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महाराष्ट्र के 85 प्रतिशत से अधिक तालुकों को सूखाग्रस्त घोषित किया गया

State 📅 October 19, 2026

महाराष्ट्र में सूखे की गंभीर स्थिति

महाराष्ट्र में कम वर्षा और जल संकट के कारण कृषि क्षेत्र पर गंभीर प्रभाव पड़ने की स्थिति को देखते हुए राज्य सरकार ने बड़े स्तर पर सूखा प्रभावित क्षेत्रों की पहचान की है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने राज्य के 85 प्रतिशत से अधिक तालुकों को सूखाग्रस्त घोषित करने की जानकारी दी। यह निर्णय किसानों को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने, कृषि संकट को कम करने और प्रभावित परिवारों को राहत प्रदान करने के उद्देश्य से लिया गया है।

महाराष्ट्र में कुल 358 तालुके हैं। इनमें से शुरुआत में 265 तालुकों को सूखाग्रस्त घोषित किया गया था। इसके बाद विभिन्न शिकायतों और प्राप्त आवेदनों का मूल्यांकन किया गया, जिसके आधार पर 40 अतिरिक्त तालुकों को सूखा प्रभावित सूची में शामिल किया गया। इस प्रकार सूखाग्रस्त घोषित तालुकों की कुल संख्या बढ़कर 305 हो गई।

कुल 358 तालुकों में से 305 तालुकों को सूखाग्रस्त घोषित किए जाने का अर्थ है कि राज्य के लगभग 85.2 प्रतिशत तालुके इस श्रेणी में आते हैं। यह स्थिति महाराष्ट्र में सूखे की व्यापकता और किसानों के सामने उत्पन्न चुनौतियों को दर्शाती है।

सूखे की घोषणा समय से पहले क्यों की गई?

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के अनुसार, सामान्य परिस्थितियों में महाराष्ट्र में सूखे की घोषणा नवंबर के अंत तक की जाती है और दिसंबर से प्रभावित लोगों को राहत प्रदान करने की प्रक्रिया शुरू होती है। हालांकि, इस बार स्थिति की गंभीरता को देखते हुए सरकार ने सामान्य समय-सीमा की प्रतीक्षा करने के बजाय अक्टूबर में ही सूखे की अधिसूचना जारी कर दी।

इस निर्णय का मुख्य उद्देश्य प्रभावित किसानों को जल्द से जल्द राहत उपलब्ध कराना है। सूखे की स्थिति में किसानों को फसलों की पैदावार में कमी, सिंचाई के लिए पानी की अनुपलब्धता, कृषि लागत में वृद्धि और घरेलू खर्चों को पूरा करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।

समय से पहले सूखा घोषित करने से प्रभावित क्षेत्रों में राहत उपायों को शीघ्र लागू करने और किसानों की आवश्यकताओं के अनुसार सरकारी सहायता पहुंचाने में मदद मिल सकती है।

किसानों को आर्थिक सहायता देने की घोषणा

महाराष्ट्र सरकार ने सूखे से प्रभावित किसानों को तत्काल आर्थिक राहत देने के लिए कई कदमों की घोषणा की है। मुख्यमंत्री ने बताया कि दिवाली से पहले किसानों के बैंक खातों में 5,000 रुपये जमा किए जाएंगे। इसका उद्देश्य किसानों को त्योहार से पहले शुरुआती वित्तीय सहायता उपलब्ध कराना है।

सूखे के कारण किसानों की आय प्रभावित होने पर उनके लिए बीज, खाद, कृषि उपकरण, सिंचाई और परिवार की दैनिक आवश्यकताओं पर खर्च करना कठिन हो सकता है। ऐसे समय में सीधे बैंक खाते में आर्थिक सहायता पहुंचाना किसानों को तत्काल जरूरतों को पूरा करने में मदद कर सकता है।

प्रत्यक्ष बैंक हस्तांतरण से सहायता राशि लाभार्थियों तक पहुंचाने की प्रक्रिया अधिक पारदर्शी बनाई जा सकती है। हालांकि, इस सहायता का वास्तविक लाभ किसानों की पात्रता, भुगतान प्रक्रिया और राशि समय पर प्राप्त होने पर निर्भर करेगा।

अतिरिक्त 3.5 लाख किसानों को ऋण राहत देने की प्रक्रिया

राज्य सरकार ने अतिरिक्त 3.5 लाख किसानों की प्रमाणित सूची तैयार करने और उन्हें निर्धारित ऋण राहत भुगतान उपलब्ध कराने की प्रक्रिया भी आगे बढ़ाई है। यह प्रक्रिया अन्य राहत उपायों के समानांतर संचालित की जा रही है।

कृषि ऋण किसानों के लिए खेती की आवश्यकताओं को पूरा करने का एक महत्वपूर्ण साधन है। लेकिन सूखे के कारण फसल खराब होने या उत्पादन कम होने पर किसानों की ऋण चुकाने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। ऐसी स्थिति में ऋण राहत किसानों पर पड़ने वाले वित्तीय दबाव को कम करने में सहायता कर सकती है।

अतिरिक्त किसानों को राहत प्रक्रिया में शामिल करने का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पात्र लाभार्थियों को भी निर्धारित सहायता मिल सके। इसके लिए लाभार्थियों की पहचान, दस्तावेजों का सत्यापन और भुगतान की प्रक्रिया महत्वपूर्ण होती है।

सहकारी बैंकों और ऋण समितियों को सख्त निर्देश

सूखे की स्थिति में किसानों को ऋण वसूली से संबंधित परेशानियों का सामना न करना पड़े, इसके लिए महाराष्ट्र सरकार ने जिला केंद्रीय सहकारी बैंकों (District Central Co-operative Banks—DCC Banks) और ऋण समितियों को सख्त चेतावनी दी है।

सरकार ने स्पष्ट किया है कि किसानों से ऋण की वसूली के लिए जबरदस्ती, उत्पीड़न या अनुचित दबाव नहीं बनाया जाना चाहिए। सूखे के कारण कृषि आय में कमी आने पर किसानों के लिए समय पर ऋण चुकाना कठिन हो सकता है। ऐसे में जबरन वसूली उनके आर्थिक और सामाजिक संकट को और बढ़ा सकती है।

सरकार निजी बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थानों के साथ भी इसी प्रकार की व्यवस्था लागू करने के प्रयास कर रही है। इसका उद्देश्य सूखे से प्रभावित किसानों को ऋण वसूली के अनुचित दबाव से बचाना और उन्हें आर्थिक स्थिति सुधारने का अवसर देना है।

बिजली बिलों की वसूली पर राहत

महाराष्ट्र सरकार ने लंबित बिजली बिलों के संबंध में भी किसानों को राहत देने की बात कही है। मुख्यमंत्री के अनुसार, बकाया बिजली बिलों की वसूली के लिए किसानों पर जबरन दबाव बनाने की अनुमति नहीं है।

कृषि क्षेत्र में बिजली का उपयोग मुख्य रूप से सिंचाई पंपों और अन्य कृषि कार्यों के लिए किया जाता है। सूखे के समय सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता कम होने तथा फसल उत्पादन प्रभावित होने से किसानों की आय घट सकती है। ऐसी स्थिति में बिजली बिलों का भुगतान उनके लिए अतिरिक्त वित्तीय बोझ बन सकता है।

राज्य की नीति के अंतर्गत 7.5 हॉर्सपावर तक की क्षमता वाले कृषि पंपों को मुफ्त बिजली प्रदान की जाती है। इस प्रावधान का उद्देश्य किसानों की सिंचाई लागत को कम करना और कृषि गतिविधियों को सहायता देना है।

पेयजल संरक्षण के लिए अवैध जल कनेक्शनों पर कार्रवाई

सूखे की स्थिति में पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित करना सरकार के सामने एक महत्वपूर्ण चुनौती होती है। जल संकट के दौरान घरेलू उपयोग, कृषि और अन्य गतिविधियों के बीच उपलब्ध जल संसाधनों का संतुलित प्रबंधन आवश्यक हो जाता है।

महाराष्ट्र सरकार ने पेयजल की आपूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए लगभग 16,000 अवैध जल कनेक्शन काटे हैं। इसके साथ ही अनधिकृत तरीके से पानी निकालने के मामलों में शून्य-सहनशीलता की नीति अपनाने की बात कही गई है।

अवैध जल कनेक्शन और अनधिकृत जल दोहन के कारण उपलब्ध जल संसाधनों का असमान वितरण हो सकता है। इससे उन क्षेत्रों में पेयजल की कमी बढ़ सकती है, जहां पहले से ही जल संकट मौजूद है।

इस प्रकार की कार्रवाई का उद्देश्य उपलब्ध पानी का उचित उपयोग सुनिश्चित करना, पेयजल आपूर्ति को प्राथमिकता देना और जल संसाधनों के अनियंत्रित दोहन को रोकना है। हालांकि, दीर्घकालीन समाधान के लिए जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन और भूजल के संतुलित उपयोग पर भी ध्यान देना आवश्यक है।

भारत में जल प्रबंधन की संवैधानिक व्यवस्था

भारत में जल संसाधनों का प्रबंधन केंद्र और राज्य सरकारों की भूमिकाओं से जुड़ा विषय है। भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची-II अर्थात राज्य सूची में जल से संबंधित विषयों को शामिल किया गया है।

इस संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत जलापूर्ति, सिंचाई, नहरों, जल निकासी, तटबंधों और जल भंडारण जैसे कई विषयों के संबंध में राज्य सरकारों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जल संसाधनों से संबंधित परियोजनाओं की योजना बनाना, उनके लिए वित्त की व्यवस्था करना, निर्माण करना और उनका रखरखाव करना सामान्यतः राज्य सरकारों की प्राथमिकताओं तथा उपलब्ध संसाधनों के अनुसार किया जाता है।

हालांकि, जल संकट और जल प्रबंधन की चुनौतियां केवल किसी एक राज्य तक सीमित नहीं हैं। इसलिए केंद्र सरकार विभिन्न योजनाओं के माध्यम से राज्यों को तकनीकी और वित्तीय सहायता प्रदान करती है।

इन योजनाओं का उद्देश्य जल संसाधनों का सतत विकास, उपलब्ध पानी का कुशल उपयोग, वर्षा जल का संरक्षण और भूजल पर अत्यधिक निर्भरता को कम करना है।

जल शक्ति अभियान (Jal Shakti Abhiyan—JSA)

जल शक्ति अभियान का उद्देश्य जल संरक्षण और वर्षा जल संचयन के प्रति जागरूकता बढ़ाना तथा जल संसाधनों के संरक्षण से संबंधित गतिविधियों को प्रोत्साहित करना है।

इस प्रकार के अभियान के अंतर्गत वर्षा जल को एकत्रित करने, पारंपरिक जल स्रोतों के संरक्षण, जल निकायों के पुनर्जीवन और स्थानीय स्तर पर जल प्रबंधन को बढ़ावा देने पर जोर दिया जाता है।

सूखाग्रस्त क्षेत्रों में वर्षा जल का उचित संचयन विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। यदि वर्षा के दौरान उपलब्ध पानी को तालाबों, जलाशयों और अन्य संरचनाओं में संचित किया जाए, तो भविष्य में इसका उपयोग घरेलू आवश्यकताओं, कृषि और भूजल पुनर्भरण के लिए किया जा सकता है।

जल शक्ति अभियान का व्यापक उद्देश्य जल संरक्षण को केवल सरकारी कार्यक्रम तक सीमित न रखकर जनभागीदारी से जुड़ा प्रयास बनाना है।

जल संचय जनभागीदारी (Jal Sanchay Jan Bhagidari—JSJB)

जल संचय जनभागीदारी पहल में जल संरक्षण के कार्यों में आम नागरिकों, स्थानीय समुदायों और विभिन्न संस्थाओं की भागीदारी को महत्व दिया जाता है।

जल संकट का समाधान केवल बड़े बांधों या सरकारी जल परियोजनाओं पर निर्भर नहीं हो सकता। स्थानीय स्तर पर वर्षा जल संचयन, छोटे जल निकायों का संरक्षण, पारंपरिक जल स्रोतों का पुनर्जीवन और पानी के विवेकपूर्ण उपयोग जैसे उपाय भी महत्वपूर्ण हैं।

जनभागीदारी से स्थानीय समुदाय अपने क्षेत्र की जल आवश्यकताओं को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं और उपलब्ध संसाधनों के अनुसार संरक्षण संबंधी गतिविधियों में योगदान दे सकते हैं।

महाराष्ट्र जैसे कृषि प्रधान राज्य में इस प्रकार के प्रयासों से ग्रामीण क्षेत्रों में जल उपलब्धता को बेहतर बनाने और सूखे के प्रभाव को कम करने में सहायता मिल सकती है।

जल जीवन मिशन—हर घर जल (Jal Jeevan Mission—JJM)

जल जीवन मिशन का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों के प्रत्येक परिवार को कार्यशील घरेलू नल कनेक्शन के माध्यम से पर्याप्त मात्रा में निर्धारित गुणवत्ता वाला पेयजल उपलब्ध कराने की दिशा में काम करना है।

ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित करना विशेष रूप से आवश्यक है, क्योंकि सूखे की स्थिति में कुओं, तालाबों और अन्य स्थानीय जल स्रोतों का जलस्तर घट सकता है। इससे लोगों को पानी लाने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ सकती है।

जल जीवन मिशन के अंतर्गत ग्रामीण पेयजल आपूर्ति व्यवस्था को विकसित करने और उसे टिकाऊ बनाए रखने पर जोर दिया जाता है। इसके लिए जल स्रोतों की उपलब्धता, आपूर्ति व्यवस्था के रखरखाव और स्थानीय स्तर पर जल प्रबंधन की भूमिका महत्वपूर्ण है।

सूखाग्रस्त क्षेत्रों में पेयजल की नियमित उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए जल स्रोतों का संरक्षण और जल आपूर्ति प्रणालियों की दीर्घकालीन स्थिरता आवश्यक है।

मिशन अमृत सरोवर (Mission Amrit Sarovar)

मिशन अमृत सरोवर का उद्देश्य देश के विभिन्न क्षेत्रों में जल निकायों का निर्माण और विकास करके जल संरक्षण को बढ़ावा देना है।

जल निकाय वर्षा के पानी को संचित करने और स्थानीय जल उपलब्धता में सुधार लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इनके माध्यम से वर्षा जल को एक स्थान पर एकत्रित किया जा सकता है, जिससे जल संसाधनों का उपयोग स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार किया जा सके।

ग्रामीण क्षेत्रों में तालाबों और अन्य जल संरचनाओं का विकास कृषि, पशुपालन और पर्यावरण संरक्षण के लिए उपयोगी हो सकता है। उचित परिस्थितियों में ये संरचनाएं भूजल पुनर्भरण में भी योगदान दे सकती हैं।

सूखे से प्रभावित क्षेत्रों में जल निकायों का संरक्षण और उनका नियमित रखरखाव विशेष महत्व रखता है। केवल नई संरचनाओं का निर्माण पर्याप्त नहीं है; उनमें पानी की उपलब्धता और उनकी उपयोगिता बनाए रखना भी आवश्यक है।

प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (Pradhan Mantri Krishi Sinchayee Yojana—PMKSY)

प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना का उद्देश्य कृषि क्षेत्र में सिंचाई की उपलब्धता बढ़ाना और जल के अधिक कुशल उपयोग को प्रोत्साहित करना है। कृषि उत्पादन में पानी की महत्वपूर्ण भूमिका को देखते हुए सिंचाई सुविधाओं का विकास किसानों के लिए आवश्यक है।

इस योजना के विभिन्न घटकों के माध्यम से सिंचाई अवसंरचना के विकास, जल उपयोग दक्षता में सुधार और कृषि भूमि तक पानी पहुंचाने के प्रयास किए जाते हैं।

सूखे की स्थिति में सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध न होने से फसलों की वृद्धि और उत्पादन प्रभावित हो सकता है। इसलिए सिंचाई सुविधाओं का विस्तार और पानी का कुशल उपयोग कृषि क्षेत्र को जल संकट के प्रति अधिक सक्षम बनाने में सहायता कर सकता है।

जल उपयोग दक्षता में सुधार का अर्थ है उपलब्ध पानी का इस प्रकार उपयोग करना कि कम पानी में भी कृषि कार्यों को अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सके। इसके लिए उपयुक्त सिंचाई तकनीकों और जल प्रबंधन पद्धतियों का महत्व बढ़ जाता है।

राष्ट्रीय जलभृत मानचित्रण एवं प्रबंधन कार्यक्रम (NAQUIM)

राष्ट्रीय जलभृत मानचित्रण एवं प्रबंधन कार्यक्रम (National Aquifer Mapping and Management Programme—NAQUIM) का संबंध भूजल स्रोतों की पहचान, उनके वैज्ञानिक अध्ययन और उनके बेहतर प्रबंधन से है।

जलभृत या एक्वीफर ऐसी भूगर्भीय संरचनाएं होती हैं, जिनमें भूजल संचित रहता है और जिनसे पानी प्राप्त किया जा सकता है। भूजल भारत के अनेक ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल और सिंचाई का महत्वपूर्ण स्रोत है।

यदि भूजल का उपयोग उसकी प्राकृतिक पुनर्भरण क्षमता से अधिक किया जाए, तो जलस्तर में गिरावट आ सकती है। इससे कुओं और नलकूपों से पानी प्राप्त करना कठिन हो सकता है तथा भविष्य में जल संकट और गंभीर बन सकता है।

NAQUIM जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से भूजल संसाधनों की प्रकृति और उपलब्धता को समझने तथा उनके वैज्ञानिक प्रबंधन के लिए जानकारी उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाता है। यह जानकारी स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार भूजल के सतत उपयोग की योजना बनाने में सहायक हो सकती है।

सूखे की समस्या से निपटने में जल संरक्षण का महत्व

महाराष्ट्र के 305 तालुकों को सूखाग्रस्त घोषित किया जाना कृषि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पेयजल प्रबंधन के लिए व्यापक चुनौती को दर्शाता है। ऐसे समय में किसानों को तत्काल आर्थिक सहायता प्रदान करना आवश्यक है, लेकिन दीर्घकालीन समाधान के लिए जल संसाधनों का वैज्ञानिक और टिकाऊ प्रबंधन भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

सूखे के प्रभाव को कम करने के लिए वर्षा जल संचयन, तालाबों और जलाशयों का संरक्षण, भूजल पुनर्भरण, सिंचाई दक्षता में सुधार और पेयजल स्रोतों की सुरक्षा जैसे उपाय उपयोगी हो सकते हैं।

केंद्र और राज्य सरकारों की योजनाओं के साथ स्थानीय समुदायों की भागीदारी भी महत्वपूर्ण है। यदि जल संरक्षण को कृषि पद्धतियों, ग्रामीण विकास और दैनिक जीवन का हिस्सा बनाया जाए, तो उपलब्ध जल संसाधनों का बेहतर उपयोग संभव हो सकता है।

महाराष्ट्र सरकार द्वारा घोषित आर्थिक सहायता, ऋण वसूली से संबंधित राहत, बिजली बिलों पर संरक्षणात्मक उपाय और पेयजल संसाधनों की सुरक्षा जैसे कदम तत्काल संकट को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण हैं। वहीं, जल संरक्षण और सिंचाई प्रबंधन से संबंधित योजनाएं भविष्य में सूखे के प्रभाव को कम करने तथा कृषि और ग्रामीण क्षेत्रों की जल सुरक्षा मजबूत करने में योगदान दे सकती हैं।

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