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भूपेंद्र यादव ने पैसिफिक प्री-COP31 बैठकों में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया

Environment 📅 October 11, 2026
केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा अभिसमय (UNFCCC) के अंतर्गत आयोजित पैसिफिक प्री-COP31 बैठकों में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया। इन बैठकों की सह-मेजबानी ऑस्ट्रेलिया, फिजी और तुवालु द्वारा की गई।

इस बैठक का प्रमुख उद्देश्य आगामी संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन COP31 से पहले जलवायु परिवर्तन से जुड़े महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा करना और सदस्य देशों के बीच सहमति बनाने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना है।

इस दौरान भारत ने जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए अनुकूलन, उत्सर्जन में कमी और विकासशील देशों को आवश्यक वित्तीय एवं तकनीकी सहायता उपलब्ध कराने पर समान रूप से ध्यान देने की आवश्यकता पर जोर दिया। भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि जलवायु परिवर्तन से निपटने की रणनीतियाँ सभी देशों की परिस्थितियों, क्षमताओं और विकास संबंधी आवश्यकताओं के अनुरूप होनी चाहिए।

पैसिफिक प्री-COP31 क्या है?

प्री-COP किसी वार्षिक संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (COP) से पहले आयोजित की जाने वाली तैयारी बैठक है। इसमें सीमित संख्या में देशों के प्रतिनिधि, मंत्री और संबंधित विशेषज्ञ एकत्र होकर आगामी सम्मेलन में चर्चा किए जाने वाले प्रमुख मुद्दों पर विचार-विमर्श करते हैं।

आमतौर पर इन बैठकों में लगभग 30 से 50 देशों के प्रतिनिधि भाग लेते हैं। इनका उद्देश्य जलवायु वार्ताओं के कठिन विषयों पर पहले से विचार करना, संभावित मतभेदों को समझना और औपचारिक सम्मेलन के लिए बातचीत का आधार तैयार करना है।

पैसिफिक प्री-COP31 का आयोजन 5 से 8 अक्टूबर तक फिजी के नादी में निर्धारित किया गया था। इसके साथ तुवालु में एक नेताओं का कार्यक्रम भी आयोजित किया गया। इस बैठक का विशेष महत्त्व इसलिए है, क्योंकि प्रशांत द्वीपीय देश समुद्र-स्तर में वृद्धि, तटीय कटाव, चक्रवातों और अन्य जलवायु संबंधी जोखिमों से गंभीर रूप से प्रभावित होते हैं।

पैसिफिक प्री-COP31 का उद्देश्य इन देशों की चिंताओं और प्राथमिकताओं को आगामी COP31 की वार्ताओं में प्रमुख स्थान दिलाना है।

प्री-COP बैठकों का महत्त्व

प्री-COP बैठकें औपचारिक जलवायु सम्मेलन से पहले देशों को अपने विचार रखने और संभावित समाधानों पर चर्चा करने का अवसर प्रदान करती हैं। जलवायु परिवर्तन से जुड़े मुद्दों में अक्सर विकसित और विकासशील देशों के बीच वित्तीय सहायता, उत्सर्जन में कटौती, तकनीकी सहयोग और जिम्मेदारियों के बँटवारे को लेकर मतभेद होते हैं।

ऐसी तैयारी बैठकों के माध्यम से इन मतभेदों को समझने और सहमति के संभावित क्षेत्रों की पहचान करने में सहायता मिलती है।

पैसिफिक प्री-COP31 के विशेष उद्देश्य निम्नलिखित हैं:

  • आगामी COP31 की वार्ताओं के लिए आधार तैयार करना।

  • प्रशांत द्वीपीय देशों की जलवायु संबंधी चिंताओं को वैश्विक मंच पर प्रमुखता देना।

  • जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए अनुकूलन संबंधी उपायों पर चर्चा करना।

  • जलवायु वित्त और तकनीकी सहायता से जुड़े मुद्दों को आगे बढ़ाना।

  • विकसित और विकासशील देशों के बीच सहयोग तथा विश्वास को मजबूत करना।

  • स्थानीय समुदायों द्वारा विकसित जलवायु समाधान और अनुकूलन के अनुभवों को साझा करना।

इस प्रकार, प्री-COP बैठकें केवल औपचारिक तैयारी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे वैश्विक जलवायु वार्ताओं में राजनीतिक सहमति बनाने का भी महत्त्वपूर्ण माध्यम हैं।

प्रशांत द्वीपीय देशों के लिए पैसिफिक प्री-COP31 का महत्त्व

प्रशांत महासागर में स्थित अनेक छोटे द्वीपीय देश जलवायु परिवर्तन के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हैं। इनमें से कई देशों की अर्थव्यवस्था, खाद्य सुरक्षा, पेयजल उपलब्धता और आजीविका समुद्री एवं तटीय पारिस्थितिक तंत्रों पर निर्भर करती है।

समुद्र-स्तर में वृद्धि से निचले तटीय क्षेत्रों और द्वीपों के अस्तित्व पर खतरा पैदा हो सकता है। इसके अतिरिक्त, समुद्री जल का भूजल में प्रवेश, तटीय कटाव, अत्यधिक गर्मी और चक्रवातों की तीव्रता से स्थानीय समुदायों की कठिनाइयाँ बढ़ सकती हैं।

ऐसे देशों के पास जलवायु संबंधी चुनौतियों से निपटने के लिए वित्तीय संसाधन, आधुनिक तकनीक और आधारभूत संरचना अक्सर सीमित होती है। इसलिए वैश्विक जलवायु नीतियों में उनकी आवश्यकताओं को शामिल करना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

प्रशांत क्षेत्र में प्री-COP बैठक आयोजित करने से अंतरराष्ट्रीय निर्णयकर्ताओं को स्थानीय परिस्थितियों को प्रत्यक्ष रूप से समझने का अवसर मिलता है। इससे जलवायु परिवर्तन के प्रभावों और समुदायों द्वारा अपनाए जा रहे समाधानों को वैश्विक वार्ताओं से जोड़ने में मदद मिलती है।

COP31 का आयोजन कहाँ होगा?

COP31 संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन का 31वाँ सत्र है। दिए गए विवरण के अनुसार, इसका आयोजन 9 से 20 नवंबर तक तुर्किये के अंताल्या शहर में निर्धारित किया गया है। इसमें विश्व नेताओं का शिखर सम्मेलन भी शामिल होगा।

COP31 की प्रक्रिया में ऑस्ट्रेलिया वार्ताओं की अध्यक्षता की भूमिका निभाएगा, जबकि सम्मेलन का आयोजन तुर्किये में होगा। इस व्यवस्था का उद्देश्य प्रशांत क्षेत्र सहित विभिन्न देशों की जलवायु प्राथमिकताओं को वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में शामिल करना है।

COP31 में देशों के बीच उत्सर्जन लक्ष्यों, जलवायु वित्त, अनुकूलन, तकनीकी सहयोग और जलवायु कार्रवाई की महत्त्वाकांक्षा जैसे विषयों पर चर्चा की जाएगी।

COP क्या है?

COP का पूरा नाम Conference of the Parties अर्थात् ‘पक्षकारों का सम्मेलन’ है। यह संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा अभिसमय (United Nations Framework Convention on Climate Change—UNFCCC) का सर्वोच्च निर्णय लेने वाला निकाय है।

इस सम्मेलन में अभिसमय के पक्षकार देश और यूरोपीय संघ जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए सामूहिक नीतियों, नियमों और उपायों पर विचार-विमर्श करते हैं।

COP के प्रमुख उद्देश्यों में शामिल हैं:

  • वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने के प्रयासों को आगे बढ़ाना।

  • जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के अनुकूलन को प्रोत्साहित करना।

  • विकासशील देशों के लिए जलवायु वित्त की व्यवस्था पर चर्चा करना।

  • स्वच्छ ऊर्जा और कम-कार्बन प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देना।

  • जलवायु संबंधी अंतरराष्ट्रीय समझौतों के क्रियान्वयन की समीक्षा करना।

  • वैश्विक तापमान वृद्धि को सीमित करने के लिए सामूहिक कार्रवाई को मजबूत करना।

COP की बैठकें सामान्यतः प्रतिवर्ष आयोजित होती हैं। इनमें लिए गए निर्णय अंतरराष्ट्रीय जलवायु सहयोग की दिशा और प्राथमिकताओं को प्रभावित करते हैं।

संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा अभिसमय (UNFCCC)

UNFCCC एक बहुपक्षीय अंतरराष्ट्रीय संधि है, जिसे 1992 में अपनाया गया था। इसका मूल उद्देश्य वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों की सांद्रता को ऐसे स्तर पर स्थिर करने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देना है, जिससे जलवायु प्रणाली पर खतरनाक मानवीय हस्तक्षेप को रोका जा सके।

यह संधि 1994 में लागू हुई और इसके बाद वैश्विक जलवायु वार्ताओं के लिए एक संस्थागत आधार तैयार हुआ।

UNFCCC के अंतर्गत देशों ने जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने के लिए अनेक महत्त्वपूर्ण समझौते किए हैं। इनमें क्योटो प्रोटोकॉल और पेरिस समझौता विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

UNFCCC का महत्त्व इस बात में है कि यह विकसित और विकासशील देशों को एक साझा मंच उपलब्ध कराता है, जहाँ वे जलवायु परिवर्तन के कारणों, प्रभावों और समाधानों पर बातचीत कर सकते हैं।

क्योटो प्रोटोकॉल, 1997

क्योटो प्रोटोकॉल को 1997 में अपनाया गया था। इसका उद्देश्य विकसित देशों के लिए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी से संबंधित प्रतिबद्धताओं को निर्धारित करना था।

इस प्रोटोकॉल में इस विचार को महत्त्व दिया गया कि औद्योगीकरण के लंबे इतिहास के कारण विकसित देशों की जलवायु संबंधी जिम्मेदारियाँ अधिक हैं। इसी आधार पर विकसित देशों के लिए विशिष्ट उत्सर्जन कटौती प्रतिबद्धताएँ तय की गईं।

क्योटो प्रोटोकॉल ने अंतरराष्ट्रीय जलवायु शासन के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई और बाद में अधिक व्यापक वैश्विक समझौते की दिशा में आधार तैयार किया।

पेरिस समझौता, 2015

पेरिस समझौते को 2015 में COP21 के दौरान अपनाया गया था। इसका प्रमुख उद्देश्य वैश्विक औसत तापमान वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तर की तुलना में 2 डिग्री सेल्सियस से काफी नीचे रखना तथा इसे 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के प्रयास करना है।

इस समझौते के अंतर्गत सभी देशों से राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (Nationally Determined Contributions—NDCs) तैयार करने और समय-समय पर उन्हें अद्यतन करने की अपेक्षा की जाती है।

पेरिस समझौता केवल उत्सर्जन घटाने पर केंद्रित नहीं है। इसमें जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन, जलवायु वित्त, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और क्षमता निर्माण को भी महत्त्व दिया गया है।

प्री-COP31 में भारत ने क्या प्रमुख मुद्दे उठाए?

केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने भारत की ओर से जलवायु परिवर्तन के प्रति संतुलित और न्यायसंगत दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दिया। उन्होंने विशेष रूप से तीन प्रमुख क्षेत्रों—अनुकूलन, शमन और कार्यान्वयन के साधनों—पर समान ध्यान देने की आवश्यकता बताई।

भारत का दृष्टिकोण है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के प्रयासों में केवल उत्सर्जन कम करने पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। जलवायु प्रभावों से प्रभावित समुदायों की सुरक्षा, आवश्यक वित्तीय सहायता और तकनीकी संसाधनों की उपलब्धता भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है।

भारत ने यह भी रेखांकित किया कि सभी देशों के लिए एक जैसी जलवायु नीति उपयुक्त नहीं हो सकती। अलग-अलग देशों की आर्थिक परिस्थितियाँ, विकास की जरूरतें, ऊर्जा संसाधन और जलवायु जोखिम अलग-अलग हैं। इसलिए जलवायु कार्रवाई में इन विविधताओं का सम्मान किया जाना चाहिए।

अनुकूलन, शमन और कार्यान्वयन के साधन

भूपेंद्र यादव द्वारा उठाए गए प्रमुख मुद्दों को समझने के लिए इन तीन अवधारणाओं का अंतर जानना आवश्यक है।

1. जलवायु परिवर्तन का अनुकूलन (Climate Adaptation)

अनुकूलन का अर्थ जलवायु परिवर्तन के वर्तमान और संभावित प्रभावों के अनुरूप तैयारी करना तथा नुकसान को कम करना है।

इसके अंतर्गत बाढ़ से सुरक्षा, सूखा-रोधी कृषि, जल संरक्षण, तटीय क्षेत्रों की सुरक्षा, चक्रवात पूर्व चेतावनी प्रणालियाँ और जलवायु-सहिष्णु आधारभूत संरचना विकसित करना शामिल है।

प्रशांत द्वीपीय देशों के लिए समुद्र-स्तर में वृद्धि और तटीय जोखिमों से निपटने के कारण अनुकूलन विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है।

2. जलवायु परिवर्तन का शमन (Climate Mitigation)

शमन का अर्थ ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करना अथवा प्राकृतिक और कृत्रिम माध्यमों से कार्बन अवशोषण बढ़ाना है।

इसके प्रमुख उपायों में नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार, ऊर्जा दक्षता में सुधार, स्वच्छ परिवहन, वनों का संरक्षण और औद्योगिक उत्सर्जन में कमी शामिल हैं।

शमन का उद्देश्य भविष्य में वैश्विक तापमान वृद्धि को सीमित करना है।

3. कार्यान्वयन के साधन (Means of Implementation)

जलवायु लक्ष्यों को वास्तविकता में बदलने के लिए वित्त, प्रौद्योगिकी और संस्थागत क्षमता की आवश्यकता होती है। इन्हें व्यापक रूप से कार्यान्वयन के साधन कहा जाता है।

इनमें जलवायु वित्त, तकनीकी सहयोग, ज्ञान का आदान-प्रदान और विकासशील देशों की संस्थागत क्षमता मजबूत करना शामिल है।

भारत का जोर है कि जलवायु लक्ष्यों पर सहमति बनाने के साथ-साथ उन्हें लागू करने के लिए आवश्यक संसाधनों की उपलब्धता पर भी पर्याप्त ध्यान दिया जाना चाहिए।

CBDR-RC सिद्धांत क्या है?

CBDR-RC का पूरा नाम Common but Differentiated Responsibilities and Respective Capabilities है। हिंदी में इसे ‘साझा लेकिन विभेदित जिम्मेदारियाँ और संबंधित क्षमताएँ’ कहा जाता है।

यह अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण शासन का एक महत्त्वपूर्ण सिद्धांत है। इसके अनुसार, जलवायु परिवर्तन से निपटना सभी देशों की साझा जिम्मेदारी है, लेकिन सभी देशों की ऐतिहासिक जिम्मेदारी, आर्थिक क्षमता और तकनीकी संसाधन समान नहीं हैं।

इस सिद्धांत के दो प्रमुख पक्ष हैं:

  • साझा जिम्मेदारियाँ: सभी देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने और पर्यावरण की रक्षा करने में योगदान देना चाहिए।

  • विभेदित जिम्मेदारियाँ और क्षमताएँ: देशों की ऐतिहासिक उत्सर्जन भूमिका, विकास की स्थिति और उपलब्ध संसाधनों को ध्यान में रखते हुए उनकी जिम्मेदारियों और योगदान की प्रकृति अलग हो सकती है।

भारत लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय जलवायु वार्ताओं में इस सिद्धांत को महत्त्व देता रहा है। भारत का तर्क है कि जलवायु कार्रवाई की जिम्मेदारियों का निर्धारण करते समय विकसित देशों के ऐतिहासिक उत्सर्जन और उनकी वित्तीय एवं तकनीकी क्षमताओं को ध्यान में रखा जाना चाहिए।

जलवायु न्याय और विकासशील देशों की चिंताएँ

जलवायु न्याय का विचार इस बात पर जोर देता है कि जलवायु परिवर्तन के कारण उत्पन्न होने वाली लागत और जोखिम सभी देशों तथा समुदायों पर समान रूप से नहीं पड़ते।

कई विकासशील देशों का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन अपेक्षाकृत कम है, लेकिन वे जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हो सकते हैं। इसके अतिरिक्त, उनके पास अनुकूलन और आपदा से उबरने के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन नहीं होते।

भारत का दृष्टिकोण है कि जलवायु कार्रवाई को आर्थिक विकास, ऊर्जा तक पहुँच, गरीबी उन्मूलन और सामाजिक कल्याण की आवश्यकताओं के साथ संतुलित किया जाना चाहिए।

CBDR-RC का सिद्धांत इसी संतुलन को ध्यान में रखता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि वैश्विक जलवायु कार्रवाई में सभी देशों का योगदान हो, लेकिन उनकी परिस्थितियों और क्षमताओं के अनुरूप जिम्मेदारियाँ भी निर्धारित की जाएँ।

जलवायु कार्रवाई में ‘वन-साइज-फिट्स-ऑल’ दृष्टिकोण क्यों उचित नहीं?

भूपेंद्र यादव ने इस बात पर जोर दिया कि जलवायु कार्रवाई के लिए ‘वन-साइज-फिट्स-ऑल’ अर्थात् सभी देशों पर एक जैसी नीति लागू करने वाला दृष्टिकोण उपयुक्त नहीं है।

दुनिया के विभिन्न देशों की ऊर्जा आवश्यकताएँ, आर्थिक संरचना, प्राकृतिक संसाधन और विकास संबंधी चुनौतियाँ अलग-अलग हैं। उदाहरण के लिए, किसी विकसित अर्थव्यवस्था के पास स्वच्छ ऊर्जा में बड़े निवेश के लिए अधिक वित्तीय संसाधन हो सकते हैं, जबकि किसी विकासशील देश को ऊर्जा तक सार्वभौमिक पहुँच सुनिश्चित करने के साथ-साथ उत्सर्जन कम करने की चुनौती का सामना करना पड़ता है।

इसी प्रकार, द्वीपीय देशों को समुद्र-स्तर में वृद्धि से सुरक्षा की आवश्यकता हो सकती है, जबकि शुष्क क्षेत्रों वाले देशों के लिए जल संकट और सूखा अधिक बड़ी चुनौती हो सकते हैं।

इसलिए जलवायु नीतियों को स्थानीय परिस्थितियों और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप तैयार करना आवश्यक है। इससे नीतियों की प्रभावशीलता बढ़ती है और जलवायु कार्रवाई को लागू करना अधिक व्यावहारिक बनता है।

स्थानीय अध्ययन और आकलन का महत्त्व

भारत ने उभरती जलवायु चुनौतियों के समाधान के लिए स्थानीय अध्ययन और आकलन को महत्त्वपूर्ण बताया। जलवायु परिवर्तन के प्रभाव प्रत्येक क्षेत्र में एक जैसे नहीं होते। किसी क्षेत्र में बाढ़ का जोखिम अधिक हो सकता है, जबकि दूसरे क्षेत्र में सूखा, जल संकट या अत्यधिक गर्मी प्रमुख चुनौती हो सकती है।

स्थानीय अध्ययन के माध्यम से निम्नलिखित कार्यों में सहायता मिल सकती है:

  • क्षेत्र विशेष के जलवायु जोखिमों की पहचान।

  • कृषि, जल संसाधनों और जैव विविधता पर संभावित प्रभावों का आकलन।

  • स्थानीय समुदायों की जरूरतों के अनुरूप अनुकूलन उपाय तैयार करना।

  • आपदा जोखिम को कम करने के लिए बेहतर योजना बनाना।

  • जलवायु संबंधी निवेश और संसाधनों का अधिक प्रभावी उपयोग करना।

स्थानीय ज्ञान और वैज्ञानिक आकलन को एक साथ उपयोग करने से ऐसी नीतियाँ विकसित की जा सकती हैं, जो वास्तविक परिस्थितियों के अनुरूप हों और जिनका लाभ प्रभावित समुदायों तक पहुँच सके।

भारत की जलवायु नीति और अंतरराष्ट्रीय भूमिका

भारत जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए नवीकरणीय ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता, सतत जीवनशैली, वन संरक्षण और जलवायु-अनुकूल विकास को महत्त्व देता है। साथ ही, भारत का कहना है कि जलवायु कार्रवाई में विकासशील देशों की आवश्यकताओं और विकास के अधिकार को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

भारत की जलवायु कूटनीति में समानता, जलवायु न्याय, CBDR-RC और वित्तीय एवं तकनीकी सहयोग जैसे मुद्दे प्रमुख हैं।

प्री-COP31 जैसे मंच भारत को अपनी प्राथमिकताएँ स्पष्ट करने, अन्य देशों के साथ संवाद बढ़ाने और आगामी वैश्विक वार्ताओं के लिए सहमति बनाने का अवसर प्रदान करते हैं।

निष्कर्ष

भूपेंद्र यादव की पैसिफिक प्री-COP31 बैठकों में भागीदारी का महत्त्व इस बात में है कि भारत ने वैश्विक जलवायु कार्रवाई को अधिक न्यायसंगत, संतुलित और व्यावहारिक बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया।

भारत ने अनुकूलन, शमन और कार्यान्वयन के साधनों पर समान ध्यान देने, CBDR-RC सिद्धांत का सम्मान करने तथा सभी देशों की परिस्थितियों के अनुरूप जलवायु नीतियाँ तैयार करने की बात रखी।

फिजी और तुवालु जैसे प्रशांत देशों के लिए यह प्रक्रिया विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि वे जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों का सामना कर रहे हैं। आगामी COP31 में इन मुद्दों पर होने वाली चर्चा वैश्विक जलवायु सहयोग, वित्तीय सहायता और उत्सर्जन कम करने के प्रयासों की दिशा तय करने में योगदान दे सकती है।