भारत सरकार ने देश की रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने तथा सशस्त्र बलों के आधुनिकीकरण की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम उठाया है।
26 अक्टूबर, 2026 को केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में आयोजित रक्षा अधिग्रहण परिषद (Defence Acquisition Council – DAC) की बैठक में लगभग 2,12,000 करोड़ रुपये (2.12 लाख करोड़ रुपये) के रक्षा उपकरणों की खरीद से संबंधित विभिन्न प्रस्तावों को मंजूरी प्रदान की गई।
इस बैठक में भारतीय थलसेना, भारतीय नौसेना और भारतीय वायुसेना के लिए आधुनिक हथियार प्रणालियों, हेलीकॉप्टरों, ड्रोन, तोपों, वायु रक्षा प्रणालियों और अन्य सैन्य उपकरणों की खरीद के प्रस्तावों को आवश्यकता की स्वीकृति (Acceptance of Necessity – AoN) प्रदान की गई।
इन प्रस्तावों का उद्देश्य भारतीय सशस्त्र बलों की युद्धक क्षमता, निगरानी व्यवस्था, परिचालन गतिशीलता और आधुनिक युद्ध की चुनौतियों से निपटने की क्षमता को बढ़ाना है।
विशेष रूप से ड्रोन युद्ध, वायु रक्षा, अत्याधुनिक तोपखाना प्रणालियों तथा स्वदेशी रक्षा उत्पादन को मजबूत करने पर जोर दिया गया है।
मंजूर किए गए कुल प्रस्तावों में से लगभग 82 प्रतिशत खरीद भारतीय रक्षा उद्योग से किए जाने की योजना है, जो आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया अभियान को प्रोत्साहित करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण है।
रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) क्या है?
रक्षा अधिग्रहण परिषद (Defence Acquisition Council – DAC) भारत के रक्षा मंत्रालय की रक्षा उपकरणों और सैन्य साजोसामान की खरीद से संबंधित सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था है।
इसका प्रमुख उद्देश्य भारतीय सशस्त्र बलों की परिचालन आवश्यकताओं के अनुरूप आधुनिक हथियारों, सैन्य उपकरणों और रक्षा प्रणालियों की समयबद्ध खरीद सुनिश्चित करना है।
DAC यह सुनिश्चित करने का प्रयास करती है कि भारतीय थलसेना, नौसेना और वायुसेना को उनकी आवश्यकताओं के अनुसार सही समय पर उपयुक्त तकनीक और सैन्य उपकरण उपलब्ध हो सकें।
इसके अतिरिक्त यह परिषद रक्षा खरीद में पारदर्शिता, प्रक्रियागत दक्षता और उपलब्ध बजटीय संसाधनों के सर्वोत्तम उपयोग पर भी ध्यान केंद्रित करती है।
रक्षा अधिग्रहण परिषद रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करती है और इसके अध्यक्ष केंद्रीय रक्षा मंत्री होते हैं।
रक्षा अधिग्रहण परिषद की स्थापना और पृष्ठभूमि
भारत में रक्षा अधिग्रहण परिषद की स्थापना वर्ष 2001 में की गई थी।
इसकी स्थापना राष्ट्रीय सुरक्षा प्रणाली में सुधार के लिए गठित मंत्रियों के समूह (Group of Ministers – GoM) की सिफारिशों के आधार पर हुई थी।
फरवरी 2001 में प्रस्तुत सिफारिशों में देश की रक्षा खरीद प्रणाली को अधिक प्रभावी, पारदर्शी और समयबद्ध बनाने पर जोर दिया गया था।
उस समय रक्षा उपकरणों की खरीद प्रक्रिया अत्यधिक जटिल और लंबी थी, जिसके कारण हथियारों तथा अन्य सैन्य उपकरणों की आपूर्ति में विलंब होता था।
इन समस्याओं को दूर करने के लिए रक्षा खरीद से संबंधित निर्णय लेने की एक उच्चस्तरीय संस्थागत व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता महसूस की गई।
इसी उद्देश्य से रक्षा मंत्री की अध्यक्षता में रक्षा अधिग्रहण परिषद की स्थापना की गई।
रक्षा अधिग्रहण परिषद की संरचना
रक्षा अधिग्रहण परिषद एक उच्चस्तरीय संस्था है, जिसमें रक्षा मंत्रालय और भारतीय सशस्त्र बलों के वरिष्ठ अधिकारी शामिल होते हैं।
इसकी प्रमुख संरचना में निम्नलिखित पदाधिकारी शामिल हैं:
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अध्यक्ष: भारत के केंद्रीय रक्षा मंत्री।
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चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS): तीनों सेनाओं के बीच समन्वय और संयुक्त सैन्य क्षमताओं के विकास से संबंधित प्रमुख सैन्य अधिकारी।
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थलसेना प्रमुख: भारतीय थलसेना की परिचालन और आधुनिकीकरण संबंधी आवश्यकताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं।
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नौसेना प्रमुख: भारतीय नौसेना की रक्षा खरीद और आधुनिकीकरण संबंधी आवश्यकताओं को प्रस्तुत करते हैं।
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वायुसेना प्रमुख: भारतीय वायुसेना की तकनीकी, परिचालन और सैन्य आवश्यकताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं।
इसके अतिरिक्त रक्षा मंत्रालय के संबंधित वरिष्ठ अधिकारी तथा वित्त, रक्षा उत्पादन और अधिग्रहण से जुड़े अधिकारी भी निर्धारित व्यवस्था के अनुसार परिषद की प्रक्रिया में भाग लेते हैं।
रक्षा अधिग्रहण परिषद के प्रमुख उद्देश्य
1. रक्षा उपकरणों की समयबद्ध खरीद सुनिश्चित करना
DAC का प्रमुख उद्देश्य भारतीय सशस्त्र बलों की आवश्यकताओं के अनुसार सैन्य उपकरणों की खरीद प्रक्रिया को तेज और प्रभावी बनाना है।
2. सशस्त्र बलों का आधुनिकीकरण
परिषद आधुनिक सैन्य तकनीकों, हथियार प्रणालियों तथा रक्षा उपकरणों की खरीद से संबंधित प्रस्तावों पर निर्णय लेकर सशस्त्र बलों की युद्धक क्षमता बढ़ाने में सहायता करती है।
3. रक्षा बजट का प्रभावी उपयोग
रक्षा उपकरणों की खरीद में बड़ी मात्रा में सार्वजनिक धन खर्च होता है। इसलिए DAC उपलब्ध संसाधनों और सैन्य प्राथमिकताओं के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करती है।
4. स्वदेशी रक्षा उत्पादन को प्रोत्साहन
भारतीय रक्षा उद्योगों को बढ़ावा देना और आयात पर निर्भरता कम करना रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल है।
5. तीनों सेनाओं की आवश्यकताओं में समन्वय
DAC थलसेना, नौसेना और वायुसेना की अलग-अलग आवश्यकताओं के साथ संयुक्त सैन्य क्षमता विकसित करने से संबंधित प्रस्तावों पर भी विचार करती है।
रक्षा अधिग्रहण परिषद के प्रमुख कार्य
1. दीर्घकालिक रक्षा क्षमता विकास योजनाओं को मंजूरी देना
रक्षा अधिग्रहण परिषद सशस्त्र बलों की दीर्घकालिक आधुनिकीकरण योजनाओं को मंजूरी देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
पहले इसके अंतर्गत 15 वर्षीय दीर्घकालिक एकीकृत परिप्रेक्ष्य योजना (Long Term Integrated Perspective Plan – LTIPP) का प्रावधान था।
हालाँकि, रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया 2020 में इस व्यवस्था को 10 वर्षीय एकीकृत क्षमता विकास योजना (Integrated Capability Development Plan – ICDP) से प्रतिस्थापित किया गया।
ICDP का उद्देश्य भविष्य की सैन्य चुनौतियों, तकनीकी आवश्यकताओं और रक्षा खरीद की प्राथमिकताओं के आधार पर सशस्त्र बलों की क्षमताओं का विकास करना है।
2. आवश्यकता की स्वीकृति (AoN) प्रदान करना
DAC का सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य रक्षा खरीद प्रस्तावों को Acceptance of Necessity (AoN) प्रदान करना है।
AoN का अर्थ किसी रक्षा उपकरण या प्रणाली की खरीद की आवश्यकता को सैद्धांतिक और प्रशासनिक स्वीकृति देना है।
उदाहरण के लिए, यदि भारतीय थलसेना को आधुनिक वायु रक्षा प्रणाली की आवश्यकता है, तो वह निर्धारित प्रक्रिया के माध्यम से संबंधित प्रस्ताव प्रस्तुत करती है।
आवश्यक परीक्षण और समीक्षा के बाद सक्षम प्राधिकारी उस प्रस्ताव को AoN प्रदान कर सकता है।
महत्त्वपूर्ण तथ्य: AoN मिलने का अर्थ यह नहीं है कि रक्षा उपकरणों की खरीद के लिए अंतिम अनुबंध पर हस्ताक्षर हो चुके हैं।
AoN के बाद निविदा, तकनीकी मूल्यांकन, परीक्षण, मूल्य संबंधी बातचीत तथा अंतिम अनुबंध जैसी प्रक्रियाएँ पूरी की जाती हैं।
3. रक्षा खरीद प्रस्तावों का वर्गीकरण
DAC रक्षा खरीद प्रस्तावों को निर्धारित खरीद श्रेणियों में वर्गीकृत करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
रक्षा खरीद व्यवस्था में ऐतिहासिक रूप से Buy, Buy & Make तथा Make जैसी श्रेणियों का उपयोग किया जाता रहा है।
इनका सामान्य अर्थ निम्नलिखित है:
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Buy: तैयार रक्षा उपकरणों की खरीद।
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Buy & Make: उपकरणों की खरीद के साथ देश में विनिर्माण तथा तकनीक हस्तांतरण की व्यवस्था।
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Make: अनुसंधान, विकास और घरेलू उत्पादन के माध्यम से रक्षा प्रणालियों का निर्माण।
वर्तमान रक्षा अधिग्रहण व्यवस्था में स्वदेशी डिजाइन, विकास और विनिर्माण को प्राथमिकता देने के लिए Buy (Indian-IDDM) जैसी अधिक विशिष्ट श्रेणियों का भी प्रावधान है।
4. एकल विक्रेता से संबंधित मामलों पर निर्णय
कभी-कभी किसी विशेष रक्षा उपकरण का निर्माण केवल एक ही कंपनी द्वारा किया जाता है।
ऐसी स्थिति में खरीद प्रक्रिया में प्रतिस्पर्धा सीमित हो सकती है।
DAC निर्धारित नियमों के अनुसार एकल विक्रेता से संबंधित महत्त्वपूर्ण मामलों पर विचार करती है, ताकि राष्ट्रीय सुरक्षा आवश्यकताओं और खरीद प्रक्रिया की निष्पक्षता के बीच संतुलन स्थापित किया जा सके।
5. ऑफसेट प्रावधानों पर निर्णय
रक्षा खरीद में ऑफसेट (Offset) व्यवस्था का उद्देश्य विदेशी रक्षा आपूर्तिकर्ताओं की भागीदारी से घरेलू रक्षा उद्योग को आर्थिक और तकनीकी लाभ पहुँचाना है।
इसके अंतर्गत पात्र विदेशी रक्षा कंपनियों को निर्धारित शर्तों के अनुसार भारत में निवेश, खरीद या अन्य स्वीकृत गतिविधियों के माध्यम से दायित्व पूरा करना पड़ सकता है।
पुरानी रक्षा खरीद व्यवस्थाओं में निर्धारित मूल्य से अधिक के प्रस्तावों के लिए ऑफसेट संबंधी प्रावधान लागू होते थे।
हालाँकि, ऑफसेट की सीमा और पात्रता समय-समय पर संशोधित हुई है। इसलिए पुराने 300 करोड़ रुपये के मानदंड को सभी वर्तमान रक्षा खरीद प्रस्तावों पर लागू नहीं माना जाना चाहिए।
6. प्रौद्योगिकी हस्तांतरण संबंधी निर्णय
प्रौद्योगिकी हस्तांतरण (Transfer of Technology – ToT) रक्षा खरीद का एक महत्त्वपूर्ण पहलू है।
इसके अंतर्गत विदेशी रक्षा कंपनियों से प्राप्त तकनीकी जानकारी और उत्पादन क्षमता का उपयोग भारत में रक्षा उपकरणों के निर्माण के लिए किया जा सकता है।
DAC संबंधित खरीद प्रस्तावों में प्रौद्योगिकी हस्तांतरण की आवश्यकता और व्यवस्था पर निर्णय लेने में भूमिका निभाती है।
इससे दीर्घकाल में घरेलू रक्षा उत्पादन क्षमता विकसित करने और आयात पर निर्भरता कम करने में सहायता मिल सकती है।
7. फील्ड ट्रायल और तकनीकी मूल्यांकन
रक्षा उपकरणों की खरीद में उनका वास्तविक परिचालन परिस्थितियों में परीक्षण अत्यंत महत्त्वपूर्ण होता है।
इस प्रक्रिया को फील्ड ट्रायल (Field Trial) कहा जाता है।
फील्ड ट्रायल के माध्यम से उपकरणों की कार्यक्षमता, विश्वसनीयता, सुरक्षा और भारतीय सैन्य आवश्यकताओं के अनुरूप प्रदर्शन का मूल्यांकन किया जाता है।
DAC इस प्रक्रिया से जुड़े महत्त्वपूर्ण नीतिगत और स्वीकृति संबंधी मामलों में भूमिका निभाती है, जबकि वास्तविक परीक्षण निर्धारित सैन्य और तकनीकी एजेंसियाँ करती हैं।
वित्त वर्ष 2025-26 में रक्षा अधिग्रहण से संबंधित उपलब्धियाँ
वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान भारत में रक्षा उपकरणों की खरीद और आधुनिकीकरण से संबंधित अनेक महत्त्वपूर्ण प्रस्तावों को मंजूरी प्रदान की गई।
27 मार्च, 2026 तक DAC ने 55 प्रस्तावों को AoN प्रदान किया था, जिनकी अनुमानित कुल लागत लगभग 6.73 लाख करोड़ रुपये थी।
इसी वित्त वर्ष में रक्षा मंत्रालय ने 503 पूँजीगत खरीद प्रस्तावों के लिए लगभग 2.28 लाख करोड़ रुपये के अनुबंधों पर हस्ताक्षर किए।
वित्त वर्ष 2025-26 की अंतिम समेकित जानकारी के अनुसार रक्षा मंत्रालय के स्तर पर कुल 109 प्रस्तावों को लगभग 6.81 लाख करोड़ रुपये की AoN स्वीकृति दी गई थी।
इसलिए 55 और 109 प्रस्तावों के आँकड़ों को समान नहीं समझना चाहिए। पहला DAC की तत्कालीन रिपोर्टिंग से संबंधित था, जबकि दूसरा वित्त वर्ष की समाप्ति पर रक्षा मंत्रालय का समेकित आँकड़ा था।
अक्टूबर 2026 में DAC द्वारा मंजूर प्रमुख रक्षा खरीद प्रस्ताव
26 अक्टूबर, 2026 की बैठक में भारतीय थलसेना, नौसेना और वायुसेना के लिए अनेक आधुनिक रक्षा प्रणालियों की खरीद को आवश्यकता की स्वीकृति दी गई।
इनका उद्देश्य पारंपरिक सैन्य क्षमताओं के साथ-साथ आधुनिक युद्ध में ड्रोन, इलेक्ट्रॉनिक निगरानी, वायु रक्षा और सटीक प्रहार की क्षमताओं को मजबूत करना है।
भारतीय थलसेना के लिए मंजूर प्रमुख प्रस्ताव
भारतीय थलसेना के लिए अत्याधुनिक तोपों, विशेष सैन्य वाहनों, हेलीकॉप्टरों, वायु रक्षा प्रणालियों और विभिन्न प्रकार के मानव रहित हवाई उपकरणों की खरीद से संबंधित प्रस्तावों को मंजूरी दी गई।
1. हाई मोबिलिटी व्हीकल्स (HMV)
हाई मोबिलिटी व्हीकल्स (High Mobility Vehicles – HMV) ऐसे विशेष सैन्य वाहन होते हैं, जिन्हें चुनौतीपूर्ण भौगोलिक परिस्थितियों में सैनिकों और सैन्य सामग्री के परिवहन के लिए विकसित किया जाता है।
ये वाहन ऊबड़-खाबड़ भूमि, पहाड़ी क्षेत्रों और अन्य कठिन सैन्य परिस्थितियों में बेहतर गतिशीलता प्रदान करने के उद्देश्य से उपयोग किए जाते हैं।
इन वाहनों के माध्यम से सैनिकों, हथियारों, गोला-बारूद और आवश्यक रसद सामग्री को विभिन्न क्षेत्रों में पहुँचाने की क्षमता बढ़ाई जा सकती है।
प्रमुख लाभ:
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दुर्गम क्षेत्रों में सैन्य गतिशीलता बढ़ाना।
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सैनिकों और सैन्य सामग्री के परिवहन को सुगम बनाना।
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युद्ध के दौरान रसद सहायता मजबूत करना।
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सीमावर्ती क्षेत्रों में परिचालन क्षमता को बढ़ाना।
2. सेल्फ-प्रोपेल्ड ट्रैक्ड गन सिस्टम
सेल्फ-प्रोपेल्ड ट्रैक्ड गन सिस्टम (Self-Propelled Tracked Gun System) एक आधुनिक तोपखाना प्रणाली है।
इस प्रकार की तोपों को ट्रैक आधारित सैन्य प्लेटफॉर्म पर स्थापित किया जाता है, जिससे इन्हें अलग वाहन द्वारा खींचने की आवश्यकता नहीं होती।
ये प्रणालियाँ यंत्रीकृत सैन्य संरचनाओं के साथ गतिशील रहते हुए आवश्यक अग्नि सहायता प्रदान कर सकती हैं।
इनकी विशेषता गतिशीलता और मारक क्षमता का संयोजन है।
प्रमुख लाभ:
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युद्ध क्षेत्र में तोपखाने की गतिशीलता बढ़ाना।
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यंत्रीकृत सैन्य इकाइयों को अग्नि सहायता प्रदान करना।
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बदलती सैन्य परिस्थितियों में तैनाती की सुविधा बढ़ाना।
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भारतीय थलसेना की तोपखाना क्षमता को मजबूत करना।
3. गन शॉट रिस्पॉन्स सिस्टम (GSRS)
गन शॉट रिस्पॉन्स सिस्टम (Gun Shot Response System – GSRS) एक ऐसी तकनीकी प्रणाली है, जिसका उपयोग गोलीबारी की घटनाओं से संबंधित जानकारी शीघ्र प्राप्त करने और सैनिकों की परिस्थितिजन्य जागरूकता बढ़ाने के लिए किया जाता है।
इस प्रकार की प्रणालियाँ सेंसर और संबंधित तकनीकों की सहायता से गोलीबारी के संकेतों की पहचान करने में उपयोगी हो सकती हैं।
इससे सैनिकों को आसपास की सुरक्षा परिस्थितियों की बेहतर जानकारी प्राप्त हो सकती है।
प्रमुख लाभ:
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गोलीबारी से संबंधित चेतावनी और जानकारी प्रदान करना।
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सैनिकों की परिस्थितिजन्य जागरूकता बढ़ाना।
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सुरक्षा संबंधी प्रतिक्रिया को अधिक प्रभावी बनाना।
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सैन्य इकाइयों की परिचालन क्षमता में वृद्धि करना।
4. लाइट मल्टी-रोल हेलीकॉप्टर (LMRH)
लाइट मल्टी-रोल हेलीकॉप्टर (Light Multi Role Helicopter – LMRH) एक बहुउद्देशीय हल्का हेलीकॉप्टर है, जिसका उपयोग विभिन्न सैन्य और मानवीय अभियानों में किया जा सकता है।
इसकी विशेषता विभिन्न प्रकार के परिचालन कार्यों के लिए उपयुक्त होना है।
इन हेलीकॉप्टरों का उपयोग भारतीय थलसेना और भारतीय वायुसेना दोनों द्वारा किया जा सकेगा।
प्रमुख उपयोग:
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टोही एवं निगरानी (Reconnaissance and Surveillance)।
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सैन्य अभियानों में सहायता।
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खोज एवं बचाव अभियान (Search and Rescue)।
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सैनिकों की सहायता तथा आवश्यक सैन्य परिवहन।
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मानवीय सहायता और आपदा राहत (HADR)।
इन हेलीकॉप्टरों की खरीद से विशेष रूप से सीमावर्ती और कठिन भौगोलिक क्षेत्रों में सैन्य परिचालन को सहायता मिलने की संभावना है।
5. वेरी शॉर्ट-रेंज एयर डिफेंस सिस्टम (VSHORADS)
वेरी शॉर्ट-रेंज एयर डिफेंस सिस्टम (Very Short-Range Air Defence System – VSHORADS) कम दूरी पर मौजूद हवाई खतरों का मुकाबला करने के लिए विकसित की जाने वाली वायु रक्षा प्रणाली है।
इस प्रकार की प्रणालियों का उद्देश्य सैनिकों, सैन्य प्रतिष्ठानों तथा अन्य महत्त्वपूर्ण संसाधनों को नजदीकी हवाई हमलों से सुरक्षा प्रदान करना है।
आधुनिक युद्ध में छोटे ड्रोन तथा अन्य कम ऊँचाई वाले हवाई खतरों की बढ़ती भूमिका के कारण ऐसी प्रणालियों का महत्त्व बढ़ गया है।
प्रमुख लाभ:
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कम दूरी के हवाई खतरों से सुरक्षा प्रदान करना।
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सैन्य इकाइयों की वायु रक्षा क्षमता मजबूत करना।
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आधुनिक छोटे हवाई लक्ष्यों का मुकाबला करने की क्षमता बढ़ाना।
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सैन्य प्रतिष्ठानों और महत्त्वपूर्ण संसाधनों की सुरक्षा में सहायता करना।
6. काउंटर अनमैन्ड एरियल सिस्टम (C-UAS)
काउंटर अनमैन्ड एरियल सिस्टम (Counter-Unmanned Aerial System – C-UAS) का उद्देश्य शत्रु के ड्रोन और अन्य मानव रहित हवाई उपकरणों से उत्पन्न खतरों का मुकाबला करना है।
आधुनिक युद्ध में ड्रोन का उपयोग निगरानी, लक्ष्यों की पहचान और हमलों के लिए तेजी से बढ़ रहा है।
इसी कारण सैन्य वाहनों और महत्त्वपूर्ण रक्षा प्लेटफॉर्मों की सुरक्षा के लिए काउंटर-ड्रोन प्रणालियाँ आवश्यक हो गई हैं।
DAC द्वारा मंजूर प्लेटफॉर्म आधारित C-UAS का उद्देश्य विशेष रूप से आधुनिक युद्धक्षेत्र में टैंकों की सुरक्षा और उनकी उत्तरजीविता (Survivability) बढ़ाना है।
ऐसी प्रणालियाँ तकनीकी स्वरूप के अनुसार ड्रोन का पता लगाने, उनकी पहचान करने और खतरे को निष्क्रिय करने में उपयोगी हो सकती हैं।
7. लंबी दूरी के मानव रहित हवाई सिस्टम
DAC ने लंबी दूरी के मानव रहित हवाई सिस्टम (Long-Range Unmanned Aerial Systems) से संबंधित प्रस्तावों को भी मंजूरी प्रदान की।
मानव रहित हवाई प्रणाली (Unmanned Aerial System – UAS) का उपयोग बिना चालक के हवाई निगरानी और अन्य निर्धारित सैन्य कार्यों के लिए किया जाता है।
लंबी दूरी की ऐसी प्रणालियाँ विस्तृत क्षेत्रों में निगरानी और परिचालन जानकारी प्राप्त करने में सहायता कर सकती हैं।
इससे भारतीय थलसेना की टोही और निगरानी क्षमता को मजबूत करने की उम्मीद है।
8. सर्विलांस UAV
सर्विलांस UAV (Surveillance Unmanned Aerial Vehicle) मुख्य रूप से निगरानी, टोही और जानकारी एकत्र करने के लिए उपयोग किए जाने वाले मानव रहित हवाई वाहन होते हैं।
ये सीमावर्ती क्षेत्रों, संवेदनशील इलाकों और अन्य परिचालन क्षेत्रों की निगरानी में सहायता कर सकते हैं।
इनके माध्यम से सैनिकों को वास्तविक समय के करीब दृश्य और अन्य प्रकार की जानकारी प्राप्त हो सकती है।
प्रमुख उपयोग:
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सीमावर्ती क्षेत्रों की निगरानी।
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सैन्य गतिविधियों की जानकारी प्राप्त करना।
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परिचालन क्षेत्रों का आकलन करना।
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सैन्य इकाइयों की परिस्थितिजन्य जागरूकता बढ़ाना।
9. इंटीग्रेटेड सर्विलांस एंड स्ट्राइक सिस्टम
इंटीग्रेटेड सर्विलांस एंड स्ट्राइक सिस्टम (Integrated Surveillance and Strike System) निगरानी और प्रहार संबंधी क्षमताओं को एकीकृत करने वाली सैन्य प्रणाली है।
इसका उद्देश्य निगरानी से प्राप्त जानकारी और संबंधित सैन्य संसाधनों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना है।
इस प्रकार की प्रणालियाँ आधुनिक युद्ध में जानकारी आधारित निर्णय लेने और सैन्य अभियानों की प्रभावशीलता बढ़ाने के लिए महत्त्वपूर्ण होती हैं।
इसके माध्यम से भारतीय थलसेना की निगरानी और लक्ष्य संबंधी क्षमताओं को मजबूत करने की योजना है।
10. लंबी दूरी की कामिकेज ड्रोन प्रणाली
कामिकेज ड्रोन (Kamikaze Drone) को सामान्यतः लोटरिंग म्यूनिशन (Loitering Munition) भी कहा जाता है।
यह मानव रहित हवाई हथियार प्रणाली की एक श्रेणी है, जिसे लक्ष्य पर प्रहार करने के लिए विकसित किया जाता है।
सामान्य निगरानी ड्रोन के विपरीत लोटरिंग म्यूनिशन को लक्ष्य के विरुद्ध एकल-उपयोग प्रहार प्रणाली के रूप में तैयार किया जाता है।
लंबी दूरी की कामिकेज ड्रोन प्रणालियाँ आधुनिक सैन्य अभियानों में सटीक प्रहार संबंधी क्षमताओं के विकास से जुड़ी हैं।
इनकी खरीद से भारतीय थलसेना की आधुनिक मानव रहित युद्धक क्षमताओं को मजबूत करने का प्रयास किया जाएगा।
भारतीय नौसेना के लिए मंजूर प्रमुख प्रस्ताव
भारतीय नौसेना के लिए आधुनिक मिसाइल रक्षा प्रणालियों और प्रमुख नौसैनिक प्लेटफॉर्मों की खरीद के प्रस्तावों को मंजूरी दी गई है।
इनका उद्देश्य हिंद महासागर क्षेत्र और अन्य समुद्री क्षेत्रों में भारतीय नौसेना की सुरक्षा, निगरानी तथा युद्धक क्षमताओं को मजबूत करना है।
1. एक्टिव ऑफबोर्ड डिकॉय सिस्टम (AODS)
एक्टिव ऑफबोर्ड डिकॉय सिस्टम (Active Offboard Decoy System – AODS) एक विशेष नौसैनिक रक्षा प्रणाली है।
इसका प्रमुख उद्देश्य युद्धपोतों को शत्रु की आधुनिक जहाज-रोधी मिसाइलों (Anti-Ship Missiles) से सुरक्षा प्रदान करना है।
डिकॉय प्रणाली का उपयोग शत्रु के हथियारों के मार्गदर्शन या लक्ष्य पहचान को भ्रमित करने के लिए किया जाता है।
इस प्रकार की प्रणालियाँ युद्धपोत की सुरक्षा को मजबूत करने और मिसाइल संबंधी खतरों को कम करने में सहायता कर सकती हैं।
प्रमुख लाभ:
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आधुनिक जहाज-रोधी मिसाइलों के विरुद्ध रक्षा क्षमता बढ़ाना।
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युद्धपोतों की सुरक्षा को मजबूत करना।
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नौसैनिक प्लेटफॉर्मों की उत्तरजीविता में सुधार करना।
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भारतीय नौसेना की मिसाइल-रोधी रक्षा व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाना।
2. आधुनिक स्वदेशी नौसैनिक प्लेटफॉर्म
DAC ने भारतीय नौसेना के लिए प्रमुख नौसैनिक प्लेटफॉर्मों की खरीद के प्रस्तावों को भी मंजूरी प्रदान की।
इन प्लेटफॉर्मों को स्वदेशी रूप से डिजाइन और निर्मित करने की योजना है।
इनमें आधुनिक नौसैनिक युद्ध से संबंधित तकनीकों और प्रणालियों को शामिल किया जाएगा।
इनका उद्देश्य समुद्री सुरक्षा, युद्धक क्षमता तथा भारतीय नौसेना की परिचालन तैयारियों को मजबूत करना है।
स्वदेशी नौसैनिक प्लेटफॉर्मों का विकास भारतीय जहाज निर्माण उद्योग और रक्षा उत्पादन क्षेत्र के लिए भी महत्त्वपूर्ण है।
भारतीय वायुसेना के लिए मंजूर प्रमुख प्रस्ताव
भारतीय वायुसेना के लिए हेलीकॉप्टरों, वायु रक्षा प्रणालियों, हथियारों और आधुनिक मौसम निगरानी प्रणालियों की खरीद से संबंधित प्रस्तावों को मंजूरी दी गई।
इनका उद्देश्य वायुसेना की परिचालन क्षमता, वायु रक्षा व्यवस्था तथा कठिन परिस्थितियों में सैन्य अभियानों के संचालन को मजबूत करना है।
1. स्पेशल यूटिलिटी हेलीकॉप्टर
स्पेशल यूटिलिटी हेलीकॉप्टर (Special Utility Helicopter) का उपयोग विभिन्न सैन्य परिवहन और सहायता कार्यों के लिए किया जाता है।
इस प्रकार के हेलीकॉप्टर सैनिकों, आवश्यक सामग्री और अन्य परिचालन संसाधनों के परिवहन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
भारतीय वायुसेना में इनकी खरीद का उद्देश्य आवश्यक हवाई परिवहन क्षमताओं को मजबूत करना है।
ये विशेष रूप से कठिन भौगोलिक क्षेत्रों में सैन्य सहायता और परिवहन गतिविधियों के लिए उपयोगी हो सकते हैं।
2. आधुनिक वायु रक्षा प्रणालियाँ
DAC ने भारतीय वायुसेना के लिए वायु रक्षा प्रणालियों की खरीद के प्रस्तावों को भी मंजूरी प्रदान की।
वायु रक्षा प्रणालियाँ किसी देश के हवाई क्षेत्र, सैन्य प्रतिष्ठानों और महत्त्वपूर्ण अवसंरचना की सुरक्षा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
इनका उद्देश्य शत्रु के विमानों, मिसाइलों और अन्य हवाई खतरों का पता लगाने तथा उनसे सुरक्षा के लिए आवश्यक क्षमता प्रदान करना है।
नई प्रणालियों की खरीद से भारतीय वायुसेना की रक्षा तैयारियों और युद्धक क्षमताओं को मजबूत करने की उम्मीद है।
3. मोबाइल एक्स-बैंड डॉप्लर मौसम रडार प्रणाली
मोबाइल एक्स-बैंड डॉप्लर मौसम रडार प्रणाली (Mobile X-Band Doppler Weather Radar System) एक उन्नत मौसम निगरानी प्रणाली है।
यह एक्स-बैंड आवृत्ति क्षेत्र में रेडियो तरंगों का उपयोग करके मौसम संबंधी जानकारी प्राप्त करती है।
डॉप्लर तकनीक के माध्यम से वर्षा की तीव्रता, बादलों से संबंधित गतिविधियों और वायुमंडलीय गति से जुड़े संकेतों का आकलन किया जा सकता है।
मोबाइल होने के कारण इस प्रकार की रडार प्रणाली को आवश्यकता के अनुसार विभिन्न स्थानों पर तैनात किया जा सकता है।
प्रमुख उपयोग:
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अग्रिम सैन्य क्षेत्रों में स्थानीय मौसम की निगरानी।
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उच्च विभेदन क्षमता वाली मौसम संबंधी जानकारी प्राप्त करना।
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वायुसेना के परिचालन निर्णयों में सहायता करना।
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प्रतिकूल मौसम संबंधी जोखिमों का बेहतर आकलन करना।
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सैन्य उड़ान और अन्य गतिविधियों की योजना बनाने में सहायता करना।
यह प्रणाली विशेष रूप से उन क्षेत्रों में उपयोगी हो सकती है, जहाँ मौसम में तेजी से परिवर्तन होता है और सटीक स्थानीय जानकारी की आवश्यकता होती है।
आवश्यकता की स्वीकृति (AoN) और अंतिम रक्षा खरीद अनुबंध में अंतर
रक्षा अधिग्रहण परिषद द्वारा दी गई आवश्यकता की स्वीकृति को अंतिम खरीद अनुबंध नहीं समझना चाहिए।
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आधार |
AoN |
अंतिम खरीद अनुबंध |
|---|---|---|
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अर्थ |
खरीद की आवश्यकता को सैद्धांतिक स्वीकृति |
आपूर्तिकर्ता के साथ बाध्यकारी समझौता |
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चरण |
प्रारंभिक स्वीकृति |
खरीद प्रक्रिया का बाद का चरण |
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उद्देश्य |
प्रस्ताव को आगे बढ़ाने की अनुमति |
खरीद की शर्तों को अंतिम रूप देना |
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वित्तीय स्थिति |
अनुमानित लागत |
अनुबंध में निर्धारित लागत |
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आपूर्तिकर्ता |
आवश्यक नहीं कि चयनित हो |
निर्धारित आपूर्तिकर्ता के साथ अनुबंध |
|
आपूर्ति |
निश्चित नहीं |
अनुबंध में आपूर्ति संबंधी शर्तें निर्धारित |
इसलिए 2.12 लाख करोड़ रुपये के प्रस्तावों को मंजूरी मिलने का अर्थ यह नहीं है कि इतनी राशि के सभी रक्षा उपकरणों के लिए अंतिम अनुबंध हो चुके हैं।
रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (Defence Acquisition Procedure – DAP) क्या है?
रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (DAP) वह नीतिगत ढाँचा है, जिसके अंतर्गत भारत में पूँजीगत रक्षा उपकरणों और सैन्य प्रणालियों की खरीद से संबंधित प्रक्रियाओं का संचालन किया जाता है।
इसका उद्देश्य रक्षा खरीद को पारदर्शी, समयबद्ध और सैन्य आवश्यकताओं के अनुरूप बनाना है।
रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया, 2020 को 1 अक्टूबर, 2020 से लागू किया गया था।
इसमें स्वदेशी रक्षा विनिर्माण, भारतीय उद्योगों की भागीदारी, आधुनिक तकनीक और आत्मनिर्भरता को विशेष महत्त्व दिया गया।
फरवरी 2026 में रक्षा मंत्रालय ने रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया, 2026 का मसौदा भी जारी किया, जिसका उद्देश्य रक्षा खरीद की प्रक्रियाओं को और सरल तथा प्रभावी बनाना है।
इसमें रक्षा अधिग्रहण की गति बढ़ाने, स्वदेशी तकनीक का विकास करने, संयुक्त सैन्य क्षमताओं को मजबूत करने और घरेलू रक्षा उद्योग की भागीदारी बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया गया है।
इस रक्षा खरीद मंजूरी का सामरिक महत्त्व
1. आधुनिक युद्ध की चुनौतियों से निपटने की क्षमता
आधुनिक युद्ध में मानव रहित हवाई प्रणालियों, इलेक्ट्रॉनिक निगरानी, आधुनिक तोपों और वायु रक्षा प्रणालियों का महत्त्व तेजी से बढ़ रहा है।
इन उपकरणों की खरीद से भारतीय सशस्त्र बलों को आधुनिक युद्ध की बदलती चुनौतियों से निपटने में सहायता मिल सकती है।
2. सीमा सुरक्षा को मजबूत करना
हाई मोबिलिटी व्हीकल्स, निगरानी ड्रोन और आधुनिक सैन्य प्रणालियाँ सीमावर्ती क्षेत्रों में भारतीय थलसेना की परिचालन क्षमताओं को मजबूत करने में उपयोगी हो सकती हैं।
3. वायु रक्षा क्षमता में सुधार
VSHORADS, C-UAS तथा अन्य वायु रक्षा प्रणालियों की खरीद से विभिन्न प्रकार के हवाई खतरों का मुकाबला करने की क्षमता बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है।
4. समुद्री सुरक्षा को सुदृढ़ करना
नौसैनिक प्लेटफॉर्मों और आधुनिक मिसाइल रक्षा प्रणालियों की खरीद भारतीय नौसेना की सुरक्षा तथा युद्धक क्षमताओं को मजबूत करने में सहायक हो सकती है।
5. तीनों सेनाओं का आधुनिकीकरण
इन प्रस्तावों में थलसेना, नौसेना और वायुसेना की आवश्यकताओं को शामिल किया गया है, जिससे देश की समग्र रक्षा क्षमता को मजबूत करने की दिशा में प्रगति हो सकती है।
आत्मनिर्भर भारत और स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा
इस मंजूरी का एक महत्त्वपूर्ण पहलू स्वदेशी रक्षा उद्योग को प्राथमिकता देना है।
कुल स्वीकृत प्रस्तावों में लगभग 82 प्रतिशत खरीद भारतीय उद्योग से किए जाने की योजना है।
यह भारत में रक्षा उपकरणों के डिजाइन, विकास और विनिर्माण को प्रोत्साहित करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण है।
इसके माध्यम से सार्वजनिक क्षेत्र की रक्षा कंपनियों, निजी रक्षा निर्माताओं, MSMEs और रक्षा क्षेत्र से जुड़े स्टार्टअप को नए औद्योगिक अवसर मिल सकते हैं।
स्वदेशी रक्षा उत्पादन बढ़ने से देश की विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता कम करने तथा घरेलू तकनीकी क्षमताओं को मजबूत करने में सहायता मिल सकती है।
इसके अतिरिक्त रक्षा उपकरणों के स्थानीय उत्पादन से रोजगार, कौशल विकास, अनुसंधान और तकनीकी नवाचार को भी प्रोत्साहन मिलने की संभावना है।
रक्षा क्षेत्र में तकनीकी आधुनिकीकरण का महत्त्व
वर्तमान समय में रक्षा क्षेत्र की चुनौतियाँ केवल पारंपरिक हथियारों और सैन्य वाहनों तक सीमित नहीं हैं।
अब सैन्य क्षमताओं में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेंसर तकनीक, स्वचालित प्रणालियों, मानव रहित प्लेटफॉर्मों और सूचना आधारित युद्ध प्रणालियों की भूमिका बढ़ रही है।
ऐसी परिस्थितियों में आधुनिक सैन्य उपकरणों का विकास और उनकी समयबद्ध उपलब्धता राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण है।
DAC द्वारा मंजूर प्रस्तावों में निगरानी ड्रोन, एकीकृत निगरानी एवं प्रहार प्रणालियाँ, काउंटर-ड्रोन सिस्टम और उन्नत वायु रक्षा उपकरण शामिल हैं।
ये प्रस्ताव भारतीय सशस्त्र बलों की तकनीकी क्षमताओं के आधुनिकीकरण पर बढ़ते जोर को दर्शाते हैं।
रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया में प्रमुख चुनौतियाँ
रक्षा उपकरणों की खरीद में अनेक तकनीकी, प्रशासनिक और वित्तीय चुनौतियाँ सामने आती हैं।
लंबी खरीद प्रक्रिया: रक्षा उपकरणों की खरीद में तकनीकी मूल्यांकन, परीक्षण, वित्तीय समीक्षा और अनुबंध संबंधी प्रक्रियाओं के कारण समय लग सकता है।
आधुनिक तकनीक की उपलब्धता: अत्याधुनिक सैन्य प्रणालियों के लिए विशेष तकनीकों और अनुसंधान क्षमताओं की आवश्यकता होती है।
उच्च लागत: आधुनिक रक्षा उपकरणों की खरीद और रखरखाव में बड़ी मात्रा में वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता होती है।
स्वदेशी उत्पादन क्षमता: भारतीय रक्षा उद्योग को जटिल सैन्य प्रणालियों के निर्माण के लिए तकनीकी कौशल और उन्नत उत्पादन सुविधाओं का निरंतर विकास करना होगा।
समयबद्ध आपूर्ति: सैन्य आवश्यकताओं के अनुसार निर्धारित समय पर उपकरणों की उपलब्धता सुनिश्चित करना एक प्रमुख चुनौती है।
तकनीकी परिवर्तन: रक्षा क्षेत्र में तकनीक तेजी से बदलती है, जिससे लंबी खरीद प्रक्रिया के दौरान कुछ उपकरणों के तकनीकी रूप से पुराने पड़ने का जोखिम हो सकता है।
इन चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए रक्षा खरीद प्रक्रिया में सुधार और आधुनिकीकरण पर लगातार जोर दिया जा रहा है।