हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (National Company Law Tribunal – NCLT) और राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (National Company Law Appellate Tribunal – NCLAT) के प्रशासनिक कामकाज में कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय (Ministry of Corporate Affairs – MCA) के बढ़ते हस्तक्षेप पर गंभीर चिंता व्यक्त की है।
सर्वोच्च न्यायालय ने टिप्पणी की कि कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय ने इन न्यायाधिकरणों के प्रशासनिक नियंत्रण को पूरी तरह अपने हाथ में ले लिया है, जिससे इन संस्थाओं की स्वतंत्रता और स्वायत्तता प्रभावित हो रही है।
यह मामला भारत में न्यायाधिकरणों की संस्थागत स्वायत्तता, प्रशासनिक स्वतंत्रता और कॉर्पोरेट विवादों के प्रभावी समाधान के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
चर्चा में क्यों?
29 अक्टूबर, 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने NCLT और NCLAT में कर्मचारियों की नियुक्ति तथा प्रशासनिक व्यवस्था से संबंधित मामले की सुनवाई के दौरान कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए।
इस मामले की सुनवाई भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने की।
मामला मुख्य रूप से NCLT और NCLAT में कार्यरत संविदा कर्मचारियों की नियुक्तियों तथा कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय द्वारा प्रशासनिक कर्मचारियों की भर्ती प्रक्रिया एक निजी कंपनी को सौंपे जाने से संबंधित था।
सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि NCLT और NCLAT जैसी अर्ध-न्यायिक संस्थाओं को अपने प्रशासनिक कार्यों में पर्याप्त स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।
सर्वोच्च न्यायालय की प्रमुख टिप्पणियाँ
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय द्वारा NCLT और NCLAT की प्रशासनिक नियुक्तियों पर अत्यधिक नियंत्रण स्थापित करना इन संस्थाओं की स्वायत्तता के लिए चिंताजनक है।
न्यायालय ने निम्नलिखित प्रमुख मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया:
1. प्रशासनिक स्वायत्तता: NCLT के अध्यक्ष को संस्थान के प्रशासन और कर्मचारियों की नियुक्ति से संबंधित मामलों में स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने का अधिकार मिलना चाहिए।
2. निजी कंपनियों के माध्यम से भर्ती: न्यायालय ने प्रशासनिक कर्मचारियों की भर्ती निजी एजेंसियों को सौंपने पर चिंता व्यक्त की।
3. नियुक्ति का अधिकार: सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि कर्मचारियों की नियुक्ति का नियंत्रण संबंधित न्यायाधिकरण के अध्यक्ष के पास होना चाहिए।
4. नियमित भर्ती प्रक्रिया: न्यायालय ने सुझाव दिया कि कर्मचारियों की नियमित नियुक्ति संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) अथवा कर्मचारी चयन आयोग (SSC) जैसी संस्थाओं की सहायता से की जा सकती है।
5. प्रतिनियुक्ति की व्यवस्था: कर्मचारियों की तत्काल आवश्यकता पूरी करने के लिए अनुभवी सरकारी अधिकारियों को प्रतिनियुक्ति पर नियुक्त करने का सुझाव भी दिया गया।
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल लंबे समय तक संविदा पर कार्य करने के आधार पर किसी कर्मचारी को स्वतः नियमित नियुक्ति का अधिकार नहीं मिल जाता। साथ ही न्यायाधिकरणों की संस्थागत स्वतंत्रता सुनिश्चित करना आवश्यक है।
ये टिप्पणियाँ सुनवाई के दौरान व्यक्त की गई थीं; इन्हें सभी नियुक्ति संबंधी विवादों पर अंतिम निर्णय के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) क्या है?
राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (National Company Law Tribunal – NCLT) भारत की एक महत्त्वपूर्ण अर्ध-न्यायिक संस्था (Quasi-Judicial Body) है।
इसका प्रमुख उद्देश्य कंपनियों से संबंधित कानूनी विवादों, दिवालियापन, ऋणशोधन अक्षमता, विलय, अधिग्रहण, पुनर्गठन तथा कंपनी परिसमापन जैसे मामलों का निपटारा करना है।
अर्ध-न्यायिक संस्था का अर्थ ऐसी संस्था से है, जो नियमित न्यायालय का हिस्सा नहीं होती, लेकिन उसे कानून द्वारा विशेष प्रकार के विवादों की सुनवाई करने तथा उन पर निर्णय देने का अधिकार प्राप्त होता है।
NCLT मुख्य रूप से कंपनी कानून और कॉर्पोरेट दिवालियापन से संबंधित विशेष मामलों की सुनवाई करता है।
यह कंपनियों, शेयरधारकों, ऋणदाताओं और अन्य संबंधित पक्षों के बीच उत्पन्न कानूनी विवादों के समाधान में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
NCLT की स्थापना एवं कानूनी आधार
राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण की स्थापना कंपनी अधिनियम, 2013 (Companies Act, 2013) की धारा 408 के अंतर्गत की गई थी।
इसका औपचारिक गठन केंद्र सरकार द्वारा 1 जून, 2016 को किया गया।
NCLT की स्थापना का प्रमुख आधार न्यायमूर्ति वी. बालकृष्ण एराडी की अध्यक्षता वाली समिति की सिफारिशें थीं, जिसे सामान्यतः न्यायमूर्ति एराडी समिति (Justice Eradi Committee) कहा जाता है।
इस समिति ने कंपनियों के दिवालियापन और परिसमापन से जुड़े मामलों के प्रभावी तथा शीघ्र समाधान के लिए विशेष न्यायाधिकरण स्थापित करने की सिफारिश की थी।
इससे पहले कंपनी संबंधी विभिन्न मामलों की सुनवाई अलग-अलग संस्थाओं और न्यायिक मंचों पर होती थी। NCLT की स्थापना का उद्देश्य इन मामलों के समाधान के लिए एक अधिक विशिष्ट और एकीकृत व्यवस्था विकसित करना था।
NCLT के प्रमुख कार्य एवं अधिकार
1. कंपनियों से संबंधित विवादों का समाधान
NCLT कंपनी अधिनियम, 2013 के अंतर्गत आने वाले विभिन्न मामलों की सुनवाई करता है।
इनमें कंपनी के प्रबंधन, शेयरधारकों के अधिकारों, कंपनी के संचालन में अनियमितताओं तथा अन्य वैधानिक विवादों से जुड़े मामले शामिल होते हैं।
2. दिवाला एवं ऋणशोधन अक्षमता संबंधी मामलों का निपटारा
NCLT, दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता, 2016 (Insolvency and Bankruptcy Code – IBC) के अंतर्गत कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया के लिए न्यायनिर्णायक प्राधिकरण के रूप में कार्य करता है।
जब कोई कंपनी अपने ऋणों का भुगतान करने में असमर्थ हो जाती है, तो निर्धारित कानूनी शर्तों के अनुसार उसके विरुद्ध दिवाला समाधान प्रक्रिया शुरू की जा सकती है।
NCLT इस प्रक्रिया की कानूनी निगरानी करता है और आवश्यक आदेश पारित करता है।
3. कंपनियों का विलय एवं समामेलन
NCLT कंपनियों के विलय (Merger), समामेलन (Amalgamation), समझौते (Compromise) तथा पुनर्व्यवस्था (Arrangement) से जुड़े मामलों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
कंपनी अधिनियम के अंतर्गत निर्धारित शर्तों के अनुसार यह विलय और पुनर्गठन से जुड़ी योजनाओं को स्वीकृति प्रदान कर सकता है।
4. कंपनियों का परिसमापन
जब किसी कंपनी का संचालन जारी रखना संभव नहीं होता अथवा वैधानिक परिस्थितियों में उसे बंद करना आवश्यक हो जाता है, तो NCLT कंपनी अधिनियम या IBC के लागू प्रावधानों के अनुसार परिसमापन (Liquidation) अथवा समापन (Winding Up) से जुड़े आदेश पारित कर सकता है।
5. उत्पीड़न और कुप्रबंधन से संबंधित मामले
कंपनी के अल्पसंख्यक शेयरधारकों के हितों की रक्षा करना भी NCLT की महत्त्वपूर्ण भूमिकाओं में शामिल है।
यदि किसी कंपनी में शेयरधारकों के साथ अनुचित व्यवहार किया जाता है या कंपनी के प्रबंधन में गंभीर अनियमितताएँ होती हैं, तो पात्र पक्ष NCLT के समक्ष आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं।
6. कॉर्पोरेट ऋण समाधान में भूमिका
NCLT आर्थिक संकट का सामना कर रही कंपनियों के पुनर्गठन और दिवाला समाधान के लिए कानूनी मंच प्रदान करता है।
इससे बैंकों, वित्तीय संस्थानों और अन्य ऋणदाताओं को लागू कानून के अंतर्गत ऋण समाधान और संभावित वसूली का अवसर मिलता है।
हालाँकि, NCLT का उद्देश्य प्रत्येक मामले में संपूर्ण ऋण वसूली सुनिश्चित करना नहीं, बल्कि कानून के अनुसार प्रभावी दिवाला समाधान करना है।
दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता, 2016 के अंतर्गत NCLT की भूमिका
दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता, 2016 (IBC) भारत में दिवालियापन से संबंधित प्रमुख कानूनी व्यवस्था है।
इस कानून का उद्देश्य कंपनियों तथा अन्य पात्र देनदारों से संबंधित दिवाला मामलों का समयबद्ध समाधान सुनिश्चित करना है।
IBC की धारा 60 के अंतर्गत NCLT को कॉर्पोरेट व्यक्तियों के दिवाला समाधान और परिसमापन से संबंधित मामलों में न्यायनिर्णायक प्राधिकरण बनाया गया है।
इसके अंतर्गत NCLT की प्रमुख भूमिकाएँ निम्नलिखित हैं:
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कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP) शुरू करने के आवेदन पर निर्णय लेना।
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समाधान प्रक्रिया के अंतर्गत आवश्यक नियुक्तियों और वैधानिक आदेशों को स्वीकृति देना।
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लेनदारों की समिति द्वारा अनुमोदित समाधान योजना की वैधानिक समीक्षा करना।
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कानून की आवश्यक शर्तें पूरी होने पर समाधान योजना को स्वीकृति देना।
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उपयुक्त परिस्थितियों में कंपनी के परिसमापन का आदेश देना।
इस प्रकार NCLT भारत की कॉर्पोरेट दिवालियापन समाधान व्यवस्था का एक केंद्रीय संस्थागत अंग है।
NCLT की प्रमुख पीठें
NCLT की प्रधान पीठ (Principal Bench) नई दिल्ली में स्थित है।
इसके अतिरिक्त देश के विभिन्न भागों में क्षेत्रीय पीठें स्थापित की गई हैं, ताकि कंपनी संबंधी मामलों का समाधान संबंधित क्षेत्रों में उपलब्ध हो सके।
इसके प्रमुख स्थानों में नई दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, बेंगलुरु, अहमदाबाद, इलाहाबाद (प्रयागराज), चंडीगढ़, हैदराबाद, गुवाहाटी, कटक, कोच्चि, जयपुर, इंदौर और अमरावती शामिल हैं।
इन पीठों के क्षेत्रीय अधिकार-क्षेत्र का निर्धारण केंद्र सरकार द्वारा कंपनी अधिनियम, 2013 के प्रावधानों के अनुसार किया जाता है।
राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (NCLAT) क्या है?
राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (National Company Law Appellate Tribunal – NCLAT) भारत की एक विशेष अपीलीय अर्ध-न्यायिक संस्था है।
इसका प्रमुख कार्य NCLT द्वारा पारित आदेशों और निर्णयों के विरुद्ध प्रस्तुत अपीलों की सुनवाई करना है।
यदि कोई पक्ष NCLT के निर्णय से असंतुष्ट है, तो वह लागू कानूनी प्रावधानों और निर्धारित समय-सीमा के अंतर्गत NCLAT के समक्ष अपील कर सकता है।
NCLAT की भूमिका केवल NCLT के निर्णयों की अपीलीय समीक्षा तक सीमित नहीं है। इसे प्रतिस्पर्धा कानून, वित्तीय रिपोर्टिंग तथा दिवाला विनियमन से जुड़े कुछ विशेष मामलों में भी अपीलीय अधिकार प्राप्त हैं।
NCLAT की स्थापना एवं कानूनी आधार
NCLAT की स्थापना कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 410 के अंतर्गत की गई थी।
इसका गठन भी 1 जून, 2016 को किया गया।
NCLAT का मुख्य उद्देश्य NCLT के आदेशों के विरुद्ध एक विशेष अपीलीय मंच उपलब्ध कराना तथा कंपनी कानून से संबंधित अपीलों का प्रभावी निपटारा करना है।
NCLAT की प्रधान पीठ नई दिल्ली में स्थित है, जबकि इसकी एक अन्य पीठ चेन्नई में कार्यरत है।
NCLAT के प्रमुख कार्य एवं अधिकार
1. NCLT के आदेशों के विरुद्ध अपील
NCLAT कंपनी अधिनियम, 2013 के अंतर्गत NCLT द्वारा पारित अपील योग्य आदेशों की समीक्षा करता है।
इनमें कंपनी प्रबंधन, पुनर्गठन, विलय तथा अन्य कंपनी कानून संबंधी मामले शामिल हो सकते हैं।
2. दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता के अंतर्गत अपील
IBC, 2016 की धारा 61 के अंतर्गत NCLAT को NCLT के दिवाला संबंधी आदेशों के विरुद्ध अपील सुनने का अधिकार प्राप्त है।
NCLAT ने 1 दिसंबर, 2016 से इस व्यवस्था के अंतर्गत अपीलीय न्यायाधिकरण के रूप में कार्य करना प्रारंभ किया।
3. भारतीय दिवाला एवं शोधन अक्षमता बोर्ड (IBBI) के आदेशों के विरुद्ध अपील
NCLAT, दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता की धारा 202 और धारा 211 के अंतर्गत भारतीय दिवाला एवं शोधन अक्षमता बोर्ड (Insolvency and Bankruptcy Board of India – IBBI) के संबंधित आदेशों के विरुद्ध अपीलों की सुनवाई भी करता है।
IBBI भारत में दिवाला समाधान प्रक्रिया से संबंधित पेशेवरों, संस्थाओं और अन्य विनियमित गतिविधियों की निगरानी करने वाला प्रमुख नियामक निकाय है।
4. भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) के निर्णयों के विरुद्ध अपील
NCLAT भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (Competition Commission of India – CCI) द्वारा जारी किए गए अपील योग्य आदेशों और निर्णयों के विरुद्ध अपीलों की सुनवाई करता है।
वित्त अधिनियम, 2017 के माध्यम से कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 410 में संशोधन किया गया, जिसके परिणामस्वरूप 26 मई, 2017 से NCLAT को यह अपीलीय अधिकार प्राप्त हुआ।
इस प्रकार प्रतिस्पर्धा-विरोधी व्यवहार, बाजार में प्रभुत्व के दुरुपयोग तथा प्रतिस्पर्धा कानून के अंतर्गत अन्य संबंधित मामलों में CCI के आदेशों को NCLAT में चुनौती दी जा सकती है।
5. राष्ट्रीय वित्तीय रिपोर्टिंग प्राधिकरण (NFRA) के आदेशों के विरुद्ध अपील
NCLAT को राष्ट्रीय वित्तीय रिपोर्टिंग प्राधिकरण (National Financial Reporting Authority – NFRA) के अपील योग्य आदेशों के विरुद्ध अपील सुनने का अधिकार भी प्राप्त है।
NFRA का प्रमुख कार्य वित्तीय रिपोर्टिंग और लेखापरीक्षा मानकों से संबंधित नियामकीय निगरानी करना है।
कंपनी (संशोधन) अधिनियम, 2017 के माध्यम से NCLAT को इस संबंध में अपीलीय अधिकार प्रदान किए गए, जो 7 मई, 2018 से प्रभावी हुए।
NCLT और NCLAT में प्रमुख अंतर
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आधार |
NCLT |
NCLAT |
|---|---|---|
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पूरा नाम |
राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण |
राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण |
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स्थापना |
1 जून, 2016 |
1 जून, 2016 |
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कानूनी आधार |
कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 408 |
कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 410 |
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प्रकृति |
मूल अधिकार-क्षेत्र वाला अर्ध-न्यायिक न्यायाधिकरण |
अपीलीय अर्ध-न्यायिक न्यायाधिकरण |
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प्रमुख कार्य |
कंपनी कानून और कॉर्पोरेट दिवाला मामलों पर निर्णय देना |
NCLT तथा अन्य निर्दिष्ट संस्थाओं के आदेशों पर अपील सुनना |
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प्रधान पीठ |
नई दिल्ली |
नई दिल्ली |
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अपील |
NCLAT में |
कानून के प्रश्न पर सर्वोच्च न्यायालय में |
NCLT और NCLAT के निर्णयों के विरुद्ध अपील की प्रक्रिया
भारत में कंपनी कानून संबंधी मामलों के समाधान के लिए एक विशेष अपीलीय व्यवस्था स्थापित की गई है।
1. NCLT – कंपनी कानून एवं कॉर्पोरेट दिवाला मामलों में प्रारंभिक निर्णय
2. NCLAT – NCLT के अपील योग्य आदेशों की समीक्षा
3. भारत का सर्वोच्च न्यायालय – संबंधित कानूनी प्रावधानों के अंतर्गत कानून के प्रश्न पर अपील
कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 423 के अंतर्गत NCLAT के निर्णयों के विरुद्ध कानून के प्रश्न (Question of Law) पर सर्वोच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है।
इसी प्रकार IBC की धारा 62 में भी NCLAT के आदेश के विरुद्ध कानून के प्रश्न पर सर्वोच्च न्यायालय में अपील का प्रावधान है।
इस व्यवस्था का उद्देश्य कंपनी संबंधी विवादों में न्यायिक समीक्षा और विधिक उत्तरदायित्व सुनिश्चित करना है।
न्यायाधिकरणों की स्वायत्तता क्यों महत्त्वपूर्ण है?
NCLT और NCLAT जैसी अर्ध-न्यायिक संस्थाएँ कंपनियों, निवेशकों, बैंकों तथा ऋणदाताओं के अधिकारों से संबंधित महत्त्वपूर्ण निर्णय लेती हैं।
इनके निर्णयों का प्रभाव बड़ी कंपनियों, वित्तीय संस्थानों और संपूर्ण अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
ऐसी परिस्थितियों में इन संस्थाओं की प्रशासनिक और निर्णय संबंधी स्वतंत्रता अत्यंत आवश्यक है।
निष्पक्ष न्यायिक निर्णय: न्यायाधिकरणों को बाहरी दबाव से मुक्त होकर कानून के अनुसार निर्णय लेने में सक्षम होना चाहिए।
निवेशकों का विश्वास: स्वतंत्र और प्रभावी विवाद समाधान प्रणाली घरेलू तथा विदेशी निवेशकों के विश्वास को मजबूत करती है।
दिवाला मामलों का समयबद्ध समाधान: पर्याप्त कर्मचारी, आधुनिक आधारभूत संरचना और प्रभावी प्रशासन लंबित मामलों को कम करने में सहायता कर सकते हैं।
कॉर्पोरेट प्रशासन में सुधार: स्वतंत्र न्यायाधिकरण कंपनियों के प्रबंधन में जवाबदेही तथा कानूनी अनुपालन को प्रोत्साहित करते हैं।
कार्यपालिका और न्यायनिर्णयन के बीच संतुलन: न्यायाधिकरणों के प्रशासन पर कार्यपालिका का अत्यधिक नियंत्रण उनके स्वतंत्र और निष्पक्ष कामकाज को प्रभावित कर सकता है।
इस मामले का व्यापक महत्त्व
सर्वोच्च न्यायालय की हालिया टिप्पणियाँ केवल NCLT और NCLAT में कर्मचारियों की नियुक्ति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि भारत की न्यायाधिकरण प्रणाली की प्रशासनिक स्वतंत्रता से भी जुड़ी हुई हैं।
भारत में विभिन्न क्षेत्रों से संबंधित मामलों के समाधान के लिए विशेष न्यायाधिकरण स्थापित किए गए हैं। इनका उद्देश्य विशेषज्ञता के आधार पर विवादों का प्रभावी और अपेक्षाकृत शीघ्र निपटारा करना है।
लेकिन यदि ऐसी संस्थाओं में कर्मचारियों की कमी, अपर्याप्त आधारभूत सुविधाएँ और प्रशासनिक नियंत्रण से संबंधित समस्याएँ बनी रहती हैं, तो उनकी कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है।
इसलिए सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियाँ न्यायाधिकरणों में पारदर्शी भर्ती व्यवस्था, संस्थागत स्वायत्तता तथा पर्याप्त प्रशासनिक संसाधन सुनिश्चित करने की आवश्यकता को रेखांकित करती हैं।
निष्कर्ष
राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) और राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (NCLAT) भारत की कॉर्पोरेट न्यायिक व्यवस्था के दो महत्त्वपूर्ण स्तंभ हैं।
जहाँ NCLT कंपनियों से संबंधित विवादों, विलय, पुनर्गठन, दिवाला समाधान तथा परिसमापन जैसे मामलों का निपटारा करता है, वहीं NCLAT संबंधित अपीलों की सुनवाई करके विधिक समीक्षा की व्यवस्था उपलब्ध कराता है।
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इन संस्थाओं की प्रशासनिक स्वायत्तता पर व्यक्त की गई चिंता यह दर्शाती है कि प्रभावी न्याय प्रदान करने के लिए केवल कानूनी अधिकार पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि संस्थागत स्वतंत्रता, पारदर्शी नियुक्ति प्रक्रिया और पर्याप्त संसाधन भी आवश्यक हैं।