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ओजोन परत संरक्षण दिवस : क्यों है महत्वपूर्ण?

संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रत्येक वर्ष 16 सितंबर को अंतरराष्ट्रीय ओजोन परत संरक्षण दिवस मनाया जाता है। यह दिवस 16 सितंबर 1987 को हुए मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर की वर्षगांठ के रूप में मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1994 में 16 सितंबर को इस दिवस के रूप में घोषित किया था और इसका औपचारिक पालन 1995 से शुरू हुआ।

2026 की थीम — “Global action for a cooler planet” यानी “शीतल ग्रह के लिए वैश्विक कार्रवाई” है। इस वर्ष की थीम मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल की उपलब्धियों के साथ-साथ 2016 में अपनाए गए किगाली संशोधन के माध्यम से जलवायु परिवर्तन को कम करने के प्रयासों पर केंद्रित है।

ओजोन क्या है?

ओजोन ऑक्सीजन का एक अत्यधिक प्रतिक्रियाशील रूप है, जिसके एक अणु में ऑक्सीजन के तीन परमाणु (O₃) होते हैं। यह पृथ्वी के वायुमंडल में अलग-अलग ऊंचाइयों पर पाया जाता है और इसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि यह वायुमंडल की किस परत में मौजूद है।

ओजोन मुख्य रूप से दो स्थानों पर महत्वपूर्ण रूप से पाया जाता है—

  • समतापमंडल (Stratosphere) में मौजूद ओजोन पृथ्वी के लिए लाभकारी है।
  • क्षोभमंडल (Troposphere) में मौजूद जमीनी स्तर का ओजोन एक हानिकारक वायु प्रदूषक है।

वायुमंडल में मौजूद कुल ओजोन का लगभग 90 प्रतिशत समतापमंडल में पाया जाता है। समतापमंडल पृथ्वी की सतह से लगभग 10 से 50 किलोमीटर की ऊंचाई तक फैला होता है।

ओजोन परत को पृथ्वी की ‘सनस्क्रीन’ क्यों कहा जाता है?

समतापमंडल में मौजूद ओजोन सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी (Ultraviolet—UV) विकिरण का एक बड़ा हिस्सा अवशोषित कर लेती है।

यदि यह सुरक्षा कवच कमजोर हो जाए, तो पृथ्वी की सतह तक अधिक मात्रा में UV विकिरण पहुंच सकता है। इससे मानव स्वास्थ्य, वनस्पतियों, समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र और अन्य जीव-जंतुओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

इसी कारण समतापमंडलीय ओजोन परत को पृथ्वी की प्राकृतिक “सनस्क्रीन” कहा जाता है।

जमीनी स्तर का ओजोन क्यों हानिकारक है?

हर प्रकार का ओजोन लाभकारी नहीं होता। पृथ्वी की सतह के निकट बनने वाला ओजोन मुख्य रूप से वाष्पशील कार्बनिक यौगिकों (VOC) और नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx) के सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में होने वाली रासायनिक प्रतिक्रियाओं से बनता है।

यह जमीनी स्तर का ओजोन वायु प्रदूषण का एक प्रमुख घटक है और स्मॉग के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

इस प्रकार ओजोन को समझते समय उसके स्थान को ध्यान में रखना आवश्यक है—ऊपरी वायुमंडल में ओजोन जीवन की रक्षा करता है, जबकि सतह के पास मौजूद अधिक मात्रा का ओजोन प्रदूषक हो सकता है।

ओजोन क्षरण क्या है?

ओजोन क्षरण का अर्थ समतापमंडलीय ओजोन की मात्रा में कमी आना है। वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चला कि कुछ मानव निर्मित रसायन वायुमंडल में पहुंचकर ऐसी रासायनिक प्रतिक्रियाएं शुरू करते हैं, जो ओजोन अणुओं को नष्ट करती हैं।

इनमें विशेष रूप से क्लोरीन और ब्रोमीन युक्त रसायन महत्वपूर्ण रहे हैं। ऐसे रसायनों को व्यापक रूप से हैलोकार्बन के रूप में जाना जाता है।

ओजोन क्षरण से जुड़े प्रमुख मानव निर्मित रसायनों में शामिल हैं—

  • क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs)
  • हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन (HCFCs)
  • हैलोन
  • कार्बन टेट्राक्लोराइड
  • मिथाइल क्लोरोफॉर्म
  • मिथाइल ब्रोमाइड

इनमें ब्रोमीन युक्त कुछ रसायनों की ओजोन-क्षय क्षमता (Ozone Depletion Potential) क्लोरीन युक्त रसायनों की तुलना में काफी अधिक हो सकती है।

‘ओजोन होल’ से क्या तात्पर्य है?

ओजोन होल का अर्थ यह नहीं है कि वायुमंडल में सचमुच कोई खाली छेद बन गया है। इसका उपयोग मुख्य रूप से उन क्षेत्रों के लिए किया जाता है जहां किसी अवधि में समतापमंडलीय ओजोन की सांद्रता अत्यधिक कम हो जाती है।

विशेष रूप से अंटार्कटिका के ऊपर ओजोन क्षरण की समस्या गंभीर रूप में देखी गई थी। इस वैज्ञानिक खोज ने वैश्विक स्तर पर रसायनों के उत्पादन और उपयोग को नियंत्रित करने की आवश्यकता को मजबूत किया।

वियना कन्वेंशन क्या है?

ओजोन परत में हो रहे क्षरण के वैज्ञानिक प्रमाण सामने आने के बाद देशों ने अंतरराष्ट्रीय सहयोग की दिशा में कदम उठाया।

इसी क्रम में 22 मार्च 1985 को वियना कन्वेंशन फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ द ओजोन लेयर को अपनाया गया और उस पर हस्ताक्षर किए गए। उस समय 28 देशों ने इस समझौते को अपनाया था।

वियना कन्वेंशन ने देशों के बीच वैज्ञानिक जानकारी साझा करने, अनुसंधान और अंतरराष्ट्रीय सहयोग का ढांचा तैयार किया। इसके बाद ओजोन-क्षयकारी पदार्थों को सीधे नियंत्रित करने के लिए मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल अस्तित्व में आया।

मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल क्या है?

मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल ऑन सब्सटांसेज दैट डिप्लीट द ओजोन लेयर को सितंबर 1987 में अपनाया गया था।

इसका मुख्य उद्देश्य उन मानव निर्मित रसायनों के उत्पादन और खपत को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करना था, जो ओजोन परत को नुकसान पहुंचाते हैं। इन पदार्थों को Ozone-Depleting Substances (ODS) कहा जाता है।

प्रोटोकॉल में लगभग 100 रसायनों को विभिन्न श्रेणियों में नियंत्रित किया गया है। प्रत्येक श्रेणी के लिए उत्पादन और खपत में कमी या समाप्ति की समयसीमा निर्धारित की गई।

मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल की विशेषता क्या है?

मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें वैज्ञानिक जानकारी और तकनीकी प्रगति के आधार पर समय-समय पर बदलाव किए जा सकते हैं।

इसके तहत देशों ने ओजोन-क्षयकारी पदार्थों के उत्पादन और उपयोग को कम करने के लिए अलग-अलग समयसीमाएं स्वीकार कीं। विकसित और विकासशील देशों के लिए कई मामलों में अलग-अलग समयसीमाएं निर्धारित की गईं।

विशेष रूप से विकासशील देशों को संक्रमण के लिए समय और वित्तीय तथा तकनीकी सहायता उपलब्ध कराने की व्यवस्था भी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा रही।

मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल की वैश्विक उपलब्धि

16 सितंबर 2009 को वियना कन्वेंशन और मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल संयुक्त राष्ट्र के इतिहास में सार्वभौमिक अनुमोदन (Universal Ratification) प्राप्त करने वाली पहली संधियां बनीं।

मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के तहत CFCs और अन्य प्रमुख ओजोन-क्षयकारी पदार्थों को चरणबद्ध तरीके से कम किया गया। इसके परिणामस्वरूप वैज्ञानिक आकलनों में ओजोन परत के दीर्घकालिक पुनरुद्धार की दिशा में प्रगति दर्ज की गई है।

यह समझौता इस बात का उदाहरण भी माना जाता है कि वैज्ञानिक प्रमाण, अंतरराष्ट्रीय सहयोग, वित्तीय सहायता और तकनीकी विकल्पों को एक साथ जोड़कर वैश्विक पर्यावरणीय समस्या से निपटा जा सकता है।

किगाली संशोधन क्या है?

मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल में समय के साथ नए वैज्ञानिक और पर्यावरणीय मुद्दों को शामिल किया गया। इसी क्रम में 15 अक्टूबर 2016 को रवांडा की राजधानी किगाली में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल का किगाली संशोधन अपनाया गया।

इसका मुख्य लक्ष्य हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFCs) के उत्पादन और उपयोग को चरणबद्ध तरीके से कम करना है।

HFCs सामान्यतः ओजोन परत को सीधे नष्ट करने वाले प्रमुख पदार्थ नहीं हैं, लेकिन इनमें से कई गैसें अत्यधिक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैसें हैं। इसलिए HFCs को कम करने से ओजोन संरक्षण के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन से निपटने में भी मदद मिल सकती है।

HFCs को कम करना जलवायु के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?

HFCs का उपयोग मुख्य रूप से रेफ्रिजरेशन, एयर कंडीशनिंग और अन्य कूलिंग तकनीकों में किया जाता है।

इनका उपयोग उन पुराने रसायनों के विकल्प के रूप में बढ़ा था, जो ओजोन परत के लिए अधिक नुकसानदेह थे। लेकिन बाद में यह सामने आया कि कई HFCs का ग्लोबल वार्मिंग पोटेंशियल बहुत अधिक है।

इसीलिए किगाली संशोधन का उद्देश्य HFCs को अचानक समाप्त करने के बजाय उनके उत्पादन और उपयोग को चरणबद्ध तरीके से कम करना तथा अधिक पर्यावरण-अनुकूल विकल्पों और ऊर्जा-कुशल कूलिंग तकनीकों को बढ़ावा देना है।

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, किगाली संशोधन का पूर्ण क्रियान्वयन इस सदी के अंत तक 0.5 डिग्री सेल्सियस तक वैश्विक तापवृद्धि को टालने में मदद कर सकता है। ऊर्जा-कुशल कूलिंग के साथ इसके लाभ और अधिक हो सकते हैं।

2026 की थीम का महत्व

“Global action for a cooler planet” का अर्थ केवल ओजोन परत की रक्षा करना नहीं है, बल्कि ऐसी कूलिंग व्यवस्था विकसित करना भी है जो जलवायु के लिए कम नुकसानदेह हो।

बढ़ते तापमान के दौर में एयर कंडीशनर, रेफ्रिजरेटर और अन्य कूलिंग उपकरणों की मांग बढ़ रही है। इसलिए दुनिया के सामने दोहरी चुनौती है—

  1. लोगों को पर्याप्त और सस्ती कूलिंग उपलब्ध कराना।
  2. ऐसी कूलिंग तकनीकों का उपयोग करना जिनका पर्यावरण और जलवायु पर कम प्रभाव हो।

इसी कारण 2026 की थीम में ओजोन संरक्षण, जलवायु कार्रवाई, ऊर्जा दक्षता और टिकाऊ कूलिंग को एक-दूसरे से जोड़कर देखा जा रहा है।

भारत और मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल

भारत 19 जून 1992 को मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल का पक्षकार बना। इसके बाद भारत ने प्रोटोकॉल के विभिन्न संशोधनों को स्वीकार किया और ओजोन-क्षयकारी पदार्थों को चरणबद्ध तरीके से कम करने की दिशा में कदम उठाए।

भारत जैसे विकासशील देश के लिए यह प्रक्रिया विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां तेजी से बढ़ती आबादी, शहरीकरण और तापमान में वृद्धि के कारण कूलिंग की मांग लगातार बढ़ रही है।

इसलिए भारत के लिए ओजोन संरक्षण और जलवायु-अनुकूल कूलिंग नीति एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं।

किगाली संशोधन को लेकर भारत का कदम

भारत के केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 18 अगस्त 2021 को किगाली संशोधन के अनुमोदन को मंजूरी दी। इसके बाद भारत ने 27 सितंबर 2021 को किगाली संशोधन का अनुमोदन/ratification औपचारिक रूप से जमा किया और यह संशोधन भारत के लिए 27 दिसंबर 2021 से प्रभावी हुआ।

भारत के लिए HFC phase-down चार चरणों में निर्धारित है। आधिकारिक भारतीय विवरण के अनुसार HFC उत्पादन और खपत में कमी का लक्ष्य 2032 से शुरू होकर क्रमशः बढ़ता है—

  • 2032 — 10 प्रतिशत कमी
  • 2037 — 20 प्रतिशत कमी
  • 2042 — 30 प्रतिशत कमी
  • 2047 — 85 प्रतिशत कमी

इस प्रकार भारत के लिए 2047 तक HFCs में 85 प्रतिशत की संचयी कमी का लक्ष्य निर्धारित है।

भारत के लिए इसका क्या महत्व है?

भारत दुनिया के उन देशों में है जहां आने वाले दशकों में कूलिंग की मांग में काफी वृद्धि होने की संभावना है। गर्मी बढ़ने के साथ घरों, कार्यालयों, अस्पतालों, उद्योगों, खाद्य भंडारण और परिवहन क्षेत्रों में कूलिंग की जरूरत बढ़ती है।

इसलिए केवल HFCs को कम करना पर्याप्त नहीं होगा। इसके साथ—

  • ऊर्जा-कुशल एयर कंडीशनर और रेफ्रिजरेटर को बढ़ावा देना,
  • कम-GWP वाले रेफ्रिजरेंट अपनाना,
  • कूलिंग उपकरणों की दक्षता बढ़ाना,
  • तकनीकी क्षमता विकसित करना,
  • पुराने उपकरणों और रेफ्रिजरेंट का सुरक्षित प्रबंधन,
  • उद्योगों को नई तकनीक अपनाने में सहायता देना

भी महत्वपूर्ण होगा।

ओजोन संरक्षण और जलवायु परिवर्तन का संबंध

ओजोन परत की रक्षा और जलवायु परिवर्तन को रोकना दो अलग-अलग मुद्दे हैं, लेकिन इनके बीच महत्वपूर्ण संबंध है।

मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल का मूल लक्ष्य ओजोन-क्षयकारी पदार्थों को नियंत्रित करना था। बाद में किगाली संशोधन ने HFCs जैसी शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैसों को कम करने के माध्यम से इस व्यवस्था को जलवायु कार्रवाई से भी जोड़ दिया।

इसलिए आज ओजोन संरक्षण की चर्चा केवल UV विकिरण से सुरक्षा तक सीमित नहीं है। यह टिकाऊ कूलिंग, ऊर्जा दक्षता और कम-कार्बन विकास से भी जुड़ गई है।

ओजोन परत संरक्षण से मिलने वाले लाभ

ओजोन परत के संरक्षण से मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण को कई प्रकार के लाभ मिलते हैं। मजबूत ओजोन परत सूर्य की अत्यधिक UV-B विकिरण से सुरक्षा प्रदान करती है।

अत्यधिक UV विकिरण से मानव स्वास्थ्य पर कई प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकते हैं, जबकि पारिस्थितिकी तंत्र और कृषि पर भी इसका असर पड़ सकता है।

इसलिए ओजोन संरक्षण का अर्थ केवल वातावरण में एक रासायनिक संतुलन बनाए रखना नहीं है, बल्कि मानव स्वास्थ्य, जैव विविधता, खाद्य सुरक्षा और पर्यावरणीय स्थिरता की रक्षा करना भी है।

आगे की चुनौती क्या है?

मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल की सफलता के बावजूद काम पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। अब चुनौती यह है कि सभी देशों में मौजूदा प्रतिबद्धताओं का प्रभावी क्रियान्वयन हो और कूलिंग क्षेत्र तेजी से ऐसे विकल्पों की ओर बढ़े जो ओजोन परत और जलवायु दोनों के लिए अधिक सुरक्षित हों।

विशेष रूप से विकासशील देशों के लिए वित्तीय सहायता, तकनीकी हस्तांतरण, प्रशिक्षित मानव संसाधन और उद्योगों के लिए संक्रमण लागत महत्वपूर्ण मुद्दे हैं।

इसके अलावा, तेजी से बढ़ती कूलिंग मांग को ऊर्जा की बढ़ती खपत के साथ संतुलित करना भी आवश्यक है।

निष्कर्ष

अंतरराष्ट्रीय ओजोन परत संरक्षण दिवस हमें यह याद दिलाता है कि पर्यावरणीय समस्याओं का समाधान वैज्ञानिक प्रमाणों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के आधार पर संभव है।

1987 का मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल मुख्य रूप से ओजोन-क्षयकारी रसायनों को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया था, जबकि 2016 का किगाली संशोधन HFCs को चरणबद्ध रूप से कम करके इस प्रयास को जलवायु कार्रवाई से जोड़ता है।

2026 की “Global action for a cooler planet” थीम इसी व्यापक सोच को सामने रखती है—दुनिया को बढ़ती गर्मी से बचाने के लिए कूलिंग की जरूरत को पूरा करना होगा, लेकिन ऐसी तकनीकों और नीतियों के माध्यम से जो पर्यावरणीय नुकसान को कम करें। इस दृष्टि से ओजोन संरक्षण केवल एक पर्यावरणीय लक्ष्य नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, जलवायु, ऊर्जा और सतत विकास से जुड़ा वैश्विक मुद्दा बन चुका है।