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राष्ट्रीय तटीय मिशन 2.0 क्या है?

Environment 📅 October 11, 2026 National 📅 October 11, 2026
केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने राष्ट्रीय तटीय मिशन 2.0 (National Coastal Mission 2.0—NCM 2.0) के कार्यान्वयन संबंधी दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इस मिशन का उद्देश्य भारत के तटीय एवं समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षण करना, तटीय क्षेत्रों की जलवायु परिवर्तन के प्रति सहनशीलता बढ़ाना तथा तटीय संसाधनों का सतत प्रबंधन सुनिश्चित करना है।

राष्ट्रीय तटीय मिशन 2.0 के लिए वर्ष 2025-26 से 2030-31 तक की अवधि हेतु ₹767 करोड़ का स्वीकृत परिव्यय निर्धारित किया गया है। यह मिशन राष्ट्रीय तटीय मिशन के पहले चरण (NCM 1.0) को समाहित करते हुए संरक्षण एवं प्रबंधन संबंधी गतिविधियों को अधिक व्यापक और व्यवस्थित स्वरूप प्रदान करेगा।

नए दिशा-निर्देशों के माध्यम से केंद्र सरकार, राज्य सरकारों, केंद्रशासित प्रदेशों, अनुसंधान संस्थानों और अन्य संबंधित एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने पर जोर दिया गया है। इसके अंतर्गत प्रक्रियाओं को सरल बनाने, संस्थागत जिम्मेदारियों को स्पष्ट करने तथा निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने का प्रयास किया जाएगा।

भारत की लगभग 11,000 किलोमीटर लंबी तटरेखा विभिन्न प्रकार के पारिस्थितिकी तंत्रों, जैव विविधता, मत्स्य संसाधनों, बंदरगाहों और पर्यटन गतिविधियों का आधार है। इसलिए, तटीय पर्यावरण का संरक्षण देश की पर्यावरणीय सुरक्षा, आर्थिक विकास और आपदा प्रबंधन की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

राष्ट्रीय तटीय मिशन 2.0 के प्रमुख उद्देश्य

राष्ट्रीय तटीय मिशन 2.0 का प्रमुख उद्देश्य तटीय एवं समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षण करते हुए तटीय समुदायों की आजीविका और आर्थिक गतिविधियों को टिकाऊ बनाना है।

इसके प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं:

  • तटीय पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षण: मैंग्रोव, प्रवाल भित्तियों, समुद्री घास और अन्य महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक आवासों का संरक्षण एवं पुनर्स्थापन।

  • जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करना: समुद्र के बढ़ते जलस्तर, तटीय कटाव, चक्रवात और अन्य जलवायु संबंधी जोखिमों के प्रति तटीय क्षेत्रों की सहनशीलता बढ़ाना।

  • जैव विविधता का संरक्षण: तटीय एवं समुद्री क्षेत्रों में पाई जाने वाली वनस्पतियों, जीव-जंतुओं और संकटग्रस्त प्रजातियों के आवासों की रक्षा करना।

  • प्रदूषण प्रबंधन: समुद्री प्लास्टिक, ठोस अपशिष्ट और अन्य प्रदूषकों के प्रभाव को कम करने के लिए प्रभावी व्यवस्था विकसित करना।

  • सतत पर्यटन को बढ़ावा देना: समुद्र तटों और तटीय पर्यटन स्थलों का ऐसा विकास करना, जिससे पर्यावरण को न्यूनतम नुकसान हो।

  • अनुसंधान एवं क्षमता निर्माण: वैज्ञानिक अध्ययन, तकनीकी नवाचार और संबंधित संस्थाओं तथा स्थानीय समुदायों की क्षमता में वृद्धि करना।

  • संस्थागत समन्वय: केंद्र, राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करके योजनाओं के कार्यान्वयन को अधिक प्रभावी बनाना।

राष्ट्रीय तटीय मिशन 1.0 और 2.0 में अंतर

राष्ट्रीय तटीय मिशन का पहला चरण वर्ष 2021-22 से 2025-26 तक लागू किया गया था। इसके अंतर्गत तटीय एवं समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण, मैंग्रोव और प्रवाल भित्तियों के प्रबंधन, अनुसंधान एवं विकास तथा समुद्र तटों के सतत विकास जैसी गतिविधियों को समर्थन दिया गया।

राष्ट्रीय तटीय मिशन 2.0 इसी कार्य को आगे बढ़ाते हुए अधिक व्यापक और समन्वित दृष्टिकोण अपनाता है।

आधार NCM 1.0 NCM 2.0
कार्यान्वयन अवधि 2021-22 से 2025-26 2025-26 से 2030-31
प्रमुख फोकस तटीय पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षण और प्रबंधन संरक्षण के साथ तटीय सहनशीलता, प्रदूषण प्रबंधन और सतत विकास
वित्तीय प्रावधान पहले चरण के लिए निर्धारित प्रावधान ₹767 करोड़ का स्वीकृत परिव्यय
कार्यान्वयन दृष्टिकोण संरक्षण एवं प्रबंधन संबंधी गतिविधियाँ समन्वित शासन, निगरानी, वैज्ञानिक आकलन और संस्थागत क्षमता
प्रमुख दिशा मैंग्रोव, प्रवाल भित्तियाँ, अनुसंधान और समुद्र तटों का विकास पारिस्थितिकी तंत्र का पुनर्स्थापन, जैव विविधता, स्थानिक नियोजन और जलवायु सहनशीलता

NCM 2.0 के अंतर्गत पहले चरण की गतिविधियों को आगे बढ़ाते हुए तटीय क्षेत्रों की बदलती पर्यावरणीय आवश्यकताओं के अनुरूप व्यापक कार्ययोजना अपनाने पर जोर दिया गया है।

राष्ट्रीय तटीय मिशन 2.0 का वित्तीय परिव्यय और अवधि

राष्ट्रीय तटीय मिशन 2.0 के लिए ₹767 करोड़ का स्वीकृत वित्तीय परिव्यय निर्धारित किया गया है। यह केंद्रीय क्षेत्र की योजना (Central Sector Scheme) है और इसकी निर्धारित अवधि वित्तीय वर्ष 2025-26 से 2030-31 तक है।

केंद्रीय क्षेत्र की योजना होने के कारण इसके वित्तपोषण और प्रशासनिक ढाँचे में केंद्र सरकार की प्रमुख भूमिका होती है। योजना की गतिविधियों को संबंधित राज्यों, केंद्रशासित प्रदेशों और कार्यान्वयन एजेंसियों के सहयोग से संचालित किया जाएगा।

इस वित्तीय प्रावधान का उद्देश्य तटीय एवं समुद्री पारिस्थितिकी तंत्रों के संरक्षण, अनुसंधान, पुनर्स्थापन, प्रदूषण नियंत्रण और संस्थागत क्षमता निर्माण जैसी गतिविधियों को समर्थन देना है।

राष्ट्रीय तटीय मिशन 2.0 का भौगोलिक दायरा

राष्ट्रीय तटीय मिशन 2.0 देश के नौ तटीय राज्यों और चार केंद्रशासित प्रदेशों में लागू किया जाएगा। इन क्षेत्रों में भारत के पश्चिमी, पूर्वी और द्वीपीय तटीय पारिस्थितिकी तंत्र शामिल हैं।

नौ तटीय राज्य:

  1. गुजरात

  2. महाराष्ट्र

  3. गोवा

  4. कर्नाटक

  5. केरल

  6. तमिलनाडु

  7. आंध्र प्रदेश

  8. ओडिशा

  9. पश्चिम बंगाल

चार केंद्रशासित प्रदेश:

  1. दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव

  2. अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह

  3. पुडुचेरी

  4. लक्षद्वीप

इन क्षेत्रों में पारिस्थितिकी तंत्र की संरचना, जैव विविधता, समुद्री संसाधन और जलवायु संबंधी जोखिम अलग-अलग हैं। उदाहरण के लिए, गुजरात और महाराष्ट्र के तटीय क्षेत्रों की चुनौतियाँ लक्षद्वीप तथा अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह की प्रवाल भित्तियों एवं द्वीपीय पारिस्थितिकी तंत्रों से भिन्न हो सकती हैं।

इसलिए, मिशन के अंतर्गत स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप संरक्षण और प्रबंधन उपायों को महत्त्व दिया जाएगा।

मैंग्रोव संरक्षण और पुनर्स्थापन

मैंग्रोव ऐसे विशिष्ट वन पारिस्थितिकी तंत्र हैं, जो उष्णकटिबंधीय एवं उपोष्णकटिबंधीय तटीय क्षेत्रों में खारे या लवणीय जल के प्रभाव वाले स्थानों पर विकसित होते हैं।

भारत में मैंग्रोव विशेष रूप से सुंदरबन, गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, ओडिशा तथा अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह के कुछ क्षेत्रों में पाए जाते हैं।

मैंग्रोव का पर्यावरणीय महत्त्व निम्नलिखित है:

  • तटीय सुरक्षा: मैंग्रोव की जड़ें मिट्टी को बाँधने और लहरों के प्रभाव को कम करने में मदद करती हैं।

  • जैव विविधता: ये मछलियों, केकड़ों, पक्षियों और अनेक अन्य जीवों को आवास प्रदान करते हैं।

  • कार्बन अवशोषण: मैंग्रोव वनस्पतियाँ और इनके नीचे की मिट्टी कार्बन का भंडारण कर सकती हैं।

  • आजीविका: इन पारिस्थितिकी तंत्रों पर मत्स्य पालन और अन्य स्थानीय आर्थिक गतिविधियाँ निर्भर हो सकती हैं।

राष्ट्रीय तटीय मिशन 2.0 के अंतर्गत मैंग्रोव संरक्षण और पारिस्थितिकी तंत्र के पुनर्स्थापन से तटीय क्षेत्रों की प्राकृतिक सुरक्षा को मजबूत करने में मदद मिल सकती है।

प्रवाल भित्तियों और समुद्री जैव विविधता का संरक्षण

प्रवाल भित्तियाँ समुद्री जैव विविधता के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र हैं। इनका निर्माण मुख्यतः प्रवाल जीवों द्वारा लंबे समय में किया जाता है और ये अनेक समुद्री प्रजातियों को आश्रय प्रदान करती हैं।

भारत में प्रवाल भित्तियाँ विशेष रूप से निम्नलिखित क्षेत्रों में पाई जाती हैं:

  • लक्षद्वीप द्वीपसमूह

  • अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह

  • मन्नार की खाड़ी

  • कच्छ की खाड़ी

  • पाक खाड़ी के कुछ क्षेत्र

समुद्र के तापमान में वृद्धि, समुद्री अम्लीकरण, प्रदूषण और कुछ मानवीय गतिविधियाँ प्रवाल भित्तियों के लिए गंभीर खतरे उत्पन्न कर सकती हैं।

राष्ट्रीय तटीय मिशन 2.0 के अंतर्गत वैज्ञानिक अनुसंधान, पारिस्थितिकी तंत्र की निगरानी और संरक्षण संबंधी गतिविधियों को समर्थन देकर प्रवाल भित्तियों तथा अन्य समुद्री आवासों की सुरक्षा को मजबूत किया जा सकता है।

तटीय क्षेत्रों की जलवायु सहनशीलता को मजबूत करना

जलवायु सहनशीलता (Climate Resilience) का अर्थ है जलवायु परिवर्तन और उससे संबंधित आपदाओं के प्रभावों का सामना करने, उनसे उबरने तथा आवश्यकतानुसार अनुकूलन करने की क्षमता।

भारत के तटीय क्षेत्र समुद्र के बढ़ते जलस्तर, चक्रवात, तूफानी ज्वार, तटीय कटाव और खारे पानी के अंतर्देशीय प्रवेश जैसी चुनौतियों का सामना करते हैं।

NCM 2.0 के अंतर्गत तटीय सहनशीलता को मजबूत करने के लिए निम्नलिखित गतिविधियाँ महत्त्वपूर्ण हैं:

1. संवेदनशीलता आकलन: तटीय क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले संभावित नुकसान की पहचान करना।

2. पारिस्थितिकी तंत्र का पुनर्स्थापन: मैंग्रोव और अन्य प्राकृतिक तटीय आवासों को बहाल करके उनकी सुरक्षात्मक भूमिका को मजबूत करना।

3. वैज्ञानिक निगरानी: तटीय कटाव, जैव विविधता और पर्यावरणीय बदलावों से संबंधित आंकड़ों का अध्ययन करना।

4. स्थानीय क्षमता निर्माण: संबंधित सरकारी संस्थाओं और तटीय समुदायों को जोखिम प्रबंधन तथा संरक्षण संबंधी गतिविधियों के लिए सक्षम बनाना।

इन प्रयासों से तटीय क्षेत्रों में पर्यावरणीय जोखिमों को बेहतर ढंग से समझने और उनके अनुरूप योजनाएँ बनाने में सहायता मिल सकती है।

तटीय प्रदूषण प्रबंधन और समुद्री प्लास्टिक की समस्या

समुद्री प्रदूषण तटीय पारिस्थितिकी तंत्र के सामने एक प्रमुख चुनौती है। प्लास्टिक कचरा, अनुपचारित अपशिष्ट जल, औद्योगिक प्रदूषक और अन्य ठोस अपशिष्ट समुद्री जीवों तथा तटीय आवासों को नुकसान पहुँचा सकते हैं।

समुद्री प्लास्टिक कचरा मछलियों, कछुओं और समुद्री पक्षियों के लिए खतरा उत्पन्न कर सकता है। इसके अतिरिक्त, प्लास्टिक के छोटे कण समुद्री खाद्य शृंखला में भी प्रवेश कर सकते हैं।

NCM 2.0 में प्रदूषण प्रबंधन को महत्त्व दिए जाने से तटीय क्षेत्रों में कचरा प्रबंधन, प्रदूषण की निगरानी तथा पर्यावरणीय संरक्षण संबंधी उपायों को बेहतर बनाने का अवसर मिलेगा।

हालाँकि, प्रदूषण नियंत्रण के लिए तटीय क्षेत्रों में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, अपशिष्ट जल का उपचार और स्थानीय निकायों की क्षमता बढ़ाने जैसे व्यापक उपाय भी आवश्यक हैं।

सतत तटीय पर्यटन और स्थानिक नियोजन

भारत के समुद्र तट और द्वीपीय क्षेत्र पर्यटन की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। गोवा, केरल, ओडिशा, तमिलनाडु, अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह तथा लक्षद्वीप जैसे क्षेत्रों में पर्यटन स्थानीय अर्थव्यवस्था और रोजगार के अवसरों में योगदान देता है।

लेकिन अनियंत्रित पर्यटन से समुद्र तटों पर कचरा बढ़ने, प्राकृतिक आवासों को नुकसान पहुँचने और जल संसाधनों पर दबाव बढ़ने जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।

इसलिए, सतत तटीय पर्यटन का उद्देश्य आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देते हुए पर्यावरणीय क्षति को कम करना है।

इसी प्रकार, स्थानिक नियोजन (Spatial Planning) के अंतर्गत भूमि उपयोग, तटीय विकास, प्राकृतिक आवासों और संवेदनशील क्षेत्रों की भौगोलिक स्थिति को ध्यान में रखकर विकास संबंधी निर्णय लिए जाते हैं।

राष्ट्रीय तटीय मिशन 2.0 के अंतर्गत इन दृष्टिकोणों को बढ़ावा देने से तटीय क्षेत्रों में विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करने में सहायता मिल सकती है।

अनुसंधान, निगरानी और क्षमता निर्माण

राष्ट्रीय तटीय मिशन 2.0 में वैज्ञानिक अनुसंधान तथा संस्थागत क्षमता निर्माण को विशेष महत्त्व दिया गया है।

तटीय और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र अत्यंत जटिल होते हैं। इनके संरक्षण के लिए समुद्र के तापमान, जैव विविधता, तटीय कटाव, प्रदूषण, मैंग्रोव आवरण और अन्य पर्यावरणीय संकेतकों से संबंधित विश्वसनीय आंकड़ों की आवश्यकता होती है।

अनुसंधान एवं निगरानी से निम्नलिखित लाभ प्राप्त हो सकते हैं:

  • तटीय पारिस्थितिकी तंत्रों की वर्तमान स्थिति का आकलन।

  • पर्यावरणीय परिवर्तनों और उभरते जोखिमों की पहचान।

  • संरक्षण तथा पुनर्स्थापन उपायों की प्रभावशीलता का मूल्यांकन।

  • वैज्ञानिक जानकारी के आधार पर नीतिगत निर्णय लेना।

  • संबंधित संस्थाओं और स्थानीय हितधारकों की तकनीकी क्षमता बढ़ाना।

इन गतिविधियों से मिशन के कार्यान्वयन में पारदर्शिता, जवाबदेही और परिणामों की निगरानी को मजबूत करने में सहायता मिल सकती है।

संपूर्ण सरकारी दृष्टिकोण (Whole-of-Government Approach)

NCM 2.0 के कार्यान्वयन दिशा-निर्देशों की एक प्रमुख विशेषता संपूर्ण सरकारी दृष्टिकोण को बढ़ावा देना है।

तटीय क्षेत्रों का प्रबंधन केवल पर्यावरण मंत्रालय या किसी एक विभाग की जिम्मेदारी नहीं है। इसमें पर्यावरण संरक्षण, मत्स्य पालन, पर्यटन, बंदरगाह, शहरी विकास, आपदा प्रबंधन और स्थानीय प्रशासन जैसे अनेक क्षेत्र शामिल हैं।

इसलिए, प्रभावी तटीय प्रबंधन के लिए संबंधित मंत्रालयों, राज्य सरकारों, केंद्रशासित प्रदेशों, स्थानीय निकायों और वैज्ञानिक संस्थानों के बीच समन्वय आवश्यक है।

नए दिशा-निर्देशों के अंतर्गत:

  • प्रशासनिक प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करने पर जोर दिया गया है।

  • विभिन्न संस्थाओं की जिम्मेदारियों को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है।

  • निगरानी और कार्यान्वयन व्यवस्था को मजबूत करने पर ध्यान दिया गया है।

  • योजनाओं के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया है।

इस दृष्टिकोण से कार्यों के दोहराव को कम करने और उपलब्ध संसाधनों का अधिक प्रभावी उपयोग करने में मदद मिल सकती है।

राष्ट्रीय तटीय मिशन 2.0 का आर्थिक और सामाजिक महत्त्व

तटीय क्षेत्र भारत की अर्थव्यवस्था के कई महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों का आधार हैं। मत्स्य पालन, समुद्री परिवहन, बंदरगाह, पर्यटन और तटीय व्यापार जैसी गतिविधियाँ इन क्षेत्रों से जुड़ी हैं।

तटीय पारिस्थितिकी तंत्रों के क्षरण से स्थानीय समुदायों की आजीविका, मत्स्य संसाधनों और पर्यटन गतिविधियों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

NCM 2.0 के माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और सतत प्रबंधन करने से दीर्घकाल में निम्नलिखित लाभ प्राप्त हो सकते हैं:

  • तटीय समुदायों की आजीविका को समर्थन।

  • समुद्री जैव विविधता और मत्स्य संसाधनों की सुरक्षा।

  • प्राकृतिक आपदाओं के प्रति तटीय क्षेत्रों की सहनशीलता में सुधार।

  • सतत पर्यटन और पर्यावरण-अनुकूल आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा।

  • तटीय संसाधनों के दीर्घकालीन उपयोग को सुनिश्चित करने में सहायता।

हालाँकि, इन लाभों की वास्तविक उपलब्धि योजना के प्रभावी कार्यान्वयन, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और वैज्ञानिक निगरानी पर निर्भर करेगी।

राष्ट्रीय तटीय मिशन 2.0 का समग्र महत्त्व

राष्ट्रीय तटीय मिशन 2.0 भारत की तटीय पर्यावरण नीति को अधिक व्यापक, समन्वित और जलवायु-संवेदनशील बनाने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण पहल है।

₹767 करोड़ के स्वीकृत परिव्यय और वर्ष 2030-31 तक की निर्धारित अवधि के साथ यह मिशन मैंग्रोव एवं प्रवाल भित्तियों के संरक्षण, तटीय प्रदूषण प्रबंधन, जैव विविधता संरक्षण, जलवायु सहनशीलता, सतत पर्यटन तथा वैज्ञानिक अनुसंधान को एक साझा ढाँचे में आगे बढ़ाने का प्रयास करता है।

यह मिशन विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि भारत के तटीय क्षेत्र एक ओर आर्थिक विकास और आजीविका के प्रमुख केंद्र हैं, वहीं दूसरी ओर जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाओं के प्रति संवेदनशील भी हैं।

निष्कर्ष

राष्ट्रीय तटीय मिशन 2.0 का उद्देश्य भारत के तटीय एवं समुद्री पारिस्थितिकी तंत्रों का संरक्षण करते हुए उनका सतत और वैज्ञानिक प्रबंधन सुनिश्चित करना है। यह मिशन पहले चरण की गतिविधियों को आगे बढ़ाकर तटीय सहनशीलता, प्रदूषण नियंत्रण, जैव विविधता संरक्षण और संस्थागत समन्वय को अधिक महत्त्व देता है।

नौ तटीय राज्यों और चार केंद्रशासित प्रदेशों में इसके कार्यान्वयन से भारत के विविध तटीय क्षेत्रों की पर्यावरणीय आवश्यकताओं के अनुरूप संरक्षण उपायों को समर्थन मिल सकता है।

समग्र रूप से, राष्ट्रीय तटीय मिशन 2.0 पर्यावरण संरक्षण, जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन, तटीय समुदायों की आजीविका और सतत आर्थिक विकास के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण पहल है।