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भारत ने हेग कोर्ट के सिंधु जल संधि से जुड़े फ़ैसले को खारिज किया

  • भारत ने हेग स्थित स्थायी मध्यस्थता न्यायालय (Permanent Court of Arbitration) के सिंधु जल संधि संबंधी फैसले को खारिज कर दिया। भारत ने कहा कि सिंधु जल संधि को निलंबित रखने का उसका निर्णय अभी भी प्रभावी है।
  • भारत के अनुसार, हेग स्थित तथाकथित मध्यस्थता न्यायालय को भारत के संप्रभु निर्णयों पर फैसला देने का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है। मध्यस्थता न्यायालय ने भारत से पाकिस्तान के साथ सिंधु जल संधि को बनाए रखने का आग्रह किया था।
  • न्यायालय ने कहा था कि भारत के पास संधि को समाप्त या निलंबित करने का कोई औचित्य नहीं है। सिंधु जल संधि भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु नदी तंत्र के जल बंटवारे को नियंत्रित करने के लिए बनाई गई थी। भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि पर सितंबर 1960 में हस्ताक्षर किए गए थे।
  • 22 अप्रैल को हुए पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ कई दंडात्मक कदम उठाए थे। पहलगाम आतंकी हमले में 26 लोगों की जान गई थी। पहलगाम हमले के अगले दिन भारत ने पाकिस्तान के साथ जल बंटवारे की व्यवस्था को निलंबित कर दिया था।
  • भारत ने अपने सिद्धांत “खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते” को दोहराते हुए संधि को निलंबित रखने की बात कही। भारत ने कहा कि संधि का संचालन तब तक निलंबित रहेगा, जब तक पाकिस्तान अपनी धरती से संचालित सीमा पार आतंकी नेटवर्क को समाप्त करने के लिए सत्यापन योग्य और अपरिवर्तनीय कार्रवाई नहीं करता।
  • विदेश मंत्रालय ने हेग स्थित न्यायालय को अवैध रूप से गठित निकाय बताया। भारत ने कहा कि तथाकथित मध्यस्थता न्यायालय का गठन विश्व बैंक द्वारा सिंधु जल संधि के प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए किया गया था।
  • भारत ने इस न्यायालय के वर्तमान फैसले के साथ-साथ इसके पूर्व के सभी फैसलों और टिप्पणियों को भी खारिज किया है। भारत ने कहा कि उसने कानून की दृष्टि से इस मध्यस्थता निकाय के अस्तित्व को कभी मान्यता नहीं दी है।
  • पाकिस्तान ने भारत की किशनगंगा और रतले जलविद्युत परियोजनाओं के डिजाइन को लेकर मध्यस्थता की मांग की थी। किशनगंगा और रतले जलविद्युत परियोजनाएं सिंधु नदी तंत्र की पश्चिमी नदियों से संबंधित हैं।
  • भारत ने शुरू से ही मध्यस्थता प्रक्रिया पर आपत्ति जताई है। भारत का तर्क है कि परियोजनाओं के डिजाइन से जुड़े ऐसे विवाद तकनीकी प्रकृति के हैं।
  • भारत के अनुसार, सिंधु जल संधि के तहत ऐसे तकनीकी विवादों की जांच न्यूट्रल एक्सपर्ट द्वारा की जानी चाहिए। भारत का कहना है कि एक ही मुद्दे की एक साथ न्यूट्रल एक्सपर्ट और मध्यस्थता न्यायालय द्वारा जांच संधि के विवाद समाधान तंत्र के विरुद्ध है।
  • भारत ने कहा कि वह कभी भी इस तथाकथित मध्यस्थता न्यायालय के समक्ष उपस्थित नहीं हुआ है। भारत ने इस न्यायालय के पूर्व फैसलों और घोषणाओं को स्वीकार करने से भी इनकार किया है।
  • भारत ने स्पष्ट किया कि मध्यस्थता न्यायालय के वर्तमान या भविष्य के किसी भी फैसले का भारत द्वारा संचालित परियोजनाओं पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। भारत ने दोहराया कि सिंधु जल संधि को निलंबित रखने का उसका निर्णय अभी भी पूरी तरह प्रभावी है।