केंद्र सरकार ने राज्यों की वित्तीय स्थिति को मजबूत करने और विकास कार्यों को गति प्रदान करने के उद्देश्य से 31 अक्टूबर, 2026 को 1,09,019 करोड़ रुपये (लगभग 1.09 लाख करोड़ रुपये) की अतिरिक्त कर हस्तांतरण राशि जारी की।
यह राशि राज्यों को नियमित मासिक कर हस्तांतरण (Tax Devolution) के अतिरिक्त प्रदान की गई है।
वित्त वर्ष 2026-27 में केंद्र सरकार द्वारा जारी की गई यह दूसरी अतिरिक्त कर हस्तांतरण किस्त है।
इसका मुख्य उद्देश्य आगामी त्योहारों के मौसम को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकारों को अतिरिक्त वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराना, पूँजीगत व्यय में तेजी लाना तथा विकास और जनकल्याण से संबंधित योजनाओं के लिए धन की उपलब्धता सुनिश्चित करना है।
इस अतिरिक्त कर हस्तांतरण से राज्य सरकारें सड़क, पुल, स्वास्थ्य, शिक्षा, सिंचाई, ग्रामीण विकास और अन्य बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं पर खर्च बढ़ा सकेंगी।
इस वितरण में उत्तर प्रदेश को सर्वाधिक 19,208 करोड़ रुपये प्राप्त हुए, जबकि बिहार को 10,845 करोड़ रुपये और मध्य प्रदेश को 8,010 करोड़ रुपये आवंटित किए गए।
यह निर्णय भारत की राजकोषीय संघीय व्यवस्था (Fiscal Federalism) के अंतर्गत केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय संसाधनों के वितरण का एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण है।
चर्चा में क्यों?
31 अक्टूबर, 2026 को केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने राज्यों के लिए 1,09,019 करोड़ रुपये की अतिरिक्त कर हस्तांतरण किस्त जारी की।
इससे पहले 1 अगस्त, 2026 को भी केंद्र सरकार ने समान राशि की एक अतिरिक्त किस्त जारी की थी।
इस प्रकार वित्त वर्ष 2026-27 के दौरान अक्टूबर तक दो अतिरिक्त किस्तें जारी की गईं।
इसके बाद 5 नवंबर, 2026 को केंद्र सरकार ने नवंबर की नियमित मासिक किस्त के 1,09,019 करोड़ रुपये भी निर्धारित 10 नवंबर की तारीख से पहले जारी कर दिए।
अतः 31 अक्टूबर की अतिरिक्त किस्त और 5 नवंबर की अग्रिम नियमित किस्त दो अलग-अलग हस्तांतरण हैं।
इन वित्तीय हस्तांतरणों का उद्देश्य राज्यों को समय पर संसाधन उपलब्ध कराकर विकास परियोजनाओं और जनकल्याणकारी कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में सहायता प्रदान करना है।
कर हस्तांतरण (Tax Devolution) क्या है?
कर हस्तांतरण (Tax Devolution) वह संवैधानिक व्यवस्था है, जिसके अंतर्गत केंद्र सरकार द्वारा एकत्र किए गए साझा किए जाने योग्य केंद्रीय करों की शुद्ध आय का निर्धारित हिस्सा राज्य सरकारों के बीच वितरित किया जाता है।
भारत में केंद्र और राज्य सरकारों के बीच कर लगाने, कर एकत्र करने तथा राजस्व के उपयोग से संबंधित शक्तियों का विभाजन संविधान द्वारा निर्धारित किया गया है।
केंद्र सरकार आयकर, निगम कर, केंद्रीय वस्तु एवं सेवा कर और अन्य केंद्रीय करों से राजस्व प्राप्त करती है।
इनमें से संवैधानिक रूप से विभाज्य कर राजस्व का एक हिस्सा केंद्र अपने पास रखता है, जबकि निर्धारित हिस्सा राज्यों को प्रदान किया जाता है।
इस प्रक्रिया को कर हस्तांतरण या कर राजस्व का अंतरण कहा जाता है।
इसका प्रमुख उद्देश्य राज्यों को पर्याप्त वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराना है, ताकि वे अपने संवैधानिक दायित्वों और विकास संबंधी आवश्यकताओं को पूरा कर सकें।
कर हस्तांतरण की व्यवस्था कैसे काम करती है?
भारत में कर हस्तांतरण की प्रक्रिया संविधान और वित्त आयोग की सिफारिशों के आधार पर संचालित होती है।
इस प्रक्रिया में सबसे पहले केंद्र सरकार विभिन्न केंद्रीय करों से राजस्व एकत्र करती है।
इसके बाद संबंधित संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार उपकर, अधिभार तथा कर संग्रह की लागत जैसी मदों को अलग करके विभाज्य कर पूल निर्धारित किया जाता है।
वित्त आयोग की स्वीकृत सिफारिशों के आधार पर इस पूल में से केंद्र और राज्यों का हिस्सा तय होता है।
वर्तमान व्यवस्था के अंतर्गत राज्यों को विभाज्य कर पूल की शुद्ध आय का 41 प्रतिशत प्रदान किया जाता है, जबकि शेष 59 प्रतिशत केंद्र के हिस्से में रहता है।
राज्यों के कुल 41 प्रतिशत हिस्से को आगे अलग-अलग राज्यों के बीच एक निर्धारित सूत्र के अनुसार वितरित किया जाता है।
कर हस्तांतरण का संवैधानिक आधार
भारत में केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय संसाधनों का वितरण मुख्य रूप से संविधान के अनुच्छेद 270 और अनुच्छेद 280 के प्रावधानों पर आधारित है।
अनुच्छेद 270: करों का वितरण
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 270 केंद्र और राज्यों के बीच कुछ केंद्रीय करों की शुद्ध आय के वितरण से संबंधित है।
इसके अंतर्गत निर्धारित केंद्रीय करों से प्राप्त राजस्व को संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार केंद्र तथा राज्यों के बीच बाँटा जाता है।
अनुच्छेद 280: वित्त आयोग
अनुच्छेद 280 के अंतर्गत भारत के राष्ट्रपति द्वारा वित्त आयोग का गठन किया जाता है।
वित्त आयोग का एक प्रमुख कार्य केंद्र और राज्यों के बीच कर राजस्व के वितरण से संबंधित सिफारिशें प्रस्तुत करना है।
अनुच्छेद 280(3)(a) विशेष रूप से संघ और राज्यों के बीच विभाज्य करों की शुद्ध आय के वितरण तथा राज्यों के बीच उनके हिस्से के आवंटन से संबंधित है।
अनुच्छेद 279: शुद्ध आय की गणना
यह अनुच्छेद करों की शुद्ध आय (Net Proceeds) की गणना से संबंधित है।
अनुच्छेद 271: अधिभार
इसके अंतर्गत संसद को निर्धारित करों और शुल्कों पर संघ के उद्देश्यों के लिए अधिभार लगाने की शक्ति प्राप्त है।
ऐसे अधिभार से प्राप्त राजस्व सामान्यतः राज्यों के साथ साझा किए जाने वाले विभाज्य कर पूल में शामिल नहीं होता।
अनुच्छेद 281: वित्त आयोग की सिफारिशें
इस अनुच्छेद के अनुसार राष्ट्रपति वित्त आयोग की सिफारिशों और उन पर की गई कार्रवाई से संबंधित व्याख्यात्मक ज्ञापन को संसद के समक्ष प्रस्तुत कराते हैं।
विभाज्य कर पूल (Divisible Pool) क्या है?
विभाज्य कर पूल वह हिस्सा है, जो केंद्र सरकार के सकल कर राजस्व में से संवैधानिक रूप से निर्धारित मदों को बाहर करने के बाद केंद्र और राज्यों के बीच वितरण के लिए उपलब्ध होता है।
इसमें केंद्रीय आयकर, निगम कर तथा अन्य पात्र केंद्रीय करों की शुद्ध आय शामिल हो सकती है।
हालाँकि, केंद्र द्वारा एकत्र किए गए सभी करों का पूरा राजस्व विभाज्य पूल में शामिल नहीं होता।
विशेष उद्देश्यों के लिए लगाए गए उपकर (Cess), अधिभार (Surcharge) तथा संबंधित संवैधानिक अपवाद इसके बाहर रखे जाते हैं।
कर संग्रह की लागत घटाने के बाद उपलब्ध शुद्ध राजस्व के आधार पर केंद्र और राज्यों का हिस्सा निर्धारित किया जाता है।
महत्त्वपूर्ण तथ्य: राज्यों को मिलने वाला 41 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार द्वारा एकत्र किए गए कुल सकल कर राजस्व का 41 प्रतिशत नहीं है, बल्कि विभाज्य कर पूल की शुद्ध आय का 41 प्रतिशत है।
उपकर (Cess) और अधिभार (Surcharge) में अंतर
उपकर और अधिभार दोनों सरकार द्वारा करों के अतिरिक्त लगाए जाने वाले वित्तीय प्रावधान हैं, लेकिन इनके उद्देश्य अलग-अलग होते हैं।
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आधार |
उपकर (Cess) |
अधिभार (Surcharge) |
|---|---|---|
|
अर्थ |
किसी निर्दिष्ट उद्देश्य के लिए लगाया जाने वाला अतिरिक्त कर |
मौजूदा कर पर लगाया जाने वाला अतिरिक्त कर |
|
उद्देश्य |
किसी विशेष कार्य या कार्यक्रम के लिए राजस्व जुटाना |
संघ के राजस्व में वृद्धि |
|
उपयोग |
निर्धारित उद्देश्य के लिए |
सामान्यतः संबंधित सरकार के राजस्व प्रयोजनों के लिए |
|
विभाज्य पूल में हिस्सा |
विशेष प्रयोजन वाले उपकर शामिल नहीं |
अनुच्छेद 271 के अधिभार शामिल नहीं |
|
उदाहरण |
स्वास्थ्य एवं शिक्षा उपकर |
निर्धारित उच्च आय पर आयकर अधिभार |
उपकर और अधिभार को विभाज्य पूल से बाहर रखने के कारण इनका अनुपात बढ़ने पर राज्यों के लिए साझा किए जाने योग्य केंद्रीय कर राजस्व का अनुपात प्रभावित हो सकता है।
वित्त आयोग (Finance Commission) क्या है?
वित्त आयोग भारत की एक संवैधानिक संस्था है, जिसका गठन भारतीय संविधान के अनुच्छेद 280 के अंतर्गत किया जाता है।
इसका प्रमुख उद्देश्य केंद्र और राज्य सरकारों के बीच वित्तीय संसाधनों के न्यायसंगत वितरण के लिए सिफारिशें प्रस्तुत करना है।
वित्त आयोग का गठन भारत के राष्ट्रपति द्वारा सामान्यतः प्रत्येक पाँच वर्ष में या आवश्यकतानुसार उससे पहले किया जा सकता है।
यह आयोग देश की संघीय वित्तीय व्यवस्था को मजबूत बनाने और राज्यों के बीच आर्थिक असमानताओं को कम करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
वित्त आयोग में एक अध्यक्ष और चार अन्य सदस्य होते हैं।
वित्त आयोग के प्रमुख कार्य
1. केंद्र और राज्यों के बीच कर राजस्व का वितरण
वित्त आयोग यह सिफारिश करता है कि विभाज्य केंद्रीय करों की शुद्ध आय में से कितना हिस्सा राज्यों को दिया जाना चाहिए।
2. राज्यों के बीच कर राजस्व का आवंटन
आयोग यह भी निर्धारित करने के लिए सिफारिशें देता है कि राज्यों के कुल हिस्से को अलग-अलग राज्यों के बीच किस आधार पर वितरित किया जाए।
3. सहायता अनुदान की सिफारिश
वित्त आयोग संविधान के अनुच्छेद 275 के अंतर्गत भारत की संचित निधि से राज्यों को दिए जाने वाले सहायता अनुदानों के संबंध में सिफारिश करता है।
4. स्थानीय निकायों के वित्तीय संसाधनों को मजबूत करना
वित्त आयोग राज्य वित्त आयोगों की सिफारिशों के आधार पर पंचायतों और नगरपालिकाओं के संसाधनों को मजबूत करने के उपाय सुझाता है।
5. वित्तीय संघवाद को प्रोत्साहन
वित्त आयोग केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय संतुलन बनाए रखने तथा राज्यों की विकास संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने में सहायता करता है।
16वाँ वित्त आयोग और कर हस्तांतरण
वित्त वर्ष 2026-27 से 2030-31 की अवधि के लिए 16वें वित्त आयोग (16th Finance Commission) की सिफारिशें लागू हैं।
इस आयोग के अध्यक्ष अर्थशास्त्री डॉ. अरविंद पनगढ़िया हैं।
16वें वित्त आयोग का गठन 31 दिसंबर, 2023 को किया गया था।
आयोग ने 17 नवंबर, 2025 को अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को प्रस्तुत की।
इसकी सिफारिशों को 1 फरवरी, 2026 को संसद के समक्ष रखा गया।
16वें वित्त आयोग ने केंद्रीय करों के विभाज्य पूल में राज्यों की हिस्सेदारी को 41 प्रतिशत पर बनाए रखने की सिफारिश की।
केंद्र सरकार ने इस सिफारिश को स्वीकार कर लिया।
इस प्रकार 15वें वित्त आयोग की तरह 16वें वित्त आयोग की अवधि में भी राज्यों की कुल हिस्सेदारी 41 प्रतिशत बनी हुई है।
विभिन्न वित्त आयोगों द्वारा राज्यों की हिस्सेदारी
समय-समय पर वित्त आयोगों ने राज्यों की वित्तीय आवश्यकताओं और देश की आर्थिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए कर हस्तांतरण की दर निर्धारित की है।
|
वित्त आयोग |
अवधि |
राज्यों की हिस्सेदारी |
|---|---|---|
|
13वाँ वित्त आयोग |
2010-15 |
32% |
|
14वाँ वित्त आयोग |
2015-20 |
42% |
|
15वाँ वित्त आयोग |
2020-26 |
41% |
|
16वाँ वित्त आयोग |
2026-31 |
41% |
14वें वित्त आयोग ने राज्यों की हिस्सेदारी को 32 प्रतिशत से बढ़ाकर 42 प्रतिशत करने की सिफारिश की थी।
यह भारत की राजकोषीय संघीय व्यवस्था में एक महत्त्वपूर्ण बदलाव था।
इसके बाद 15वें वित्त आयोग ने जम्मू-कश्मीर के केंद्रशासित प्रदेश बनने के बाद राज्यों की हिस्सेदारी 41 प्रतिशत निर्धारित की।
16वें वित्त आयोग ने इसी अनुपात को जारी रखने की सिफारिश की।
ऊर्ध्वाधर कर हस्तांतरण (Vertical Devolution) क्या है?
ऊर्ध्वाधर कर हस्तांतरण का अर्थ केंद्र सरकार और सभी राज्य सरकारों के बीच विभाज्य कर राजस्व का वितरण है।
इसमें यह निर्धारित किया जाता है कि केंद्रीय करों के विभाज्य पूल में केंद्र और सभी राज्यों की सामूहिक हिस्सेदारी कितनी होगी।
वर्तमान व्यवस्था के अनुसार राज्यों को 41 प्रतिशत और केंद्र को 59 प्रतिशत हिस्सा प्राप्त होता है।
उदाहरण के लिए, यदि विभाज्य कर पूल की शुद्ध राशि 1,000 करोड़ रुपये हो, तो:
-
राज्यों का कुल हिस्सा 410 करोड़ रुपये होगा।
-
केंद्र सरकार का हिस्सा 590 करोड़ रुपये होगा।
यह ऊर्ध्वाधर कर हस्तांतरण का एक सरल उदाहरण है।
क्षैतिज कर हस्तांतरण (Horizontal Devolution) क्या है?
क्षैतिज कर हस्तांतरण का अर्थ राज्यों को प्राप्त कुल कर राजस्व को अलग-अलग राज्यों के बीच बाँटना है।
इसके लिए वित्त आयोग विभिन्न सामाजिक, आर्थिक और भौगोलिक मानदंड निर्धारित करता है।
इन मानदंडों में राज्यों की जनसंख्या, आय का स्तर, क्षेत्रफल, जनसांख्यिकीय प्रदर्शन, वन क्षेत्र और अर्थव्यवस्था में योगदान जैसे पहलू शामिल हो सकते हैं।
क्षैतिज हस्तांतरण का उद्देश्य राज्यों के बीच वित्तीय असमानताओं को कम करने के साथ विकास की आवश्यकताओं और आर्थिक योगदान के बीच संतुलन स्थापित करना है।
16वें वित्त आयोग द्वारा कर वितरण के निर्धारित मानदंड
16वें वित्त आयोग ने राज्यों के बीच कर राजस्व के वितरण के लिए छह प्रमुख मानदंड निर्धारित किए हैं।
|
मानदंड |
निर्धारित भारांश |
|---|---|
|
आय दूरी (Income Distance) |
42.5% |
|
जनसंख्या – जनगणना 2011 |
17.5% |
|
जनसांख्यिकीय प्रदर्शन |
10% |
|
क्षेत्रफल |
10% |
|
वन क्षेत्र |
10% |
|
सकल घरेलू उत्पाद में योगदान |
10% |
|
कुल |
100% |
इस व्यवस्था में आय दूरी को सबसे अधिक महत्त्व दिया गया है।
16वें वित्त आयोग ने सकल घरेलू उत्पाद में योगदान को एक अलग मानदंड के रूप में शामिल किया है, जबकि पिछले आयोग में प्रयुक्त कर एवं राजकोषीय प्रयास के मानदंड को हटाया गया है।
आय दूरी (Income Distance) का अर्थ
आय दूरी का अर्थ विभिन्न राज्यों की प्रति व्यक्ति आय के स्तर में मौजूद अंतर से है।
इस मानदंड का उद्देश्य अपेक्षाकृत कम आय वाले राज्यों को अधिक वित्तीय सहायता प्रदान करके उनके विकास की आवश्यकताओं को पूरा करना है।
16वें वित्त आयोग ने आय दूरी के आकलन के लिए राज्यों के प्रति व्यक्ति सकल राज्य घरेलू उत्पाद (Per Capita GSDP) को आधार बनाया है।
सामान्यतः अधिक आय दूरी वाले राज्यों को इस मानदंड के अंतर्गत अधिक भारांक प्राप्त होता है।
इससे अपेक्षाकृत कम आर्थिक क्षमता वाले राज्यों को वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराने में सहायता मिलती है।
जनसंख्या को कर हस्तांतरण का आधार क्यों बनाया जाता है?
किसी राज्य की जनसंख्या उसकी सार्वजनिक सेवाओं की माँग को प्रभावित करती है।
अधिक जनसंख्या वाले राज्यों में शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पेयजल, सार्वजनिक परिवहन और अन्य मूलभूत सुविधाओं की आवश्यकता भी अधिक हो सकती है।
इसलिए राज्यों की जनसंख्या को कर हस्तांतरण के एक महत्त्वपूर्ण मानदंड के रूप में शामिल किया गया है।
16वें वित्त आयोग ने वर्ष 2011 की जनगणना के जनसंख्या आँकड़ों को आधार बनाकर 17.5 प्रतिशत भारांश निर्धारित किया है।
जनसांख्यिकीय प्रदर्शन का महत्त्व
जनसांख्यिकीय प्रदर्शन का संबंध राज्यों द्वारा जनसंख्या संबंधी संकेतकों में किए गए प्रदर्शन से है।
इसका एक प्रमुख उद्देश्य उन राज्यों के प्रयासों को मान्यता देना है, जिन्होंने जनसंख्या स्थिरीकरण और जनसांख्यिकीय परिवर्तन में प्रगति की है।
16वें वित्त आयोग ने इस मानदंड के लिए 10 प्रतिशत भारांश निर्धारित किया है।
इससे जनसंख्या संबंधी प्रदर्शन को राज्यों के वित्तीय आवंटन में महत्त्व दिया गया है।
वन क्षेत्र और पर्यावरण संरक्षण का महत्त्व
भारत के अनेक राज्य बड़े वन क्षेत्रों और महत्त्वपूर्ण पारिस्थितिक तंत्रों का संरक्षण करते हैं।
वन क्षेत्र का संरक्षण राष्ट्रीय पर्यावरणीय सुरक्षा, जैव विविधता, जल संसाधनों और जलवायु संतुलन के लिए महत्त्वपूर्ण है।
हालाँकि, बड़े वन क्षेत्रों के कारण कई राज्यों में भूमि के व्यावसायिक तथा औद्योगिक उपयोग पर प्रतिबंध भी हो सकते हैं।
इसलिए वन संरक्षण में राज्यों के योगदान को ध्यान में रखते हुए वित्त आयोग ने वन क्षेत्र को कर वितरण का एक मानदंड बनाया है।
16वें वित्त आयोग ने इसके लिए 10 प्रतिशत भारांश निर्धारित किया है।
1,09,019 करोड़ रुपये का राज्यवार वितरण
31 अक्टूबर, 2026 को जारी अतिरिक्त कर हस्तांतरण राशि का वितरण सभी 28 राज्यों के बीच निर्धारित हिस्सेदारी के अनुसार किया गया।
|
राज्य |
प्राप्त राशि (₹ करोड़) |
|---|---|
|
उत्तर प्रदेश |
19,208 |
|
बिहार |
10,845 |
|
मध्य प्रदेश |
8,010 |
|
पश्चिम बंगाल |
7,866 |
|
महाराष्ट्र |
7,022 |
|
राजस्थान |
6,460 |
|
ओडिशा |
4,819 |
|
आंध्र प्रदेश |
4,597 |
|
कर्नाटक |
4,504 |
|
तमिलनाडु |
4,466 |
|
गुजरात |
4,094 |
|
झारखंड |
3,660 |
|
छत्तीसगढ़ |
3,602 |
|
असम |
3,552 |
|
केरल |
2,597 |
|
तेलंगाना |
2,370 |
|
पंजाब |
2,176 |
|
हरियाणा |
1,484 |
|
अरुणाचल प्रदेश |
1,476 |
|
उत्तराखंड |
1,244 |
|
हिमाचल प्रदेश |
996 |
|
त्रिपुरा |
699 |
|
मेघालय |
688 |
|
मणिपुर |
682 |
|
मिजोरम |
615 |
|
नगालैंड |
524 |
|
गोवा |
398 |
|
सिक्किम |
365 |
|
कुल |
1,09,019 |
इस वितरण में उत्तर प्रदेश को सर्वाधिक और सिक्किम को सबसे कम राशि प्राप्त हुई।
इन राशियों में अंतर राज्यों के लिए निर्धारित क्षैतिज वितरण सूत्र का परिणाम है। केवल प्राप्त राशि से किसी राज्य की आर्थिक स्थिति या वित्तीय आवश्यकता का पूरा आकलन नहीं किया जा सकता।
उत्तर प्रदेश को सर्वाधिक कर हस्तांतरण राशि क्यों मिली?
उत्तर प्रदेश भारत के सर्वाधिक जनसंख्या वाले राज्यों में पहला स्थान रखता है।
इसके अतिरिक्त राज्य का विशाल भौगोलिक क्षेत्रफल, सामाजिक-आर्थिक आवश्यकताएँ और प्रति व्यक्ति आय संबंधी संकेतक वित्त आयोग के वितरण सूत्र को प्रभावित करते हैं।
इन्हीं निर्धारित मानदंडों के संयुक्त प्रभाव के कारण उत्तर प्रदेश का हिस्सा अन्य राज्यों की तुलना में अधिक है।
31 अक्टूबर, 2026 की अतिरिक्त किस्त में उत्तर प्रदेश को 19,208 करोड़ रुपये प्रदान किए गए।
इस राशि से राज्य सरकार को विभिन्न विकास कार्यों और सार्वजनिक सेवाओं के वित्तपोषण के लिए अतिरिक्त संसाधन उपलब्ध हुए हैं।
नियमित और अतिरिक्त कर हस्तांतरण में अंतर
केंद्र सरकार सामान्यतः वित्त वर्ष के दौरान राज्यों को मासिक किस्तों में कर हस्तांतरण की राशि उपलब्ध कराती है।
इसके अतिरिक्त वित्तीय आवश्यकताओं और केंद्र के नकदी प्रवाह की स्थिति को ध्यान में रखते हुए अतिरिक्त या अग्रिम किस्तें भी जारी की जा सकती हैं।
|
आधार |
नियमित कर हस्तांतरण |
अतिरिक्त कर हस्तांतरण |
|---|---|---|
|
प्रकृति |
सामान्य किस्त |
नियमित किस्त से अलग अतिरिक्त अथवा अग्रिम वितरण |
|
समय |
निर्धारित मासिक कार्यक्रम |
सरकार द्वारा निर्धारित अतिरिक्त समय |
|
उद्देश्य |
राज्यों को नियमित राजस्व उपलब्ध कराना |
राज्यों को पहले से अधिक नकदी उपलब्ध कराना |
|
आधार |
वित्त आयोग की स्वीकृत सिफारिशें |
वही कर हस्तांतरण व्यवस्था |
|
उपयोग |
राज्य बजट और अन्य व्यय |
विकास, पूँजीगत व्यय एवं अन्य आवश्यकताएँ |
वित्त वर्ष 2026-27 में नियमित मासिक किस्तों के अतिरिक्त दो विशेष किस्तें जारी की गई हैं।
इसलिए इस वर्ष कर हस्तांतरण के अंतर्गत 14 किस्तों की व्यवस्था देखने को मिलती है। हालाँकि, संविधान सभी वित्त वर्षों के लिए अनिवार्य रूप से 14 किस्तों का प्रावधान नहीं करता।
पूँजीगत व्यय (Capital Expenditure) क्या है?
पूँजीगत व्यय वह सरकारी खर्च होता है, जिसके माध्यम से दीर्घकालिक उपयोग वाली परिसंपत्तियों का निर्माण या अधिग्रहण किया जाता है अथवा निर्धारित वित्तीय दायित्वों में कमी लाई जाती है।
सरकारी पूँजीगत व्यय में सड़क, पुल, रेलवे अवसंरचना, सिंचाई परियोजनाएँ, सरकारी भवन, अस्पताल और अन्य सार्वजनिक अवसंरचना का निर्माण शामिल हो सकता है।
पूँजीगत व्यय का उद्देश्य अर्थव्यवस्था में उत्पादक क्षमता और दीर्घकालिक विकास की संभावनाएँ बढ़ाना होता है।
केंद्र सरकार द्वारा राज्यों को अतिरिक्त कर हस्तांतरण प्रदान करने का एक प्रमुख उद्देश्य ऐसे पूँजीगत व्यय को गति देना है।
पूँजीगत व्यय और राजस्व व्यय में अंतर
|
आधार |
पूँजीगत व्यय |
राजस्व व्यय |
|---|---|---|
|
अर्थ |
परिसंपत्ति निर्माण या संबंधित वित्तीय दायित्वों में कमी से जुड़ा व्यय |
सरकार के नियमित संचालन और सेवाओं पर होने वाला व्यय |
|
प्रकृति |
प्रायः दीर्घकालिक लाभ |
सामान्यतः नियमित या आवर्ती |
|
उदाहरण |
सड़क, पुल और भवन निर्माण |
वेतन, पेंशन, ब्याज भुगतान |
|
आर्थिक प्रभाव |
उत्पादक क्षमता बढ़ाने में सहायता |
सरकारी सेवाओं की निरंतरता बनाए रखने में सहायता |
राज्यों को प्राप्त अतिरिक्त कर हस्तांतरण राशि का उपयोग उनकी बजटीय प्राथमिकताओं के अनुसार पूँजीगत और राजस्व, दोनों प्रकार के व्यय के वित्तपोषण में किया जा सकता है।
अतिरिक्त कर हस्तांतरण का राज्यों पर प्रभाव
1. राज्यों की वित्तीय स्थिति मजबूत होना
अतिरिक्त कर हस्तांतरण से राज्य सरकारों के पास उपलब्ध नकदी और वित्तीय संसाधनों में वृद्धि होती है।
इससे उन्हें अपने निर्धारित व्यय पूरे करने और विकास परियोजनाओं को आगे बढ़ाने में सहायता मिलती है।
2. विकास परियोजनाओं में तेजी
अतिरिक्त वित्तीय संसाधन मिलने से राज्य सरकारें पहले से स्वीकृत बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं का कार्यान्वयन तेज कर सकती हैं।
3. जनकल्याणकारी योजनाओं को सहायता
राज्य सरकारें शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, सामाजिक सुरक्षा और ग्रामीण विकास से जुड़ी योजनाओं के वित्तपोषण में इन संसाधनों का उपयोग कर सकती हैं।
4. स्थानीय आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा
सार्वजनिक व्यय में वृद्धि से निर्माण, परिवहन और संबंधित सेवाओं की माँग बढ़ सकती है।
5. राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता
कर हस्तांतरण से प्राप्त संसाधन सामान्यतः बिना किसी विशिष्ट योजना से बँधे होते हैं। इससे राज्य अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार वित्तीय निर्णय ले सकते हैं।
त्योहारों के मौसम से पहले अतिरिक्त राशि जारी करने का महत्त्व
भारत में त्योहारों के मौसम के दौरान व्यापार, परिवहन, पर्यटन, निर्माण और उपभोक्ता गतिविधियों में वृद्धि देखने को मिल सकती है।
राज्य सरकारों को इस अवधि में अतिरिक्त वित्तीय संसाधन मिलने से विकास संबंधी भुगतान और सार्वजनिक खर्च को समय पर पूरा करने में सहायता मिलती है।
इससे निर्माण परियोजनाओं, सार्वजनिक सेवाओं और स्थानीय अर्थव्यवस्था से संबंधित गतिविधियों को प्रोत्साहन मिल सकता है।
हालाँकि, आर्थिक प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि राज्य सरकारें प्राप्त राशि का उपयोग कितनी जल्दी और किस प्रकार करती हैं।
कर हस्तांतरण और सहायता अनुदान (Grants-in-Aid) में अंतर
कर हस्तांतरण और सहायता अनुदान दोनों केंद्र से राज्यों तक वित्तीय संसाधन पहुँचाने के महत्त्वपूर्ण माध्यम हैं।
लेकिन दोनों की प्रकृति अलग है।
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आधार |
कर हस्तांतरण |
सहायता अनुदान |
|---|---|---|
|
संवैधानिक आधार |
मुख्यतः अनुच्छेद 270 एवं 280 |
अनुच्छेद 275 सहित संबंधित प्रावधान |
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उद्देश्य |
राज्यों का कर राजस्व में निर्धारित हिस्सा |
विशिष्ट वित्तीय आवश्यकताओं में सहायता |
|
वितरण का आधार |
वित्त आयोग का कर वितरण सूत्र |
संबंधित अनुदान की सिफारिशें एवं शर्तें |
|
उपयोग में लचीलापन |
सामान्यतः अधिक |
अनुदान की प्रकृति पर निर्भर |
|
स्वरूप |
कर राजस्व में हिस्सा |
अलग वित्तीय सहायता |
इस प्रकार कर हस्तांतरण को केंद्र सरकार की किसी विशेष योजना का अनुदान नहीं समझना चाहिए।
राजकोषीय संघवाद (Fiscal Federalism) क्या है?
राजकोषीय संघवाद वह व्यवस्था है, जिसके अंतर्गत संघीय शासन प्रणाली में केंद्र और राज्य सरकारों के बीच वित्तीय शक्तियों, कर राजस्व और व्यय संबंधी जिम्मेदारियों का वितरण किया जाता है।
भारत एक संघीय शासन व्यवस्था वाला देश है, जिसमें केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर सरकारें कार्य करती हैं।
भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची में संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची के माध्यम से विधायी शक्तियों का विभाजन किया गया है।
इसके अतिरिक्त कराधान और राजस्व वितरण की विस्तृत व्यवस्था संविधान के वित्तीय प्रावधानों के अंतर्गत निर्धारित की गई है।
भारत में अनेक महत्त्वपूर्ण करों से राजस्व केंद्र सरकार को प्राप्त होता है, जबकि शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, सार्वजनिक व्यवस्था और अन्य विकास कार्यों पर राज्य सरकारों की व्यापक जिम्मेदारियाँ होती हैं।
इसी असंतुलन को कम करने के लिए कर हस्तांतरण और सहायता अनुदान जैसी व्यवस्थाएँ महत्त्वपूर्ण हैं।
कर हस्तांतरण से राज्यों को वित्तीय स्थिरता कैसे मिलती है?
कर हस्तांतरण राज्यों को अपेक्षाकृत पूर्वानुमान योग्य और नियमित राजस्व उपलब्ध कराने में सहायता करता है।
इससे राज्य सरकारें अपने वार्षिक बजट और मध्यम अवधि की विकास योजनाएँ तैयार कर सकती हैं।
इसके अतिरिक्त राज्यों को हर व्यय के लिए केंद्र सरकार से अलग-अलग अनुदान माँगने की आवश्यकता कम होती है।
कर हस्तांतरण के माध्यम से उपलब्ध संसाधनों का उपयोग राज्य अपनी आवश्यकताओं और प्राथमिकताओं के अनुसार कर सकते हैं।
यह व्यवस्था राज्य सरकारों की वित्तीय स्वायत्तता और जवाबदेही को भी मजबूत करती है।
राज्यों के बीच वित्तीय असमानता को कम करने में भूमिका
भारत के विभिन्न राज्यों की आर्थिक स्थिति, कर राजस्व क्षमता और विकास का स्तर एक समान नहीं है।
कुछ राज्यों में औद्योगिक गतिविधियाँ और प्रति व्यक्ति आय अधिक हैं, जबकि कुछ राज्यों की अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत कम विकसित है।
इसके अतिरिक्त जनसंख्या, क्षेत्रफल, भौगोलिक परिस्थितियों और बुनियादी सेवाओं की आवश्यकता में भी अंतर होता है।
इस स्थिति में वित्त आयोग कर वितरण सूत्र के माध्यम से राज्यों के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है।
आय दूरी जैसे मानदंडों के कारण अपेक्षाकृत कम आय वाले राज्यों को वित्तीय सहायता के वितरण में अधिक महत्त्व प्राप्त हो सकता है।
इस प्रकार कर हस्तांतरण क्षेत्रीय आर्थिक असमानताओं को कम करने का एक महत्त्वपूर्ण माध्यम है।
कर हस्तांतरण व्यवस्था के सामने प्रमुख चुनौतियाँ
उपकर और अधिभार में वृद्धि: केंद्रीय कर राजस्व में उपकर और अधिभार का अनुपात बढ़ने से विभाज्य पूल का आकार प्रभावित हो सकता है।
राज्यों की बढ़ती वित्तीय आवश्यकताएँ: स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा और बुनियादी ढाँचा विकास के कारण राज्यों के व्यय में लगातार वृद्धि होती है।
केंद्र और राज्यों के बीच राजस्व असंतुलन: कर संग्रह की शक्तियों और व्यय संबंधी जिम्मेदारियों के बीच अंतर वित्तीय तनाव उत्पन्न कर सकता है।
राज्यों के बीच वितरण संबंधी मतभेद: अलग-अलग राज्यों की जनसंख्या, आर्थिक योगदान और विकास की आवश्यकताएँ भिन्न होने के कारण वितरण सूत्र पर मतभेद हो सकते हैं।
कर राजस्व में उतार-चढ़ाव: आर्थिक मंदी या कर संग्रह में कमी आने से विभाज्य कर राजस्व प्रभावित हो सकता है।
इन चुनौतियों के समाधान के लिए पारदर्शी राजस्व वितरण और केंद्र-राज्य सहयोग महत्त्वपूर्ण है।
कर हस्तांतरण और सहकारी संघवाद
सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) का अर्थ केंद्र और राज्य सरकारों के बीच सहयोग तथा समन्वय के माध्यम से शासन और विकास संबंधी उद्देश्यों को प्राप्त करना है।
कर हस्तांतरण इस व्यवस्था का एक महत्त्वपूर्ण आर्थिक आधार है।
केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार राज्यों को वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराना विकास में उनकी भागीदारी को मजबूत करता है।
इससे राज्यों को स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार योजनाएँ बनाने और उन्हें लागू करने की स्वतंत्रता प्राप्त होती है।
साथ ही वित्त आयोग जैसी स्वतंत्र संवैधानिक संस्था केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय संसाधनों के न्यायसंगत वितरण का आधार प्रदान करती है।