भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की एक सलाहकार समिति ने राज्यों की बढ़ती बजटीय आवश्यकताओं और अस्थायी नकदी की कमी को ध्यान में रखते हुए, राज्यों के लिए तरीके और साधन अग्रिम (WMA) की कुल सीमा में 11.2 प्रतिशत की वृद्धि करने की सिफारिश की है। इसके अंतर्गत कुल सीमा को वर्तमान ₹61,008 करोड़ से बढ़ाकर ₹67,839 करोड़ करने का प्रस्ताव दिया गया है।
WMA एक अल्पकालिक वित्तीय सुविधा है, जिसके माध्यम से भारतीय रिजर्व बैंक राज्य सरकारों को उस समय धन उपलब्ध कराता है, जब उनके पास सरकारी व्यय पूरा करने के लिए अस्थायी रूप से पर्याप्त नकदी उपलब्ध नहीं होती है, जबकि राजस्व प्राप्तियाँ बाद में होने की संभावना होती है।
इस सुविधा का मुख्य उद्देश्य राज्यों के नकदी प्रवाह में अस्थायी असंतुलन को दूर करना, सरकारी भुगतान सुचारु बनाए रखना तथा वित्तीय प्रबंधन को अधिक प्रभावी बनाना है।
WMA क्या है?
Ways and Means Advances (WMA) का हिंदी अर्थ ‘तरीके और साधन अग्रिम’ है। यह भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा राज्य सरकारों को दी जाने वाली अल्पकालिक वित्तीय सहायता है।
राज्य सरकारों को विभिन्न स्रोतों से राजस्व प्राप्त होता है, जैसे राज्य वस्तु एवं सेवा कर (SGST), राज्य का अपना कर राजस्व, केंद्रीय करों में हिस्सा तथा केंद्र सरकार से मिलने वाले अनुदान। दूसरी ओर, वेतन, पेंशन, सब्सिडी, विकास योजनाओं और अन्य सरकारी सेवाओं पर नियमित रूप से व्यय करना पड़ता है।
कभी-कभी सरकारी प्राप्तियों और व्यय के समय में अंतर होने के कारण नकदी की अस्थायी कमी उत्पन्न हो जाती है। ऐसी स्थिति में राज्य सरकार RBI से WMA के अंतर्गत अग्रिम राशि प्राप्त कर सकती है।
उदाहरण के लिए, यदि किसी राज्य को महीने के प्रारंभ में कर्मचारियों के वेतन और पेंशन का भुगतान करना है, लेकिन कर राजस्व की बड़ी प्राप्ति महीने के अंत में होने वाली है, तो इस बीच की नकदी आवश्यकता को पूरा करने के लिए WMA का उपयोग किया जा सकता है।
यह सुविधा राज्य सरकार को स्थायी वित्तीय घाटे की भरपाई के लिए नहीं, बल्कि अस्थायी नकदी असंतुलन के प्रबंधन के लिए दी जाती है।
राज्यों को RBI द्वारा वित्तीय सहायता देने का आधार
भारतीय रिजर्व बैंक राज्य सरकारों के बैंकर और ऋण प्रबंधक के रूप में कार्य करता है। यह 28 राज्यों और तीन केंद्रशासित प्रदेशों—पुडुचेरी, जम्मू-कश्मीर तथा दिल्ली—के लिए बैंकिंग और ऋण प्रबंधन से संबंधित कार्य करता है।
RBI अधिनियम, 1934 की धारा 17(5) के अंतर्गत राज्यों को अस्थायी नकदी आवश्यकताओं के प्रबंधन के लिए वित्तीय सुविधा प्रदान की जाती है।
इस व्यवस्था के माध्यम से RBI राज्यों के नकदी प्रवाह को सुचारु बनाने में सहायता करता है। इससे सरकारों को नियमित भुगतान करने, आवश्यक सार्वजनिक सेवाएँ जारी रखने और अल्पकालिक वित्तीय दबावों का सामना करने में मदद मिलती है।
WMA योजना का ऐतिहासिक विकास
भारतीय रिजर्व बैंक वर्ष 1938 से राज्य सरकारों को WMA की सुविधा प्रदान कर रहा है।
प्रारंभ में अग्रिम की सीमाएँ राज्यों के न्यूनतम नकदी शेष से जुड़ी हुई थीं। बाद में इन सीमाओं को राज्य सरकारों के बजट से संबंधित मदों, विशेषकर व्यय और राजस्व प्राप्तियों, के आधार पर निर्धारित करने की दिशा में बदलाव किया गया।
1999 के प्रारंभ तक राज्यों की WMA सीमाओं की समय-समय पर समीक्षा की जाती थी। इन सीमाओं को संशोधित करते समय निम्नलिखित पहलुओं पर विचार किया जाता था:
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राज्यों की अनुमानित वित्तीय आवश्यकताएँ।
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राजकोषीय, वित्तीय और संस्थागत परिस्थितियों में होने वाले बदलाव।
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मौद्रिक प्रबंधन और राजकोषीय प्रबंधन के उद्देश्य।
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राज्यों की नकदी उपलब्धता और भुगतान संबंधी आवश्यकताएँ।
वर्ष 1997 में राज्य वित्त सचिवों (Conference of State Finance Secretaries) के सम्मेलन की शुरुआत ने WMA व्यवस्था की समीक्षा और उसमें बदलाव करने की प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित बनाने में भूमिका निभाई।
इसके बाद RBI समय-समय पर सलाहकार समितियों का गठन करने लगा, ताकि WMA की मौजूदा व्यवस्था का आकलन किया जा सके और राज्यों की बदलती वित्तीय आवश्यकताओं के अनुसार सुधारों की सिफारिश की जा सके।
राज्यों को मिलने वाली वित्तीय सहायता के तीन प्रमुख साधन
राज्य सरकारों की अल्पकालिक नकदी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए RBI की वित्तीय सहायता व्यवस्था में तीन प्रमुख साधन शामिल हैं:
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तरीके और साधन अग्रिम (Ways and Means Advances — WMA)।
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विशेष आहरण सुविधा (Special Drawing Facility — SDF)।
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अधिविकर्ष (Overdraft — OD)।
इन तीनों सुविधाओं की प्रकृति, पात्रता और उपयोग की परिस्थितियाँ अलग-अलग हैं।
1. तरीके और साधन अग्रिम (Ways and Means Advances — WMA)
WMA राज्यों को दी जाने वाली सामान्य अल्पकालिक वित्तीय सुविधा है। इसका उद्देश्य सरकारी प्राप्तियों और भुगतान के बीच उत्पन्न अस्थायी अंतर को पूरा करना है।
प्रमुख विशेषताएँ
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शुरुआत: RBI वर्ष 1938 से राज्य सरकारों को यह सुविधा प्रदान कर रहा है।
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उद्देश्य: अस्थायी नकदी की कमी को दूर करना।
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सीमा: प्रत्येक राज्य के लिए निर्धारित सीमा के भीतर अग्रिम उपलब्ध कराया जाता है।
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चुकौती अवधि: प्रत्येक अग्रिम को दिए जाने की तारीख से अधिकतम तीन महीने के भीतर चुकाना होता है।
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समीक्षा: राज्यों की वित्तीय परिस्थितियों और आवश्यकताओं को देखते हुए इसकी सीमा की समय-समय पर समीक्षा की जाती है।
WMA की सीमा निर्धारित करते समय राज्यों के राजस्व, व्यय, बजट के आकार और नकदी संबंधी आवश्यकताओं को ध्यान में रखा जाता है।
यह सुविधा राज्यों को अल्पकालिक नकदी प्रबंधन में सहायता देती है, लेकिन इसका उद्देश्य लगातार बने रहने वाले राजकोषीय घाटे या दीर्घकालिक वित्तीय संकट का समाधान करना नहीं है।
2. विशेष आहरण सुविधा (Special Drawing Facility — SDF)
विशेष आहरण सुविधा राज्यों को उपलब्ध कराई जाने वाली एक अन्य अल्पकालिक वित्तीय व्यवस्था है। इसका ऐतिहासिक आधार वर्ष 1953 में शुरू की गई विशेष तरीके और साधन अग्रिम (Special Ways and Means Advances — SWMA) योजना में मिलता है।
प्रारंभ में इस योजना के अंतर्गत राज्यों को भारत सरकार की प्रतिभूतियों को जमानत के रूप में रखकर वित्तीय सहायता दी जाती थी। जून 2014 में SWMA का नाम बदलकर Special Drawing Facility (SDF) कर दिया गया।
वर्तमान व्यवस्था में राज्यों को निर्धारित पात्र निवेशों के आधार पर यह सुविधा उपलब्ध कराई जाती है।
इनमें मुख्य रूप से निम्नलिखित शामिल हैं:
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समेकित ऋण शोधन निधि (Consolidated Sinking Fund — CSF): सरकारी देनदारियों के पुनर्भुगतान के लिए निर्धारित निधि।
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गारंटी मोचन निधि (Guarantee Redemption Fund — GRF): राज्य सरकार द्वारा दी गई गारंटियों से उत्पन्न संभावित देनदारियों के प्रबंधन के लिए रखी गई निधि।
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नीलामी राजकोषीय बिल (Auction Treasury Bills — ATBs): पात्रता के अनुसार राज्यों के निवेश में शामिल सरकारी राजकोषीय बिल।
इन पात्र निवेशों के आधार पर राज्यों को अपेक्षाकृत रियायती ब्याज दर पर अल्पकालिक वित्तीय सहायता दी जा सकती है।
SDF की विशेषता यह है कि यह निर्धारित पात्र निवेशों से जुड़ी होती है। इससे राज्यों को उपलब्ध वित्तीय संसाधनों का उपयोग किए बिना, पात्र निवेशों के आधार पर नकदी की आवश्यकता पूरी करने का अवसर मिलता है।
3. अधिविकर्ष (Overdraft — OD)
अधिविकर्ष वह सुविधा है, जिसके अंतर्गत राज्य सरकार अपनी उपलब्ध निर्धारित वित्तीय सीमा समाप्त होने के बाद भी कुछ समय के लिए अतिरिक्त धन प्राप्त कर सकती है, बशर्ते वह लागू नियमों और प्रतिबंधों के अंतर्गत हो।
राज्यों के लिए OD की सुविधा तब प्रासंगिक होती है, जब उनकी नकदी की आवश्यकता SDF और WMA के माध्यम से पूरी नहीं हो पाती।
वर्ष 1972 से राज्यों द्वारा OD के उपयोग को सीमित दिनों तक नियंत्रित किया जाता रहा है। इसकी अधिकतम अवधि और संबंधित शर्तें समय-समय पर निर्धारित की जाती हैं।
OD का उद्देश्य भी अस्थायी नकदी की कमी को दूर करना है। इसे नियमित वित्तपोषण का विकल्प नहीं माना जाता, क्योंकि इसके लगातार उपयोग से राज्य की नकदी और वित्तीय स्थिति पर दबाव बढ़ सकता है।
SDF, WMA और OD में अंतर
| आधार | SDF | WMA | OD |
|---|---|---|---|
| पूरा नाम | Special Drawing Facility | Ways and Means Advances | Overdraft |
| प्रमुख उद्देश्य | पात्र निवेशों के आधार पर अल्पकालिक सहायता | अस्थायी नकदी असंतुलन दूर करना | निर्धारित सुविधाओं की सीमा समाप्त होने पर अतिरिक्त नकदी उपलब्ध कराना |
| आधार | पात्र निवेश, जैसे CSF, GRF और ATBs | निर्धारित WMA सीमा | लागू OD नियम और प्रतिबंध |
| उपयोग | पात्रता और उपलब्ध निवेश के अनुसार | स्वीकृत सीमा के भीतर | WMA सीमा समाप्त होने के बाद |
| प्रकृति | अल्पकालिक, निवेश-आधारित | अल्पकालिक अग्रिम | अधिक प्रतिबंधित अतिरिक्त वित्तीय सुविधा |
राज्यों की वित्तीय सहायता व्यवस्था में सामान्यतः पहले पात्र निवेशों के आधार पर SDF का उपयोग किया जाता है। इसके बाद WMA के माध्यम से नकदी की आवश्यकता पूरी की जाती है। यदि WMA की सीमा समाप्त हो जाती है, तो लागू नियमों के अनुसार OD की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
WMA और OD पर लगने वाली ब्याज दरें समय-समय पर RBI द्वारा गठित विभिन्न समितियों और समूहों की सिफारिशों के आधार पर निर्धारित की जाती रही हैं।
WMA सीमा की समीक्षा के लिए RBI की सलाहकार समिति
भारतीय रिजर्व बैंक ने 30 अप्रैल 2026 को राज्यों के लिए WMA व्यवस्था की समीक्षा करने के उद्देश्य से एक सलाहकार समिति का गठन किया।
इस समिति की अध्यक्षता आई. एस. एन. प्रसाद (I.S.N. Prasad) ने की, जो कर्नाटक सरकार के पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव रह चुके हैं।
समिति को राज्यों की वित्तीय परिस्थितियों, बजट के आकार और नकदी की आवश्यकताओं का आकलन करने के साथ-साथ WMA की मौजूदा व्यवस्था में आवश्यक बदलावों पर विचार करने का दायित्व दिया गया।
समिति ने विशेष रूप से सोलहवें वित्त आयोग (Sixteenth Finance Commission — FC-XVI) की सिफारिशों का अध्ययन किया। इसका उद्देश्य यह समझना था कि वित्त आयोग की सिफारिशों का राज्यों की वित्तीय स्थिति और अल्पकालिक तरलता संबंधी आवश्यकताओं पर क्या प्रभाव पड़ सकता है।
राज्यों के बजट के आकार में वृद्धि और सरकारी व्यय की बढ़ती आवश्यकताओं को देखते हुए समिति ने WMA की कुल सीमा बढ़ाने की सिफारिश की।
WMA सीमा में 11.2 प्रतिशत वृद्धि की सिफारिश
समिति की प्रमुख सिफारिश राज्यों के लिए WMA की कुल सीमा को वर्तमान ₹61,008 करोड़ से बढ़ाकर ₹67,839 करोड़ करना है।
राज्यों की कुल WMA सीमा में प्रस्तावित बदलाव
वर्तमान सीमा – ₹61,008 करोड़
प्रस्तावित सीमा – ₹67,839 करोड़
कुल वृद्धि – ₹6,831 करोड़
प्रतिशत वृद्धि – 11.2%
इस वृद्धि का अर्थ है कि राज्यों के लिए उपलब्ध WMA की समग्र सीमा में ₹6,831 करोड़ की अतिरिक्त गुंजाइश होगी।
इससे राज्यों को राजस्व प्राप्तियों और सरकारी भुगतान के बीच अस्थायी अंतर होने पर अधिक वित्तीय सहायता उपलब्ध हो सकेगी।
हालाँकि, कुल सीमा में वृद्धि का अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक राज्य को स्वतः अतिरिक्त राशि मिल जाएगी। राज्यवार सीमा निर्धारित करने की पद्धति, संबंधित नियमों और वास्तविक नकदी आवश्यकताओं के अनुसार सहायता उपलब्ध होगी।
नई WMA सीमा निर्धारित करने का आधार
समिति ने संशोधित WMA सीमा की गणना के लिए राज्यों की समायोजित राजस्व प्राप्तियों (Adjusted Revenue Receipts) को आधार बनाया।
इसकी गणना में निम्नलिखित मदों को ध्यान में रखा गया:
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राज्यों की कुल राजस्व प्राप्तियाँ।
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लॉटरी से संबंधित व्यय को राजस्व प्राप्तियों से घटाना।
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प्राकृतिक आपदाओं पर शुद्ध व्यय को जोड़ना, यदि यह सकारात्मक हो।
इसे सरल रूप में इस प्रकार समझा जा सकता है:
समायोजित राजस्व प्राप्तियाँ = राजस्व प्राप्तियाँ − लॉटरी-संबंधी व्यय + प्राकृतिक आपदाओं पर शुद्ध व्यय (यदि सकारात्मक हो)।
इस गणना के लिए वित्त वर्ष 2022-23 से 2024-25 तक के लेखा-स्तर के आँकड़ों का उपयोग किया गया।
लेखा-स्तर के आँकड़ों का उपयोग करने से राज्यों की वास्तविक राजस्व प्राप्तियों और संबंधित व्यय का अधिक विस्तृत आकलन किया जा सकता है। इससे WMA सीमा निर्धारित करने का आधार केवल बजट अनुमान के बजाय वास्तविक वित्तीय आँकड़ों से जुड़ता है।
समायोजित राजस्व प्राप्तियों को आधार बनाने का उद्देश्य राज्यों की वित्तीय क्षमता और नकदी संबंधी आवश्यकताओं के बीच बेहतर संबंध स्थापित करना है।
राज्यों की बढ़ती बजटीय आवश्यकताओं से WMA की जरूरत क्यों बढ़ रही है?
समय के साथ राज्यों के बजट का आकार बढ़ा है। इसके साथ ही सरकारी योजनाओं, बुनियादी ढाँचे, सामाजिक कल्याण, वेतन, पेंशन और सार्वजनिक सेवाओं पर होने वाला व्यय भी बढ़ सकता है।
लेकिन सरकारी प्राप्तियों और व्यय का समय हमेशा एक जैसा नहीं होता। कई बार भुगतान की आवश्यकता पहले उत्पन्न हो जाती है, जबकि राजस्व बाद में प्राप्त होता है।
ऐसी परिस्थितियों में WMA की पर्याप्त सीमा होना महत्वपूर्ण है।
इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:
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बढ़ता सरकारी व्यय: राज्यों को नियमित प्रशासनिक और विकास संबंधी खर्चों के लिए अधिक नकदी की आवश्यकता हो सकती है।
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राजस्व प्राप्तियों में समय का अंतर: कर राजस्व और अन्य प्राप्तियाँ अलग-अलग समय पर आती हैं, जबकि सरकारी भुगतान लगातार करने पड़ते हैं।
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विकास योजनाओं का संचालन: योजनाओं और सार्वजनिक परियोजनाओं पर समय पर भुगतान करने के लिए पर्याप्त तरलता आवश्यक है।
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प्राकृतिक आपदाओं का प्रभाव: आपदा की स्थिति में तत्काल व्यय बढ़ सकता है, जबकि संबंधित राजस्व या सहायता बाद में प्राप्त हो सकती है।
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बेहतर नकदी प्रबंधन: पर्याप्त WMA सीमा होने से राज्य सरकारों को अल्पकालिक नकदी की कमी के दौरान अधिक लचीलापन मिल सकता है।
सोलहवें वित्त आयोग की सिफारिशों से संबंध
समिति ने सोलहवें वित्त आयोग (FC-XVI) की सिफारिशों का अध्ययन करते हुए उनके संभावित वित्तीय प्रभावों पर विचार किया।
वित्त आयोग की सिफारिशें केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय संसाधनों के वितरण तथा राज्यों की वित्तीय स्थिति से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं को प्रभावित कर सकती हैं।
इन सिफारिशों के प्रभाव का आकलन करते समय राज्यों की नकदी आवश्यकताओं पर भी ध्यान देना आवश्यक है। यदि राज्यों के बजट और भुगतान संबंधी आवश्यकताएँ बढ़ती हैं, तो अल्पकालिक वित्तीय सहायता की मांग भी बढ़ सकती है।
इसी संदर्भ में सलाहकार समिति ने WMA की समग्र सीमा बढ़ाने की सिफारिश की। इसका उद्देश्य राज्यों की बदलती वित्तीय आवश्यकताओं के अनुरूप RBI की नकदी सहायता व्यवस्था को अधिक उपयुक्त बनाना है।
WMA सीमा बढ़ने के संभावित लाभ
1. सरकारी भुगतान में निरंतरता: राज्यों को वेतन, पेंशन और अन्य आवश्यक भुगतानों के लिए अस्थायी नकदी की कमी का सामना करने में सहायता मिल सकती है।
2. नकदी प्रबंधन में सुधार: राजस्व प्राप्तियों और व्यय के बीच समयगत अंतर को संभालना आसान हो सकता है।
3. वित्तीय लचीलापन: राज्य सरकारों को अल्पकालिक नकदी संबंधी दबावों का सामना करने के लिए अतिरिक्त गुंजाइश मिल सकती है।
4. विकास कार्यों में सहायता: अस्थायी नकदी की कमी के कारण आवश्यक सरकारी भुगतान में होने वाली देरी को कम करने में मदद मिल सकती है।
5. वित्तीय प्रबंधन की बेहतर योजना: वास्तविक राजस्व आँकड़ों के आधार पर सीमा तय करने से राज्यों की वित्तीय आवश्यकताओं के आकलन को अधिक व्यवस्थित बनाया जा सकता है।
WMA सीमा बढ़ाने की सीमाएँ और चुनौतियाँ
WMA सीमा बढ़ाने से राज्यों को नकदी प्रबंधन में सहायता मिलेगी, लेकिन यह राज्य की सभी वित्तीय समस्याओं का समाधान नहीं है।
यदि किसी राज्य की राजस्व प्राप्तियाँ लगातार उसके व्यय से कम रहती हैं, तो केवल अल्पकालिक अग्रिम उपलब्ध कराने से संरचनात्मक राजकोषीय घाटा दूर नहीं होगा।
इसके अतिरिक्त, WMA और OD का अत्यधिक उपयोग ब्याज संबंधी लागत बढ़ा सकता है तथा नकदी प्रबंधन पर दबाव डाल सकता है। इसलिए राज्यों को अपने राजस्व और व्यय के बीच संतुलन बनाए रखने, व्यय की उचित योजना बनाने और उपलब्ध वित्तीय संसाधनों का प्रभावी उपयोग करने की आवश्यकता होती है।
इस प्रकार, WMA को एक अस्थायी वित्तीय प्रबंधन साधन के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि नियमित आय के विकल्प के रूप में।
परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण तथ्य
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संबंधित संस्था: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI)।
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प्रमुख उद्देश्य: राज्यों की अस्थायी नकदी की कमी को दूर करना।
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कानूनी आधार: RBI अधिनियम, 1934 की धारा 17(5)।
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WMA की शुरुआत: वर्ष 1938।
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अग्रिम चुकाने की अधिकतम अवधि: प्रत्येक अग्रिम की तारीख से तीन महीने।
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विशेष आहरण सुविधा की ऐतिहासिक शुरुआत: वर्ष 1953 में SWMA योजना।
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SWMA का नाम परिवर्तन: जून 2014 में SDF।
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OD पर प्रतिबंध: वर्ष 1972 से राज्यों के OD उपयोग को सीमित दिनों तक नियंत्रित किया गया।
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सलाहकार समिति का गठन: 30 अप्रैल 2026।
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समिति के अध्यक्ष: आई. एस. एन. प्रसाद, कर्नाटक सरकार के पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव।
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वर्तमान कुल WMA सीमा: ₹61,008 करोड़।
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प्रस्तावित कुल WMA सीमा: ₹67,839 करोड़।
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प्रस्तावित वृद्धि: ₹6,831 करोड़ अथवा 11.2 प्रतिशत।
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संशोधित सीमा के निर्धारण का आधार: वित्त वर्ष 2022-23 से 2024-25 के लेखा-स्तर के आँकड़ों पर आधारित समायोजित राजस्व प्राप्तियाँ।
निष्कर्ष
राज्यों के लिए WMA सीमा में 11.2 प्रतिशत वृद्धि की सिफारिश का मुख्य उद्देश्य बढ़ते बजट और सरकारी भुगतान की आवश्यकताओं के अनुरूप अल्पकालिक नकदी सहायता को मजबूत करना है। ₹61,008 करोड़ से ₹67,839 करोड़ तक प्रस्तावित वृद्धि राज्यों को राजस्व प्राप्तियों और व्यय के बीच अस्थायी अंतर का प्रबंधन करने में अधिक लचीलापन प्रदान कर सकती है।
SDF, WMA और OD की संयुक्त व्यवस्था राज्यों की नकदी आवश्यकताओं को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। फिर भी, दीर्घकालिक वित्तीय स्थिरता के लिए राजस्व वृद्धि, व्यय अनुशासन, प्रभावी बजट प्रबंधन और जिम्मेदार ऋण प्रबंधन आवश्यक बने रहते हैं।