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महासागर कार्बन इंटेलिजेंस (Ocean Carbon Intelligence) फ्रेमवर्क क्या है?

विश्व को महासागर की कार्बन प्रणाली के बारे में अपनी समझ को मजबूत करने की आवश्यकता है, ताकि पृथ्वी के सबसे महत्वपूर्ण जलवायु सहयोगियों में से एक महासागर की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। यह बात 28 अक्टूबर को जारी संयुक्त राष्ट्र (UN) की 2026 जलवायु प्रौद्योगिकी प्रगति रिपोर्ट (Climate Technology Progress Report – CTPR) में कही गई है।

रिपोर्ट किसके द्वारा जारी की गई?

संयुक्त राष्ट्र की वर्ष 2026 की जलवायु प्रौद्योगिकी प्रगति रिपोर्ट (CTPR) निम्नलिखित संस्थाओं के सहयोग से जारी की गई है—

  • UNEP Copenhagen Climate Centre (यूएनईपी कोपेनहेगन क्लाइमेट सेंटर)।

  • Climate Technology Centre and Network (CTCN) अर्थात जलवायु प्रौद्योगिकी केंद्र एवं नेटवर्क।

  • UN Framework Convention on Climate Change Technology Executive Committee (TEC) अर्थात संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा अभिसमय की प्रौद्योगिकी कार्यकारी समिति।

रिपोर्ट का महत्व

वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए विभिन्न देशों की सरकारें, वैज्ञानिक, शोधकर्ता और निवेशक महासागर आधारित जलवायु समाधानों की ओर तेजी से ध्यान दे रहे हैं।

इस रिपोर्ट में बताया गया है कि महासागर की कार्बन प्रणाली को बेहतर ढंग से समझने के लिए दीर्घकालिक निवेश की आवश्यकता है। इसके अंतर्गत महासागरीय निगरानी, डेटा अवसंरचना और वैज्ञानिक मॉडलिंग को मजबूत करना महत्वपूर्ण है।

रिपोर्ट के अनुसार, इन क्षेत्रों में निवेश करने से महासागर से संबंधित महत्वपूर्ण वैज्ञानिक जानकारियों की कमी को दूर किया जा सकता है। इससे जलवायु संबंधी निर्णय लेने की प्रक्रिया अधिक प्रभावी होगी तथा महासागर आधारित जलवायु प्रौद्योगिकियों का जिम्मेदारीपूर्वक विकास किया जा सकेगा।

रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि जलवायु परिवर्तन पहले से ही महासागर की कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) को अवशोषित करने और लंबे समय तक संग्रहित रखने की क्षमता को प्रभावित कर रहा है।

वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चलता है कि महासागरों के तापमान में वृद्धि, अम्लीकरण (Acidification) तथा अन्य पर्यावरणीय दबाव महासागर की भौतिक, रासायनिक और जैविक प्रक्रियाओं को प्रभावित कर रहे हैं। यही प्रक्रियाएँ महासागर को वैश्विक कार्बन सिंक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

रिपोर्ट में महासागर आधारित जलवायु प्रौद्योगिकियों के अवसरों और सीमाओं दोनों पर प्रकाश डाला गया है। इनमें ब्लू कार्बन पारिस्थितिकी तंत्र का पुनर्स्थापन तथा समुद्री माध्यमों से कार्बन डाइऑक्साइड को हटाने की उभरती प्रौद्योगिकियाँ शामिल हैं।

इसके अतिरिक्त, रिपोर्ट में ओशन कार्बन इंटेलिजेंस (Ocean Carbon Intelligence – OCI) फ्रेमवर्क के महत्व को विशेष रूप से रेखांकित किया गया है।

महासागर एक कार्बन सिंक (Ocean Carbon Sink)

महासागर पृथ्वी की जलवायु स्थिरता, मानव आजीविका और सतत विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। महासागर वातावरण में मौजूद कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करके जलवायु परिवर्तन की गति को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

वर्तमान में महासागर मानव गतिविधियों के कारण उत्सर्जित कुल कार्बन डाइऑक्साइड का लगभग 30 प्रतिशत अवशोषित करते हैं। इसके अतिरिक्त, जलवायु परिवर्तन के कारण उत्पन्न अतिरिक्त ऊष्मा का लगभग 90 प्रतिशत महासागर अपने भीतर समाहित कर लेते हैं।

इस प्रकार महासागर ने वैश्विक तापमान वृद्धि की गति और उसके प्रभावों को काफी हद तक कम करने में सहायता की है।

हालाँकि, महासागर की यह क्षमता हमेशा इसी प्रकार बनी रहेगी, इसकी गारंटी नहीं है। जलवायु परिवर्तन के कारण महासागर के तापमान में वृद्धि, अम्लीकरण, ऑक्सीजन की कमी (Deoxygenation), समुद्री जल परिसंचरण में बदलाव, पोषक तत्त्वों के वितरण में परिवर्तन, प्रदूषण तथा समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र का क्षरण जैसी समस्याएँ बढ़ रही हैं।

ये सभी कारक महासागर की कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करने और लंबे समय तक संग्रहित रखने की प्राकृतिक क्षमता को प्रभावित कर रहे हैं।

वर्तमान में महासागर द्वारा कार्बन डाइऑक्साइड के निरंतर अवशोषण से समुद्री जल की रासायनिक संरचना में बदलाव हो रहा है। इससे भविष्य में कार्बन को अवशोषित करने और लंबे समय तक संग्रहित रखने की महासागर की क्षमता कम हो सकती है।

महासागर की कार्बन अवशोषण क्षमता में कमी आने से समुद्री और तटीय पारिस्थितिकी तंत्र की प्रतिरोधक क्षमता भी प्रभावित होती है। इसका प्रतिकूल प्रभाव समुद्री जीवों, तटीय समुदायों और महासागर पर निर्भर आजीविकाओं पर पड़ता है।

यदि महासागर की कार्बन अवशोषित करने की क्षमता कमजोर होती है, तो मानव गतिविधियों से उत्सर्जित कार्बन डाइऑक्साइड का अधिक हिस्सा वायुमंडल में बना रहेगा। इससे वैश्विक तापमान में वृद्धि होगी और शेष वैश्विक कार्बन बजट (Global Carbon Budget) पर दबाव बढ़ेगा।

महासागरीय अम्लीकरण (Ocean Acidification)

महासागर की कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करने की क्षमता समुद्री जल की क्षारीयता (Alkalinity) पर भी निर्भर करती है।

क्षारीयता (Alkalinity) क्या है?

क्षारीयता से तात्पर्य समुद्री जल की उस क्षमता से है, जिसके माध्यम से वह अम्ल (Acid) को निष्क्रिय या उदासीन कर सकता है।

समुद्री जल की क्षारीयता मुख्य रूप से उसमें घुले हुए बाइकार्बोनेट (Bicarbonate) और कार्बोनेट (Carbonate) आयनों जैसे पदार्थों पर निर्भर करती है।

इनमें से कई आयन मुख्य रूप से भूमि पर चट्टानों के धीरे-धीरे अपक्षय (Weathering) होने से उत्पन्न होते हैं और नदियों के माध्यम से महासागरों तक पहुँचते हैं।

समुद्री जल में बाइकार्बोनेट और कार्बोनेट आयनों की पर्याप्त मात्रा होने के कारण उसमें थोड़ी मात्रा में अम्ल मिलने पर भी उसका प्रभाव तुरंत कम हो जाता है। इससे समुद्री जल के pH मान में बहुत अधिक परिवर्तन नहीं होता।

इस क्षमता को अम्ल-क्षार बफर क्षमता (Acid-Base Buffer Capacity) कहा जाता है। यही क्षमता समुद्री जल के pH मान को अपेक्षाकृत स्थिर बनाए रखने में सहायता करती है।

महासागरीय अम्लीकरण की प्रक्रिया

मानव गतिविधियों से उत्सर्जित कार्बन डाइऑक्साइड का लगातार महासागरों में घुलना उनकी प्राकृतिक बफर क्षमता को कम कर रहा है। इसके परिणामस्वरूप समुद्री जल की अम्लीयता बढ़ रही है और उसमें कार्बोनेट आयनों की उपलब्धता घट रही है। इस प्रक्रिया को महासागरीय अम्लीकरण (Ocean Acidification) कहा जाता है।

जैसे-जैसे महासागरों की अम्लीयता बढ़ती है, उनकी वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करने की क्षमता प्रभावित होती है। इससे जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने में महासागर की भूमिका कमजोर हो सकती है।

समुद्री जीवों पर प्रभाव

महासागरीय अम्लीकरण का समुद्री जीवों पर भी गंभीर प्रभाव पड़ता है।

समुद्री जल में कार्बोनेट आयनों की उपलब्धता कम होने से उन जीवों के लिए कैल्शियम कार्बोनेट (Calcium Carbonate) के कवच और कंकाल का निर्माण करना कठिन हो जाता है, जो इन संरचनाओं पर निर्भर होते हैं।

इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं—

  • प्लवक (Plankton)

  • शंख एवं सीप जैसे जीव (Shellfish)

  • प्रवाल (Corals)

इस प्रकार महासागरीय अम्लीकरण समुद्री जैव विविधता और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन के लिए एक गंभीर चुनौती है।

ओशन कार्बन इंटेलिजेंस (Ocean Carbon Intelligence – OCI)

वर्ष 2026 की जलवायु प्रौद्योगिकी प्रगति रिपोर्ट (CTPR) में ओशन कार्बन इंटेलिजेंस (OCI) की अवधारणा को प्रस्तुत किया गया है।

यह एक ऐसा ढाँचा (Framework) है, जो महासागर विज्ञान, निगरानी प्रौद्योगिकियों, डेटा अवसंरचना और विश्लेषणात्मक उपकरणों को एक साथ जोड़ता है। इसका उद्देश्य महासागर में कार्बन की गतिविधियों और उसके अवशोषण एवं भंडारण की प्रक्रियाओं को बेहतर ढंग से समझना तथा वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर जलवायु संबंधी निर्णय लेने में सहायता करना है।

इस फ्रेमवर्क के माध्यम से महासागर से संबंधित विभिन्न वैज्ञानिक जानकारियों, निगरानी प्रणालियों और डिजिटल प्रौद्योगिकियों को एकीकृत करने पर जोर दिया गया है।

महासागर की जलवायु विनियमन, जलवायु अनुकूलन (Adaptation) और जलवायु शमन (Mitigation) में भूमिका लगातार बदल रही है। इसलिए महासागर के बारे में उपलब्ध वैज्ञानिक जानकारियों को एक साथ जोड़ना और उनका प्रभावी उपयोग करना आवश्यक हो गया है।

ओशन कार्बन इंटेलिजेंस फ्रेमवर्क के प्रमुख घटक

1. महासागरीय निगरानी (Ocean Observation): महासागर के तापमान, कार्बन अवशोषण, समुद्री जल की रासायनिक संरचना और अन्य पर्यावरणीय परिवर्तनों की नियमित निगरानी करना।

2. डेटा अवसंरचना (Data Infrastructure): महासागर से संबंधित विभिन्न स्रोतों से प्राप्त आंकड़ों को एकत्रित करना, व्यवस्थित करना और उनका विश्लेषण करना।

3. वैज्ञानिक मॉडलिंग (Scientific Modelling): वैज्ञानिक मॉडलों की सहायता से महासागर में कार्बन के प्रवाह, अवशोषण और भंडारण की प्रक्रियाओं को समझना तथा भविष्य में होने वाले परिवर्तनों का आकलन करना।

4. डिजिटल प्रौद्योगिकियाँ (Digital Technologies): आधुनिक डिजिटल उपकरणों और विश्लेषणात्मक तकनीकों का उपयोग करके महासागर से संबंधित जानकारी को अधिक प्रभावी बनाना।

5. वैज्ञानिक ज्ञान का एकीकरण: महासागर विज्ञान, जलवायु अनुसंधान और प्रौद्योगिकी से संबंधित जानकारियों को एक साथ जोड़कर बेहतर निर्णय लेने में सहायता करना।

महासागरीय और तटीय निगरानी प्रणालियों का एकीकरण

ओशन कार्बन इंटेलिजेंस फ्रेमवर्क का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य खुले महासागरों में होने वाली गतिविधियों की निगरानी को तटीय क्षेत्रों की निगरानी प्रणालियों तथा भूमि आधारित नदी बेसिन के आंकड़ों से जोड़ना है।

इससे उन क्षेत्रों में उपलब्ध आंकड़ों की कमी को दूर करने में मदद मिलेगी, जहाँ समुद्री पर्यावरण में तेजी से परिवर्तन होते हैं।

ऐसे क्षेत्रों में प्रमुख रूप से निम्नलिखित शामिल हैं—

  • अपवेलिंग क्षेत्र (Upwelling Systems): वे समुद्री क्षेत्र जहाँ गहरे समुद्र का ठंडा और पोषक तत्त्वों से भरपूर जल सतह पर आता है।

  • फियोर्ड (Fjords): समुद्र के किनारे स्थित गहरी और संकरी जलमग्न घाटियाँ, जो सामान्यतः हिमनदों की गतिविधियों से निर्मित होती हैं।

इन क्षेत्रों में समुद्री जल के प्रवाह, कार्बन के आदान-प्रदान और पर्यावरणीय परिस्थितियों में तेजी से बदलाव हो सकता है। इसलिए यहाँ बेहतर निगरानी और वैज्ञानिक आंकड़ों की आवश्यकता होती है।

इस फ्रेमवर्क से कार्बन के प्रवाह का वास्तविक आकलन करने तथा एक साथ उत्पन्न होने वाले विभिन्न जलवायु जोखिमों को समझने में भी सहायता मिलेगी।

ओशन कार्बन इंटेलिजेंस फ्रेमवर्क का महत्व

ओशन कार्बन इंटेलिजेंस महासागर विज्ञान, जलवायु प्रौद्योगिकी और उनके व्यावहारिक उपयोग के बीच मौजूद अंतर को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

यह फ्रेमवर्क सरकारों, वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और निवेशकों को महासागर आधारित जलवायु समाधानों के संबंध में अधिक सटीक एवं वैज्ञानिक निर्णय लेने में सहायता प्रदान करता है।

इसके माध्यम से महासागर के कार्बन अवशोषण और भंडारण की क्षमता को बेहतर ढंग से समझा जा सकेगा तथा समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण और सतत विकास से संबंधित योजनाओं को अधिक प्रभावी बनाया जा सकेगा।

इस प्रकार ओशन कार्बन इंटेलिजेंस जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने, महासागर आधारित जलवायु समाधानों के विकास और समुद्री पर्यावरण के दीर्घकालिक संरक्षण के लिए एक महत्वपूर्ण आधार प्रदान करता है।

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