SIOFA में शामिल होने का भारत का निर्णय
भारत सरकार ने दक्षिणी हिंद महासागर मत्स्य समझौते (Southern Indian Ocean Fisheries Agreement—SIOFA) में शामिल होने को मंजूरी दे दी है। यह निर्णय वैश्विक मत्स्य संसाधनों के प्रबंधन में भारत की भूमिका को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे भारत को अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में मत्स्य संसाधनों के संरक्षण, वैज्ञानिक अध्ययन और सतत उपयोग से संबंधित गतिविधियों में अधिक सक्रिय भागीदारी का अवसर मिलेगा।
इस समझौते में शामिल होने से भारत की मछली पकड़ने वाली नौकाओं और मत्स्य व्यवसाय से जुड़े उद्यमों के लिए अंतरराष्ट्रीय समुद्री क्षेत्रों में नए अवसर खुलने की संभावना है। साथ ही, भारत को दक्षिणी हिंद महासागर में मछली पकड़ने से संबंधित नियमों, वैज्ञानिक आकलनों और संरक्षण नीतियों के निर्माण में अधिक प्रभावी भूमिका निभाने का अवसर मिलेगा।
यह निर्णय भारत की नीली अर्थव्यवस्था (Blue Economy) को आगे बढ़ाने के लिए भी महत्वपूर्ण है। नीली अर्थव्यवस्था का अर्थ समुद्र और समुद्री संसाधनों का इस प्रकार उपयोग करना है, जिससे आर्थिक विकास, रोजगार और आजीविका को बढ़ावा मिले तथा समुद्री पर्यावरण और जैव विविधता का संरक्षण भी सुनिश्चित हो।
दक्षिणी हिंद महासागर मत्स्य समझौता (SIOFA) क्या है?
दक्षिणी हिंद महासागर मत्स्य समझौता एक क्षेत्रीय मत्स्य प्रबंधन समझौता है, जिसका उद्देश्य दक्षिणी हिंद महासागर के खुले समुद्री क्षेत्रों में मत्स्य संसाधनों का संरक्षण और सतत प्रबंधन करना है।
इस समझौते पर 7 जुलाई 2006 को रोम, इटली में हस्ताक्षर किए गए थे। यह जून 2012 में लागू हुआ।
SIOFA एक क्षेत्रीय मत्स्य प्रबंधन व्यवस्था के रूप में कार्य करता है। इसके अंतर्गत सदस्य देश समुद्री जीव संसाधनों के वैज्ञानिक प्रबंधन, मछली पकड़ने की गतिविधियों के नियमन और समुद्री पारिस्थितिकी की रक्षा के लिए सहयोग करते हैं।
खुले समुद्र में मछली पकड़ने की गतिविधियां किसी एक देश की सीमाओं तक सीमित नहीं होतीं। इसलिए विभिन्न देशों के बीच साझा नियम और सहयोग आवश्यक होते हैं, ताकि मत्स्य संसाधनों का अत्यधिक दोहन न हो और उनका उपयोग भविष्य की पीढ़ियों के लिए भी संभव बना रहे।
SIOFA के अंतर्गत किन समुद्री संसाधनों का प्रबंधन किया जाता है?
SIOFA समझौते के अंतर्गत निर्धारित क्षेत्र में पाए जाने वाले विभिन्न मत्स्य संसाधनों का प्रबंधन किया जाता है। इनमें मछलियां, मोलस्क, क्रस्टेशियन और समुद्र तल से संबंधित कुछ अन्य जीव शामिल हैं।
-
मछलियां (Fish): समुद्री जल में रहने वाली विभिन्न मछली प्रजातियां, जिनका उपयोग खाद्य आपूर्ति और व्यावसायिक मत्स्य पालन के लिए किया जाता है।
-
मोलस्क (Molluscs): इस समूह में स्क्विड और अन्य संबंधित समुद्री जीव शामिल होते हैं।
-
क्रस्टेशियन (Crustaceans): इस समूह में झींगा, केकड़े और अन्य संबंधित जीव आते हैं।
-
समुद्र तल पर रहने वाली प्रजातियां: समझौते के अंतर्गत कुछ ऐसे जीव भी आते हैं, जो समुद्र तल से जुड़े रहते हैं और जिनका प्रबंधन संबंधित नियमों के अनुसार किया जाता है।
हालांकि, SIOFA के अधिकार क्षेत्र में सभी समुद्री जीव शामिल नहीं हैं। संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून अभिसमय (United Nations Convention on the Law of the Sea—UNCLOS) के परिशिष्ट-I में सूचीबद्ध अत्यधिक प्रवासी प्रजातियां इसके दायरे से बाहर हैं। इसके अतिरिक्त, तटीय देशों के मत्स्य अधिकार क्षेत्र के अधीन आने वाली कुछ समुद्र तल से जुड़ी प्रजातियां भी इस समझौते के दायरे में शामिल नहीं हैं।
इस प्रकार SIOFA का कार्यक्षेत्र निर्धारित समुद्री क्षेत्र और समझौते में वर्णित संसाधनों तक सीमित है।
SIOFA के प्रमुख उद्देश्य
SIOFA का मुख्य उद्देश्य दक्षिणी हिंद महासागर में मत्स्य संसाधनों का दीर्घकालीन संरक्षण सुनिश्चित करना और उनका सतत उपयोग बढ़ावा देना है। इसके लिए समझौते के पक्षकार देश आपसी सहयोग के माध्यम से साझा नियमों और प्रबंधन उपायों को विकसित करते हैं।
इसके प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं:
1. मत्स्य संसाधनों का दीर्घकालीन संरक्षण: समुद्री जीवों की आबादी को इस स्तर पर बनाए रखना, जिससे उनका अनियंत्रित दोहन न हो और उनकी प्रजातियां भविष्य में भी बनी रहें।
2. सतत मत्स्य पालन को बढ़ावा देना: मछली पकड़ने की गतिविधियों को इस प्रकार संचालित करना कि आर्थिक लाभ प्राप्त होने के साथ समुद्री पारिस्थितिकी पर अनावश्यक दबाव न पड़े।
3. सदस्य देशों के बीच सहयोग: वैज्ञानिक जानकारी, अनुसंधान, मत्स्य संसाधनों की स्थिति और प्रबंधन से संबंधित अनुभव साझा करना।
4. विकासशील देशों की आवश्यकताओं पर ध्यान देना: समझौते में शामिल ऐसे विकासशील देशों की जरूरतों को ध्यान में रखना, जो संबंधित समुद्री क्षेत्र के निकट स्थित हैं। इसमें विशेष रूप से अल्पविकसित देशों और छोटे द्वीपीय विकासशील देशों की आवश्यकताओं को महत्व दिया गया है।
इन उद्देश्यों के माध्यम से SIOFA समुद्री संसाधनों के आर्थिक उपयोग और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है।
SIOFA के सदस्य देश और मुख्यालय
SIOFA में दस संविदाकारी पक्ष (Contracting Parties) हैं। इनमें ऑस्ट्रेलिया, चीन, कुक द्वीपसमूह, यूरोपीय संघ, फ्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया, मॉरीशस, सेशेल्स और थाईलैंड शामिल हैं।
इसके अतिरिक्त, भारत और कोमोरोस सहयोगी गैर-संविदाकारी पक्ष (Cooperating Non-Contracting Parties) के रूप में सूचीबद्ध हैं। केन्या, मेडागास्कर, मोजाम्बिक और न्यूजीलैंड ने समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, लेकिन दिए गए विवरण के अनुसार उन्होंने इसका अनुमोदन नहीं किया है।
SIOFA का मुख्यालय रीयूनियन द्वीप के ले पोर्ट (Le Port) में स्थित है।
संविदाकारी पक्ष और सहयोगी गैर-संविदाकारी पक्ष की स्थिति में महत्वपूर्ण अंतर होता है। संविदाकारी पक्ष समझौते के औपचारिक सदस्य होते हैं और उन्हें उसके नियमों के अनुसार निर्णय लेने की प्रक्रिया में पूर्ण भागीदारी प्राप्त होती है। सहयोगी गैर-संविदाकारी पक्ष सहयोग कर सकते हैं, लेकिन उनकी भागीदारी और निर्णय लेने के अधिकार संविदाकारी पक्षों के समान नहीं होते।
हिंद महासागर में क्षेत्रीय मत्स्य प्रबंधन संगठनों की भूमिका
हिंद महासागर में मत्स्य संसाधनों के संरक्षण और प्रबंधन के लिए क्षेत्रीय मत्स्य प्रबंधन संगठन (Regional Fisheries Management Organisations—RFMOs) महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
ये संगठन विभिन्न देशों के बीच सहयोग के माध्यम से समुद्री जीवों के संरक्षण, मछली पकड़ने की गतिविधियों के नियमन और वैज्ञानिक जानकारी के आदान-प्रदान के लिए व्यवस्था प्रदान करते हैं।
हिंद महासागर में इस संदर्भ में दो प्रमुख व्यवस्थाएं महत्वपूर्ण हैं:
1. हिंद महासागर टूना आयोग (Indian Ocean Tuna Commission—IOTC)
यह संगठन हिंद महासागर में टूना और उससे संबंधित अत्यधिक प्रवासी मछली प्रजातियों के प्रबंधन पर ध्यान देता है। भारत वर्ष 1996 से IOTC का संविदाकारी पक्ष है।
2. दक्षिणी हिंद महासागर मत्स्य समझौता (SIOFA)
यह समझौता दक्षिणी हिंद महासागर के निर्धारित खुले समुद्री क्षेत्रों में आने वाले मत्स्य संसाधनों के संरक्षण और सतत उपयोग पर केंद्रित है। इसका कार्यक्षेत्र IOTC से अलग है और यह समझौते में शामिल विशेष समुद्री संसाधनों के प्रबंधन से संबंधित है।
इस प्रकार IOTC और SIOFA की भूमिकाएं अलग-अलग हैं, लेकिन दोनों हिंद महासागर में मत्स्य संसाधनों के बेहतर प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण हैं।
SIOFA में भारत की वर्तमान स्थिति
भारत वर्तमान में SIOFA में सहयोगी गैर-संविदाकारी पक्ष के रूप में भाग ले रहा है। इस स्थिति में भारत को सहयोग करने का अवसर मिलता है, लेकिन निर्णय लेने की प्रक्रिया में उसकी भागीदारी सीमित रहती है।
विशेष रूप से वैज्ञानिक समिति (Scientific Committee) और अनुपालन समिति (Compliance Committee) जैसे महत्वपूर्ण निकायों में भारत की भूमिका संविदाकारी पक्षों के समान पूर्ण नहीं है।
वैज्ञानिक समिति मत्स्य संसाधनों की स्थिति, समुद्री प्रजातियों की आबादी और संरक्षण संबंधी वैज्ञानिक जानकारी का आकलन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। वहीं, अनुपालन समिति समझौते के नियमों और प्रबंधन उपायों के पालन से संबंधित विषयों पर काम करती है।
भारत के संविदाकारी पक्ष बनने से इन निकायों में उसकी पूर्ण भागीदारी का मार्ग खुलेगा। इससे भारत को मत्स्य संसाधनों के प्रबंधन से जुड़े निर्णयों में अपनी आवश्यकताओं और हितों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने का अवसर मिलेगा।
SIOFA में शामिल होने से भारत को क्या लाभ होंगे?
भारत के लिए SIOFA में संविदाकारी पक्ष के रूप में शामिल होना आर्थिक, वैज्ञानिक और रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
1. अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में मछली पकड़ने के नए अवसर
SIOFA के अंतर्गत आने वाले समुद्री क्षेत्रों में भारतीय ध्वज वाले मछली पकड़ने के जहाजों और संबंधित उद्यमों को निर्धारित नियमों के अनुसार अधिकृत मत्स्य गतिविधियां संचालित करने के अवसर मिल सकते हैं।
इन संसाधनों में स्क्विड, टूथफिश, अल्फोंसिनो और अन्य गैर-प्रवासी मछली प्रजातियां शामिल हैं, बशर्ते वे समझौते के लागू क्षेत्र और नियमों के अंतर्गत आती हों।
इससे भारतीय मछुआरों और मत्स्य उद्यमियों के लिए नए व्यावसायिक अवसर पैदा हो सकते हैं। हालांकि, मछली पकड़ने की गतिविधियां संबंधित प्रबंधन नियमों, अनुमतियों और संरक्षण उपायों के अधीन होंगी।
2. वैज्ञानिक अनुसंधान और समुद्री आंकड़ों तक बेहतर पहुंच
SIOFA में पूर्ण भागीदारी से भारत को वैज्ञानिक आंकड़ों, अनुसंधान कार्यक्रमों और मत्स्य संसाधनों के आकलन से संबंधित गतिविधियों में अधिक सक्रिय भूमिका निभाने का अवसर मिलेगा।
समुद्री संसाधनों की आबादी, उनके प्रजनन, वितरण और उपलब्धता का वैज्ञानिक आकलन सतत मत्स्य पालन के लिए आवश्यक है।
यदि किसी प्रजाति का अत्यधिक दोहन होता है, तो उसकी आबादी में गिरावट आ सकती है। वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर मछली पकड़ने की सीमा, मौसम और अन्य प्रबंधन उपाय निर्धारित किए जा सकते हैं।
इससे भारत को अपने मत्स्य क्षेत्र की योजनाओं को बेहतर वैज्ञानिक जानकारी के आधार पर विकसित करने में सहायता मिल सकती है।
3. भारत के रणनीतिक हितों की रक्षा
खुले समुद्र में मत्स्य संसाधनों का प्रबंधन अनेक देशों के साझा हितों से जुड़ा होता है। ऐसे में निर्णय लेने की प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी भारत को अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों को सामने रखने का अवसर प्रदान करेगी।
संविदाकारी पक्ष के रूप में भारत समुद्री संसाधनों के संरक्षण और उपयोग से संबंधित चर्चाओं में अधिक प्रभावी भूमिका निभा सकेगा।
इससे भारत की अंतरराष्ट्रीय समुद्री मामलों में भागीदारी मजबूत हो सकती है और क्षेत्रीय मत्स्य प्रबंधन में उसकी उपस्थिति अधिक औपचारिक रूप ले सकती है।
4. नीली अर्थव्यवस्था को बढ़ावा
नीली अर्थव्यवस्था भारत के आर्थिक विकास का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है। इसमें मत्स्य पालन, समुद्री परिवहन, समुद्री जैव संसाधन, तटीय पर्यटन और अन्य समुद्र आधारित आर्थिक गतिविधियां शामिल हैं।
SIOFA के अंतर्गत अधिकृत मत्स्य गतिविधियों में भागीदारी से भारत के मत्स्य उद्यमों को नए अवसर मिल सकते हैं। इससे संबंधित क्षेत्रों में निवेश, रोजगार और समुद्री संसाधनों के सतत उपयोग को प्रोत्साहन मिल सकता है।
हालांकि, दीर्घकालीन लाभ प्राप्त करने के लिए आधुनिक तकनीक, सुरक्षित जहाजों, वैज्ञानिक प्रबंधन और समुद्री पर्यावरण के संरक्षण पर भी ध्यान देना आवश्यक होगा।
5. अवैध, असूचित और अनियमित मत्स्य पालन पर नियंत्रण
अवैध, असूचित और अनियमित मत्स्य पालन को IUU Fishing कहा जाता है। इसमें बिना अनुमति मछली पकड़ना, पकड़ की सही जानकारी दर्ज न करना या निर्धारित नियमों के विरुद्ध मत्स्य गतिविधियां संचालित करना शामिल है।
ऐसी गतिविधियां मत्स्य संसाधनों के अत्यधिक दोहन और समुद्री पारिस्थितिकी को नुकसान पहुंचा सकती हैं। इससे नियमों का पालन करने वाले मछुआरों और उद्यमियों को भी नुकसान हो सकता है।
SIOFA के अंतर्गत सहयोग करने से भारत अन्य पक्षों के साथ वैज्ञानिक आकलन, जानकारी साझा करने और अवैध मत्स्य गतिविधियों की रोकथाम के प्रयासों में भाग ले सकेगा।
उच्च समुद्र पर निरीक्षण और तटीय सुरक्षा का महत्व
SIOFA के अंतर्गत उच्च समुद्र पर चढ़कर निरीक्षण करने की योजना (High Seas Boarding and Inspection—HSBI Scheme) भी महत्वपूर्ण है। दिए गए विवरण के अनुसार, इस योजना को अपनाया जा चुका है और इसे लागू किया जाना है।
उच्च समुद्र पर निरीक्षण व्यवस्था का उद्देश्य लागू नियमों के अनुसार अधिकृत अधिकारियों को समुद्र में जहाजों की जांच करने और मत्स्य गतिविधियों के अनुपालन की निगरानी करने की सुविधा देना है।
इस तरह की व्यवस्था से मछली पकड़ने वाले जहाजों की गतिविधियों पर निगरानी रखने, नियमों के पालन की जांच करने और अवैध मत्स्य पालन को रोकने में सहायता मिल सकती है।
भारत की सक्रिय भागीदारी से समुद्री संसाधनों के प्रबंधन और क्षेत्रीय सुरक्षा से संबंधित सहयोग को बढ़ावा मिल सकता है। हालांकि, HSBI योजना का संचालन संबंधित अंतरराष्ट्रीय नियमों और निर्धारित अधिकारों के अनुसार ही किया जाएगा।
भारत के मत्स्य क्षेत्र के लिए दीर्घकालीन महत्व
SIOFA में शामिल होने की मंजूरी भारत के मत्स्य क्षेत्र को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक अवसर उपलब्ध कराने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
इससे भारतीय मछुआरों और उद्यमियों को निर्धारित नियमों के अंतर्गत नए समुद्री क्षेत्रों में मत्स्य गतिविधियों के अवसर मिल सकते हैं। साथ ही, वैज्ञानिक अनुसंधान और समुद्री संसाधनों के प्रबंधन में भारत की भागीदारी बढ़ सकती है।
यह निर्णय भारत के लिए केवल आर्थिक अवसरों तक सीमित नहीं है, बल्कि समुद्री पर्यावरण संरक्षण, अवैध मत्स्य पालन की रोकथाम और अंतरराष्ट्रीय समुद्री शासन में अधिक प्रभावी भागीदारी से भी जुड़ा है।
भारत की दीर्घकालीन सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह उपलब्ध अवसरों का उपयोग कितनी प्रभावी ढंग से करता है, मत्स्य संसाधनों का वैज्ञानिक प्रबंधन कैसे सुनिश्चित करता है और समुद्री पर्यावरण की रक्षा के साथ आर्थिक गतिविधियों में किस प्रकार संतुलन स्थापित करता है।