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राजनाथ सिंह ने भारत के पहले फ्लीट सपोर्ट शिप ‘सूर्य’ का शुभारंभ किया

Defence 📅 October 11, 2026

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 7 अक्टूबर को आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम स्थित हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड (HSL) में भारत के पहले फ्लीट सपोर्ट शिप (Fleet Support Ship—FSS-1) ‘सूर्य’ का शुभारंभ किया। यह भारत की स्वदेशी जहाज निर्माण क्षमता और समुद्री रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है।

इस पोत का निर्माण हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड द्वारा स्वदेशी रूप से किया गया है। इसका उद्देश्य भारतीय नौसेना को समुद्र में लंबे समय तक अभियान चलाने, दूरस्थ समुद्री क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति बनाए रखने और परिचालन क्षमता को मजबूत करने में सहायता प्रदान करना है।

फ्लीट सपोर्ट शिप क्या है?

फ्लीट सपोर्ट शिप ऐसे विशेष नौसैनिक सहायक पोत होते हैं, जो समुद्र में तैनात युद्धपोतों और अन्य नौसैनिक जहाजों को आवश्यक रसद, ईंधन, सामग्री तथा तकनीकी सहायता उपलब्ध कराते हैं। इनका मुख्य कार्य नौसेना के जहाजों को बार-बार बंदरगाह पर लौटे बिना लंबे समय तक समुद्र में अभियान जारी रखने में सक्षम बनाना है।

समुद्र में दूरस्थ क्षेत्रों में तैनात युद्धपोतों को लगातार ईंधन, अन्य तरल पदार्थों, आवश्यक उपकरणों, पुर्जों और रखरखाव संबंधी सहायता की जरूरत होती है। फ्लीट सपोर्ट शिप इन आवश्यकताओं को पूरा करके नौसेना की परिचालन क्षमता और समुद्री उपस्थिति को बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

‘सूर्य’ की प्रमुख विशेषताएँ

फ्लीट सपोर्ट शिप-1 ‘सूर्य’ को भारतीय नौसेना की रसद एवं सहायता संबंधी आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर विकसित किया गया है। इस श्रेणी के जहाजों में कई महत्त्वपूर्ण सुविधाएँ शामिल होंगी।

  • बढ़ी हुई मालवाहक क्षमता: इन पोतों में अधिक मात्रा में आवश्यक सामग्री और रसद ले जाने की क्षमता होगी, जिससे समुद्र में तैनात नौसैनिक जहाजों को लगातार सहायता मिल सकेगी।

  • अधिक तरल पदार्थों की क्षमता: ईंधन और अन्य आवश्यक तरल पदार्थों के भंडारण एवं आपूर्ति की बेहतर व्यवस्था नौसेना के जहाजों की परिचालन अवधि बढ़ाने में सहायक होगी।

  • जहाज पर रखरखाव कार्यशालाएँ: पोतों में प्राथमिक स्तर की मरम्मत और रखरखाव के लिए कार्यशालाएँ होंगी। इससे समुद्र में ही कई तकनीकी समस्याओं का समाधान किया जा सकेगा।

  • हेलीकॉप्टर डेक: इसमें बहुउद्देशीय हेलीकॉप्टरों के संचालन के लिए डेक की व्यवस्था होगी, जिससे आवश्यकतानुसार परिवहन, निगरानी और सहायता संबंधी गतिविधियों को सहयोग मिल सकता है।

  • आत्मरक्षा प्रणालियाँ: पोतों में अपनी सुरक्षा के लिए आवश्यक आत्मरक्षा प्रणालियाँ होंगी, जो परिचालन परिस्थितियों में इसकी सुरक्षा क्षमता को बढ़ाएँगी।

इन सुविधाओं के माध्यम से फ्लीट सपोर्ट शिप भारतीय नौसेना के लिए समुद्र में एक चलायमान रसद एवं रखरखाव केंद्र के रूप में कार्य कर सकेंगे।

भारतीय नौसेना की परिचालन क्षमता में वृद्धि

हिंद महासागर क्षेत्र में भारत के सामरिक और आर्थिक हितों की सुरक्षा के लिए भारतीय नौसेना की निरंतर उपस्थिति महत्त्वपूर्ण है। इस क्षेत्र से अंतरराष्ट्रीय व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और अनेक प्रमुख समुद्री परिवहन मार्ग जुड़े हुए हैं।

जब नौसेना के युद्धपोत लंबे समय तक दूरस्थ समुद्री क्षेत्रों में तैनात रहते हैं, तब उनके लिए केवल युद्धक क्षमता पर्याप्त नहीं होती। उन्हें ईंधन, रसद, तकनीकी सहायता, मरम्मत और अन्य आवश्यक सुविधाओं की भी जरूरत होती है।

फ्लीट सपोर्ट शिप समुद्र में ही आवश्यक सामग्री और सहायता उपलब्ध कराकर इस आवश्यकता को पूरा करते हैं। इससे युद्धपोतों को बार-बार बंदरगाह लौटने की आवश्यकता कम हो सकती है और वे अधिक समय तक अपने निर्धारित अभियानों में लगे रह सकते हैं।

‘सूर्य’ जैसे पोत भारतीय नौसेना की पहुँच, सहनशक्ति और परिचालन प्रभावशीलता को बढ़ाने में योगदान देंगे। इससे हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की समुद्री उपस्थिति को बनाए रखने और आवश्यकतानुसार दूरस्थ क्षेत्रों में अभियान संचालित करने की क्षमता मजबूत होगी।

समुद्र में पुनःपूर्ति की भूमिका

फ्लीट सपोर्ट शिप की सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिकाओं में से एक समुद्र में पुनःपूर्ति (At-sea Replenishment) है। इसके अंतर्गत समुद्र में तैनात नौसैनिक जहाजों को आवश्यक ईंधन, तरल पदार्थों और अन्य आपूर्ति की उपलब्धता सुनिश्चित की जाती है।

इस व्यवस्था का प्रमुख लाभ यह है कि नौसैनिक जहाजों को हर बार आपूर्ति प्राप्त करने के लिए बंदरगाह पर लौटने की जरूरत नहीं पड़ती। इससे समय की बचत होती है और लंबी दूरी के अभियानों को अधिक प्रभावी ढंग से संचालित किया जा सकता है।

आधुनिक नौसैनिक अभियानों में यह क्षमता विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि समुद्र में लंबे समय तक बने रहने से निगरानी, समुद्री सुरक्षा और रणनीतिक उपस्थिति संबंधी कार्यों को निरंतरता मिलती है।

पाँचवें फ्लीट सपोर्ट शिप की आधारशिला रखी गई

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस अवसर पर पाँचवें फ्लीट सपोर्ट शिप (FSS-5) की आधारशिला भी रखी। यह कदम भारत के फ्लीट सपोर्ट शिप निर्माण कार्यक्रम को आगे बढ़ाने की दिशा में महत्त्वपूर्ण है।

इस कार्यक्रम के अंतर्गत ऐसे सहायक पोतों के निर्माण से नौसेना की रसद संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने की स्वदेशी क्षमता विकसित होगी। इससे देश में बड़े नौसैनिक पोतों के डिजाइन, निर्माण और उनसे जुड़ी तकनीकी विशेषज्ञता को भी प्रोत्साहन मिलेगा।

फ्लीट सपोर्ट शिप कार्यक्रम का महत्त्व केवल नए जहाजों के निर्माण तक सीमित नहीं है। यह भारतीय नौसेना की दीर्घकालिक परिचालन जरूरतों के लिए देश के भीतर आवश्यक औद्योगिक और तकनीकी आधार तैयार करने में भी योगदान देता है।

हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड में स्लिपवे-4 का उन्नयन

इस अवसर पर रक्षा मंत्री ने हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड के उन्नत स्लिपवे-4 का भी उद्घाटन किया। स्लिपवे ऐसी संरचना होती है, जिसका उपयोग जहाजों को निर्माण के बाद पानी में उतारने तथा जहाज निर्माण से संबंधित कार्यों में किया जाता है।

उन्नत स्लिपवे-4 को विस्तारित और मजबूत बनाया गया है, ताकि शिपयार्ड में अधिक बड़े जहाजों का निर्माण और जलावतरण किया जा सके। इस सुविधा के माध्यम से HSL अब 45,000 डेडवेट टन (DWT) तक की क्षमता वाले जहाजों के निर्माण और जलावतरण में सहायता प्राप्त कर सकेगा।

डेडवेट टन भार किसी जहाज द्वारा सुरक्षित रूप से वहन किए जा सकने वाले कुल भार को दर्शाता है। इसमें माल, ईंधन, पानी, आपूर्ति, चालक दल और अन्य भार शामिल होते हैं। यह जहाज के खाली वजन से अलग होता है।

स्लिपवे-4 का उन्नयन शिपयार्ड की क्षमता में महत्त्वपूर्ण विस्तार है। इससे बड़े और अधिक जटिल जहाजों के निर्माण के लिए आवश्यक आधारभूत संरचना मजबूत होगी।

300 टन क्षमता वाली गॉलियथ क्रेन का उद्घाटन

रक्षा मंत्री ने HSL में 300 टन क्षमता वाली गॉलियथ क्रेन का भी उद्घाटन किया। गॉलियथ क्रेन एक विशाल औद्योगिक क्रेन होती है, जिसका उपयोग जहाज निर्माण के दौरान भारी संरचनाओं और बड़े मॉड्यूल को उठाने तथा निर्धारित स्थान पर स्थापित करने के लिए किया जाता है।

आधुनिक जहाज निर्माण में कई बार जहाज के अलग-अलग हिस्सों को अलग-अलग तैयार करके बाद में जोड़ा जाता है। इस प्रक्रिया को ब्लॉक निर्माण पद्धति (Block Construction) कहा जाता है। भारी क्षमता वाली क्रेन बड़े ब्लॉकों को उठाने, स्थानांतरित करने और जोड़ने में सहायता करती है।

नई क्रेन से HSL की भारी संरचनाओं को संभालने की क्षमता बढ़ेगी। इससे जहाज निर्माण की प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित बनाने और बड़े तथा जटिल पोतों के निर्माण में सहायता मिलने की उम्मीद है।

हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड का सामरिक महत्त्व

हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड भारत के प्रमुख जहाज निर्माण प्रतिष्ठानों में से एक है और विशाखापत्तनम में स्थित है। भारतीय नौसेना की आवश्यकताओं के लिए जहाजों के निर्माण, मरम्मत और रखरखाव से जुड़ी इसकी भूमिका महत्त्वपूर्ण है।

स्लिपवे-4 के उन्नयन और 300 टन क्षमता वाली गॉलियथ क्रेन की स्थापना से शिपयार्ड बड़े तथा अधिक जटिल जहाज निर्माण कार्यक्रमों को संभालने के लिए बेहतर स्थिति में होगा। आधुनिक ब्लॉक निर्माण पद्धति को समर्थन मिलने से भारी जहाजों के विभिन्न हिस्सों के निर्माण और संयोजन की प्रक्रिया को भी मजबूती मिलेगी।

यह विस्तार भारत के जहाज निर्माण उद्योग में तकनीकी क्षमता विकसित करने, घरेलू औद्योगिक आधार को मजबूत करने और रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी उत्पादन को प्रोत्साहित करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण है।

आत्मनिर्भर भारत और स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा

‘सूर्य’ का शुभारंभ भारत की रक्षा उत्पादन संबंधी आत्मनिर्भरता की नीति के अनुरूप है। स्वदेशी जहाज निर्माण से देश में तकनीकी ज्ञान, कुशल मानव संसाधन, औद्योगिक क्षमता और आपूर्ति शृंखला के विकास को प्रोत्साहन मिलता है।

जब बड़े नौसैनिक पोतों और सहायक जहाजों का निर्माण देश के भीतर किया जाता है, तो घरेलू शिपयार्ड, इंजीनियरिंग उद्योग, उपकरण निर्माता और अन्य संबंधित क्षेत्र भी लाभान्वित हो सकते हैं।

इसके साथ ही, जहाज निर्माण की क्षमता में वृद्धि से भविष्य में अधिक जटिल समुद्री प्लेटफॉर्म तैयार करने के लिए आवश्यक अनुभव और बुनियादी ढाँचा विकसित होता है। यह रक्षा क्षेत्र में आयात पर निर्भरता कम करने तथा दीर्घकालिक रणनीतिक आवश्यकताओं को पूरा करने की दिशा में सहायक हो सकता है।

हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की रणनीतिक स्थिति

हिंद महासागर क्षेत्र भारत की समुद्री सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इस क्षेत्र में समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा, समुद्री डकैती जैसी चुनौतियों से निपटना, निगरानी बनाए रखना और जरूरत पड़ने पर मानवीय सहायता तथा आपदा राहत अभियानों में भाग लेना भारतीय नौसेना की प्रमुख जिम्मेदारियों में शामिल हैं।

इन कार्यों के लिए युद्धपोतों के साथ-साथ मजबूत रसद व्यवस्था और सहायता प्रदान करने वाले जहाज भी आवश्यक हैं। फ्लीट सपोर्ट शिप नौसेना को लंबे समय तक समुद्र में तैनात रहने की क्षमता प्रदान करके इन जिम्मेदारियों को निभाने में सहायता करते हैं।

इस प्रकार, ‘सूर्य’ का शुभारंभ केवल एक नए जहाज की शुरुआत नहीं, बल्कि भारतीय नौसेना की दीर्घकालिक परिचालन आवश्यकताओं और समुद्री रणनीति को मजबूत करने के व्यापक प्रयास का हिस्सा है।

निष्कर्ष

फ्लीट सपोर्ट शिप-1 ‘सूर्य’ का शुभारंभ, पाँचवें फ्लीट सपोर्ट शिप की आधारशिला, उन्नत स्लिपवे-4 का उद्घाटन और 300 टन क्षमता वाली गॉलियथ क्रेन की स्थापना—ये सभी घटनाएँ भारत की स्वदेशी जहाज निर्माण क्षमता के विस्तार को दर्शाती हैं।

इन पहलों से भारतीय नौसेना को समुद्र में अधिक समय तक अभियान संचालित करने के लिए आवश्यक रसद एवं तकनीकी सहायता उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी। साथ ही, हिंदुस्तान शिपयार्ड लिमिटेड की क्षमता बढ़ने से बड़े और जटिल जहाजों के निर्माण के लिए देश का औद्योगिक आधार मजबूत होगा।

दीर्घकाल में यह पहल आत्मनिर्भर भारत, स्वदेशी रक्षा उत्पादन और हिंद महासागर क्षेत्र में भारतीय नौसेना की परिचालन क्षमता को मजबूत करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकती है।