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भारत में चीता पुनर्स्थापन परियोजना के चार वर्ष पूरे

भारत में चीतों को पुनः बसाने के उद्देश्य से शुरू की गई चीता पुनर्स्थापन परियोजना (प्रोजेक्ट चीता) ने 17 सितंबर 2026 को चार वर्ष पूरे कर लिए। इस परियोजना का उद्देश्य भारत में विलुप्त हो चुके चीतों की ऐसी स्थायी और व्यवहार्य आबादी स्थापित करना है, जो प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र में शीर्ष शिकारी के रूप में अपनी भूमिका निभा सके।

भारत में चीतों की वापसी

17 सितंबर 2022 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मध्य प्रदेश के कूनो राष्ट्रीय उद्यान में नामीबिया से लाए गए आठ चीतों को विशेष बाड़ों में छोड़ा था। इनमें पाँच मादा और तीन नर चीते शामिल थे। इसके साथ ही भारत में लगभग सात दशक बाद चीतों की औपचारिक वापसी हुई।

चीता भारत में ऐतिहासिक रूप से पाया जाता था, लेकिन शिकार, खेल के लिए चीतों का उपयोग, अत्यधिक शिकार और प्राकृतिक आवास के नष्ट होने जैसी वजहों से इसकी संख्या लगातार घटती गई और यह देश से विलुप्त हो गया।

परियोजना की पृष्ठभूमि

भारत में अफ्रीकी चीतों को पुनः लाने की अवधारणा पहली बार 2009 में सामने आई थी। वर्ष 2013 में सर्वोच्च न्यायालय ने कूनो राष्ट्रीय उद्यान में अफ्रीकी चीतों को स्थानांतरित करने की याचिका को स्वीकार नहीं किया था।

इसके बाद जनवरी 2020 में सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को उपयुक्त आवास में अफ्रीकी चीतों को प्रायोगिक आधार पर भारत लाने की अनुमति दी। इसका उद्देश्य यह देखना था कि अफ्रीकी चीते भारतीय जलवायु और परिस्थितियों के अनुकूल ढल सकते हैं या नहीं।

नामीबिया से आए आठ चीते

सितंबर 2022 में नामीबिया से आठ चीते भारत लाए गए। उन्हें मध्य प्रदेश के कूनो राष्ट्रीय उद्यान में छोड़ा गया। 17 सितंबर 2022 को चीतों को कूनो में छोड़े जाने के साथ भारत में इस महत्वाकांक्षी वन्यजीव संरक्षण कार्यक्रम की शुरुआत हुई।

यह परियोजना दुनिया की पहली अंतरमहाद्वीपीय बड़े जंगली मांसाहारी जीव स्थानांतरण परियोजना मानी जाती है। इसका उद्देश्य केवल चीतों को भारत लाना नहीं, बल्कि उनके लिए उपयुक्त आवास तैयार करना, उनका प्रजनन सुनिश्चित करना और देश में एक दीर्घकालिक आबादी स्थापित करना है।

दक्षिण अफ्रीका से 12 चीते

परियोजना के दूसरे चरण में 18 फरवरी 2023 को दक्षिण अफ्रीका से 12 और चीतों को भारत लाया गया। इन चीतों को भी मध्य प्रदेश के कूनो राष्ट्रीय उद्यान में छोड़ा गया।

इससे परियोजना के अंतर्गत भारत में चीतों की संख्या बढ़ाने और उनके प्रजनन के लिए आनुवंशिक विविधता बनाए रखने के प्रयासों को आगे बढ़ाया गया।

गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य में विस्तार

चीता संरक्षण के लिए केवल कूनो राष्ट्रीय उद्यान पर निर्भर रहने के बजाय मध्य प्रदेश में दूसरे आवास भी तैयार किए गए। वर्ष 2025 में तीन चीतों को गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य में स्थानांतरित किया गया।

गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य मध्य प्रदेश के मंदसौर और नीमच जिलों की सीमा पर स्थित है। इसे चीतों के लिए अतिरिक्त आवास के रूप में विकसित किया गया है, ताकि भविष्य में परियोजना का विस्तार किया जा सके।

बोत्सवाना से नौ नए चीते

28 फरवरी 2026 को केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने बोत्सवाना से भारत लाए गए नौ चीतों को कूनो राष्ट्रीय उद्यान में बनाए गए क्वारंटीन बाड़ों में छोड़ा। इनमें छह मादा और तीन नर चीते शामिल थे।

बोत्सवाना से चीतों का आगमन परियोजना के अंतरराष्ट्रीय स्वरूप को और मजबूत करता है तथा भारत में चीतों की आबादी के विस्तार में योगदान देता है।

वर्तमान में चीतों की संख्या

17 सितंबर 2026 तक भारत में चीतों की कुल आबादी 52 हो गई है। इनमें 32 चीते भारत में जन्मे हैं। यह आंकड़ा परियोजना के तहत भारत में सफल प्रजनन की दिशा में हुई प्रगति को दर्शाता है।

वर्तमान में:

  • 49 चीते कूनो राष्ट्रीय उद्यान में हैं।
  • 3 चीते गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य में हैं।
  • कुल आबादी 52 चीतों की है।
  • इनमें 32 चीते भारत में जन्मे हैं।

कूनो राष्ट्रीय उद्यान की भूमिका

कूनो राष्ट्रीय उद्यान को भारत में चीता आबादी स्थापित करने के लिए प्राथमिक स्थल के रूप में विकसित किया गया है। मध्य प्रदेश का यह क्षेत्र चीतों के लिए उपयुक्त घासभूमि और खुले वन क्षेत्र उपलब्ध कराता है।

परियोजना के तहत यहां चीतों के लिए विशेष प्रबंधन, निगरानी और संरक्षण व्यवस्था विकसित की गई है। चीतों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए आधुनिक तकनीक और नियमित निगरानी का उपयोग किया जाता है।

गांधी सागर को अतिरिक्त आवास के रूप में विकसित करना

गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य को कूनो के अतिरिक्त आवास के रूप में विकसित किया गया है। इसका उद्देश्य चीतों के लिए उपलब्ध क्षेत्र का विस्तार करना और भविष्य में आबादी बढ़ने पर उन्हें नए क्षेत्रों में फैलने का अवसर देना है।

कूनो और गांधी सागर को मध्य भारत के बड़े परस्पर जुड़े वन्यजीव परिदृश्य का हिस्सा बनाने की योजना है। इससे चीतों के प्राकृतिक फैलाव तथा विभिन्न समूहों के बीच आनुवंशिक आदान-प्रदान की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।

गुजरात के बन्नी घासभूमि की तैयारी

चीता परियोजना को भविष्य में नए क्षेत्रों तक विस्तारित करने की तैयारी भी चल रही है। इनमें गुजरात की बन्नी घासभूमि प्रमुख संभावित क्षेत्र है।

बन्नी क्षेत्र की घासभूमि और प्राकृतिक परिस्थितियों को चीतों के लिए संभावित आवास के रूप में विकसित करने और वहां आवश्यक बुनियादी तैयारियां करने पर काम किया जा रहा है।

चीता संरक्षण में प्रमुख चुनौतियां

भारत में चीतों को पुनः बसाना केवल दूसरे देशों से जानवरों को लाने तक सीमित नहीं है। परियोजना के सामने चीतों को नए वातावरण में अनुकूलित करने, उनके स्वास्थ्य की निगरानी करने, प्रजनन सुनिश्चित करने और शावकों के जीवित रहने जैसी कई चुनौतियां हैं।

विशेष रूप से शावकों का जीवित रहना परियोजना की सफलता का महत्वपूर्ण पहलू है। जन्म के बाद शावकों को प्राकृतिक परिस्थितियों में कई तरह के जोखिमों का सामना करना पड़ता है। इसलिए उनकी निगरानी और संरक्षण व्यवस्था परियोजना का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

भारत में चीता क्यों विलुप्त हुआ?

चीता कभी भारत के विभिन्न क्षेत्रों में पाया जाता था। लेकिन लंबे समय तक शिकार, मनोरंजन और खेल के लिए चीतों का इस्तेमाल, अत्यधिक शिकार तथा आवास के नष्ट होने के कारण इसकी संख्या तेजी से घटती गई।

भारत में अंतिम ज्ञात चीते की मृत्यु 1947 में वर्तमान छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले में हुई थी। इसके बाद 1952 में चीते को भारत में आधिकारिक रूप से विलुप्त घोषित कर दिया गया।

इस प्रकार प्रोजेक्ट चीता भारत में एक ऐसे वन्यजीव को पुनः स्थापित करने का प्रयास है, जो कई दशकों से देश में प्राकृतिक रूप से मौजूद नहीं था।

चीते की विशेषताएं

चीता वैज्ञानिक नाम Acinonyx jubatus वाला विश्व का सबसे तेज दौड़ने वाला स्थलीय जीव है। यह कम पानी में भी जीवित रह सकता है और विभिन्न प्रकार के शुष्क एवं खुले आवासों में रह सकता है।

चीतों के लिए शुष्क वन, घासभूमि, खुले मैदान और मरुस्थलीय क्षेत्र उपयुक्त माने जाते हैं। यही कारण है कि भारत के कुछ घासभूमि और खुले वन क्षेत्रों को उनके पुनर्वास के लिए संभावित आवास के रूप में चुना गया है।

चीते की वैश्विक संरक्षण स्थिति

अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ की लाल सूची में चीते को संकटग्रस्त (Vulnerable) श्रेणी में रखा गया है। दुनिया में चीतों की संख्या लगातार घट रही है और उनकी प्रमुख आबादी अफ्रीकी सवाना क्षेत्रों में पाई जाती है।

इसलिए भारत में चीता पुनर्स्थापन का उद्देश्य केवल राष्ट्रीय स्तर पर एक विलुप्त प्रजाति को वापस लाना नहीं है, बल्कि वैश्विक स्तर पर चीता संरक्षण के प्रयासों में भी योगदान देना है।

प्रोजेक्ट चीता का मुख्य उद्देश्य

भारत में चीता पुनर्स्थापन परियोजना का प्रमुख लक्ष्य ऐसी व्यवहार्य चीता मेटापॉपुलेशन स्थापित करना है, जो लंबे समय तक कायम रह सके। इसके माध्यम से चीतों को पर्याप्त प्राकृतिक क्षेत्र उपलब्ध कराया जाना है, ताकि वे पारिस्थितिकी तंत्र में शीर्ष शिकारी के रूप में अपनी भूमिका निभा सकें।

परियोजना के व्यापक उद्देश्यों में शामिल हैं:

  • भारत में चीतों की स्थायी और व्यवहार्य आबादी स्थापित करना।
  • चीतों के लिए उपयुक्त प्राकृतिक आवास विकसित करना।
  • चीतों के प्रजनन और शावकों के जीवित रहने को सुनिश्चित करना।
  • चीतों को उनके ऐतिहासिक भौगोलिक क्षेत्र में फिर से फैलने का अवसर देना।
  • विभिन्न चीता आबादियों के बीच आनुवंशिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देना।
  • घासभूमि और खुले वन पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण को बढ़ावा देना।
  • वैश्विक स्तर पर चीता संरक्षण में भारत के योगदान को मजबूत करना।

चार वर्षों की उपलब्धि

17 सितंबर 2022 को आठ चीतों से शुरू हुई परियोजना अब 52 चीतों की आबादी तक पहुंच चुकी है, जिनमें 32 भारत में जन्मे हैं। कूनो के साथ गांधी सागर को जोड़ना और भविष्य में नए क्षेत्रों, जैसे बन्नी घासभूमि, तक परियोजना के विस्तार की तैयारी इस कार्यक्रम के व्यापक स्वरूप को दर्शाती है।

प्रोजेक्ट चीता भारत में विलुप्त हो चुके एक प्रमुख वन्यजीव की वापसी के साथ-साथ घासभूमि संरक्षण, जैव विविधता और पारिस्थितिक संतुलन को मजबूत करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण प्रयास है।