सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की स्वीकृत अधिकतम संख्या 38 है, जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश भी शामिल हैं। तीन नए न्यायाधीशों के शपथ ग्रहण के बाद न्यायालय में केवल एक पद रिक्त रह जाता है।
यह नियुक्ति न्यायालय की न्यायिक क्षमता को मजबूत करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम है। न्यायाधीशों की पर्याप्त संख्या होने से लंबित मामलों के निपटारे, संवैधानिक विवादों की सुनवाई और नागरिकों को समय पर न्याय उपलब्ध कराने में सहायता मिल सकती है।
सर्वोच्च न्यायालय में नियुक्त किए गए तीन नए न्यायाधीश
सर्वोच्च न्यायालय में पदोन्नत किए गए तीन न्यायाधीश पहले विभिन्न उच्च न्यायालयों में मुख्य न्यायाधीश के रूप में कार्य कर रहे थे।
1. न्यायमूर्ति सुनीता अग्रवाल
न्यायमूर्ति सुनीता अग्रवाल गुजरात उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश थीं। उच्च न्यायालय में उनके न्यायिक अनुभव के आधार पर उन्हें सर्वोच्च न्यायालय में नियुक्त किया गया।
2. न्यायमूर्ति देवेंद्र कुमार उपाध्याय
न्यायमूर्ति देवेंद्र कुमार उपाध्याय दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश थे। सर्वोच्च न्यायालय में उनकी नियुक्ति से शीर्ष अदालत को एक अनुभवी न्यायाधीश की सेवाएँ प्राप्त हुई हैं।
3. न्यायमूर्ति अपरेश कुमार सिंह
न्यायमूर्ति अपरेश कुमार सिंह तेलंगाना उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश थे। उन्हें भी सर्वोच्च न्यायालय में पदोन्नत किया गया।
इन तीनों नियुक्तियों से सर्वोच्च न्यायालय की न्यायिक क्षमता में वृद्धि हुई है। उच्च न्यायालयों में मुख्य न्यायाधीश के रूप में कार्य करने का अनुभव सर्वोच्च न्यायालय में संवैधानिक, दीवानी, आपराधिक और अन्य महत्त्वपूर्ण मामलों की सुनवाई में उपयोगी हो सकता है।
सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या और स्वीकृत क्षमता
सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या संसद द्वारा कानून के माध्यम से निर्धारित की जाती है। इसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश का पद भी शामिल होता है।
दिए गए समाचार के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय की स्वीकृत न्यायाधीश संख्या हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय संशोधन अधिनियम, 2026 के बाद 34 से बढ़ाकर 38 की गई थी।
तीन नए न्यायाधीशों के शपथ ग्रहण के बाद न्यायालय की स्थिति इस प्रकार है:
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स्वीकृत क्षमता: 38 न्यायाधीश, मुख्य न्यायाधीश सहित।
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कार्यरत न्यायाधीश: 37।
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रिक्त पद: 1।
स्वीकृत क्षमता और कार्यरत संख्या में अंतर को समझना महत्त्वपूर्ण है। स्वीकृत क्षमता न्यायाधीशों की कानून द्वारा निर्धारित अधिकतम संख्या होती है, जबकि कार्यरत संख्या उन न्यायाधीशों की होती है जो वर्तमान में पद पर हैं।
न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने का क्या महत्त्व है?
सर्वोच्च न्यायालय देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था है। यहाँ संविधान की व्याख्या, केंद्र और राज्यों के बीच विवाद, मौलिक अधिकारों से संबंधित याचिकाएँ, अपीलें तथा राष्ट्रीय महत्त्व के अनेक मामलों की सुनवाई होती है।
न्यायालय में न्यायाधीशों की पर्याप्त संख्या होने से कई स्तरों पर लाभ मिल सकता है।
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लंबित मामलों के निपटारे में सहायता: अधिक न्यायाधीश होने से विभिन्न पीठों का गठन किया जा सकता है और सुनवाई की क्षमता बढ़ सकती है।
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संवैधानिक मामलों की सुनवाई: महत्त्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्नों पर सुनवाई के लिए आवश्यक पीठों का गठन अधिक सुविधाजनक हो सकता है।
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न्यायिक कार्यभार का वितरण: न्यायाधीशों के बीच मामलों का बेहतर वितरण संभव हो सकता है।
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समय पर न्याय: प्रभावी न्यायिक प्रबंधन के माध्यम से मामलों की सुनवाई और निर्णय की प्रक्रिया में तेजी लाने में सहायता मिल सकती है।
हालाँकि, केवल न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने से सभी लंबित मामलों का समाधान सुनिश्चित नहीं होता। इसके लिए न्यायालयों की प्रशासनिक क्षमता, पर्याप्त न्यायिक कर्मचारी, प्रभावी केस प्रबंधन और समयबद्ध सुनवाई भी आवश्यक हैं।
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति कैसे होती है?
भारत में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति संविधान के अनुच्छेद 124 के अंतर्गत की जाती है। अनुच्छेद 124(2) के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
हालाँकि, नियुक्ति की प्रक्रिया में न्यायपालिका और कार्यपालिका दोनों की भूमिका होती है। वर्तमान व्यवस्था में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम प्रणाली के अंतर्गत नामों पर विचार किया जाता है।
इस प्रक्रिया का उद्देश्य न्यायाधीशों की योग्यता, अनुभव, न्यायिक क्षमता और संस्थागत आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए नियुक्तियाँ करना है।
सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनने की योग्यता
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124(3) में सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनने के लिए आवश्यक योग्यताओं का उल्लेख किया गया है।
किसी व्यक्ति को निम्नलिखित में से संबंधित संवैधानिक शर्तें पूरी करनी होती हैं:
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वह भारत का नागरिक हो।
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वह कम-से-कम पाँच वर्ष तक किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश रहा हो, अथवा लगातार दो या अधिक उच्च न्यायालयों में न्यायाधीश के रूप में कार्य कर चुका हो।
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अथवा वह कम-से-कम दस वर्ष तक किसी उच्च न्यायालय में अधिवक्ता रहा हो, अथवा लगातार दो या अधिक उच्च न्यायालयों में अधिवक्ता के रूप में कार्य कर चुका हो।
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अथवा राष्ट्रपति की राय में वह एक प्रतिष्ठित विधिवेत्ता (Distinguished Jurist) हो।
इनमें से किसी एक निर्धारित योग्यता को पूरा करना आवश्यक है। संविधान में प्रतिष्ठित विधिवेत्ता के लिए भी प्रावधान रखा गया है, ताकि विधि के क्षेत्र में असाधारण ज्ञान और योगदान रखने वाले व्यक्ति पर विचार किया जा सके।
कॉलेजियम प्रणाली क्या है?
कॉलेजियम प्रणाली सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति तथा पदोन्नति के लिए अपनाई जाने वाली व्यवस्था है। इसके अंतर्गत वरिष्ठ न्यायाधीश संभावित उम्मीदवारों के नामों पर विचार करते हैं और नियुक्ति के लिए सिफारिश करते हैं।
सर्वोच्च न्यायालय में अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम में भारत के मुख्य न्यायाधीश तथा सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होते हैं।
इस प्रकार, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति संबंधी कॉलेजियम में कुल पाँच सदस्य होते हैं।
कॉलेजियम उम्मीदवारों की वरिष्ठता, न्यायिक अनुभव, योग्यता, कार्यक्षमता और अन्य प्रासंगिक पहलुओं पर विचार करता है। संबंधित उच्च न्यायालय से जुड़े वरिष्ठतम न्यायाधीश की राय भी निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार महत्त्वपूर्ण होती है।
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया
न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया में कई चरण शामिल होते हैं।
1. रिक्त पद का आकलन
जब सर्वोच्च न्यायालय में किसी न्यायाधीश का पद रिक्त होने वाला होता है या रिक्त हो जाता है, तो नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू की जाती है।
2. मुख्य न्यायाधीश द्वारा प्रस्ताव
भारत के मुख्य न्यायाधीश संभावित उम्मीदवारों के नामों पर विचार करते हैं। इस प्रक्रिया में सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों के साथ परामर्श किया जाता है।
3. कॉलेजियम की सिफारिश
कॉलेजियम उम्मीदवारों की योग्यता और अन्य प्रासंगिक पहलुओं का आकलन करके नियुक्ति के लिए नामों की सिफारिश करता है। निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार संबंधित न्यायाधीशों की राय और विचारों का लिखित रिकॉर्ड भी तैयार किया जाता है।
4. केंद्र सरकार को सिफारिश भेजना
मुख्य न्यायाधीश कॉलेजियम की सिफारिश और संबंधित अभिलेख केंद्र सरकार को भेजते हैं। इसके बाद केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्रालय नियुक्ति संबंधी प्रस्ताव पर कार्रवाई करता है।
5. प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति की भूमिका
कानून मंत्री सिफारिश को प्रधानमंत्री के समक्ष प्रस्तुत करते हैं। प्रधानमंत्री राष्ट्रपति को नियुक्ति के संबंध में सलाह देते हैं।
6. राष्ट्रपति द्वारा नियुक्ति
संवैधानिक प्रक्रिया पूरी होने पर राष्ट्रपति सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति करते हैं। नियुक्ति के बाद संबंधित न्यायाधीश पद की शपथ लेते हैं और अपना न्यायिक कार्यभार संभालते हैं।
इस पूरी प्रक्रिया में न्यायपालिका की सिफारिश और कार्यपालिका की संवैधानिक भूमिका दोनों महत्त्वपूर्ण हैं।
कॉलेजियम की सिफारिश और पारदर्शिता
दिए गए समाचार के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय के कॉलेजियम ने तीनों न्यायाधीशों के नामों की सिफारिश 28 सितंबर को की थी।
कॉलेजियम की सिफारिशों में उम्मीदवारों के न्यायिक अनुभव, वरिष्ठता, योग्यता और संबंधित उच्च न्यायालयों के प्रतिनिधित्व जैसे पहलुओं पर विचार किया जाता है।
कॉलेजियम की राय और सिफारिशों का रिकॉर्ड नियुक्ति प्रक्रिया का हिस्सा होता है। न्यायाधीशों की नियुक्ति में पारदर्शिता, योग्यता और संस्थागत स्वतंत्रता को लेकर सार्वजनिक तथा कानूनी विमर्श भी होता रहा है।
उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की सर्वोच्च न्यायालय में पदोन्नति
उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीश सर्वोच्च न्यायालय में नियुक्ति के संभावित उम्मीदवार हो सकते हैं। इस प्रक्रिया में उनके न्यायिक अनुभव, निर्णयों की गुणवत्ता, वरिष्ठता और अन्य प्रासंगिक मानदंडों पर विचार किया जाता है।
उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों को संवैधानिक मामलों, दीवानी विवादों, आपराधिक मामलों, प्रशासनिक कानून और नागरिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर काम करने का अनुभव मिलता है।
सर्वोच्च न्यायालय में नियुक्ति के बाद न्यायाधीश राष्ट्रीय महत्त्व के मामलों, संविधान की व्याख्या और उच्च न्यायालयों के निर्णयों के विरुद्ध अपीलों की सुनवाई में भाग लेते हैं।
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति
भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश 65 वर्ष की आयु पूरी करने पर सेवानिवृत्त होते हैं। यह व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 124(2) में निर्धारित है।
इसके विपरीत, उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की आयु 62 वर्ष है। इस अंतर का उद्देश्य दोनों स्तरों की न्यायिक संस्थाओं के संवैधानिक ढाँचे के अनुरूप सेवा अवधि निर्धारित करना है।
न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की आयु का नियुक्ति प्रक्रिया पर भी प्रभाव पड़ता है, क्योंकि रिक्तियों का अनुमान लगाकर समय पर नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू करना आवश्यक होता है।
सर्वोच्च न्यायालय में तदर्थ न्यायाधीशों और सेवानिवृत्त न्यायाधीशों से संबंधित प्रावधान
भारतीय संविधान में कुछ विशेष परिस्थितियों में न्यायालय की कार्यक्षमता बनाए रखने के लिए अतिरिक्त व्यवस्थाएँ भी की गई हैं।
अनुच्छेद 127 के अंतर्गत आवश्यक परिस्थितियों में किसी उच्च न्यायालय के योग्य न्यायाधीश को सर्वोच्च न्यायालय में तदर्थ (Ad-hoc) न्यायाधीश के रूप में बैठने और कार्य करने के लिए नियुक्त किया जा सकता है। इसके लिए संविधान में निर्धारित प्रक्रिया और आवश्यक सहमतियों का पालन करना होता है।
इसके अतिरिक्त, अनुच्छेद 128 के अंतर्गत भारत के मुख्य न्यायाधीश राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से किसी पूर्व न्यायाधीश को सर्वोच्च न्यायालय की बैठक में भाग लेने और न्यायाधीश के रूप में कार्य करने के लिए अनुरोध कर सकते हैं, बशर्ते संबंधित संवैधानिक शर्तें पूरी हों।
इन प्रावधानों का उद्देश्य विशेष परिस्थितियों में न्यायालय के कामकाज को सुचारु बनाए रखने में सहायता करना है।
निष्कर्ष
सर्वोच्च न्यायालय में तीन नए न्यायाधीशों की नियुक्ति न्यायपालिका की कार्यक्षमता मजबूत करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम है। इससे न्यायालय की कार्यरत संख्या बढ़कर 37 हो गई है, जबकि स्वीकृत क्षमता 38 न्यायाधीशों की है।
न्यायाधीशों की नियुक्ति संविधान के अनुच्छेद 124 के अंतर्गत होती है और इसमें कॉलेजियम की सिफारिश, केंद्र सरकार की भूमिका तथा राष्ट्रपति द्वारा नियुक्ति की संवैधानिक प्रक्रिया शामिल होती है।
यह विषय भारतीय संविधान, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, कॉलेजियम प्रणाली और न्यायिक प्रशासन की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों के लिए अनुच्छेद 124, न्यायाधीशों की योग्यता, नियुक्ति प्रक्रिया, सेवानिवृत्ति की आयु और कॉलेजियम की संरचना विशेष रूप से उपयोगी तथ्य हैं।