मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) का पद भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में अत्यंत महत्वपूर्ण संवैधानिक पद है। निर्वाचन आयोग को संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत संसद, राज्य विधानसभाओं तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनावों के संचालन, निर्देशन और नियंत्रण की जिम्मेदारी दी गई है। वर्तमान में ज्ञानेश कुमार मुख्य चुनाव आयुक्त हैं।
सितंबर 2026 में निर्वाचन आयोग के भीतर विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और मतदाता सूची से जुड़े कुछ मुद्दों पर दो निर्वाचन आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—द्वारा आपत्तियां दर्ज किए जाने की खबर सामने आने के बाद राजनीतिक विवाद तेज हुआ। एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, दोनों ने लगभग 10 महीनों में कम-से-कम 14 बार कुछ निर्णयों और आदेशों पर आपत्ति दर्ज की थी।
विवाद की पृष्ठभूमि
विवाद का संबंध मुख्य रूप से मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision—SIR) से जुड़ा है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, दोनों निर्वाचन आयुक्तों ने मतदाताओं के नाम जोड़ने और हटाने, मतदाता पंजीकरण की प्रक्रिया, फॉर्म-6 में बदलाव तथा मतदाता डेटा से संबंधित कुछ निर्णयों पर अपनी आपत्तियां दर्ज की थीं।
रिपोर्ट के अनुसार, कुछ आपत्तियां इस बात से भी संबंधित थीं कि आयोग के नाम पर जारी किए गए कुछ निर्णयों या आदेशों के बारे में दोनों आयुक्तों को पहले जानकारी या उनकी सहमति नहीं थी।
इसके बाद विपक्षी दलों ने इस मुद्दे को उठाते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की कार्रवाई शुरू करने की मांग की।
निर्वाचन आयोग का पक्ष
निर्वाचन आयोग ने इन रिपोर्टों के बाद कहा कि किसी बहुसदस्यीय संस्था में अलग-अलग विचार, टिप्पणियां और सुझाव आना सामान्य निर्णय-प्रक्रिया का हिस्सा है।
आयोग के अनुसार, अधिकारियों और निर्वाचन आयुक्तों द्वारा लिखित टिप्पणियां, तकनीकी सुझाव तथा आंतरिक जांच-पड़ताल संस्थागत कार्यप्रणाली का हिस्सा हैं। आयोग ने यह भी कहा कि उसके महत्वपूर्ण निर्णयों में तीनों निर्वाचन आयुक्तों की सहमति रही है और SIR से संबंधित निर्णयों को भी आयोग ने सर्वसम्मति से मंजूर किया।
इस प्रकार, इस पूरे प्रकरण में मीडिया रिपोर्टों में दर्ज आपत्तियों और निर्वाचन आयोग द्वारा निर्णयों को सर्वसम्मत बताए जाने—दोनों पक्षों को अलग-अलग समझना आवश्यक है।
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का संवैधानिक आधार
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 324(5) में दी गई है।
इस अनुच्छेद के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से केवल उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिस तरीके और आधारों पर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है।
इसका उद्देश्य मुख्य चुनाव आयुक्त को कार्यपालिका या राजनीतिक दबाव के कारण मनमाने ढंग से हटाए जाने से सुरक्षा प्रदान करना है।
मुख्य चुनाव आयुक्त को किन आधारों पर हटाया जा सकता है?
CEC को हटाने के लिए केवल दो संवैधानिक आधार हैं—
1. सिद्ध कदाचार (Proved Misbehaviour)
2. अक्षमता (Incapacity)
केवल किसी निर्णय से असहमति, राजनीतिक आलोचना या किसी नीति अथवा चुनावी प्रक्रिया पर विवाद अपने-आप में CEC को हटाने का संवैधानिक आधार नहीं बन जाता। पहले निर्धारित प्रक्रिया के तहत आरोपों की जांच और उनके सिद्ध होने की आवश्यकता होती है।
क्या इसे महाभियोग कहा जाता है?
राजनीतिक और मीडिया विमर्श में CEC को हटाने की प्रक्रिया को अक्सर “महाभियोग” (Impeachment) कहा जाता है। हालांकि संवैधानिक दृष्टि से मुख्य चुनाव आयुक्त के मामले में अधिक सटीक शब्द “Removal यानी पद से हटाना” है।
भारतीय संविधान में महाभियोग की विशेष प्रक्रिया राष्ट्रपति के लिए अनुच्छेद 61 में प्रयुक्त होती है। वहीं CEC और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के लिए संविधान “removal” की प्रक्रिया निर्धारित करता है।
हटाने की प्रक्रिया की शुरुआत कैसे होती है?
CEC को हटाने की प्रक्रिया संसद के किसी भी सदन से शुरू की जा सकती है।
यदि प्रस्ताव लोकसभा में लाया जाता है, तो उसके नोटिस पर कम-से-कम 100 लोकसभा सदस्यों के हस्ताक्षर आवश्यक होते हैं।
यदि प्रस्ताव राज्यसभा में लाया जाता है, तो कम-से-कम 50 राज्यसभा सदस्यों के हस्ताक्षर आवश्यक होते हैं। यह व्यवस्था न्यायाधीशों की हटाने की प्रक्रिया से जुड़ी वैधानिक व्यवस्था के अनुरूप है।
पहला चरण — प्रस्ताव का नोटिस
सांसदों द्वारा हस्ताक्षरित प्रस्ताव संबंधित सदन के पीठासीन अधिकारी को दिया जाता है।
- लोकसभा में — लोकसभा अध्यक्ष
- राज्यसभा में — राज्यसभा के सभापति
पीठासीन अधिकारी प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार कर सकते हैं। केवल आवश्यक संख्या में सांसदों के हस्ताक्षर हो जाने से CEC स्वतः हटाने की प्रक्रिया में नहीं आ जाते और न ही इससे आरोप सिद्ध माने जाते हैं।
दूसरा चरण — जांच समिति का गठन
यदि प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है, तो आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की जाती है।
इस समिति में सामान्यतः शामिल होते हैं—
- सर्वोच्च न्यायालय का एक न्यायाधीश
- किसी उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश
- एक प्रतिष्ठित विधिवेत्ता
यह व्यवस्था न्यायाधीशों के विरुद्ध कदाचार या अक्षमता के आरोपों की जांच के लिए न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 में निर्धारित प्रक्रिया से जुड़ी है।
तीसरा चरण — आरोपों की जांच
जांच समिति आरोपों, उपलब्ध साक्ष्यों और संबंधित तथ्यों की जांच करती है। संबंधित पदाधिकारी को अपने पक्ष में स्पष्टीकरण देने और अपना बचाव प्रस्तुत करने का अवसर भी मिलता है।
समिति का उद्देश्य यह निर्धारित करना होता है कि लगाए गए आरोप वास्तव में कदाचार या अक्षमता के रूप में सिद्ध होते हैं या नहीं।
चौथा चरण — जांच समिति की रिपोर्ट
जांच पूरी होने के बाद समिति अपनी रिपोर्ट संबंधित सदन के पीठासीन अधिकारी को सौंपती है।
यदि समिति को आरोप सिद्ध नहीं मिलते हैं, तो हटाने की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ती।
यदि समिति यह निष्कर्ष देती है कि कदाचार या अक्षमता सिद्ध हुई है, तो प्रस्ताव संसद में विचार के लिए आगे बढ़ सकता है।
पांचवां चरण — संसद में विशेष बहुमत
यदि जांच में आरोप सिद्ध होते हैं, तो दोनों सदनों में प्रस्ताव पर मतदान होता है।
CEC को हटाने के लिए प्रत्येक सदन में विशेष बहुमत आवश्यक है। इसका अर्थ है—
- सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत, और
- उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों के कम-से-कम दो-तिहाई का समर्थन।
अर्थात केवल उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत पर्याप्त नहीं है; कुल सदस्य संख्या के बहुमत की शर्त भी पूरी करनी होती है।
छठा चरण — राष्ट्रपति का आदेश
जब दोनों सदन निर्धारित विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित कर देते हैं, तो संसद की ओर से राष्ट्रपति को हटाने संबंधी अभिभाषण प्रस्तुत किया जाता है।
इसके बाद राष्ट्रपति द्वारा औपचारिक आदेश जारी किए जाने पर मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाया जाता है।
CEC और अन्य निर्वाचन आयुक्तों में अंतर
संविधान मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों को हटाने के मामले में अलग-अलग सुरक्षा प्रदान करता है।
मुख्य चुनाव आयुक्त:
उन्हें सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान प्रक्रिया और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है।
अन्य निर्वाचन आयुक्त:
उन्हें राष्ट्रपति द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश पर हटाया जा सकता है। यह व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 324(5) में दी गई है।
2023 का नया कानून और निर्वाचन आयोग
मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 ने निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति, कार्यकाल और आयोग के कामकाज से संबंधित वैधानिक व्यवस्था निर्धारित की है।
इस अधिनियम के अनुसार CEC और अन्य निर्वाचन आयुक्तों का कार्यकाल अधिकतम छह वर्ष या 65 वर्ष की आयु, जो पहले हो, तक है और पुनर्नियुक्ति की पात्रता नहीं है।
अधिनियम आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया को भी निर्धारित करता है। यदि CEC और अन्य निर्वाचन आयुक्त किसी विषय पर अलग-अलग राय रखते हैं, तो कानून में बहुमत के आधार पर निर्णय लेने का प्रावधान है।
इस प्रकरण में महत्वपूर्ण संवैधानिक बिंदु
वर्तमान विवाद को समझने के लिए यह अंतर महत्वपूर्ण है कि आंतरिक असहमति और संवैधानिक रूप से सिद्ध कदाचार एक ही बात नहीं हैं।
किसी निर्वाचन आयुक्त द्वारा किसी प्रस्ताव पर आपत्ति दर्ज करना अपने-आप में CEC के विरुद्ध कदाचार सिद्ध नहीं करता। CEC को हटाने के लिए संविधान में निर्धारित प्रक्रिया के तहत आरोपों की जांच, उनका सिद्ध होना और दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित होना आवश्यक है।
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
- निर्वाचन आयोग का संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 324
- CEC को हटाने का प्रावधान: अनुच्छेद 324(5)
- हटाने के आधार: सिद्ध कदाचार और अक्षमता
- प्रक्रिया: सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान
- लोकसभा में प्रस्ताव के लिए न्यूनतम समर्थन: 100 सदस्य
- राज्यसभा में प्रस्ताव के लिए न्यूनतम समर्थन: 50 सदस्य
- जांच समिति: 3 सदस्य
- जांच समिति में: सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश, उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश और प्रतिष्ठित विधिवेत्ता
- अंतिम संसदीय बहुमत: कुल सदस्य संख्या का बहुमत + उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का कम-से-कम दो-तिहाई
- अंतिम आदेश: राष्ट्रपति
- अन्य निर्वाचन आयुक्तों को हटाना: CEC की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा
- CEC का वर्तमान नाम: ज्ञानेश कुमार
- अन्य निर्वाचन आयुक्त: सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी