भारत सरकार ने Biovigilance Programme of India (BvPI) को मंजूरी प्रदान की है। इसकी घोषणा केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल ने 21 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में भारतीय फार्माकोपिया आयोग (IPC) द्वारा आयोजित छठे राष्ट्रीय फार्माकोविजिलेंस सप्ताह के कार्यक्रम के दौरान की। यह पहल भारत के रोगी-सुरक्षा ढांचे को दवाओं और चिकित्सा उपकरणों से आगे बढ़ाकर अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण से जुड़े जैविक उत्पादों और प्रक्रियाओं तक विस्तारित करेगी।
जैव-सतर्कता कार्यक्रम क्या है?
बायोविजिलेंस (Biovigilance) का उद्देश्य अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण में उपयोग होने वाली दवाओं और जैविक उत्पादों से संबंधित किसी भी प्रतिकूल घटना की पहचान, सूचना, मूल्यांकन, निगरानी और रोकथाम को मजबूत करना है।
इसमें केवल प्रत्यारोपण प्राप्त करने वाले मरीज ही नहीं, बल्कि अंग या ऊतक दाताओं को दिए जाने वाले संबंधित उत्पादों की सुरक्षा की निगरानी भी शामिल होगी। कार्यक्रम के तहत भारतीय फार्माकोपिया आयोग को इस सुरक्षा निगरानी व्यवस्था में प्रमुख भूमिका दी गई है।
रोगी सुरक्षा के लिए तीन स्तरीय निगरानी व्यवस्था
भारत में दवा और स्वास्थ्य उत्पादों की सुरक्षा को मजबूत करने के लिए अब तीन महत्वपूर्ण निगरानी व्यवस्थाएं एक-दूसरे को पूरक करेंगी—
1. फार्माकोविजिलेंस — दवाओं और टीकों से जुड़ी प्रतिकूल घटनाओं की निगरानी।
2. मैटेरियोविजिलेंस — चिकित्सा उपकरणों के उपयोग से होने वाली प्रतिकूल घटनाओं की पहचान और निगरानी।
3. बायोविजिलेंस — अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण में उपयोग होने वाली दवाओं और जैविक उत्पादों से संबंधित प्रतिकूल घटनाओं की निगरानी।
इस प्रकार यह व्यवस्था दवाओं, चिकित्सा उपकरणों और प्रत्यारोपण प्रक्रियाओं से जुड़े रोगी-सुरक्षा जोखिमों की व्यापक निगरानी में सहायता करेगी।
फार्माकोविजिलेंस क्या है?
फार्माकोविजिलेंस दवाओं और टीकों से संबंधित प्रतिकूल प्रभावों या अन्य दवा-संबंधी समस्याओं की पहचान, मूल्यांकन, समझ और रोकथाम से जुड़ी विज्ञान एवं गतिविधियों को कहा जाता है।
इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि किसी दवा के उपयोग के बाद मरीज में कोई अप्रत्याशित या हानिकारक प्रभाव तो उत्पन्न नहीं हो रहा है। प्राप्त जानकारी का विश्लेषण करके आवश्यक सुरक्षा उपाय किए जा सकते हैं।
भारत में फार्माकोविजिलेंस प्रोग्राम ऑफ इंडिया (PvPI) के राष्ट्रीय समन्वय केंद्र की भूमिका भारतीय फार्माकोपिया आयोग निभाता है। यह कार्यक्रम प्रतिकूल दवा प्रतिक्रियाओं से संबंधित सूचनाओं को व्यवस्थित रूप से एकत्र करने, उनका मूल्यांकन करने और विश्लेषण करने में मदद करता है।
मैटेरियोविजिलेंस क्या है?
मैटेरियोविजिलेंस चिकित्सा उपकरणों के उपयोग से जुड़ी प्रतिकूल घटनाओं की पहचान, संग्रह, रिपोर्टिंग और विश्लेषण की समन्वित व्यवस्था है।
इसका प्रमुख उद्देश्य चिकित्सा उपकरणों के कारण मरीजों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों की पहचान करना तथा उनकी पुनरावृत्ति को रोकना है।
भारत में मैटेरियोविजिलेंस प्रोग्राम ऑफ इंडिया (MvPI) चिकित्सा उपकरणों से संबंधित सुरक्षा निगरानी को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
प्रत्यारोपण के क्षेत्र में बायोविजिलेंस का महत्व
अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण एक जटिल चिकित्सा प्रक्रिया है, जिसमें मरीजों और दाताओं दोनों की सुरक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। इसमें विभिन्न जैविक उत्पादों और दवाओं का उपयोग किया जा सकता है।
ऐसे उत्पादों से जुड़ी प्रतिकूल घटनाओं की व्यवस्थित रिपोर्टिंग और निगरानी से संभावित सुरक्षा समस्याओं की समय पर पहचान की जा सकती है।
बायोविजिलेंस कार्यक्रम के माध्यम से प्राप्त जानकारी का उपयोग जोखिमों की पहचान, घटनाओं के मूल्यांकन और भविष्य में ऐसी घटनाओं की रोकथाम के लिए किया जा सकेगा।
भारतीय फार्माकोपिया आयोग की भूमिका
भारतीय फार्माकोपिया आयोग (IPC) स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अधीन एक स्वायत्त संस्था है। इसका प्रमुख उद्देश्य देश में दवाओं के लिए आधिकारिक गुणवत्ता मानक तैयार करना और उन्हें समय-समय पर अद्यतन करना है। IPC भारतीय फार्माकोपिया और राष्ट्रीय फार्मूलरी ऑफ इंडिया जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेजों के प्रकाशन में भी भूमिका निभाता है।
IPC दवाओं की पहचान, शुद्धता और गुणवत्ता से संबंधित मानकों के विकास में कार्य करता है। इसके अतिरिक्त, यह स्वास्थ्य पेशेवरों को दवाओं के तर्कसंगत उपयोग को बढ़ावा देने वाली जानकारी उपलब्ध कराने में भी योगदान देता है।
भारतीय फार्माकोपिया आयोग की स्थापना और संचालन
IPC को भारत सरकार द्वारा दवाओं के आधिकारिक मानकों से संबंधित कार्यों के लिए स्थापित किया गया था। IPC 1 जनवरी 2009 से एक स्वायत्त संस्था के रूप में पूर्ण रूप से कार्यरत हुआ और यह स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण में कार्य करता है।
IPC के माध्यम से भारतीय फार्माकोपिया के मानकों को नियमित रूप से संशोधित किया जाता है तथा नए दवा मानकों और आवश्यक मोनोग्राफ को शामिल किया जाता है।
भारतीय फार्माकोपिया क्या है?
इंडियन फार्माकोपिया (IP) भारत में दवाओं की गुणवत्ता के आधिकारिक मानकों का प्रमुख दस्तावेज है। इसमें दवाओं की पहचान, शुद्धता और सामर्थ्य से संबंधित मानक निर्धारित किए जाते हैं।
IPC इन मानकों को वैज्ञानिक एवं तकनीकी विकास के अनुरूप समय-समय पर अद्यतन करता है। इन मानकों का उपयोग भारत में दवाओं की गुणवत्ता नियंत्रण और गुणवत्ता आश्वासन में किया जाता है।
भारतीय फार्माकोपिया संदर्भ पदार्थ
IPC Indian Pharmacopoeia Reference Substances (IPRS) भी विकसित करता है। इनका उपयोग परीक्षण किए जा रहे पदार्थ की पहचान और उसकी शुद्धता की जांच के लिए संदर्भ के रूप में किया जाता है।
इन्हें दवा परीक्षण के दौरान एक प्रकार के मानक संदर्भ के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, जिससे निर्धारित मानकों के अनुरूप गुणवत्ता की जांच में सहायता मिलती है।
IPC की तीन-स्तरीय संरचना
भारतीय फार्माकोपिया आयोग की संस्थागत संरचना में तीन प्रमुख निकाय शामिल हैं—
- सामान्य निकाय (General Body)
- शासी निकाय (Governing Body)
- वैज्ञानिक निकाय (Scientific Body)
इन निकायों को IPC सचिवालय और इंडियन फार्माकोपिया प्रयोगशाला (IPL) का सहयोग प्राप्त होता है। वैज्ञानिक निकाय तथा विशेषज्ञ समितियां भारतीय फार्माकोपिया में शामिल किए जाने वाले मानकों की वैज्ञानिक उपयुक्तता का परीक्षण करती हैं।
वैज्ञानिक निकाय और विशेषज्ञ समितियों की भूमिका
IPC के वैज्ञानिक कार्यों में विभिन्न विशेषज्ञ समितियों और विशेषज्ञ सदस्यों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। वे दवाओं के मौजूदा मानकों की समीक्षा करते हैं और आवश्यकता के अनुसार नए मानकों या मोनोग्राफ को शामिल करने पर विचार करते हैं।
इस प्रक्रिया में दवाओं के निर्माण और विश्लेषण से संबंधित तकनीकी प्रगति, गुणवत्ता मानकों का सामंजस्य तथा देश में उपलब्ध परीक्षण सुविधाओं जैसे पहलुओं को ध्यान में रखा जाता है।
रोगी सुरक्षा के लिए व्यापक दृष्टिकोण
नई बायोविजिलेंस पहल भारत की रोगी-सुरक्षा व्यवस्था को केवल दवाओं तक सीमित न रखते हुए चिकित्सा उत्पादों और प्रत्यारोपण से जुड़े जोखिमों तक विस्तारित करती है।
इसका व्यापक उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी दवा, चिकित्सा उपकरण या प्रत्यारोपण से जुड़ी प्रतिकूल घटना सामने आने पर उसकी सूचना व्यवस्थित रूप से दर्ज हो, उसका वैज्ञानिक मूल्यांकन किया जाए और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाए जा सकें।
भारत की फार्माकोविजिलेंस क्षमता में प्रगति
कार्यक्रम के दौरान अनुप्रिया पटेल ने बताया कि भारत का योगदान विश्व स्वास्थ्य संगठन के रोगी-सुरक्षा डेटाबेस में 2009–2014 के दौरान 123वें स्थान से बढ़कर वैश्विक स्तर पर 8वें स्थान पर पहुंच गया है। उन्होंने इसे भारत में स्वयं दवा-सुरक्षा संबंधी साक्ष्य तैयार करने और वैश्विक स्तर पर योगदान देने की बढ़ती क्षमता से जोड़ा।
देश में लगभग 1,150 प्रतिकूल दवा प्रतिक्रिया रिपोर्टिंग केंद्र भी संचालित हैं और इस नेटवर्क को प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा स्तर तक विस्तारित करने की योजना पर जोर दिया गया है।
बायोविजिलेंस कार्यक्रम का महत्व
बायोविजिलेंस कार्यक्रम से अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण से संबंधित सुरक्षा निगरानी को एक अधिक व्यवस्थित ढांचा मिल सकता है। प्रतिकूल घटनाओं की रिपोर्टिंग और वैज्ञानिक विश्लेषण से स्वास्थ्य पेशेवरों को संभावित जोखिमों को समझने तथा आवश्यक निवारक उपाय करने में सहायता मिलेगी।
इस प्रकार फार्माकोविजिलेंस, मैटेरियोविजिलेंस और बायोविजिलेंस का संयुक्त ढांचा भारत में दवाओं, चिकित्सा उपकरणों तथा प्रत्यारोपण प्रक्रियाओं से जुड़े रोगी-सुरक्षा तंत्र को व्यापक बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है।
परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य
- कार्यक्रम: भारत का बायोविजिलेंस कार्यक्रम (Biovigilance Programme of India)
- मंजूरी: भारत सरकार
- घोषणा: अनुप्रिया पटेल
- मंत्रालय: स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय
- मुख्य संस्था: भारतीय फार्माकोपिया आयोग (IPC)
- मुख्य क्षेत्र: अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण से जुड़े जैविक उत्पाद और दवाएं
- फार्माकोविजिलेंस: दवाओं एवं टीकों की सुरक्षा निगरानी
- मैटेरियोविजिलेंस: चिकित्सा उपकरणों की सुरक्षा निगरानी
- बायोविजिलेंस: प्रत्यारोपण में उपयोग होने वाले जैविक उत्पादों एवं संबंधित दवाओं की सुरक्षा निगरानी
- IPC की पूर्ण स्थापना/स्वायत्त संचालन: 1 जनवरी 2009
- IPC के प्रमुख निकाय: सामान्य निकाय, शासी निकाय और वैज्ञानिक निकाय
- सहायक संस्थाएं: IPC सचिवालय और इंडियन फार्माकोपिया प्रयोगशाला (IPL)