इस योजना के माध्यम से लगभग 135 गीगावाट (GW) नवीकरणीय ऊर्जा के पारेषण और ग्रिड में एकीकरण को सक्षम बनाने का लक्ष्य है। इसके अंतर्गत पारेषण लाइनों, सब-स्टेशनों और बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणालियों का विकास किया जाएगा।
भारत में सौर और पवन ऊर्जा की उत्पादन क्षमता तेजी से बढ़ रही है। लेकिन इन स्रोतों से प्राप्त बिजली को उपभोक्ताओं तक पहुँचाने के लिए पर्याप्त पारेषण अवसंरचना और ऊर्जा भंडारण सुविधाओं की आवश्यकता होती है। GEC-III इसी आवश्यकता को पूरा करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण पहल है। इससे नवीकरणीय ऊर्जा की उपलब्धता बढ़ाने, बिजली आपूर्ति को अधिक विश्वसनीय बनाने और जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करने में मदद मिलने की उम्मीद है।
ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर (GEC) योजना क्या है?
ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर एक ऐसी योजना है, जिसका उद्देश्य नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से उत्पादित बिजली को विद्युत ग्रिड में प्रभावी ढंग से शामिल करने के लिए आवश्यक पारेषण अवसंरचना विकसित करना है।
सौर और पवन ऊर्जा जैसे स्रोतों से बिजली का उत्पादन मौसम, धूप और हवा की उपलब्धता पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए, सौर ऊर्जा का उत्पादन दिन के समय अधिक होता है, जबकि रात में सौर बिजली का उत्पादन नहीं होता। इसी प्रकार, पवन ऊर्जा का उत्पादन हवा की गति के अनुसार बदलता रहता है।
इस कारण नवीकरणीय ऊर्जा के बड़े हिस्से को ग्रिड में शामिल करने के लिए ऐसी व्यवस्था आवश्यक है, जो बिजली के उत्पादन और मांग के बीच संतुलन बनाए रख सके।
ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर योजना के अंतर्गत निम्नलिखित कार्य किए जाते हैं:
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राज्यों के भीतर उच्च क्षमता वाली विद्युत पारेषण लाइनों का निर्माण।
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नए सब-स्टेशनों की स्थापना और मौजूदा सब-स्टेशनों का उन्नयन।
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नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन केंद्रों को विद्युत ग्रिड से जोड़ना।
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बिजली की पारेषण क्षमता और ग्रिड की स्थिरता में सुधार।
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बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणालियों के माध्यम से बिजली की उपलब्धता और आपूर्ति में लचीलापन बढ़ाना।
इस प्रकार, यह योजना नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन क्षमता और बिजली की वास्तविक आपूर्ति के बीच आवश्यक अवसंरचनात्मक कड़ी का कार्य करती है।
ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर योजना की शुरुआत और कार्यान्वयन
ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर योजना के अंतर्गत राज्यों के भीतर पारेषण तंत्र को विकसित करने की पहल को वर्ष 2015 में आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (Cabinet Committee on Economic Affairs—CCEA) की मंजूरी मिली थी।
नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (Ministry of New and Renewable Energy—MNRE) इस योजना के कार्यान्वयन में प्रमुख भूमिका निभाता है।
योजना के अंतर्गत प्रारंभिक स्तर पर 10 राज्यों में पारेषण अवसंरचना विकसित की गई। ये राज्य हैं:
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आंध्र प्रदेश
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गुजरात
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हिमाचल प्रदेश
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कर्नाटक
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केरल
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मध्य प्रदेश
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महाराष्ट्र
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राजस्थान
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तमिलनाडु
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उत्तर प्रदेश
योजना के अंतर्गत उपलब्ध विवरण के अनुसार, कुल 9,856 सर्किट किलोमीटर (ckm) अंतरराज्यीय नहीं, बल्कि अंतःराज्यीय पारेषण लाइनें तथा 24,300 मेगा वोल्ट-एम्पियर (MVA) क्षमता के सब-स्टेशन चालू किए जा चुके हैं।
यह उपलब्धि राज्यों के भीतर नवीकरणीय ऊर्जा की निकासी और विद्युत ग्रिड में उसके एकीकरण को सुविधाजनक बनाने की दिशा में महत्त्वपूर्ण है।
GEC-III योजना की प्रमुख विशेषताएँ
GEC-III योजना में पारेषण अवसंरचना के विस्तार के साथ-साथ ऊर्जा भंडारण पर भी विशेष ध्यान दिया गया है। इसका उद्देश्य नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन में होने वाले उतार-चढ़ाव के बावजूद बिजली आपूर्ति को अधिक स्थिर और विश्वसनीय बनाना है।
1. कुल वित्तीय परिव्यय
योजना का कुल परिव्यय ₹1,86,405 करोड़ निर्धारित किया गया है। इसमें प्रमुख घटक निम्नलिखित हैं:
| घटक | निर्धारित राशि |
|---|---|
| अंतःराज्यीय पारेषण प्रणाली का विकास | ₹1,36,378 करोड़ |
| 50 GWh बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली | ₹50,000 करोड़ |
| कुल परियोजना परिव्यय | ₹1,86,405 करोड़ |
| केंद्रीय वित्तीय सहायता | ₹54,082 करोड़ |
इन आंकड़ों के अनुसार, योजना का सबसे बड़ा हिस्सा पारेषण नेटवर्क के निर्माण और सुदृढ़ीकरण पर खर्च किया जाएगा। इसके अतिरिक्त, बड़े पैमाने पर बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली स्थापित करने के लिए अलग से वित्तीय प्रावधान किया गया है।
2. 135 GW नवीकरणीय ऊर्जा के पारेषण का लक्ष्य
इस योजना का एक प्रमुख उद्देश्य विभिन्न राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में 135 गीगावाट तक नवीकरणीय ऊर्जा के पारेषण को सक्षम बनाना है।
इसके लिए विद्युत पारेषण नेटवर्क की क्षमता बढ़ाई जाएगी, ताकि सौर और पवन ऊर्जा परियोजनाओं से उत्पादित बिजली को ग्रिड में शामिल करने के दौरान होने वाली बाधाओं को कम किया जा सके।
3. वर्ष 2032-33 तक स्थापना का लक्ष्य
योजना के अंतर्गत निर्धारित अवसंरचना और ऊर्जा भंडारण प्रणालियों को वित्तीय वर्ष 2032-33 तक विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है।
इस समयसीमा के दौरान पारेषण लाइनों, सब-स्टेशनों और बैटरी भंडारण सुविधाओं का विकास किया जाना प्रस्तावित है।
बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली (BESS) की भूमिका
GEC-III का एक महत्त्वपूर्ण घटक 50 गीगावाट-घंटे (GWh) क्षमता वाली बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली (Battery Energy Storage System—BESS) की स्थापना है। इसके लिए ₹50,000 करोड़ का प्रावधान किया गया है।
BESS ऐसी तकनीक है, जिसके माध्यम से बिजली को बैटरियों में संग्रहित किया जा सकता है और आवश्यकता पड़ने पर उसे दोबारा ग्रिड में उपलब्ध कराया जा सकता है।
इसका महत्त्व इसलिए बढ़ जाता है, क्योंकि सौर और पवन ऊर्जा का उत्पादन हर समय समान नहीं रहता।
उदाहरण के लिए, दिन के समय सौर ऊर्जा का उत्पादन अधिक होने पर अतिरिक्त बिजली को बैटरियों में संग्रहित किया जा सकता है। शाम या रात के समय, जब सौर ऊर्जा का उत्पादन कम हो जाता है लेकिन बिजली की मांग अधिक हो सकती है, तब संग्रहित ऊर्जा का उपयोग किया जा सकता है।
BESS के प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैं:
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नवीकरणीय ऊर्जा का बेहतर उपयोग: अतिरिक्त उत्पादित बिजली को संग्रहित करके बाद में उपयोग किया जा सकता है।
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ग्रिड की स्थिरता: बिजली की आपूर्ति और मांग के बीच अंतर को कम करने में सहायता मिलती है।
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पीक आवर में आपूर्ति: अधिक मांग वाले समय में संग्रहित ऊर्जा उपलब्ध कराई जा सकती है।
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ऊर्जा की बर्बादी में कमी: पारेषण संबंधी बाधाओं या सीमित मांग के कारण नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन को कम करने की आवश्यकता घट सकती है।
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गैर-सौर घंटों में बिजली की उपलब्धता: दिन में संग्रहित बिजली का उपयोग रात के समय भी किया जा सकता है।
इस योजना के अंतर्गत बैटरी प्रणालियाँ नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादकों के परिसर में या ग्रिड के लिए महत्त्वपूर्ण अन्य स्थानों पर स्थापित की जा सकती हैं।
अंतःराज्यीय विद्युत पारेषण प्रणाली (InSTS) क्या है?
अंतःराज्यीय विद्युत पारेषण प्रणाली वह नेटवर्क है, जिसके माध्यम से किसी राज्य की सीमाओं के भीतर बिजली को उत्पादन केंद्रों से विभिन्न सब-स्टेशनों और वितरण नेटवर्क तक पहुँचाया जाता है।
इसमें उच्च वोल्टेज वाली पारेषण लाइनें, सब-स्टेशन, ट्रांसफॉर्मर और संबंधित विद्युत उपकरण शामिल होते हैं।
भारत में नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाएँ प्रायः उन क्षेत्रों में स्थापित की जाती हैं, जहाँ पर्याप्त धूप, तेज हवा या अन्य उपयुक्त प्राकृतिक संसाधन उपलब्ध हों। लेकिन बिजली की मांग औद्योगिक क्षेत्रों, शहरों और आवासीय क्षेत्रों में अलग-अलग स्थानों पर होती है।
यदि उत्पादन केंद्रों से बिजली को मांग वाले क्षेत्रों तक पहुँचाने के लिए पर्याप्त पारेषण क्षमता उपलब्ध नहीं है, तो उत्पादित बिजली का पूरा उपयोग नहीं हो पाता।
GEC-III के अंतर्गत अंतःराज्यीय पारेषण नेटवर्क को मजबूत करके इस समस्या को कम करने का प्रयास किया जाएगा।
केंद्रीय वित्तीय सहायता (CFA) का प्रावधान
GEC-III के लिए ₹54,082 करोड़ की केंद्रीय वित्तीय सहायता (Central Financial Assistance—CFA) निर्धारित की गई है।
इस सहायता का उद्देश्य पारेषण अवसंरचना विकसित करने से जुड़ी वित्तीय चुनौतियों को कम करना और राज्यों में नवीकरणीय ऊर्जा के एकीकरण को सुविधाजनक बनाना है।
पारेषण नेटवर्क के निर्माण और संचालन की लागत अंततः बिजली प्रणाली की कुल लागत को प्रभावित कर सकती है। केंद्रीय सहायता से पारेषण शुल्क के बोझ को कम करने में मदद मिल सकती है, जिससे बिजली की लागत को नियंत्रित रखने में सहायता मिलेगी।
इस प्रकार, केंद्रीय वित्तीय सहायता का उद्देश्य केवल अवसंरचना निर्माण को प्रोत्साहित करना नहीं है, बल्कि नवीकरणीय ऊर्जा को ग्रिड तक पहुँचाने की लागत को भी अधिक प्रबंधनीय बनाना है।
हालाँकि, बिजली की अंतिम कीमत पर इसका वास्तविक प्रभाव परियोजना लागत, वित्तपोषण, पारेषण शुल्क और संबंधित नियामकीय व्यवस्थाओं पर निर्भर करेगा।
योजना के अंतर्गत परियोजनाओं के कार्यान्वयन की व्यवस्था
GEC-III में नई पारेषण परियोजनाओं और मौजूदा नेटवर्क के उन्नयन के लिए अलग-अलग कार्यान्वयन मॉडल निर्धारित किए गए हैं।
1. टैरिफ आधारित प्रतिस्पर्धी बोली (TBCB)
नई पारेषण परियोजनाओं अर्थात् ग्रीनफील्ड परियोजनाओं को टैरिफ आधारित प्रतिस्पर्धी बोली (Tariff Based Competitive Bidding—TBCB) के माध्यम से लागू किया जाएगा।
इस व्यवस्था में पात्र कंपनियाँ प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया में भाग लेती हैं और निर्धारित शर्तों के अनुसार पारेषण सेवा प्रदान करने के लिए चयनित की जाती हैं।
इसका उद्देश्य प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना और परियोजनाओं के लिए लागत-कुशल विकल्प उपलब्ध कराना है।
2. लागत आधारित मॉडल (Cost Plus Basis—CPB)
मौजूदा पारेषण नेटवर्क के उन्नयन, विस्तार और सुदृढ़ीकरण से संबंधित ब्राउनफील्ड परियोजनाओं को लागत आधारित मॉडल के तहत लागू किया जाएगा।
ऐसी परियोजनाओं में पहले से मौजूद पारेषण लाइनों, सब-स्टेशनों और अन्य सुविधाओं की क्षमता बढ़ाने या उनकी कार्यक्षमता में सुधार करने पर ध्यान दिया जाता है।
3. राज्य पारेषण उपयोगिताओं की भूमिका
राज्य पारेषण उपयोगिताएँ (State Transmission Utilities—STUs) योजना के कार्यान्वयन के लिए समग्र रूप से जिम्मेदार होंगी।
वे संबंधित परियोजनाओं की योजना बनाने, पारेषण नेटवर्क के विकास और राज्य की विद्युत आवश्यकताओं के अनुरूप कार्यों के समन्वय में भूमिका निभाएँगी।
4. ट्रांसमिशन सेवा प्रदाताओं की भूमिका
ट्रांसमिशन सेवा प्रदाता (Transmission Service Providers—TSPs) TBCB के अंतर्गत चयनित होने पर बिल्ड-ओन-ऑपरेट-मेंटेन (Build-Own-Operate-Maintain—BOOM) मॉडल के अनुसार कार्य कर सकते हैं।
इस मॉडल में संबंधित सेवा प्रदाता परियोजना का निर्माण, स्वामित्व, संचालन और रखरखाव निर्धारित अनुबंध की शर्तों के अनुसार करता है।
GEC-III योजना के अपेक्षित परिणाम
GEC-III का प्रभाव केवल विद्युत पारेषण नेटवर्क के विस्तार तक सीमित नहीं रहेगा। इससे ऊर्जा क्षेत्र, विनिर्माण, रोजगार और पर्यावरण पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ने की संभावना है।
1. गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता बढ़ाने में योगदान
भारत ने वर्ष 2035 तक 900 GW स्थापित गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता प्राप्त करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। GEC-III इस दिशा में आवश्यक पारेषण और ऊर्जा भंडारण अवसंरचना उपलब्ध कराने में योगदान दे सकती है।
यहाँ गैर-जीवाश्म ऊर्जा में सौर, पवन, जलविद्युत और अन्य गैर-जीवाश्म स्रोत शामिल हो सकते हैं। निर्धारित लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उत्पादन क्षमता के विस्तार के साथ-साथ ग्रिड की क्षमता बढ़ाना भी आवश्यक होगा।
2. ऊर्जा सुरक्षा को मजबूती
नवीकरणीय ऊर्जा की उपलब्धता और उपयोग बढ़ने से बिजली उत्पादन में कोयले, प्राकृतिक गैस और अन्य जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
इससे भारत की दीर्घकालीन ऊर्जा सुरक्षा को समर्थन मिलेगा। विशेष रूप से, स्वदेशी सौर और पवन संसाधनों का अधिक उपयोग आयातित ईंधनों की आवश्यकता कम करने में सहायक हो सकता है।
3. कार्बन उत्सर्जन में कमी
नवीकरणीय ऊर्जा के बेहतर एकीकरण से बिजली की मांग को पूरा करने के लिए जीवाश्म ईंधन आधारित उत्पादन पर निर्भरता घटाई जा सकती है।
यदि अतिरिक्त सौर और पवन बिजली को प्रभावी ढंग से ग्रिड में शामिल किया जाता है, तो इससे विद्युत क्षेत्र के कार्बन उत्सर्जन को कम करने में सहायता मिल सकती है।
हालाँकि, वास्तविक उत्सर्जन कटौती इस बात पर निर्भर करेगी कि नवीकरणीय ऊर्जा कितनी मात्रा में जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली उत्पादन का स्थान लेती है।
4. रोजगार के अवसरों में वृद्धि
पारेषण लाइनों, सब-स्टेशनों और बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणालियों के निर्माण से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार उत्पन्न होने की संभावना है।
निर्माण, विद्युत उपकरणों के उत्पादन, परियोजना प्रबंधन, इंजीनियरिंग, परिवहन और रखरखाव जैसे क्षेत्रों में रोजगार के अवसर विकसित हो सकते हैं।
इसके अलावा, बैटरी निर्माण और ऊर्जा भंडारण उद्योग के विस्तार से कुशल तकनीकी श्रमिकों तथा विशेषज्ञों की मांग बढ़ सकती है।
5. विद्युत ग्रिड की विश्वसनीयता में सुधार
पारेषण नेटवर्क के सुदृढ़ीकरण और ऊर्जा भंडारण सुविधाओं के विस्तार से बिजली आपूर्ति में होने वाले उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।
इससे बिजली की मांग और आपूर्ति के बीच बेहतर संतुलन स्थापित किया जा सकेगा और नवीकरणीय ऊर्जा की अधिक मात्रा को ग्रिड में समाहित करना आसान होगा।
भारत के नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्यों के लिए GEC-III का महत्त्व
भारत ने स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने और ऊर्जा क्षेत्र में कार्बन उत्सर्जन कम करने की दिशा में कई पहल की हैं। सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और अन्य गैर-जीवाश्म स्रोतों की स्थापित क्षमता बढ़ने के साथ ही बिजली को विश्वसनीय तरीके से उपभोक्ताओं तक पहुँचाने की आवश्यकता भी बढ़ रही है।
GEC-III इस चुनौती का समाधान करने के लिए उत्पादन, पारेषण और भंडारण के बीच समन्वय स्थापित करने का प्रयास करती है।
यदि नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं के साथ पर्याप्त पारेषण क्षमता उपलब्ध हो, तो नए ऊर्जा संयंत्रों से उत्पादित बिजली का अधिक प्रभावी उपयोग किया जा सकता है। इसी प्रकार, बैटरी भंडारण प्रणाली उपलब्ध होने से बिजली उत्पादन और मांग के समय में होने वाले अंतर को कम किया जा सकता है।
इस प्रकार, यह योजना भारत के ऊर्जा संक्रमण को केवल उत्पादन क्षमता बढ़ाने तक सीमित रखने के बजाय संपूर्ण विद्युत प्रणाली को अधिक सक्षम बनाने की दिशा में काम करती है।
GEC-III के कार्यान्वयन में प्रमुख चुनौतियाँ
योजना के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए कुछ चुनौतियों पर ध्यान देना आवश्यक होगा।
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भूमि और अनुमतियाँ: पारेषण लाइनों तथा सब-स्टेशनों के निर्माण के लिए भूमि, मार्ग निर्धारण और आवश्यक अनुमतियों की जरूरत होती है।
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परियोजना लागत: बड़े पारेषण नेटवर्क और बैटरी प्रणालियों के निर्माण में भारी पूँजी निवेश की आवश्यकता होगी।
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तकनीकी एकीकरण: सौर और पवन ऊर्जा के उत्पादन में होने वाले उतार-चढ़ाव को संभालने के लिए उन्नत ग्रिड प्रबंधन की जरूरत होगी।
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बैटरी की लागत और उपलब्धता: बड़े पैमाने पर ऊर्जा भंडारण के लिए बैटरियों की लागत, आपूर्ति शृंखला, जीवनकाल और पुनर्चक्रण महत्त्वपूर्ण होंगे।
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राज्यों के बीच समन्वय: विभिन्न राज्य एजेंसियों, परियोजना विकासकर्ताओं और पारेषण सेवा प्रदाताओं के बीच प्रभावी समन्वय आवश्यक होगा।
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समयबद्ध क्रियान्वयन: वर्ष 2032-33 तक निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए परियोजनाओं की योजना, वित्तपोषण, निर्माण और संचालन समय पर पूरा करना होगा।
इन चुनौतियों का प्रभावी समाधान योजना से अपेक्षित लाभ प्राप्त करने के लिए आवश्यक होगा।
ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर और सतत विकास
GEC-III का संबंध ऊर्जा दक्षता, स्वच्छ ऊर्जा और पर्यावरण संरक्षण जैसे व्यापक सतत विकास उद्देश्यों से है।
यह योजना सतत विकास लक्ष्य 7 (स्वच्छ और किफायती ऊर्जा), लक्ष्य 9 (उद्योग, नवाचार और अवसंरचना), लक्ष्य 13 (जलवायु कार्रवाई) तथा लक्ष्य 8 (सम्मानजनक कार्य और आर्थिक विकास) में योगदान दे सकती है।
पारेषण अवसंरचना और ऊर्जा भंडारण का विस्तार स्वच्छ ऊर्जा के अधिक उपयोग को संभव बनाता है। इससे दीर्घकाल में अधिक टिकाऊ विद्युत प्रणाली विकसित करने और ऊर्जा क्षेत्र में तकनीकी नवाचार को प्रोत्साहित करने में मदद मिल सकती है।
निष्कर्ष
ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर योजना का तीसरा चरण भारत की नवीकरणीय ऊर्जा अवसंरचना को मजबूत करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण पहल है। ₹1,86,405 करोड़ के कुल परिव्यय, 135 GW नवीकरणीय ऊर्जा के पारेषण की क्षमता और 50 GWh बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली के प्रावधान के माध्यम से यह योजना बिजली उत्पादन, पारेषण और भंडारण के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने का लक्ष्य रखती है।
इससे नवीकरणीय ऊर्जा का अधिक प्रभावी उपयोग, विद्युत ग्रिड की विश्वसनीयता में सुधार, ऊर्जा सुरक्षा को मजबूती तथा रोजगार सृजन को बढ़ावा मिलने की संभावना है।
समग्र रूप से, GEC-III भारत को अधिक स्वच्छ, विश्वसनीय और टिकाऊ ऊर्जा व्यवस्था की ओर ले जाने वाली एक महत्त्वपूर्ण अवसंरचनात्मक पहल है। इसकी सफलता समयबद्ध कार्यान्वयन, प्रभावी वित्तीय प्रबंधन, आधुनिक तकनीकों और केंद्र तथा राज्यों के बीच समन्वय पर निर्भर करेगी।