Skip to content

मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान फॉर्म 6 में बदलाव पर सुप्रीम कोर्ट ने मांगा जवाब

Legal 📅 October 11, 2026
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision—SIR) के दौरान निर्वाचन आयोग द्वारा फॉर्म 6 के उपयोग में किए गए कथित बदलावों के मामले में केंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उसने फॉर्म 6 में किए गए किसी भी संशोधन को अपनी मंजूरी नहीं दी है।

यह मामला मतदाता सूची में नए मतदाताओं के नाम जोड़ने की प्रक्रिया, निर्वाचन आयोग की निर्णय लेने की शक्तियों और चुनावी नियमों के पालन से संबंधित है। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि निर्वाचन आयोग ने कुछ निर्णय दोनों निर्वाचन आयुक्तों की मंजूरी के बिना लिए। सुप्रीम कोर्ट अब इन आरोपों और आयोग के निर्णयों की वैधानिकता की जांच करेगा।

सुप्रीम कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियां

भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल थे, ने कहा कि निर्वाचन आयोग के निर्णयों की जांच की जाएगी। यदि कोई निर्णय कानून के अनुरूप नहीं पाया जाता है, तो न्यायालय उसके संबंध में उचित कार्रवाई कर सकता है।

इस मामले में न्यायालय की प्रमुख बातें निम्नलिखित हैं:

  • फॉर्म 6 में बदलाव की मंजूरी: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने SIR के दौरान इस्तेमाल किए जा रहे फॉर्म 6 में किसी संशोधन को मंजूरी नहीं दी है।

  • केंद्र और निर्वाचन आयोग को नोटिस: न्यायालय ने याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा।

  • निर्णयों की वैधानिकता की जांच: निर्वाचन आयोग द्वारा लिए गए निर्णयों की कानून के अनुरूप होने के आधार पर समीक्षा की जाएगी।

  • अंतरिम राहत से इनकार: न्यायालय ने अंतिम निर्णय आने तक मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को कोई भी निर्णय लेने से रोकने का अंतरिम आदेश जारी नहीं किया।

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि नोटिस जारी करने का अर्थ यह नहीं है कि न्यायालय ने निर्वाचन आयोग के विरुद्ध लगाए गए आरोपों को सही मान लिया है। इन आरोपों पर संबंधित पक्षों के जवाब और कानूनी दलीलों के आधार पर विचार किया जाएगा।

विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) क्या है?

विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) मतदाता सूची की व्यापक जांच और अद्यतन करने की प्रक्रिया है। इसका उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक सटीक बनाना तथा पात्र मतदाताओं के नाम शामिल करने और अपात्र या गलत प्रविष्टियों की पहचान करने में सहायता करना है।

इस प्रक्रिया के दौरान निर्वाचन आयोग मतदाताओं की पात्रता और उपलब्ध विवरणों की जांच कर सकता है। हालांकि, इस प्रक्रिया में अपनाई जाने वाली प्रत्येक शर्त और प्रक्रिया का संबंधित कानूनों तथा नियमों के अनुरूप होना आवश्यक है।

SIR का संबंध सीधे चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता से है, क्योंकि मतदाता सूची ही यह निर्धारित करने का आधार है कि कौन व्यक्ति चुनाव में मतदान करने का पात्र है।

फॉर्म 6 क्या है?

फॉर्म 6 मतदाता सूची में नया नाम शामिल कराने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला आवेदन-पत्र है। कोई पात्र भारतीय नागरिक निर्धारित नियमों और शर्तों को पूरा करने पर मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज कराने के लिए इसका उपयोग कर सकता है।

फॉर्म 6 का प्रावधान निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 (Registration of Electors Rules, 1960) के अंतर्गत है।

इस फॉर्म का महत्व इसलिए है क्योंकि इसके माध्यम से पात्र नागरिक मतदाता के रूप में पंजीकरण कराने की प्रक्रिया शुरू करते हैं। आवेदन के साथ मांगी गई जानकारी और घोषणा से यह सुनिश्चित करने में सहायता मिल सकती है कि मतदाता सूची में प्रविष्टियां निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार दर्ज की जाएं।

फॉर्म 6 के ऑनलाइन संस्करण में कथित बदलाव क्या था?

विवाद का मुख्य मुद्दा फॉर्म 6 के ऑनलाइन संस्करण के साथ जोड़ी गई एक अतिरिक्त घोषणा है। इस घोषणा के अनुसार, आवेदन करने वाले व्यक्ति को यह बताना आवश्यक था कि क्या उसका अपना नाम अथवा उसके माता-पिता या दादा-दादी में से किसी का नाम पहले किए गए विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान तैयार की गई मतदाता सूची में दर्ज था।

यह घोषणा ऑनलाइन पंजीकरण प्रक्रिया पूरी करने से पहले देनी होती थी।

इस व्यवस्था को लेकर विवाद इसलिए उत्पन्न हुआ क्योंकि याचिकाकर्ताओं ने निर्वाचन आयोग के निर्णय लेने की प्रक्रिया और इस अतिरिक्त आवश्यकता की वैधानिकता पर सवाल उठाए। मामले में यह जांच महत्वपूर्ण है कि अतिरिक्त घोषणा किस आदेश के आधार पर लागू की गई और क्या इसे लागू करने की प्रक्रिया संबंधित कानूनों के अनुरूप थी।

निर्वाचन आयोग के अधिकारियों का पक्ष

निर्वाचन आयोग के अधिकारियों ने कहा कि फॉर्म 6 में बदलाव नहीं किया गया था, बल्कि उसके साथ एक घोषणा जोड़ी गई थी।

आयोग के अनुसार, यह घोषणा बिहार में SIR से संबंधित 24 जून 2025 के आदेश के तहत फॉर्म 6 के साथ संलग्न की गई थी। आयोग ने यह भी कहा कि इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट ने 27 मई के अपने आदेश में बरकरार रखा था।

इस प्रकार, आयोग का तर्क है कि फॉर्म में संशोधन और फॉर्म के साथ अतिरिक्त घोषणा संलग्न करना दो अलग-अलग बातें हैं। न्यायालय के सामने इस अंतर तथा संबंधित आदेशों के कानूनी प्रभाव पर विचार किया जा सकता है।

याचिकाकर्ताओं ने क्या आपत्ति उठाई?

याचिकाओं में निर्वाचन आयोग के कुछ निर्णयों को लेकर आपत्ति की गई है। आरोप है कि आयोग ने कई निर्णय दोनों निर्वाचन आयुक्तों की मंजूरी के बिना लिए।

इस विवाद के प्रमुख पहलू हैं:

  • निर्णय लेने की प्रक्रिया: क्या संबंधित निर्णय निर्धारित संस्थागत प्रक्रिया और आवश्यक अनुमोदन के अनुसार लिए गए?

  • कानूनी अधिकार: क्या निर्वाचन आयोग को फॉर्म 6 के साथ अतिरिक्त घोषणा जोड़ने का अधिकार प्राप्त था?

  • मतदाता पंजीकरण: क्या ऑनलाइन आवेदन के लिए निर्धारित अतिरिक्त घोषणा कानून और नियमों के अनुरूप है?

  • पारदर्शिता और जवाबदेही: क्या चुनावी प्रक्रिया से जुड़े निर्णय उचित कानूनी आधार और स्पष्ट प्रशासनिक प्रक्रिया के अनुसार लिए गए?

इन बिंदुओं पर अंतिम निष्कर्ष निकालने के लिए न्यायालय को संबंधित पक्षों की दलीलों और लागू कानूनी प्रावधानों का परीक्षण करना होगा।

मुख्य निर्वाचन आयुक्त को रोकने की मांग क्यों महत्वपूर्ण थी?

याचिकाकर्ताओं ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को मामले का अंतिम निपटारा होने तक कोई भी निर्णय लेने से रोकने के लिए अंतरिम निर्देश देने की मांग की थी।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया। इसका अर्थ यह है कि इस स्तर पर न्यायालय ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त के निर्णय लेने के अधिकार पर सामान्य रोक नहीं लगाई।

लेकिन अंतरिम राहत से इनकार करने का अर्थ यह भी नहीं है कि न्यायालय ने निर्वाचन आयोग के सभी निर्णयों को वैध घोषित कर दिया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वह आयोग के निर्णयों की वैधानिकता की जांच करेगा और कानून के विपरीत पाए जाने वाले निर्णयों के संबंध में उचित कार्रवाई कर सकता है।

इस मामले का लोकतांत्रिक व्यवस्था पर प्रभाव

मतदाता सूची चुनावी लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण आधार है। मतदाता सूची में पात्र नागरिकों के नाम शामिल होना और पंजीकरण प्रक्रिया का कानून के अनुरूप होना स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव के लिए आवश्यक है।

इस मामले का महत्व कई कारणों से है:

  1. मतदाता पंजीकरण की प्रक्रिया: फॉर्म 6 के माध्यम से नए मतदाताओं के नाम शामिल किए जाते हैं, इसलिए इससे संबंधित अतिरिक्त शर्तों की वैधानिकता महत्वपूर्ण है।

  2. निर्वाचन आयोग की शक्तियां: मामला आयोग के प्रशासनिक अधिकारों और उनके प्रयोग की कानूनी सीमाओं से जुड़ा है।

  3. संस्थागत जवाबदेही: आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया और आवश्यक अनुमोदन के पालन पर सवाल उठे हैं।

  4. न्यायिक समीक्षा: सुप्रीम कोर्ट यह जांच सकता है कि संबंधित निर्णय लागू कानूनों और नियमों के अनुरूप हैं या नहीं।

  5. मतदाताओं के अधिकार: मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए कि पात्र मतदाताओं के पंजीकरण से जुड़े नियम स्पष्ट और कानूनी रूप से उचित हों।

प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण तथ्य

  • मुख्य विषय: भारतीय राजव्यवस्था एवं शासन

  • संबंधित संस्थान: भारत का सर्वोच्च न्यायालय और भारत निर्वाचन आयोग

  • प्रमुख प्रक्रिया: विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR)

  • फॉर्म 6 का उद्देश्य: मतदाता सूची में नया नाम शामिल कराने के लिए आवेदन

  • संबंधित नियम: निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960

  • विवाद का प्रमुख मुद्दा: फॉर्म 6 के साथ अतिरिक्त घोषणा जोड़ने की वैधानिकता और निर्वाचन आयोग के निर्णयों की प्रक्रिया

  • सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई: केंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग को नोटिस

  • अंतरिम राहत: मुख्य निर्वाचन आयुक्त को निर्णय लेने से रोकने की मांग स्वीकार नहीं की गई

  • संवैधानिक संदर्भ: निर्वाचन आयोग की भूमिका, मतदाता पंजीकरण, चुनावी पारदर्शिता और न्यायिक समीक्षा

निष्कर्ष

फॉर्म 6 और विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़ा यह मामला निर्वाचन आयोग की निर्णय प्रक्रिया तथा मतदाता पंजीकरण के नियमों की वैधानिकता पर केंद्रित है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि उसने कथित बदलावों को मंजूरी नहीं दी है और वह संबंधित निर्णयों की कानून के अनुरूप होने के आधार पर जांच करेगा। इस मामले का अंतिम महत्व न्यायालय की आगे की सुनवाई और उसके निर्णय से निर्धारित होगा।