MHz

L1-बैंड को शामिल करने से NavIC की अन्य प्रमुख वैश्विक नेविगेशन प्रणालियों के साथ अंतर-संचालनीयता (Interoperability) बढ़ाने में सहायता मिलती है।

यह विशेष रूप से स्मार्टफोन, वाहन नेविगेशन उपकरणों और अन्य व्यावसायिक रिसीवरों में NavIC तकनीक को अपनाने के लिए महत्त्वपूर्ण है।

भारत की NavIC और विश्व की प्रमुख नेविगेशन प्रणालियाँ

विश्व में विभिन्न देशों और क्षेत्रों द्वारा उपग्रह आधारित नेविगेशन प्रणालियाँ विकसित की गई हैं।

नेविगेशन प्रणाली

संबंधित देश/क्षेत्र

प्रमुख प्रकृति

NavIC

भारत

क्षेत्रीय

GPS

संयुक्त राज्य अमेरिका

वैश्विक

GLONASS

रूस

वैश्विक

Galileo

यूरोपीय संघ

वैश्विक

BeiDou

चीन

वैश्विक

इन प्रणालियों के बीच अंतर-संचालनीयता का अर्थ है कि संगत रिसीवर एक से अधिक नेविगेशन प्रणालियों के संकेतों का उपयोग कर सकते हैं।

इससे उपग्रहों की उपलब्धता और स्थिति निर्धारण की विश्वसनीयता बढ़ाने में सहायता मिल सकती है।

NavIC के प्रमुख अनुप्रयोग

1. सड़क परिवहन और वाहन निगरानी

NavIC का उपयोग सड़क परिवहन, वाहन निगरानी और स्थान आधारित सेवाओं में किया जा सकता है।

इसके माध्यम से संगत उपकरण वाहनों की स्थिति, गति और मार्ग संबंधी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

यह सार्वजनिक परिवहन और वाहन बेड़ा प्रबंधन में उपयोगी हो सकता है।

2. समुद्री परिवहन और मछुआरों की सुरक्षा

NavIC समुद्री क्षेत्र में जहाजों तथा मछली पकड़ने वाली नौकाओं की स्थिति और मार्ग संबंधी जानकारी प्रदान करने में सहायक है।

इससे समुद्री नेविगेशन तथा तटीय क्षेत्रों में सुरक्षा संबंधी सेवाओं को मजबूत किया जा सकता है।

NavIC प्रणाली का उपयोग समुद्री क्षेत्रों में चक्रवात, सुनामी और ऊँची समुद्री लहरों जैसी परिस्थितियों से संबंधित चेतावनी संदेश प्रसारित करने में भी किया गया है।

3. विमानन क्षेत्र

उपग्रह आधारित नेविगेशन विमानन क्षेत्र में स्थिति और मार्ग संबंधी जानकारी प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

NavIC की सेवाएँ संगत विमानन प्रणालियों और संबंधित अनुप्रयोगों में उपयोगी हो सकती हैं।

यहाँ ध्यान रखना आवश्यक है कि भारत की नागरिक विमानन संबंधी विशेष उपग्रह संवर्धन प्रणाली GAGAN है, जबकि NavIC एक स्वतंत्र क्षेत्रीय नेविगेशन प्रणाली है।

4. आपदा प्रबंधन

प्राकृतिक आपदाओं के दौरान स्थान संबंधी जानकारी अत्यंत महत्त्वपूर्ण होती है।

NavIC आपदा प्रभावित क्षेत्रों की स्थिति निर्धारित करने, राहत कार्यों की योजना बनाने और आवश्यक स्थानिक जानकारी उपलब्ध कराने में सहायता कर सकता है।

इसके अतिरिक्त सुरक्षा और चेतावनी संदेशों के प्रसारण में भी उपग्रह प्रणालियों की उपयोगिता होती है।

5. व्यक्तिगत नेविगेशन

NavIC का उपयोग स्मार्टफोन तथा अन्य संगत व्यक्तिगत नेविगेशन उपकरणों में किया जा सकता है।

इससे उपयोगकर्ताओं को स्थान निर्धारण और मार्ग संबंधी जानकारी प्राप्त करने में सहायता मिलती है।

हालाँकि, किसी स्मार्टफोन में NavIC सेवा उपलब्ध होने के लिए उस उपकरण में आवश्यक हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर समर्थन होना चाहिए।

6. संसाधन निगरानी

NavIC का उपयोग प्राकृतिक संसाधनों से संबंधित स्थानिक डेटा के संग्रह और निगरानी में सहायक तकनीक के रूप में किया जा सकता है।

कृषि, भूमि उपयोग और अन्य संसाधन आधारित गतिविधियों में स्थिति निर्धारण की जानकारी उपयोगी होती है।

7. सर्वेक्षण और भूगणित

भूगणित (Geodesy) पृथ्वी के आकार, माप और स्थानिक संरचना का अध्ययन करने वाला विज्ञान है।

उपग्रह आधारित नेविगेशन प्रणालियाँ भूमि सर्वेक्षण, मानचित्रण और भौगोलिक मापन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

NavIC के संकेतों का उपयोग संगत उपकरणों में ऐसी गतिविधियों के लिए किया जा सकता है।

8. वैज्ञानिक अनुसंधान

उच्च परिशुद्धता वाली समय और स्थान संबंधी जानकारी विभिन्न वैज्ञानिक अध्ययनों में उपयोगी होती है।

इस प्रकार NavIC वैज्ञानिक अनुसंधान और तकनीकी विकास से जुड़े अनुप्रयोगों में योगदान दे सकता है।

9. समय का प्रसारण और समकालिकीकरण

NavIC का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण उपयोग सटीक समय संबंधी जानकारी उपलब्ध कराना है।

दूरसंचार नेटवर्क, वित्तीय लेनदेन, विद्युत ग्रिड और अन्य डिजिटल प्रणालियों में समय का सटीक समन्वय आवश्यक होता है।

NavIC की समय सेवाएँ ऐसी प्रणालियों के विकास और संचालन में उपयोगी हो सकती हैं।

‘एक राष्ट्र, एक समय’ परियोजना से NavIC का संबंध

भारत सरकार ने देश में एक समान और विश्वसनीय समय निर्धारण व्यवस्था विकसित करने के उद्देश्य से ‘एक राष्ट्र, एक समय’ (One Nation, One Time) पहल को आगे बढ़ाया है।

इसका प्रमुख उद्देश्य भारतीय मानक समय (Indian Standard Time – IST) को देश के विभिन्न क्षेत्रों में एक सामान्य, कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त और सटीक समय संदर्भ के रूप में स्थापित करना है।

भारत में IST का निर्धारण 82°30′ पूर्व देशांतर को आधार मानकर किया जाता है।

भारतीय मानक समय समन्वित सार्वभौमिक समय (Coordinated Universal Time – UTC) से 5 घंटे 30 मिनट आगे है।

राष्ट्रीय स्तर पर सटीक समय संबंधी सेवाओं के विकास में परमाणु घड़ियों और उपग्रह आधारित प्रणालियों की विशेष भूमिका होती है।

NavIC इस व्यवस्था में उपग्रह आधारित समय प्रसारण की सुविधा उपलब्ध कराने वाला एक महत्त्वपूर्ण घटक है।

भारतीय मानक समय नियम, 2026

भारत सरकार ने विधिक मापविज्ञान (भारतीय मानक समय) नियम, 2026 [Legal Metrology (Indian Standard Time) Rules, 2026] अधिसूचित किए हैं।

इन नियमों को उपभोक्ता मामले विभाग द्वारा 27 अगस्त, 2026 को अधिसूचित किया गया था और 29 अगस्त, 2026 को राजपत्र में प्रकाशित किया गया।

इनका उद्देश्य पूरे देश में भारतीय मानक समय की उत्पत्ति, रखरखाव, प्रसारण और उपयोग के लिए एक स्पष्ट कानूनी व्यवस्था तैयार करना है।

नियमों के अनुसार IST का उपयोग विभिन्न कानूनी, प्रशासनिक, वाणिज्यिक और आधिकारिक गतिविधियों में एक सामान्य समय संदर्भ के रूप में किया जाएगा।

इन नियमों के प्रभावी होने के लिए राजपत्र में प्रकाशन की तिथि से 180 दिनों की अवधि निर्धारित की गई है।

CSIR-NPL की भूमिका

राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला (National Physical Laboratory – NPL) भारत में मानक समय और मापन विज्ञान से संबंधित प्रमुख संस्थान है।

यह वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (Council of Scientific and Industrial Research – CSIR) के अंतर्गत कार्य करती है।

CSIR-NPL भारत की राष्ट्रीय समय मानक व्यवस्था को बनाए रखने में प्रमुख भूमिका निभाती है।

इसके अंतर्गत परमाणु घड़ियों की सहायता से सटीक समय का निर्धारण और प्रसारण किया जाता है।

NPL, ISRO और संबंधित अन्य संस्थाओं के बीच समन्वय भारत में सटीक समय वितरण की व्यवस्था को मजबूत करता है।

NavIC के माध्यम से उपग्रह आधारित समय संकेत उपलब्ध कराना इस राष्ट्रीय व्यवस्था का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है।

एक समान समय व्यवस्था का महत्त्व

आधुनिक डिजिटल अर्थव्यवस्था में विभिन्न प्रणालियों का एक समान समय संदर्भ पर कार्य करना अत्यंत आवश्यक है।

बैंकिंग लेनदेन, डिजिटल भुगतान, दूरसंचार नेटवर्क, विद्युत ग्रिड और डेटा केंद्रों में समय संबंधी सूचनाओं का सटीक समन्वय महत्त्वपूर्ण होता है।

उदाहरण के लिए, डिजिटल वित्तीय लेनदेन में किसी गतिविधि का सही समय दर्ज होना रिकॉर्ड की विश्वसनीयता और तकनीकी जाँच के लिए आवश्यक होता है।

इसी प्रकार दूरसंचार नेटवर्क और विद्युत प्रणालियों में सटीक समय समकालिकीकरण संचालन की दक्षता बढ़ाने में सहायता करता है।

NavIC और राष्ट्रीय समय मानक अवसंरचना के विकास से भारत में ऐसी सेवाओं की स्वतंत्रता और विश्वसनीयता बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है।

भारतीय क्षेत्रीय नेविगेशन उपग्रह प्रणाली (IRNSS) का विकास

भारत ने स्वदेशी नेविगेशन व्यवस्था विकसित करने के लिए IRNSS कार्यक्रम प्रारंभ किया।

इस कार्यक्रम के अंतर्गत सात उपग्रहों का मूल समूह तैयार किया गया।

इस समूह का पहला उपग्रह IRNSS-1A था, जिसे जुलाई 2013 में लॉन्च किया गया।

इसके बाद वर्ष 2014 से 2016 के बीच अन्य उपग्रहों का प्रक्षेपण किया गया।

28 अप्रैल, 2016 को IRNSS-1G के प्रक्षेपण के साथ सात उपग्रहों वाले मूल समूह का निर्माण पूरा हुआ।

बाद में तकनीकी समस्याओं से प्रभावित उपग्रहों के स्थान पर नए उपग्रहों का प्रक्षेपण किया गया।

IRNSS शृंखला के उपग्रहों का प्रक्षेपण इतिहास

उपग्रह

प्रक्षेपण तिथि

प्रक्षेपण यान

IRNSS-1A

1 जुलाई, 2013

PSLV-C22

IRNSS-1B

4 अप्रैल, 2014

PSLV-C24

IRNSS-1C

16 अक्टूबर, 2014 (IST)

PSLV-C26

IRNSS-1D

28 मार्च, 2015

PSLV-C27

IRNSS-1E

20 जनवरी, 2016

PSLV-C31

IRNSS-1F

10 मार्च, 2016

PSLV-C32

IRNSS-1G

28 अप्रैल, 2016

PSLV-C33

IRNSS-1H

31 अगस्त, 2017

PSLV-C39

IRNSS-1I

12 अप्रैल, 2018

PSLV-C41

IRNSS-1H मिशन असफल क्यों हुआ था?

IRNSS-1H उपग्रह का प्रक्षेपण 31 अगस्त, 2017 को PSLV-C39 रॉकेट के माध्यम से किया गया था।

इस उपग्रह को IRNSS-1A के प्रतिस्थापन के उद्देश्य से तैयार किया गया था।

हालाँकि, प्रक्षेपण के दौरान रॉकेट का सुरक्षात्मक तापीय आवरण (Heat Shield/Payload Fairing) निर्धारित समय पर अलग नहीं हो सका।

इसके कारण उपग्रह सुरक्षात्मक आवरण के भीतर ही रह गया और निर्धारित कक्षा में स्थापित नहीं हो पाया।

इस तकनीकी समस्या के कारण मिशन असफल रहा।

बाद में ISRO ने इस समस्या का अध्ययन करके आवश्यक तकनीकी सुधार किए।

IRNSS-1I का महत्त्व

IRNSS-1I का प्रक्षेपण 12 अप्रैल, 2018 को PSLV-C41 रॉकेट के माध्यम से किया गया।

यह उपग्रह IRNSS-1A की नेविगेशन सेवाओं को प्रतिस्थापित करने के उद्देश्य से विकसित किया गया था।

इसमें नेविगेशन पेलोड के साथ रुबिडियम परमाणु घड़ियाँ शामिल थीं।

इसका प्रमुख उद्देश्य NavIC की परिचालन क्षमता और सेवा निरंतरता को बनाए रखना था।

IRNSS-1I ने भारत की स्वदेशी क्षेत्रीय नेविगेशन प्रणाली को मजबूती प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

NavIC में परिचालन उपग्रहों की कमी क्यों हुई?

NavIC की मूल उपग्रह शृंखला के कई उपग्रहों ने अपनी निर्धारित मिशन अवधि पूरी कर ली थी।

इसके अतिरिक्त कुछ उपग्रहों में लगी परमाणु घड़ियों ने कार्य करना बंद कर दिया।

परमाणु घड़ियों के काम नहीं करने से उपग्रहों की सटीक नेविगेशन सेवाएँ प्रभावित हो सकती हैं।

हालाँकि, ऐसे उपग्रह अन्य प्रकार की सीमित सेवाएँ प्रदान करने में उपयोगी बने रह सकते हैं।

जुलाई 2026 में संसद में दी गई जानकारी के अनुसार NavIC में केवल तीन उपग्रह स्थिति निर्धारण, नेविगेशन और समय संबंधी सेवाओं के लिए उपलब्ध थे।

चार परिचालन उपग्रहों की न्यूनतम आवश्यकता पूरी नहीं होने के कारण उस समय NavIC स्वतंत्र स्थिति निर्धारण सेवा उपलब्ध नहीं करा पा रहा था, जबकि उसकी समय संबंधी सेवा कार्यरत थी।

NVS-03 के सफल प्रक्षेपण और कक्षीय स्थापना से इस कमी को दूर करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण प्रगति हुई है।

भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए NavIC का महत्त्व

स्वदेशी उपग्रह नेविगेशन प्रणाली राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

आधुनिक रक्षा प्रणालियों में स्थान संबंधी जानकारी और सटीक समय निर्धारण की बड़ी भूमिका होती है।

इस प्रकार की सेवाएँ सैन्य परिवहन, निगरानी, संचार और अन्य रणनीतिक गतिविधियों के लिए उपयोगी हो सकती हैं।

विदेशी उपग्रह नेविगेशन प्रणालियों पर अत्यधिक निर्भरता से कुछ परिस्थितियों में रणनीतिक चुनौतियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।

स्वदेशी NavIC प्रणाली भारत को नेविगेशन और समय संबंधी सेवाओं के लिए वैकल्पिक राष्ट्रीय अवसंरचना प्रदान करती है।

इससे भारत की अंतरिक्ष आधारित तकनीकी क्षमताओं और रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूत करने में सहायता मिल सकती है।

NVS-03 मिशन का वैज्ञानिक और तकनीकी महत्त्व

NVS-03 मिशन भारत की अंतरिक्ष तकनीक के विकास में अनेक दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण है।

स्वदेशी प्रक्षेपण क्षमता: GSLV-F18 ने आधुनिक नेविगेशन उपग्रह को सफलतापूर्वक निर्धारित स्थानांतरण कक्षा में स्थापित किया।

क्रायोजेनिक तकनीक की सफलता: रॉकेट के स्वदेशी क्रायोजेनिक ऊपरी चरण ने मिशन में सफलतापूर्वक कार्य किया।

स्वदेशी परमाणु घड़ी: उपग्रह में भारत में विकसित परमाणु घड़ी शामिल है, जो तकनीकी आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देती है।

नेविगेशन संकेतों का विस्तार: L1, L5 और S-बैंड की उपलब्धता विभिन्न प्रकार के नेविगेशन रिसीवरों के विकास में सहायता प्रदान करती है।

कक्षीय परिवर्तन तकनीक: प्रक्षेपण के बाद उपग्रह को निर्धारित भू-समकालिक कक्षा तक पहुँचाने के लिए सफलतापूर्वक कक्षीय परिवर्तन किए गए।

NavIC की निरंतरता: नई पीढ़ी के उपग्रह पुराने उपग्रहों से संबंधित समस्याओं के बीच सेवाओं की उपलब्धता को मजबूत करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

भारत की अंतरिक्ष आत्मनिर्भरता में योगदान

भारत की अंतरिक्ष नीति का एक प्रमुख उद्देश्य स्वदेशी तकनीकों का विकास करना और महत्त्वपूर्ण अंतरिक्ष सेवाओं के लिए बाहरी निर्भरता को कम करना है।

NavIC इस दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम है।

इसके माध्यम से भारत अपने निर्धारित क्षेत्र में स्वतंत्र स्थिति निर्धारण, नेविगेशन और समय संबंधी सेवाओं की क्षमता विकसित कर रहा है।

NVS-03 में स्वदेशी परमाणु घड़ी तथा आधुनिक नेविगेशन तकनीकों का उपयोग इस दिशा में प्रगति को दर्शाता है।

भविष्य में उपग्रहों की संख्या और प्रणाली की विश्वसनीयता बढ़ने से भारत की नागरिक और रणनीतिक आवश्यकताओं को बेहतर समर्थन मिल सकता है।

NavIC के सामने प्रमुख चुनौतियाँ

NavIC भारत की एक महत्त्वपूर्ण अंतरिक्ष उपलब्धि है, लेकिन इसकी दीर्घकालिक सफलता के लिए कई चुनौतियों का समाधान आवश्यक है।

परिचालन उपग्रहों की पर्याप्त संख्या: विश्वसनीय और निर्बाध सेवाओं के लिए आवश्यक संख्या में सक्रिय उपग्रह बनाए रखना आवश्यक है।

परमाणु घड़ियों की विश्वसनीयता: उपग्रहों में सटीक समय निर्धारण करने वाली घड़ियों का निर्धारित मिशन अवधि तक सही कार्य करना अत्यंत आवश्यक है।

तकनीकी खराबियों से सुरक्षा: प्रणोदन, बिजली, संचार और अन्य प्रणालियों में अनावश्यक विफलताओं को रोकने के लिए तकनीकी विश्वसनीयता बढ़ानी होगी।

रिसीवरों में NavIC समर्थन: स्मार्टफोन, वाहनों और अन्य उपकरणों में NavIC के उपयोग के लिए संगत हार्डवेयर तथा सॉफ्टवेयर की उपलब्धता बढ़ाना आवश्यक है।

निरंतर उपग्रह प्रतिस्थापन: पुराने उपग्रहों का मिशन जीवन समाप्त होने से पहले नए उपग्रह उपलब्ध कराना दीर्घकालिक सेवा निरंतरता के लिए महत्त्वपूर्ण है।

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