चर्चा में क्यों?
संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (UNESCO) के अंतर्गत कार्यरत मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड कमेटी फॉर एशिया एंड द पैसिफिक (MOWCAP) ने वर्ष 2025–2026 के नामांकन चक्र के लिए 21 नई दस्तावेजी धरोहरों को एशिया-प्रशांत क्षेत्रीय सूची (Asia-Pacific Regional Register) में शामिल करने की घोषणा की है।
इस सूची में भारत की तीन महत्वपूर्ण प्राचीन पांडुलिपियों को स्थान मिला है:
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महाभारत (Mahabharata)
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राजतरंगिणी (Rajatarangini)
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अर्थशास्त्र (Arthashastra)
यह निर्णय इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता में आयोजित मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड एशिया-प्रशांत क्षेत्रीय सूची के 11वें सत्र के दौरान लिया गया।
नई शामिल की गई 21 दस्तावेजी धरोहरें आपदा प्रबंधन, प्राचीन लिपियों, पाक परंपराओं, लैंगिक समानता तथा प्राचीन शासन व्यवस्थाओं जैसे विविध विषयों से संबंधित हैं।
भारत की इन तीन पांडुलिपियों का चयन देश की प्राचीन साहित्यिक, ऐतिहासिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक विरासत के अंतरराष्ट्रीय महत्व को रेखांकित करता है।
मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड एशिया-प्रशांत क्षेत्रीय सूची क्या है?
मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड एशिया-प्रशांत क्षेत्रीय सूची यूनेस्को के मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड कार्यक्रम के अंतर्गत संचालित एक महत्वपूर्ण क्षेत्रीय पहल है।
इसका उद्देश्य एशिया-प्रशांत क्षेत्र की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक दृष्टि से महत्वपूर्ण दस्तावेजी धरोहरों की पहचान करना तथा उनके संरक्षण को बढ़ावा देना है।
इस सूची में प्राचीन पांडुलिपियाँ, ऐतिहासिक दस्तावेज, अभिलेख, दुर्लभ पुस्तकें, दृश्य-श्रव्य सामग्री तथा अन्य महत्वपूर्ण दस्तावेजी संग्रह शामिल किए जा सकते हैं।
इसका प्रमुख उद्देश्य ऐसी धरोहरों को संरक्षित करना है, जो मानव सभ्यता के इतिहास, ज्ञान और सांस्कृतिक विकास को समझने में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं।
भारत की तीन नई शामिल पांडुलिपियाँ
1. कौटिल्य का अर्थशास्त्र (Arthashastra)
कौटिल्य का अर्थशास्त्र प्राचीन भारत के राजनीतिक, आर्थिक और प्रशासनिक चिंतन का एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है।
यह ग्रंथ कौटिल्य द्वारा रचित माना जाता है, जिन्हें चाणक्य और विष्णुगुप्त के नाम से भी जाना जाता है।
यूनेस्को की एशिया-प्रशांत क्षेत्रीय सूची में शामिल की गई अर्थशास्त्र की पांडुलिपि 16वीं शताब्दी की ताड़पत्र पांडुलिपि है।
इसमें प्राचीन भारतीय राज्य व्यवस्था, लोक वित्त, विधि और प्रशासन से संबंधित महत्वपूर्ण विचारों का वर्णन मिलता है।
अर्थशास्त्र की प्रमुख विशेषताएँ:
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प्राचीन भारतीय शासन और प्रशासन की विस्तृत जानकारी।
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राज्य की आर्थिक नीतियों और राजस्व व्यवस्था का वर्णन।
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कराधान तथा सार्वजनिक वित्त का विश्लेषण।
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कूटनीति, विदेश नीति और अंतरराज्यीय संबंधों की चर्चा।
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आंतरिक सुरक्षा और गुप्तचर व्यवस्था का उल्लेख।
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कानून, न्याय और दंड व्यवस्था का विवरण।
अर्थशास्त्र प्राचीन भारत में राज्य संचालन तथा आर्थिक प्रबंधन की विकसित परंपरा को दर्शाता है।
2. कल्हण की राजतरंगिणी (Rajatarangini)
राजतरंगिणी 12वीं शताब्दी में संस्कृत भाषा में रचित एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक ग्रंथ है।
इसके रचयिता कल्हण (Kalhana) थे।
यह ग्रंथ मुख्य रूप से कश्मीर के राजवंशों, शासकों और सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन का ऐतिहासिक विवरण प्रस्तुत करता है।
राजतरंगिणी को प्राचीन और मध्यकालीन कश्मीर के इतिहास के अध्ययन का एक महत्वपूर्ण साहित्यिक स्रोत माना जाता है।
राजतरंगिणी की प्रमुख विशेषताएँ:
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कश्मीर के विभिन्न राजवंशों का ऐतिहासिक विवरण।
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राजाओं की वंशावली और शासनकाल का वर्णन।
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तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों की जानकारी।
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कश्मीर के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का चित्रण।
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प्रशासनिक व्यवस्था तथा ऐतिहासिक घटनाओं का उल्लेख।
राजतरंगिणी संस्कृत साहित्य में इतिहास लेखन की एक महत्वपूर्ण परंपरा का प्रतिनिधित्व करती है।
3. महाभारत की शारदा लिपि में लिखित पांडुलिपि
यूनेस्को की क्षेत्रीय सूची में शामिल महाभारत की पांडुलिपि लगभग 400 वर्ष पुरानी है।
यह पांडुलिपि भोजपत्र (Birch Bark) पर शारदा लिपि (Sharada Script) में लिखी गई है।
यह महाभारत की कश्मीरी पाठ-परंपरा का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है।
पांडुलिपि की प्रमुख विशेषताएँ:
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लगभग 400 वर्ष पुरानी ऐतिहासिक पांडुलिपि।
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भोजपत्र पर लिखित।
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शारदा लिपि का उपयोग।
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महाभारत की कश्मीरी पाठ-परंपरा का संरक्षण।
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प्राचीन भारतीय साहित्य और क्षेत्रीय पांडुलिपि परंपराओं के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण।
महाभारत भारतीय सभ्यता के प्रमुख महाकाव्यों में से एक है। परंपरागत रूप से इसके रचयिता महर्षि वेदव्यास माने जाते हैं।
यह ग्रंथ धर्म, नैतिकता, राजनीति, दर्शन, सामाजिक व्यवस्था और मानव जीवन से संबंधित विविध विषयों का वर्णन करता है।
शारदा लिपि (Sharada Script) क्या है?
शारदा लिपि भारतीय उपमहाद्वीप की एक प्राचीन लिपि है, जिसका ऐतिहासिक उपयोग विशेष रूप से कश्मीर और उत्तर-पश्चिमी भारत के कुछ क्षेत्रों में किया जाता था।
इस लिपि का उपयोग संस्कृत और कश्मीरी सहित विभिन्न भाषाओं की पांडुलिपियों को लिखने के लिए किया गया।
शारदा लिपि का संबंध ब्राह्मी लिपि से विकसित भारतीय लिपि परंपरा से है।
कश्मीर की अनेक प्राचीन धार्मिक, दार्शनिक और साहित्यिक पांडुलिपियाँ इसी लिपि में उपलब्ध हैं।
भोजपत्र (Birch Bark) क्या है?
भोजपत्र भोज वृक्ष की छाल से प्राप्त एक प्राकृतिक लेखन सामग्री है।
प्राचीन भारत में कागज के व्यापक उपयोग से पहले विभिन्न क्षेत्रों में भोजपत्र और ताड़पत्र का उपयोग पांडुलिपियाँ तैयार करने के लिए किया जाता था।
विशेष रूप से हिमालयी क्षेत्रों में भोजपत्र का उपयोग महत्वपूर्ण रहा है।
भोजपत्र पर लिखी पांडुलिपियाँ प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा और लेखन संस्कृति के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्रोत हैं।
यूनेस्को की सूची में पहले से शामिल अन्य भारतीय दस्तावेजी धरोहरें
प्रदान की गई सूची के अनुसार, मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड कार्यक्रम के अंतर्गत भारत से संबंधित अन्य महत्वपूर्ण दस्तावेजी धरोहरें निम्नलिखित हैं।
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दस्तावेजी धरोहर |
वर्ष |
|---|---|
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आई.ए.एस. तमिल चिकित्सा पांडुलिपि संग्रह |
1997 |
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डच ईस्ट इंडिया कंपनी के अभिलेख |
2003 |
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पुडुचेरी की शैव पांडुलिपियाँ |
2005 |
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ऋग्वेद |
2007 |
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लघु कालचक्र तंत्र टीका (विमलप्रभा) |
2011 |
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तारीख-ए-खानदान-ए-तैमूरिया |
2011 |
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शांतिनाथ चरित्र |
2013 |
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गिलगित पांडुलिपियाँ |
2017 |
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मैत्रेयव्याकरण |
2017 |
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अभिनवगुप्त की रचनाओं का पांडुलिपि संग्रह |
2023 |
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गुटनिरपेक्ष आंदोलन के प्रथम शिखर सम्मेलन के अभिलेख |
2023 |
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रामचरितमानस |
2024 |
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पंचतंत्र |
2024 |
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सहृदयालोक-लोचन |
2024 |
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भरतमुनि का नाट्यशास्त्र |
2025 |
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भगवद्गीता का पांडुलिपि संग्रह |
2025 |
महत्वपूर्ण: मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड की अंतरराष्ट्रीय सूची और एशिया-प्रशांत क्षेत्रीय सूची अलग-अलग हैं। उपर्युक्त प्रविष्टियों के वर्ष विभिन्न नामांकन चक्रों से संबंधित हैं; इन्हें एक ही सूची की प्रविष्टियाँ नहीं समझना चाहिए।
यूनेस्को का मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड (Memory of the World) कार्यक्रम क्या है?
यूनेस्को ने वर्ष 1992 में मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड (MoW) कार्यक्रम की शुरुआत की थी।
इस कार्यक्रम का उद्देश्य विश्व की महत्वपूर्ण दस्तावेजी विरासत को नष्ट होने, क्षतिग्रस्त होने, उपेक्षित होने और सामूहिक विस्मृति से बचाना है।
विश्व के अनेक देशों में ऐतिहासिक अभिलेख, दुर्लभ पांडुलिपियाँ और पुस्तकालय संग्रह प्राकृतिक आपदाओं, युद्धों, राजनीतिक संघर्षों तथा संरक्षण सुविधाओं की कमी के कारण नष्ट होने के खतरे का सामना करते हैं।
इसके अतिरिक्त अनेक ऐतिहासिक दस्तावेज युद्धों, औपनिवेशिक गतिविधियों और अन्य ऐतिहासिक परिस्थितियों के कारण अपने मूल स्थानों से अलग हो गए हैं।
इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए यूनेस्को ने विश्व की दस्तावेजी विरासत के संरक्षण और उसकी व्यापक उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए यह कार्यक्रम शुरू किया।
दस्तावेजी विरासत (Documentary Heritage) क्या है?
दस्तावेजी विरासत से आशय उन ऐतिहासिक और सांस्कृतिक अभिलेखों से है, जिनमें मानव सभ्यता के ज्ञान, विचारों, घटनाओं और अनुभवों का रिकॉर्ड सुरक्षित रहता है।
इसमें विभिन्न प्रकार की सामग्री शामिल हो सकती है।
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प्राचीन पांडुलिपियाँ और हस्तलिखित ग्रंथ।
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ऐतिहासिक सरकारी अभिलेख।
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दुर्लभ पुस्तकें और पत्र।
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मानचित्र और चित्र।
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ध्वनि रिकॉर्डिंग।
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चलचित्र और दृश्य-श्रव्य सामग्री।
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डिजिटल अभिलेख और दस्तावेज।
दस्तावेजी विरासत मानव समाज को अपने अतीत को समझने, वर्तमान को समृद्ध बनाने और भविष्य के लिए ज्ञान सुरक्षित रखने में सहायता करती है।
यह सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) से भी संबंधित है, क्योंकि सांस्कृतिक विरासत शिक्षा, सामाजिक समावेशन, ज्ञान के प्रसार और संस्थागत विकास में योगदान देती है।
मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड कार्यक्रम के प्रमुख उद्देश्य
1. विश्व की दस्तावेजी विरासत का संरक्षण
ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक दृष्टि से महत्वपूर्ण दस्तावेजों को क्षरण, विनाश और अन्य खतरों से सुरक्षित रखना।
2. दस्तावेजी विरासत तक सार्वभौमिक पहुँच
दुनियाभर के लोगों को महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेजों और अभिलेखों तक यथासंभव समान और व्यापक पहुँच प्रदान करना।
3. जन-जागरूकता बढ़ाना
दस्तावेजी विरासत के महत्व के प्रति सरकारों, संस्थाओं, शोधकर्ताओं और आम जनता को जागरूक करना।
4. संरक्षण के लिए वित्तीय सहायता
दुर्लभ दस्तावेजों के संरक्षण, डिजिटलीकरण और प्रबंधन के लिए वित्तीय संसाधन जुटाने को प्रोत्साहित करना।
5. अंतरराष्ट्रीय सहयोग
विभिन्न देशों और संस्थाओं के बीच दस्तावेजी विरासत के संरक्षण से संबंधित तकनीकी ज्ञान तथा अनुभवों का आदान-प्रदान बढ़ाना।
मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड कार्यक्रम की प्रमुख सूचियाँ
यूनेस्को का मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड कार्यक्रम विभिन्न स्तरों पर महत्वपूर्ण दस्तावेजी विरासतों की पहचान करता है।
1. अंतरराष्ट्रीय सूची (International Register)
इस सूची में वैश्विक महत्व की दस्तावेजी विरासतों को शामिल किया जाता है।
किसी दस्तावेज या संग्रह का विश्व स्तर पर ऐतिहासिक, सांस्कृतिक या बौद्धिक महत्व होना इसके चयन का प्रमुख आधार है।
प्रदान की गई जानकारी के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय सूची में 193 देशों से संबंधित 570 प्रविष्टियाँ शामिल हैं।
2. क्षेत्रीय सूची (Regional Register)
इस सूची में किसी विशेष भौगोलिक क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण दस्तावेजी विरासतों को शामिल किया जाता है।
एशिया-प्रशांत क्षेत्रीय सूची का संचालन MOWCAP से संबंधित क्षेत्रीय व्यवस्था के अंतर्गत किया जाता है।
3. राष्ट्रीय सूची (National Register)
राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण दस्तावेजी धरोहरों की पहचान और उनके संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय सूचियाँ तैयार की जाती हैं।
मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड कार्यक्रम का संचालन कैसे होता है?
इस कार्यक्रम का संचालन यूनेस्को द्वारा अंतरराष्ट्रीय, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर की समितियों तथा सहयोगी व्यवस्थाओं के माध्यम से किया जाता है।
अंतरराष्ट्रीय सलाहकार समिति (International Advisory Committee – IAC)
अंतरराष्ट्रीय सलाहकार समिति मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड कार्यक्रम की योजना और कार्यान्वयन के संबंध में यूनेस्को को सलाह देने वाली प्रमुख संस्था है।
इसकी प्रमुख विशेषताएँ:
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समिति में 14 सदस्य होते हैं।
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सदस्यों की नियुक्ति यूनेस्को के महानिदेशक द्वारा की जाती है।
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सदस्यों का चयन दस्तावेजी विरासत के क्षेत्र में उनकी विशेषज्ञता और अनुभव के आधार पर किया जाता है।
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सदस्य व्यक्तिगत क्षमता में अपनी सेवाएँ प्रदान करते हैं।
यह समिति कार्यक्रम की रणनीति, संरक्षण संबंधी प्राथमिकताओं और कार्यान्वयन से जुड़े विषयों पर मार्गदर्शन प्रदान करती है।
क्षेत्रीय और राष्ट्रीय समितियों की भूमिका
मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड कार्यक्रम के अंतर्गत क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर भी समितियाँ कार्य करती हैं।
इन समितियों में दस्तावेजी विरासत के संरक्षण से संबंधित विशेषज्ञ शामिल होते हैं।
इनके प्रमुख कार्य हैं:
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महत्वपूर्ण दस्तावेजी विरासतों की पहचान करना।
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संरक्षण संबंधी प्रयासों को बढ़ावा देना।
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क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर जागरूकता विकसित करना।
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दस्तावेजी विरासत से संबंधित संस्थाओं के बीच सहयोग बढ़ाना।
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यूनेस्को के कार्यक्रमों और रणनीतियों को लागू करने में सहायता करना।
विभिन्न समितियों के बीच अनुभवों के आदान-प्रदान के लिए अंतर-क्षेत्रीय सम्मेलनों का भी आयोजन किया जाता है।
मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड सूची में शामिल होने के लाभ
1. अंतरराष्ट्रीय पहचान
यूनेस्को द्वारा मान्यता मिलने से संबंधित दस्तावेजी विरासत को व्यापक पहचान और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है।
2. यूनेस्को के लोगो का उपयोग
निर्धारित नियमों के अनुसार मान्यता प्राप्त संस्थाओं और संग्रहों को मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड लोगो के उपयोग से संबंधित अवसर प्राप्त हो सकते हैं।
3. संरक्षण के लिए वित्तीय सहायता की संभावनाएँ
सूची में शामिल होने से संरक्षण परियोजनाओं के लिए प्रायोजन, अनुदान और वित्तीय सहायता प्राप्त करने के प्रयासों को मजबूती मिल सकती है।
4. जन-जागरूकता में वृद्धि
ऐतिहासिक दस्तावेजों और पांडुलिपियों के महत्व के प्रति आम जनता की जागरूकता बढ़ती है।
5. अनुसंधान और शिक्षा को प्रोत्साहन
मान्यता प्राप्त दस्तावेजी संग्रह इतिहासकारों, शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों और सांस्कृतिक संस्थाओं के लिए महत्वपूर्ण अध्ययन सामग्री बन सकते हैं।
6. वैश्विक संरक्षण प्रयासों में भागीदारी
दस्तावेजी विरासत को अंतरराष्ट्रीय सूची में शामिल करने से उसके संरक्षण के लिए वैश्विक सहयोग और समर्थन प्राप्त करने की संभावनाएँ बढ़ती हैं।
भारत के लिए इस उपलब्धि का महत्व
भारत की महाभारत, राजतरंगिणी और अर्थशास्त्र की पांडुलिपियों को एशिया-प्रशांत क्षेत्रीय सूची में शामिल किया जाना देश की समृद्ध बौद्धिक और सांस्कृतिक परंपरा के लिए महत्वपूर्ण है।
1. प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा को मान्यता
अर्थशास्त्र और महाभारत जैसी पांडुलिपियाँ प्राचीन भारत के राजनीतिक, आर्थिक, दार्शनिक और सामाजिक विचारों को समझने में सहायता करती हैं।
2. कश्मीर की ऐतिहासिक विरासत का संरक्षण
राजतरंगिणी और शारदा लिपि में लिखित महाभारत की पांडुलिपि कश्मीर की साहित्यिक तथा ऐतिहासिक परंपराओं को संरक्षित करती हैं।
3. पांडुलिपि संरक्षण को प्रोत्साहन
अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलने से दुर्लभ पांडुलिपियों के संरक्षण, अध्ययन और डिजिटलीकरण को बढ़ावा मिल सकता है।
4. सांस्कृतिक कूटनीति को मजबूती
भारत की दस्तावेजी विरासत को अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिलने से वैश्विक स्तर पर भारतीय संस्कृति और ज्ञान परंपरा की पहचान मजबूत होती है।
5. शोध और शिक्षा के नए अवसर
इन पांडुलिपियों के अध्ययन से प्राचीन भारतीय इतिहास, साहित्य, राजनीति, प्रशासन और क्षेत्रीय संस्कृतियों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
निष्कर्ष
यूनेस्को की मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड एशिया-प्रशांत क्षेत्रीय सूची में 21 नई दस्तावेजी धरोहरों को शामिल किया जाना ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।
भारत की तीन पांडुलिपियों—महाभारत, राजतरंगिणी और अर्थशास्त्र—को इस सूची में स्थान मिलना देश की प्राचीन साहित्यिक, ऐतिहासिक और बौद्धिक परंपराओं के महत्व को दर्शाता है।
इससे न केवल भारतीय दस्तावेजी विरासत को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलेगी, बल्कि उसके संरक्षण, अध्ययन और भावी पीढ़ियों तक पहुँच को भी प्रोत्साहन मिलेगा।
प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
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महत्वपूर्ण बिंदु |
विवरण |
|---|---|
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कार्यक्रम |
UNESCO Memory of the World |
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कार्यक्रम की शुरुआत |
1992 |
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संबंधित संस्था |
UNESCO |
|
क्षेत्रीय समिति |
MOWCAP |
|
नामांकन चक्र |
2025–2026 |
|
नई प्रविष्टियाँ |
21 |
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संबंधित बैठक |
11वाँ क्षेत्रीय सत्र |
|
आयोजन स्थल |
जकार्ता, इंडोनेशिया |
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भारत की नई पांडुलिपियाँ |
महाभारत, राजतरंगिणी, अर्थशास्त्र |
|
अर्थशास्त्र के रचयिता |
कौटिल्य (चाणक्य) |
|
अर्थशास्त्र की पांडुलिपि |
16वीं शताब्दी, ताड़पत्र |
|
राजतरंगिणी के रचयिता |
कल्हण |
|
राजतरंगिणी की रचना |
12वीं शताब्दी |
|
महाभारत की पांडुलिपि |
लगभग 400 वर्ष पुरानी |
|
महाभारत की पांडुलिपि की लिपि |
शारदा |
|
महाभारत की पांडुलिपि की सामग्री |
भोजपत्र |
|
अंतरराष्ट्रीय सलाहकार समिति के सदस्य |
14 |
|
कार्यक्रम के प्रमुख उद्देश्य |
संरक्षण, सार्वभौमिक पहुँच और जागरूकता |