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ब्रिक्स नेताओं ने पारंपरिक चिकित्सा के प्रति प्रतिबद्धता को आगे बढ़ाया

18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान अपनाई गई नई दिल्ली घोषणा में पारंपरिक, पूरक और एकीकृत चिकित्सा यानी टीसीआईएम को स्वास्थ्य प्रणालियों को मजबूत करने और सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज की दिशा में प्रगति के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में स्वीकार किया गया है।

ब्रिक्स नेताओं ने पारंपरिक चिकित्सा के क्षेत्र में सदस्य देशों के बीच शोध, ज्ञान-विनिमय और सहयोग को बढ़ाने के लिए ब्रिक्स विशेषज्ञ कार्य समूह के प्रस्तावित गठन का स्वागत किया। यह पहल पारंपरिक चिकित्सा के क्षेत्र में ब्रिक्स सहयोग को केवल नीतिगत मान्यता से आगे बढ़ाकर अधिक व्यवस्थित और संस्थागत सहयोग की दिशा में ले जाने वाली है।

टीसीआईएम क्या है?

टीसीआईएम (Traditional, Complementary and Integrative Medicine) के अंतर्गत पारंपरिक, पूरक और एकीकृत चिकित्सा पद्धतियों को शामिल किया जाता है। इसका उद्देश्य विभिन्न चिकित्सा ज्ञान प्रणालियों और स्वास्थ्य संबंधी पद्धतियों को उचित वैज्ञानिक प्रमाण, सुरक्षा और गुणवत्ता के आधार पर समझना तथा आवश्यकता के अनुसार स्वास्थ्य प्रणालियों में उनका उपयोग करना है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, टीसीआईएम को स्वास्थ्य और कल्याण से संबंधित ज्ञान एवं पद्धतियों के व्यापक क्षेत्र के रूप में देखा जाता है। वर्तमान अंतरराष्ट्रीय चर्चा में इसके सुरक्षित, प्रभावी और साक्ष्य-आधारित उपयोग पर विशेष जोर दिया जा रहा है।

पारंपरिक चिकित्सा

पारंपरिक चिकित्सा से आशय उन स्वास्थ्य प्रणालियों, ज्ञान, कौशल, प्रथाओं और दर्शन से है, जिनका विकास विभिन्न ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियों में हुआ है और जो आधुनिक जैव-चिकित्सा प्रणाली से अलग तथा उससे पहले अस्तित्व में रही हैं।

इन प्रणालियों में प्रकृति आधारित उपचार, औषधीय पौधों का उपयोग, शरीर और मन के बीच संतुलन तथा व्यक्ति-केंद्रित उपचार जैसे दृष्टिकोण शामिल हो सकते हैं।

आयुर्वेद, पारंपरिक चीनी चिकित्सा तथा विभिन्न समुदायों की पारंपरिक स्वास्थ्य प्रणालियाँ इसके उदाहरण हैं।

पूरक चिकित्सा

पूरक चिकित्सा ऐसी अतिरिक्त स्वास्थ्य पद्धतियों को कहा जाता है जो किसी देश की मुख्यधारा की चिकित्सा प्रणाली का हिस्सा नहीं होतीं, लेकिन उनका उपयोग मुख्यधारा की चिकित्सा के साथ किया जा सकता है।

वैज्ञानिक प्रमाणों से समर्थित पूरक चिकित्सा पद्धतियाँ कुछ परिस्थितियों में मुख्यधारा की चिकित्सा को सहयोग प्रदान कर सकती हैं तथा स्वास्थ्य और कल्याण की आवश्यकताओं को अधिक व्यापक रूप से संबोधित करने में योगदान दे सकती हैं।

एकीकृत चिकित्सा

एकीकृत चिकित्सा एक बहु-विषयक और साक्ष्य-आधारित दृष्टिकोण है, जिसमें आधुनिक जैव-चिकित्सा ज्ञान के साथ पारंपरिक और/या पूरक चिकित्सा के उपयुक्त ज्ञान, कौशल एवं पद्धतियों का संयोजन किया जाता है।

इस दृष्टिकोण में किसी चिकित्सा पद्धति को केवल उसकी पारंपरिक पहचान के आधार पर अपनाने के बजाय उसके वैज्ञानिक प्रमाण, सुरक्षा, गुणवत्ता और उपयुक्तता को महत्व दिया जाता है।

हर्बल चिकित्सा क्या है?

हर्बल चिकित्सा में औषधीय पौधों के विभिन्न भागों, वनस्पति सामग्री, हर्बल तैयारियों तथा उनसे बने अंतिम उत्पादों का उपयोग किया जाता है।

इन उत्पादों में सक्रिय घटक के रूप में पौधों के हिस्से या अन्य वनस्पति सामग्री अथवा उनका संयोजन हो सकता है। हर्बल चिकित्सा पर वैज्ञानिक शोध का उद्देश्य इनके संभावित चिकित्सीय एवं निवारक उपयोग, सुरक्षा और गुणवत्ता को बेहतर ढंग से समझना है।

नई दिल्ली घोषणा में टीसीआईएम को महत्व

नई दिल्ली घोषणा में ब्रिक्स नेताओं ने टीसीआईएम की बढ़ती प्रासंगिकता को स्वीकार किया। विशेष रूप से इसे स्वास्थ्य प्रणालियों को मजबूत करने तथा सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज की दिशा में प्रगति से जोड़ा गया है।

यह निर्णय जुलाई 2026 में चंडीगढ़ में हुई 16वीं ब्रिक्स स्वास्थ्य मंत्रियों की बैठक में हुए महत्वपूर्ण समझौतों के बाद सामने आया है। जुलाई की बैठक में टीसीआईएम पर विशेष ध्यान दिया गया था और ब्रिक्स विशेषज्ञ कार्य समूह की स्थापना का समर्थन किया गया था।

ब्रिक्स विशेषज्ञ कार्य समूह की स्थापना

नई दिल्ली घोषणा में पहली बार ब्रिक्स नेताओं ने ब्रिक्स स्वास्थ्य कार्यधारा के अंतर्गत टीसीआईएम पर विशेषज्ञ कार्य समूह के प्रस्तावित गठन का औपचारिक स्वागत किया।

यह कार्य समूह ब्रिक्स सदस्य देशों के बीच—

  • नीति संवाद,
  • वैज्ञानिक एवं तकनीकी सहयोग,
  • ज्ञान और अनुभव का आदान-प्रदान,
  • अनुसंधान सहयोग,
  • क्षमता निर्माण तथा
  • पारंपरिक चिकित्सा से संबंधित सर्वोत्तम प्रक्रियाओं

को आगे बढ़ाने के लिए एक संरचित मंच के रूप में कार्य कर सकता है।

जुलाई 2026 की स्वास्थ्य मंत्रिस्तरीय बैठक की भूमिका

भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता के दौरान 23–24 जुलाई 2026 को चंडीगढ़ में 16वीं ब्रिक्स स्वास्थ्य मंत्रियों की बैठक आयोजित की गई। इस बैठक में टीसीआईएम पर पहली बार ब्रिक्स स्वास्थ्य मंत्रिस्तरीय घोषणा में एक समर्पित खंड शामिल किया गया।

बैठक में शोध एवं साक्ष्य निर्माण, वैज्ञानिक पद्धतियों के आदान-प्रदान, सर्वोत्तम प्रक्रियाओं के दस्तावेजीकरण, नैदानिक सत्यापन, गुणवत्ता, सुरक्षा और औषधि-सुरक्षा निगरानी जैसे विषयों पर सहयोग को आगे बढ़ाने की दिशा तय की गई।

औषधीय पौधों और हर्बल तैयारियों पर संयुक्त शोध

नई दिल्ली घोषणा का एक महत्वपूर्ण पक्ष औषधीय पौधों और हर्बल तैयारियों पर समन्वित शोध है।

ब्रिक्स देशों में पारंपरिक चिकित्सा का समृद्ध अनुभव और अलग-अलग प्रकार के पारंपरिक औषधीय ज्ञान मौजूद हैं। इन ज्ञान प्रणालियों के बीच वैज्ञानिक सहयोग से औषधीय संसाधनों की बेहतर पहचान, दस्तावेजीकरण और वैज्ञानिक मूल्यांकन में सहायता मिल सकती है।

संयुक्त शोध के माध्यम से संभावित चिकित्सीय एवं निवारक उपयोग वाले पौधों और हर्बल तैयारियों की वैज्ञानिक समझ को मजबूत किया जा सकता है।

औषधीय संसाधनों के दस्तावेजीकरण का महत्व

पारंपरिक चिकित्सा से संबंधित ज्ञान का एक बड़ा हिस्सा विभिन्न समुदायों और पीढ़ियों के माध्यम से विकसित हुआ है। इस ज्ञान का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण वैज्ञानिक अनुसंधान और भविष्य के उपयोग के लिए महत्वपूर्ण है।

ब्रिक्स देशों के बीच सहयोग से औषधीय पौधों, पारंपरिक उपयोग, हर्बल तैयारियों और उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाणों से संबंधित जानकारी के आदान-प्रदान को बेहतर बनाया जा सकता है।

गुणवत्ता, सुरक्षा और प्रभावशीलता पर जोर

टीसीआईएम को बढ़ावा देने के साथ गुणवत्ता, सुरक्षा और प्रभावशीलता सुनिश्चित करना भी नई दिल्ली घोषणा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

ब्रिक्स नेताओं ने साक्ष्य-आधारित दृष्टिकोण तथा उपयुक्त नियामकीय ढांचे के माध्यम से टीसीआईएम पद्धतियों और उत्पादों की गुणवत्ता एवं सुरक्षा सुनिश्चित करने के महत्व पर जोर दिया।

इसका उद्देश्य पारंपरिक चिकित्सा को वैज्ञानिक प्रमाणों और उचित नियमन के साथ आगे बढ़ाना है, ताकि उपचार पद्धतियों और उत्पादों के संभावित लाभों के साथ-साथ उनकी सुरक्षा का भी व्यवस्थित मूल्यांकन किया जा सके।

सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज में टीसीआईएम की भूमिका

सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (UHC) का व्यापक उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि लोगों को आवश्यक स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध हों और स्वास्थ्य सेवाओं का खर्च उनके लिए आर्थिक कठिनाई का कारण न बने।

ब्रिक्स नेताओं ने टीसीआईएम को स्वास्थ्य प्रणालियों को मजबूत करने और सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज की दिशा में प्रगति से जोड़ा है। हालांकि, इसका उपयोग प्रत्येक देश की स्वास्थ्य व्यवस्था, वैज्ञानिक प्रमाणों और नियामकीय ढांचे के अनुरूप किया जाना महत्वपूर्ण है।

भारत के लिए विशेष महत्व

भारत के लिए यह पहल विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि देश में आयुर्वेद सहित विभिन्न आयुष प्रणालियों की लंबी परंपरा और संस्थागत ढांचा मौजूद है।

ब्रिक्स के भीतर विशेषज्ञ कार्य समूह भारत को आयुर्वेद एवं अन्य आयुष प्रणालियों से संबंधित शोध, अनुभव और वैज्ञानिक प्रक्रियाओं को अन्य सदस्य देशों के साथ साझा करने के लिए एक अतिरिक्त अंतरराष्ट्रीय मंच प्रदान कर सकता है।

भारत ने पारंपरिक चिकित्सा के क्षेत्र में अनुसंधान, साक्ष्य निर्माण, गुणवत्ता आश्वासन, सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर जोर दिया है।

वैज्ञानिक प्रमाणों पर भारत का जोर

पारंपरिक चिकित्सा को आधुनिक स्वास्थ्य प्रणालियों के साथ जोड़ने के संदर्भ में भारत ने वैज्ञानिक प्रमाण, सुरक्षा, प्रभावशीलता और उपयुक्त मानकों के महत्व को रेखांकित किया है।

इसका अर्थ यह है कि पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों और उत्पादों के विकास तथा उपयोग में वैज्ञानिक अनुसंधान, गुणवत्ता नियंत्रण और उचित नियामकीय व्यवस्था को महत्व दिया जाए।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की वैश्विक रणनीति से संबंध

ब्रिक्स की यह पहल विश्व स्वास्थ्य संगठन की वैश्विक पारंपरिक चिकित्सा रणनीति 2025–2034 के व्यापक उद्देश्यों से भी जुड़ती है।

डब्ल्यूएचओ की रणनीति में पारंपरिक चिकित्सा के लिए वैज्ञानिक प्रमाणों को मजबूत करने, सुरक्षा और गुणवत्ता सुनिश्चित करने तथा जहां उपयुक्त हो वहां स्वास्थ्य प्रणालियों में इसके उचित एकीकरण पर जोर दिया गया है।

शोध और डिजिटल सहयोग की संभावनाएँ

जुलाई 2026 की ब्रिक्स स्वास्थ्य मंत्रिस्तरीय प्रक्रिया में टीसीआईएम से संबंधित डिजिटल ज्ञान मंचों, डेटाबेस और सूचना-साझाकरण को भी सहयोग के संभावित क्षेत्रों के रूप में आगे बढ़ाया गया।

सदस्य देशों के बीच वैज्ञानिक पद्धतियों, शोध अनुभवों, सर्वोत्तम प्रक्रियाओं और ज्ञान-संसाधनों का आदान-प्रदान अनुसंधान की गुणवत्ता और पहुंच को बेहतर बनाने में सहायक हो सकता है।

गुणवत्तापूर्ण हर्बल उत्पादों के विकास की संभावना

औषधीय पौधों और हर्बल तैयारियों पर समन्वित शोध से भविष्य में अधिक गुणवत्ता-आश्वस्त चिकित्सीय उत्पादों के विकास में योगदान मिल सकता है।

इसके लिए पौधों की पहचान, सक्रिय घटकों का अध्ययन, गुणवत्ता परीक्षण, सुरक्षा मूल्यांकन, प्रभावशीलता संबंधी प्रमाण और उचित नियामकीय मानकों जैसे पहलुओं पर वैज्ञानिक सहयोग आवश्यक होगा।

ब्रिक्स सहयोग का व्यापक महत्व

टीसीआईएम के क्षेत्र में ब्रिक्स सहयोग पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान और अंतरराष्ट्रीय सहयोग से जोड़ने की दिशा में एक संस्थागत कदम है।

इससे सदस्य देशों को अपनी-अपनी पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों से जुड़े अनुभव साझा करने, संयुक्त शोध करने और गुणवत्ता तथा सुरक्षा से संबंधित बेहतर प्रक्रियाओं पर सहयोग करने का अवसर मिल सकता है।

निष्कर्ष

नई दिल्ली घोषणा में टीसीआईएम को मिली मान्यता ब्रिक्स स्वास्थ्य सहयोग में पारंपरिक चिकित्सा के लिए एक नए चरण का संकेत देती है। प्रस्तावित विशेषज्ञ कार्य समूह के माध्यम से सदस्य देशों के बीच संवाद, शोध, ज्ञान-विनिमय और नीति सहयोग को अधिक व्यवस्थित रूप दिया जा सकता है।

साथ ही, औषधीय पौधों और हर्बल तैयारियों पर संयुक्त शोध तथा गुणवत्ता, सुरक्षा और प्रभावशीलता पर जोर यह दर्शाता है कि पारंपरिक चिकित्सा के अंतरराष्ट्रीय सहयोग में वैज्ञानिक प्रमाण और उचित नियमन को केंद्रीय महत्व दिया जा रहा है।

परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य

  • टीसीआईएम का पूर्ण रूप: Traditional, Complementary and Integrative Medicine
  • हिंदी अर्थ: पारंपरिक, पूरक और एकीकृत चिकित्सा
  • संबंधित घोषणा: नई दिल्ली घोषणा, 2026
  • मंच: ब्रिक्स
  • प्रस्तावित निकाय: ब्रिक्स विशेषज्ञ कार्य समूह
  • कार्यधारा: ब्रिक्स स्वास्थ्य कार्यधारा
  • प्रमुख उद्देश्य: संवाद, सहयोग, शोध और ज्ञान-विनिमय
  • प्रमुख शोध क्षेत्र: औषधीय पौधे एवं हर्बल तैयारियाँ
  • मुख्य मानक: गुणवत्ता, सुरक्षा और प्रभावशीलता
  • व्यापक स्वास्थ्य लक्ष्य: सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज
  • भारत से संबंधित प्रमुख प्रणालियाँ: आयुर्वेद एवं अन्य आयुष प्रणालियाँ
  • 16वीं ब्रिक्स स्वास्थ्य मंत्रियों की बैठक: 23–24 जुलाई 2026, चंडीगढ़
  • डब्ल्यूएचओ की संबंधित रणनीति: वैश्विक पारंपरिक चिकित्सा रणनीति 2025–2034