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दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर का 75 वर्ष की आयु में निधन

Persons in News 📅 October 11, 2026

दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर का 8 अक्टूबर को गोवा में 75 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनका वास्तविक नाम विश्वनाथ पाटेकर था। वे हिंदी और मराठी सिनेमा के प्रमुख अभिनेताओं में गिने जाते थे। अपने दमदार अभिनय, संवाद अदायगी और विविध भूमिकाओं के माध्यम से उन्होंने भारतीय फिल्म जगत में विशिष्ट पहचान बनाई।

नाना पाटेकर का जन्म 1 जनवरी, 1951 को महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के मुरुड-जंजीरा में हुआ था। उन्होंने रंगमंच से अपने अभिनय करियर की शुरुआत की और बाद में फिल्मों में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया।

रंगमंच से अभिनय करियर की शुरुआत

नाना पाटेकर ने रंगमंच पर अपने अभिनय कौशल को विकसित किया। निर्देशक विजया मेहता के नाटक ‘हमीदाबाईची कोठी’ में उनके अभिनय को विशेष सराहना मिली। इस नाटक के बाद उन्हें रंगमंच पर कई अन्य महत्त्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाने का अवसर मिला।

रंगमंच के अनुभव ने उनके अभिनय को गहराई प्रदान की। उनकी संवाद अदायगी, भाव-भंगिमाओं और पात्रों को स्वाभाविक रूप से प्रस्तुत करने की क्षमता ने उन्हें अन्य अभिनेताओं से अलग पहचान दिलाई।

फिल्मी करियर की शुरुआत

नाना पाटेकर ने वर्ष 1978 में मुजफ्फर अली की फिल्म ‘गमन’ से बड़े पर्दे पर अपने अभिनय करियर की शुरुआत की। इस फिल्म में स्मिता पाटिल और फारूक शेख प्रमुख भूमिकाओं में थे।

इसके बाद उन्होंने ‘सिंहासन’, ‘गिद्ध’, ‘आज की आवाज’, ‘अंकुश’ और ‘प्रतिघात’ जैसी फिल्मों में अभिनय किया। इन फिल्मों के माध्यम से उन्होंने गंभीर और यथार्थवादी भूमिकाएँ निभाने वाले अभिनेता के रूप में अपनी पहचान मजबूत की।

‘सलाम बॉम्बे!’ से मिली व्यापक पहचान

वर्ष 1988 में मीरा नायर की फिल्म ‘सलाम बॉम्बे!’ में नाना पाटेकर ने एक स्थानीय गुंडे और नशीले पदार्थों के कारोबारी की भूमिका निभाई। यह फिल्म ऑस्कर पुरस्कार के लिए नामांकित हुई थी।

फिल्म में उनके अभिनय ने दर्शकों और फिल्म समीक्षकों का ध्यान आकर्षित किया। इस भूमिका के बाद वे आलोचकों की नजर में एक प्रभावशाली अभिनेता के रूप में उभरे और उन्हें बड़े स्तर पर पहचान मिलने लगी।

‘परिंदा’ और पहला राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार

वर्ष 1989 में प्रदर्शित विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म ‘परिंदा’ में नाना पाटेकर ने अन्ना नामक खलनायक की भूमिका निभाई। उनके प्रभावशाली अभिनय ने इस पात्र को हिंदी सिनेमा के यादगार खलनायकों में शामिल कर दिया।

इस भूमिका के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। यह उनके करियर का पहला राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार था और इससे उनकी अभिनय क्षमता को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली।

‘क्रांतिवीर’ और सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार

वर्ष 1994 की सफल फिल्म ‘क्रांतिवीर’ में नाना पाटेकर ने मुख्य भूमिका निभाई। फिल्म में उनके दमदार अभिनय और प्रभावशाली संवादों को दर्शकों ने खूब पसंद किया।

इस फिल्म में अभिनय के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। यह उनके करियर का दूसरा राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार था और मुख्य अभिनेता के रूप में उनकी प्रतिष्ठा को और मजबूत करने वाला साबित हुआ।

‘अग्निसाक्षी’ के लिए तीसरा राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार

वर्ष 1996 में प्रदर्शित फिल्म ‘अग्निसाक्षी’ में नाना पाटेकर के अभिनय को भी राष्ट्रीय स्तर पर सराहना मिली। इस फिल्म के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्रदान किया गया।

इस प्रकार, उन्होंने अपने करियर में तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त किए। यह उपलब्धि उनकी अभिनय प्रतिभा और विभिन्न प्रकार की भूमिकाओं को प्रभावशाली ढंग से निभाने की क्षमता को दर्शाती है।

विविध भूमिकाओं से बनाई अलग पहचान

नाना पाटेकर ने अपने लंबे करियर में गंभीर, भावनात्मक, नकारात्मक और हास्यपूर्ण—कई तरह की भूमिकाएँ निभाईं। उनकी प्रमुख फिल्मों में शामिल हैं:

  • ‘खामोशी: द म्यूजिकल’ — संजय लीला भंसाली की इस फिल्म में उन्होंने भावनात्मक गहराई से भरा किरदार निभाया।

  • ‘हू तू तू’ — गुलजार की इस फिल्म में उनके अभिनय को सराहना मिली।

  • ‘अपहरण’ और ‘राजनीति’ — प्रकाश झा की इन फिल्मों में उन्होंने सत्ता, अपराध और राजनीति से जुड़े प्रभावशाली पात्र निभाए।

  • ‘नटसम्राट’ — इस मराठी फिल्म में उनके अभिनय को विशेष प्रशंसा मिली।

  • ‘वेलकम’ और ‘वेलकम बैक’ — इन हास्य फिल्मों में उन्होंने गंभीर भूमिकाओं से अलग अंदाज प्रस्तुत किया।

  • ‘भूत’ — राम गोपाल वर्मा की इस फिल्म में उन्होंने एक अलग प्रकार की भूमिका निभाई।

  • ‘काला’ — इस तमिल फिल्म में भी उन्होंने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इन फिल्मों से स्पष्ट होता है कि नाना पाटेकर किसी एक प्रकार के किरदार तक सीमित नहीं रहे। वे खलनायक, गंभीर चरित्र अभिनेता, मुख्य अभिनेता और हास्य कलाकार के रूप में अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने में सफल रहे।

‘प्रहार: द फाइनल अटैक’ से निर्देशन में कदम

अपने करियर के शिखर पर नाना पाटेकर ने अभिनय से कुछ समय का विराम लेकर निर्देशन के क्षेत्र में कदम रखा। उन्होंने फिल्म ‘प्रहार: द फाइनल अटैक’ का निर्देशन किया और इसमें मराठा लाइट इन्फैंट्री के एक सैन्य अधिकारी की भूमिका भी निभाई।

इस फिल्म में सैन्य जीवन, अनुशासन और देशसेवा से जुड़े विषयों को प्रस्तुत किया गया। फिल्म उनके करियर का एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव मानी जाती है, क्योंकि इसमें उन्होंने अभिनय के साथ-साथ निर्देशन की जिम्मेदारी भी संभाली।

पद्मश्री से सम्मानित

नाना पाटेकर को भारतीय सिनेमा में उनके योगदान के लिए वर्ष 2013 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। पद्मश्री भारत के प्रमुख नागरिक सम्मानों में से एक है।

यह सम्मान उनके लंबे अभिनय करियर, रंगमंच और फिल्मों में योगदान तथा भारतीय मनोरंजन जगत में उनकी विशिष्ट पहचान को रेखांकित करता है।

वर्ष 2018 में ‘मी टू’ विवाद

वर्ष 2018 में नाना पाटेकर का नाम ‘मी टू’ अभियान के दौरान लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों के कारण चर्चा में आया। इस मामले में प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गई और प्रकरण स्थानीय अदालत में पहुँचा।

उपलब्ध विवरण के अनुसार, पर्याप्त साक्ष्य न मिलने के कारण मामले को बंद कर दिया गया। इस प्रकरण ने उस समय भारतीय फिल्म उद्योग में कार्यस्थल पर उत्पीड़न, महिलाओं की सुरक्षा और जवाबदेही से जुड़े मुद्दों पर व्यापक चर्चा को जन्म दिया।

भारतीय सिनेमा में नाना पाटेकर का योगदान

नाना पाटेकर भारतीय सिनेमा के उन अभिनेताओं में शामिल रहे, जिन्होंने अपनी विशिष्ट अभिनय शैली के माध्यम से दर्शकों पर गहरी छाप छोड़ी। उनकी सशक्त संवाद अदायगी, प्रभावशाली व्यक्तित्व और पात्रों को वास्तविक रूप देने की क्षमता उनकी प्रमुख विशेषताएँ थीं।

उन्होंने हिंदी और मराठी फिल्मों के साथ-साथ अन्य भाषाओं की फिल्मों में भी काम किया। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों और पद्मश्री जैसे सम्मानों ने भारतीय सिनेमा में उनके योगदान को मान्यता दी।

उनकी अभिनय यात्रा रंगमंच से शुरू होकर मुख्यधारा के सिनेमा तक पहुँची और उन्होंने विभिन्न विधाओं में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। उनका निधन भारतीय फिल्म जगत के लिए एक बड़ी क्षति के रूप में देखा जाएगा।