बिहार और झारखंड के बीच सोन नदी के जल बंटवारे को लेकर चल रहा लगभग 25 वर्ष पुराना विवाद समाप्त हो गया। दोनों राज्यों ने दिल्ली में अंतर-राज्यीय समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए।
समझौते के तहत बिहार को 5.75 मिलियन एकड़ फीट (MAF) सोन नदी का जल मिलेगा। झारखंड को 2 मिलियन एकड़ फीट (MAF) जल आवंटित किया गया।
यह विवाद नवंबर 2000 में झारखंड के बिहार से अलग राज्य बनने के बाद शुरू हुआ। झारखंड को सोन नदी के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र और प्रमुख सहायक नदियों का बड़ा हिस्सा मिला, जबकि निचले कृषि क्षेत्र बिहार में रह गए।
विवाद की पृष्ठभूमि वर्ष 1973 के बाणसागर समझौते से जुड़ी है। 1973 का बाणसागर समझौता मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और अविभाजित बिहार के बीच हुआ था।
इस समझौते के तहत अविभाजित बिहार को सोन नदी बेसिन के कुल जल से 7.75 MAF जल आवंटित किया गया था। बिहार के विभाजन के बाद 7.75 MAF जल को बिहार और झारखंड के बीच बांटने के लिए कोई बाध्यकारी फार्मूला नहीं था।
पिछले दो दशकों में कई अंतर-राज्यीय समितियों ने विवाद सुलझाने का प्रयास किया। जलाशय की ऊंचाई, भूमि डूब क्षेत्र और जल के सटीक बंटवारे को लेकर वार्ता बार-बार अटकती रही। समझौते से रोहतास जिले में सोन नदी पर स्थित इंद्रपुरी बैराज के पूर्ण संचालन का मार्ग प्रशस्त हुआ।
इंद्रपुरी बैराज को इंद्रपुरी बांध या सोन बैराज भी कहा जाता है। इंद्रपुरी बैराज देहरी-ऑन-सोन के पास स्थित है। यह बैराज सोन नहर नेटवर्क के लिए प्रमुख जल मोड़ संरचना के रूप में कार्य करता है।
सोन नहर नेटवर्क रोहतास, भोजपुर, बक्सर और कैमूर सहित शाहाबाद क्षेत्र की कृषि भूमि को सिंचाई जल उपलब्ध कराता है। समझौते के बाद बिहार को स्थानीय कृषि भूमि की सिंचाई के लिए अतिरिक्त जल उपलब्ध होगा। झारखंड ने भूमि डूब को कम करने के लिए निर्धारित जलाशय जल स्तर पर सहमति व्यक्त की। प्रभावित लोगों के पुनर्वास के लिए स्पष्ट प्रावधान भी किए गए हैं।
समझौते से दक्षिण बिहार के रोहतास, भोजपुर और औरंगाबाद जिलों की सिंचाई आवश्यकताओं को लाभ मिलेगा। झारखंड के सूखाग्रस्त पलामू और गढ़वा जिलों में नई नहर परियोजनाओं का मार्ग प्रशस्त होगा।
बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने समझौते को अंतिम रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय ने समझौता प्रक्रिया की अध्यक्षता की।
विवाद चुनावी मौसम में बिहार के शाहाबाद और झारखंड के पलामू क्षेत्रों में राजनीतिक मुद्दा बनता रहा। बिहार में सोन नहर प्रणाली में जल की कमी को लेकर सरकारों की आलोचना होती रही। झारखंड में इंद्रपुरी बांध की ऊंचाई बढ़ाने से कृषि भूमि के डूबने और विस्थापन की आशंका जताई जाती रही।
केंद्रीय जल आयोग (CWC) ने तकनीकी ढांचा, जल विज्ञान संबंधी अध्ययन और संशोधित बांध ऊंचाई संबंधी सुझाव उपलब्ध कराए। CWC के तकनीकी हस्तक्षेप ने दोनों राज्यों के बीच सहमति बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। नए समझौते से झारखंड के गढ़वा और पलामू क्षेत्रों की जल सुरक्षा सुनिश्चित होने की उम्मीद है।
बिहार वर्ष 1973 के समझौते को आधार बनाकर अपने जल अधिकार का दावा करता रहा।
अमित शाह के अनुसार, यह इस वर्ष राज्यों के बीच हुआ चौथा महत्वपूर्ण जल समझौता है। केंद्र सरकार ने इसे ‘टीम भारत’ और सहकारी संघवाद की भावना का उदाहरण बताया।
इस वर्ष हुए अन्य प्रमुख समझौतों में नर्मदा जल विवाद, यमुना जल परियोजना और किशाऊ बहुउद्देशीय बाँध परियोजना से जुड़े समझौते शामिल हैं।
7 जुलाई 2026 को महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेश के बीच नर्मदा परियोजना से संबंधित बकाया भुगतान के निपटारे का समझौता हुआ।
29 जून 2026 को राजस्थान और हरियाणा के बीच यमुना जल परियोजना के निर्माण एवं क्रियान्वयन को लेकर समझौता हुआ।
16 जून 2026 को किशाऊ बहुउद्देशीय बाँध परियोजना के क्रियान्वयन को लेकर हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान के बीच सहमति बनी।
बिहार–झारखंड समझौते के साथ 2000 से चला आ रहा सोन नदी जल विवाद समाप्त हुआ।
केंद्र के अनुसार, इस प्रकार के समझौते अंतरराज्यीय विवादों को संवाद और सहकारी संघवाद के माध्यम से सुलझाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।