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सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला: NSA के तहत हिरासत केवल पुलिस के सामने दिए गए कबूलनामे पर आधारित नहीं हो सकती

Legal 📅 October 11, 2026

भारत के सुप्रीम कोर्ट ने 29 सितंबर 2026 को Mulla Afroz v. Union of India मामले में स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (National Security Act—NSA), 1980 के तहत निवारक हिरासत में रखने का आधार केवल पुलिस अधिकारी के सामने दिया गया कथित कबूलनामा नहीं हो सकता। अदालत ने कहा कि यदि ऐसे कबूलनामे के समर्थन में कोई स्वतंत्र और ठोस सामग्री नहीं है, तो उसके आधार पर निवारक हिरासत को कायम नहीं रखा जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार पर ₹10 लाख का खर्च (costs) भी लगाया और हिरासत आदेश तथा उसकी पुष्टि को रद्द कर दिया। हालांकि, अदालत ने संबंधित आपराधिक मामलों के गुण-दोष पर कोई अंतिम राय नहीं दी।

मामला क्या था?

यह मामला उत्तर प्रदेश के संभल में 24 नवंबर 2024 को हुई हिंसा से जुड़ा था। उस समय शाही जामा मस्जिद के न्यायालय-आदेशित सर्वेक्षण के दौरान तनाव बढ़ गया था।

सर्वेक्षण के दूसरे चरण के दौरान प्रदर्शन कर रहे स्थानीय लोगों और सुरक्षा बलों के बीच हिंसक झड़प हुई। इस घटना में चार लोगों की मृत्यु हुई और कई लोग घायल हुए। घटना के बाद कई प्राथमिकी दर्ज की गईं।

इसी मामले में मुल्ला अफरोज को जनवरी 2025 में गिरफ्तार किया गया। सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार, वह मुख्य घटना वाली प्राथमिकी में नामजद नहीं था और बाद में उससे संबंधित अन्य मामलों में भी उसे आरोपी बनाया गया। हिरासत के दौरान पुलिस के सामने उसके कथित कबूलनामे को महत्वपूर्ण सामग्री के रूप में इस्तेमाल किया गया।

NSA के तहत हिरासत का आदेश

मुल्ला अफरोज के खिलाफ 13 अक्टूबर 2025 को संभल के जिला मजिस्ट्रेट ने NSA की धारा 3(2) के तहत निवारक हिरासत का आदेश पारित किया।

इस आदेश का उद्देश्य यह था कि उसे ऐसी गतिविधियों में दोबारा शामिल होने से रोका जा सके जिन्हें प्रशासन ने लोक व्यवस्था (Public Order) के लिए हानिकारक माना था।

बाद में हिरासत आदेश की पुष्टि भी की गई। अफरोज ने इस आदेश को चुनौती दी, लेकिन इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जून 2026 में उसकी याचिका खारिज कर दी। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने कहा कि निवारक हिरासत एक असाधारण शक्ति है। इसे सामान्य आपराधिक प्रक्रिया के विकल्प के रूप में आसानी से इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

अदालत ने कहा कि संविधान व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को महत्वपूर्ण सुरक्षा प्रदान करता है। इसलिए निवारक हिरासत जैसे असाधारण उपाय का इस्तेमाल अत्यंत सावधानी और केवल वास्तविक आवश्यकता वाली परिस्थितियों में किया जाना चाहिए।

पुलिस के सामने दिए गए कबूलनामे पर आपत्ति क्यों?

सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की जगह लागू भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (Bharatiya Sakshya Adhiniyam—BSA) की धारा 23 और संविधान के अनुच्छेद 20(3) के संदर्भ में इस मुद्दे की जांच की।

अदालत ने कहा कि पुलिस अधिकारी के सामने किया गया कबूलनामा कानून की नजर में अत्यधिक संदेहास्पद माना जाता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि पुलिस हिरासत में बयान दबाव, धमकी, प्रलोभन या जबरदस्ती के प्रभाव में दिए जाने की आशंका हो सकती है।

इसलिए यदि ऐसा कबूलनामा किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने के लिए आपराधिक मुकदमे में ही पर्याप्त आधार नहीं बन सकता, तो केवल उसी के आधार पर निवारक हिरासत को उचित ठहराने के लिए और भी अधिक सावधानी आवश्यक है।

केवल कबूलनामा ही आधार हो तो हिरासत टिक नहीं सकती

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत स्थापित किया कि:

पुलिस अधिकारी के सामने दिया गया कबूलनामा, अपने आप में और किसी स्वतंत्र पुष्टिकारक सामग्री के अभाव में, निवारक हिरासत का आधार नहीं बन सकता।

अर्थात, यदि प्रशासन के पास किसी व्यक्ति के खिलाफ अन्य स्वतंत्र और प्रासंगिक सामग्री मौजूद है, तो अदालत उस सामग्री की वैधता और पर्याप्तता की जांच कर सकती है।

लेकिन यदि हिरासत आदेश का मुख्य या एकमात्र आधार पुलिस के सामने दिया गया कथित कबूलनामा है, तो ऐसा आदेश कानूनी जांच में टिक नहीं सकता।

अनुच्छेद 20(3) का महत्व

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 20(3) व्यक्ति को स्वयं के विरुद्ध गवाही देने के लिए मजबूर किए जाने से सुरक्षा देता है।

सरल शब्दों में, किसी आरोपी को इस तरह मजबूर नहीं किया जा सकता कि वह स्वयं अपने खिलाफ आपराधिक साक्ष्य उपलब्ध कराए।

सुप्रीम कोर्ट ने इस संवैधानिक सुरक्षा को पुलिस के सामने किए गए कबूलनामे के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना और कहा कि ऐसे बयान के इस्तेमाल को अत्यधिक सावधानी से देखा जाना चाहिए।

निवारक हिरासत और सामान्य गिरफ्तारी में अंतर

निवारक हिरासत (Preventive Detention) और सामान्य आपराधिक गिरफ्तारी एक जैसी नहीं हैं।

सामान्य आपराधिक प्रक्रिया में किसी व्यक्ति को कथित अपराध के संबंध में गिरफ्तार करके उसके खिलाफ मुकदमा चलाया जाता है। अदालत में अभियोजन को आरोपों को कानून के अनुसार साबित करना होता है।

इसके विपरीत, निवारक हिरासत का मूल उद्देश्य किसी व्यक्ति को भविष्य में ऐसी गतिविधि करने से रोकना है जिसे राज्य सुरक्षा या लोक व्यवस्था के लिए हानिकारक माना जाता है।

इसलिए निवारक हिरासत को दंड के रूप में नहीं, बल्कि भविष्य के संभावित खतरे को रोकने के उपाय के रूप में देखा जाता है।

NSA क्या है?

National Security Act, 1980 (राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, 1980) भारत का एक निवारक हिरासत कानून है।

इसके तहत केंद्र या राज्य सरकार, निर्धारित कानूनी परिस्थितियों में, किसी व्यक्ति को हिरासत में रखने का आदेश दे सकती है यदि संबंधित प्राधिकारी को संतुष्टि हो कि ऐसा करना आवश्यक है।

NSA के तहत हिरासत का उद्देश्य मुख्य रूप से निम्नलिखित मामलों में संभावित हानिकारक गतिविधियों को रोकना है:

  • भारत की रक्षा से संबंधित सुरक्षा
  • भारत की सुरक्षा
  • राज्य की सुरक्षा
  • लोक व्यवस्था बनाए रखना
  • समुदाय के लिए आवश्यक आपूर्ति और सेवाओं को बनाए रखना

NSA में ‘Preventive Detention’ का अर्थ

Preventive Detention का अर्थ है—किसी संभावित हानिकारक गतिविधि को भविष्य में होने से रोकने के उद्देश्य से हिरासत।

यह किसी व्यक्ति को उसके पहले से किए गए अपराध के लिए सजा देने की अवधारणा से अलग है।

यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निवारक हिरासत की शक्ति का प्रयोग करते समय प्रशासन को यह दिखाना आवश्यक है कि हिरासत वास्तव में भविष्य में होने वाली संभावित गतिविधि को रोकने के लिए आवश्यक है। केवल पहले से चल रहे आपराधिक मामले को मजबूत करने के लिए NSA का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।

NSA के तहत हिरासत की अधिकतम अवधि

NSA के तहत निवारक हिरासत की अवधि सामान्यतः अधिकतम 12 महीने तक हो सकती है, हालांकि कानून के अनुसार इसे इससे पहले भी समाप्त किया जा सकता है।

इसका मतलब यह नहीं है कि प्रत्येक मामले में व्यक्ति को अनिवार्य रूप से 12 महीने तक हिरासत में रखा जाएगा। अवधि परिस्थितियों और कानून में निर्धारित प्रक्रिया पर निर्भर करती है।

Advisory Board की भूमिका

NSA के तहत निवारक हिरासत में Advisory Board (सलाहकार बोर्ड) की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

हिरासत से संबंधित सामग्री की समीक्षा निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के अनुसार की जाती है। इस व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि निवारक हिरासत की असाधारण शक्ति का इस्तेमाल आवश्यक संवैधानिक और कानूनी सुरक्षा उपायों के अनुरूप हो।

हिरासत में लिए गए व्यक्ति के अधिकार

निवारक हिरासत के बावजूद संविधान व्यक्ति को कुछ महत्वपूर्ण सुरक्षा प्रदान करता है।

विशेष रूप से अनुच्छेद 22 निवारक हिरासत से संबंधित संवैधानिक सुरक्षा प्रदान करता है। हिरासत में लिए गए व्यक्ति को निर्धारित परिस्थितियों में हिरासत के आधारों की जानकारी दी जानी चाहिए ताकि वह अपने खिलाफ आदेश के संबंध में प्रभावी प्रतिनिधित्व (Effective Representation) कर सके।

सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले में इस संवैधानिक सुरक्षा को महत्वपूर्ण माना।

सुप्रीम कोर्ट ने हिरासत आदेश क्यों रद्द किया?

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि संबंधित मामले में निवारक हिरासत का आदेश कानूनी कसौटी पर टिक नहीं सकता।

अदालत ने कहा कि:

  • पुलिस के सामने कथित कबूलनामे को अकेले पर्याप्त आधार नहीं बनाया जा सकता।
  • निवारक हिरासत के लिए स्वतंत्र और वैध सामग्री की आवश्यकता होती है।
  • निवारक हिरासत का उद्देश्य भविष्य के हानिकारक आचरण को रोकना होना चाहिए।
  • इसे चल रहे आपराधिक मुकदमे का विकल्प या उसके समर्थन के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
  • इस आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले के साथ-साथ हिरासत आदेश और उसकी पुष्टि के आदेश को रद्द कर दिया तथा अफरोज को रिहा करने का निर्देश दिया, बशर्ते किसी अन्य मामले में उसकी हिरासत आवश्यक न हो।

उत्तर प्रदेश सरकार पर ₹10 लाख का खर्च

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार पर ₹10 लाख की लागत (Costs) भी लगाई।

अदालत ने टिप्पणी की कि अफरोज को हिरासत में रखे जाने से उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का काफी नुकसान हुआ, जबकि संबंधित आपराधिक मामलों में उसे जमानत भी मिल चुकी थी। अदालत ने इस स्थिति को इस दृष्टि से गंभीर माना कि कानूनी प्रक्रिया स्वयं व्यक्ति के लिए दंड जैसी स्थिति नहीं बननी चाहिए।

इस फैसले का व्यापक महत्व

यह फैसला व्यक्तिगत स्वतंत्रता और राज्य की निवारक हिरासत की शक्ति के बीच संतुलन के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि NSA जैसी असाधारण शक्ति का प्रयोग करते समय प्रशासन को कानून द्वारा मान्य और स्वतंत्र सामग्री पर निर्भर रहना होगा।

साथ ही, इस फैसले का अर्थ यह नहीं है कि NSA के तहत निवारक हिरासत कभी नहीं की जा सकती। इसका अर्थ यह है कि ऐसी हिरासत के लिए कानूनी रूप से स्वीकार्य, प्रासंगिक और पर्याप्त आधार होना आवश्यक है।

परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य

  • मामला: Mulla Afroz v. Union of India
  • सुप्रीम कोर्ट का फैसला: 29 सितंबर 2026
  • पीठ: न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू
  • संबंधित कानून: National Security Act, 1980
  • मुख्य मुद्दा: पुलिस के सामने दिए गए कबूलनामे के आधार पर निवारक हिरासत
  • सुप्रीम कोर्ट का निष्कर्ष: केवल पुलिस के सामने दिया गया कबूलनामा, स्वतंत्र पुष्टिकारक सामग्री के अभाव में, NSA हिरासत का आधार नहीं बन सकता।
  • संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 20(3) और अनुच्छेद 22
  • मुख्य वैधानिक प्रावधान: Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023 की धारा 23
  • अधिकतम NSA हिरासत: सामान्यतः 12 महीने तक
  • घटना: संभल हिंसा, 24 नवंबर 2024
  • NSA हिरासत आदेश: 13 अक्टूबर 2025
  • उत्तर प्रदेश सरकार पर लागत: ₹10 लाख
  • सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण सिद्धांत: निवारक हिरासत एक असाधारण उपाय है और इसका प्रयोग अत्यंत सावधानी से किया जाना चाहिए।