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भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 25.17% हिस्सा वन एवं वृक्ष आवरण के अंतर्गत

Environment 📅 October 11, 2026

भारत ने वन एवं वृक्ष आवरण में वृद्धि की उपलब्धि को किया रेखांकित

भारत ने वन संरक्षण, वृक्ष आवरण में वृद्धि और क्षरित भूमि के पुनर्स्थापन के क्षेत्र में अपनी महत्वपूर्ण उपलब्धियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुत किया है। इस संबंध में इटली की राजधानी रोम में आयोजित खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) की वानिकी समिति के 28वें सत्र (COFO 28) में भारत ने अपने प्रयासों और प्रगति को रेखांकित किया।

वन एवं वृक्ष आवरण किसी देश के पर्यावरणीय संतुलन, जैव विविधता, जलवायु परिवर्तन से निपटने की क्षमता और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। वन कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करने, मिट्टी के कटाव को रोकने, जल चक्र को बनाए रखने तथा अनेक जीव-जंतुओं को प्राकृतिक आवास प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

भारत द्वारा प्रस्तुत जानकारी के अनुसार, देश में वन एवं वृक्ष आवरण का विस्तार बढ़ा है। यह वृद्धि वन संरक्षण, वनीकरण, वृक्षारोपण और वनों के बाहर पेड़ों की संख्या बढ़ाने जैसे प्रयासों से संबंधित है।

भारत में वन एवं वृक्ष आवरण की वर्तमान स्थिति

भारत वन स्थिति रिपोर्ट 2023 (India State of Forest Report—ISFR 2023) के अनुसार, देश का कुल वन एवं वृक्ष आवरण 8.274 करोड़ हेक्टेयर (82.74 मिलियन हेक्टेयर) है। यह भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 25.17 प्रतिशत है।

इस आंकड़े में वन आवरण के साथ-साथ वनों के बाहर स्थित वृक्ष आवरण को भी शामिल किया जाता है। इसलिए इसे केवल अधिसूचित वन क्षेत्रों के क्षेत्रफल के रूप में नहीं समझना चाहिए।

वन एवं वृक्ष आवरण में वृद्धि का अर्थ है कि देश के भौगोलिक क्षेत्र में पेड़ों और वनस्पतियों से आच्छादित क्षेत्रों का विस्तार हुआ है। हालांकि, वन आवरण के आंकड़े और प्राकृतिक वनों की गुणवत्ता अलग-अलग पहलू हैं। वन संरक्षण के मूल्यांकन में पेड़ों की संख्या के साथ-साथ जैव विविधता, वन पारिस्थितिकी तंत्र और प्राकृतिक आवासों की स्थिति पर ध्यान देना भी आवश्यक है।

वर्ष 2021 की तुलना में वन एवं वृक्ष आवरण में वृद्धि

भारत वन स्थिति रिपोर्ट 2023 के अनुसार, देश के वन एवं वृक्ष आवरण में वर्ष 2021 के पिछले आकलन की तुलना में 1,445.81 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि दर्ज की गई।

यह वृद्धि देश में वन संरक्षण और वृक्षारोपण से जुड़े प्रयासों की प्रगति को दर्शाती है। वन एवं वृक्ष आवरण में बदलाव कई प्राकृतिक और मानवीय कारकों पर निर्भर करता है। इनमें पौधों की प्राकृतिक वृद्धि, वनीकरण कार्यक्रम, वन क्षेत्रों की सुरक्षा और कृषि अथवा अन्य भूमि उपयोगों के साथ मौजूद पेड़ों की संख्या में बदलाव शामिल हैं।

हालांकि, कुल वन एवं वृक्ष आवरण में वृद्धि को केवल नए वन विकसित होने का परिणाम नहीं माना जा सकता। इसमें पहले से मौजूद वनस्पतियों की वृद्धि और वनों के बाहर वृक्ष आवरण में होने वाले परिवर्तन भी योगदान देते हैं।

भारत वन स्थिति रिपोर्ट क्या है?

भारत वन स्थिति रिपोर्ट (ISFR) देश के वन एवं वृक्ष आवरण की स्थिति का आकलन करने वाली एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय रिपोर्ट है। इसके माध्यम से वन संसाधनों में होने वाले परिवर्तनों का अध्ययन किया जाता है और वन संरक्षण से संबंधित नीतियों तथा कार्यक्रमों के लिए आवश्यक जानकारी उपलब्ध होती है।

यह रिपोर्ट प्रत्येक दो वर्ष में प्रकाशित की जाती है। इसका उद्देश्य देश के वन संसाधनों की स्थिति का नियमित आकलन करना, वन आवरण में होने वाले सकारात्मक एवं नकारात्मक परिवर्तनों की पहचान करना और पर्यावरणीय नियोजन में सहायता प्रदान करना है।

इस रिपोर्ट के आधार पर सरकार वन संरक्षण, वनीकरण, वन प्रबंधन और प्राकृतिक संसाधनों के सतत उपयोग से संबंधित योजनाओं की समीक्षा कर सकती है।

भारतीय वन सर्वेक्षण की भूमिका

भारतीय वन सर्वेक्षण (Forest Survey of India—FSI) देहरादून स्थित एक प्रमुख संगठन है, जो पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करता है।

इस संगठन की प्रमुख जिम्मेदारियों में देश के वन एवं वृक्ष आवरण का आकलन करना, वन संसाधनों में होने वाले बदलावों का अध्ययन करना और संबंधित आंकड़ों को संकलित करना शामिल है।

भारतीय वन सर्वेक्षण प्रत्येक दो वर्ष में वन एवं वृक्ष आवरण का आकलन करता है तथा इसके निष्कर्ष भारत वन स्थिति रिपोर्ट में प्रकाशित किए जाते हैं। इस प्रक्रिया से देश में वन संसाधनों की स्थिति की नियमित निगरानी संभव होती है।

वन एवं वृक्ष आवरण का आकलन कैसे किया जाता है?

भारत में वन आवरण का आकलन आधुनिक तकनीक और जमीनी स्तर पर सत्यापन के संयोजन से किया जाता है। इस प्रक्रिया में रिमोट सेंसिंग तकनीक का विशेष महत्व है।

रिमोट सेंसिंग के माध्यम से उपग्रहों से प्राप्त चित्रों और आंकड़ों का उपयोग करके बड़े भौगोलिक क्षेत्रों में वनस्पति के विस्तार का अध्ययन किया जाता है। इससे देश के विभिन्न हिस्सों में वन आवरण की स्थिति और समय के साथ होने वाले परिवर्तनों की पहचान करने में सहायता मिलती है।

इस आकलन में संपूर्ण भौगोलिक क्षेत्र की मैपिंग की जाती है, जिसे वॉल-टू-वॉल मैपिंग कहा जाता है। उपग्रह आधारित जानकारी को अधिक विश्वसनीय बनाने के लिए व्यापक जमीनी सत्यापन भी किया जाता है।

इसके अतिरिक्त, राष्ट्रीय वन सूची (National Forest Inventory) से प्राप्त क्षेत्रीय आंकड़ों का उपयोग किया जाता है। इस प्रकार उपग्रह चित्रों, मैपिंग, क्षेत्रीय सर्वेक्षण और जमीनी सत्यापन के संयुक्त उपयोग से वन आवरण का आकलन किया जाता है।

वन एवं वृक्ष आवरण में वृद्धि के प्रमुख कारण

भारत में वन एवं वृक्ष आवरण में वृद्धि के पीछे कई प्राकृतिक और मानवीय कारण हैं। प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं।

1. वनस्पतियों की प्राकृतिक वृद्धि

प्राकृतिक रूप से पेड़ों और अन्य वनस्पतियों की वृद्धि वन आवरण में सुधार का एक महत्वपूर्ण कारण है। अनुकूल जलवायु, पर्याप्त वर्षा, मिट्टी की उपयुक्त स्थिति और प्राकृतिक पुनर्जनन के कारण वनस्पतियों का विस्तार हो सकता है।

जब किसी वन क्षेत्र में पेड़-पौधों की वृद्धि होती है और वनस्पति का घनत्व बढ़ता है, तो इससे वन आवरण के आकलन में सकारात्मक परिवर्तन दिखाई दे सकता है।

2. वनीकरण और वृक्षारोपण कार्यक्रम

वनीकरण (Afforestation) का अर्थ ऐसे क्षेत्रों में पेड़ लगाना है, जहां पहले वन नहीं थे या वन आवरण सीमित था। इसके माध्यम से नए वृक्ष आवरण का विकास किया जा सकता है।

वृक्षारोपण कार्यक्रमों के अंतर्गत सरकारी संस्थाओं, स्थानीय समुदायों और अन्य संगठनों द्वारा पौधे लगाए जाते हैं। यदि इन पौधों का उचित संरक्षण किया जाए और वे विकसित होकर स्थापित वृक्ष बनें, तो इससे वृक्ष आवरण में वृद्धि हो सकती है।

3. वन क्षेत्रों और लगाए गए पौधों का बेहतर संरक्षण

वृक्षारोपण की सफलता केवल पौधे लगाने तक सीमित नहीं होती। पौधों को जीवित रखना, अवैध कटाई रोकना और वन क्षेत्रों को क्षति से बचाना भी आवश्यक है।

वनों की बेहतर सुरक्षा और लगाए गए पौधों की देखभाल से वनस्पतियों के नष्ट होने की संभावना कम होती है। इससे वन एवं वृक्ष आवरण के संरक्षण तथा विस्तार में सहायता मिलती है।

4. वनों के बाहर पेड़ों की संख्या में वृद्धि

वृक्ष केवल प्राकृतिक वनों में ही नहीं पाए जाते, बल्कि कृषि भूमि, सड़कों के किनारे, गांवों, शहरों, बागानों और अन्य गैर-वन क्षेत्रों में भी मौजूद होते हैं।

इन क्षेत्रों में पेड़ों की संख्या बढ़ने से वृक्ष आवरण में वृद्धि हो सकती है। कृषि वानिकी, सामुदायिक वृक्षारोपण और शहरी हरित क्षेत्रों का विकास इसके उदाहरण हैं।

5. स्थानांतरित कृषि वाले क्षेत्रों में वनस्पतियों का पुनर्जनन

स्थानांतरित कृषि (Shifting Cultivation) में किसी क्षेत्र में कुछ समय तक खेती करने के बाद दूसरे क्षेत्र में खेती की जाती है। खेती छोड़ दिए जाने के बाद पुराने क्षेत्र में वनस्पतियों का प्राकृतिक पुनर्जनन हो सकता है।

समय के साथ घास, झाड़ियों और पेड़-पौधों की वृद्धि होने से ऐसे क्षेत्रों में वनस्पति आवरण बढ़ सकता है। इस प्रक्रिया को वन एवं वृक्ष आवरण में होने वाले परिवर्तनों के संभावित कारणों में शामिल किया गया है।

वन एवं वृक्ष आवरण में कमी के प्रमुख कारण

वन एवं वृक्ष आवरण में वृद्धि के साथ-साथ कुछ ऐसे कारक भी हैं, जिनसे इसमें कमी हो सकती है।

अल्पावधि चक्र वाले वृक्षारोपण की कटाई: कुछ वृक्षारोपण कार्यक्रमों में पेड़ों को सीमित अवधि में काटा जाता है। कटाई के कारण संबंधित क्षेत्र में अस्थायी रूप से वृक्ष आवरण घट सकता है।

स्थानांतरित कृषि: इस कृषि पद्धति के अंतर्गत वनस्पतियों को हटाकर खेती की जाती है। इससे कुछ क्षेत्रों में वन आवरण कम हो सकता है।

वन क्षेत्रों पर अतिक्रमण: वन भूमि पर अनधिकृत कब्जा और भूमि के अन्य उपयोगों में परिवर्तन प्राकृतिक वन क्षेत्रों को प्रभावित कर सकते हैं।

प्राकृतिक आपदाएं: तूफान, बाढ़ और भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं से पेड़ों को नुकसान पहुंच सकता है। इससे वनस्पति आवरण में कमी आने की संभावना रहती है।

इन कारणों से स्पष्ट होता है कि वन आवरण में परिवर्तन एक सतत प्रक्रिया है। किसी देश के वन संसाधनों की वास्तविक स्थिति समझने के लिए वृद्धि और कमी, दोनों प्रकार के परिवर्तनों का आकलन करना आवश्यक है।

भारत का कार्बन सिंक बढ़ाने का लक्ष्य

भारत ने वन एवं वृक्ष आवरण बढ़ाने के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए कार्बन सिंक के विस्तार पर भी जोर दिया है।

भारत द्वारा प्रस्तुत जानकारी के अनुसार, वर्ष 2021 तक देश ने 2.29 अरब टन CO₂ समतुल्य का अतिरिक्त कार्बन सिंक सृजित किया था। इसके साथ ही भारत ने वर्ष 2035 तक अतिरिक्त कार्बन सिंक को बढ़ाकर 3.5 से 4.0 अरब टन CO₂ समतुल्य करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इसकी तुलना वर्ष 2005 के स्तर से की जाएगी।

कार्बन सिंक ऐसे प्राकृतिक या अन्य तंत्र को कहा जाता है, जो वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करके उसका भंडारण करते हैं। वन और पेड़ प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया के माध्यम से कार्बन डाइऑक्साइड ग्रहण करते हैं और कार्बन को अपनी लकड़ी, जड़ों, पत्तियों तथा संबंधित पारिस्थितिकी तंत्र में संचित करते हैं।

कार्बन सिंक बढ़ाने से वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों की वृद्धि को सीमित करने के प्रयासों में मदद मिल सकती है। हालांकि, कार्बन भंडारण की वास्तविक क्षमता वन के प्रकार, पेड़ों की आयु, वनस्पति की स्थिति और भूमि प्रबंधन जैसे कारकों पर निर्भर करती है।

बॉन चैलेंज के अंतर्गत क्षरित भूमि के पुनर्स्थापन की पहल

भारत ने बॉन चैलेंज (Bonn Challenge) के अंतर्गत वर्ष 2030 तक 2.6 करोड़ हेक्टेयर क्षरित एवं वन-विहीन भूमि का पुनर्स्थापन करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की है।

प्रस्तुत जानकारी के अनुसार, इस लक्ष्य के अंतर्गत अब तक 2.176 करोड़ हेक्टेयर भूमि को पुनर्स्थापन के दायरे में लाया जा चुका है।

भूमि क्षरण का अर्थ भूमि की गुणवत्ता, उत्पादकता या पारिस्थितिक कार्यक्षमता में कमी आना है। वनों की कटाई, मिट्टी का कटाव, अनुचित भूमि उपयोग और वनस्पति आवरण का नष्ट होना इसके प्रमुख कारणों में शामिल हो सकते हैं।

भूमि पुनर्स्थापन का उद्देश्य क्षतिग्रस्त पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिति में सुधार करना, वनस्पति को पुनर्जीवित करना, मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखना और जैव विविधता के संरक्षण को बढ़ावा देना है।

इस प्रक्रिया में प्राकृतिक वनस्पतियों का पुनर्जनन, उपयुक्त प्रजातियों का वृक्षारोपण, मिट्टी एवं जल संरक्षण तथा स्थानीय समुदायों की भागीदारी महत्वपूर्ण हो सकती है।

बॉन चैलेंज का महत्व

बॉन चैलेंज एक वैश्विक पहल है, जिसका उद्देश्य क्षरित और वन-विहीन भूमि के पुनर्स्थापन को प्रोत्साहित करना है। इसके अंतर्गत विभिन्न देश अपनी परिस्थितियों और क्षमताओं के अनुसार भूमि पुनर्स्थापन के लक्ष्य निर्धारित करते हैं।

इस पहल का महत्व केवल पेड़ लगाने तक सीमित नहीं है। इसका उद्देश्य भूमि की पारिस्थितिक स्थिति में सुधार करना, प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करना और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में योगदान देना भी है।

भारत जैसे विशाल और विविध भौगोलिक परिस्थितियों वाले देश के लिए भूमि पुनर्स्थापन कृषि उत्पादकता, जल संरक्षण, ग्रामीण आजीविका और जैव विविधता के लिहाज से महत्वपूर्ण है।

वन संरक्षण और जलवायु परिवर्तन के बीच संबंध

वन संरक्षण और जलवायु परिवर्तन एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। वन वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करके कार्बन का भंडारण करते हैं। इस कारण वे वैश्विक तापवृद्धि को सीमित करने के प्रयासों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

इसके अतिरिक्त, वन वर्षा जल के अवशोषण, भूजल पुनर्भरण, मिट्टी के कटाव को रोकने और स्थानीय तापमान को नियंत्रित करने में मदद करते हैं। वे अनेक वन्यजीवों तथा पौधों के लिए आवास उपलब्ध कराते हैं और पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन को बनाए रखते हैं।

हालांकि, वन संरक्षण की सफलता केवल वन एवं वृक्ष आवरण के कुल क्षेत्रफल में वृद्धि से नहीं मापी जानी चाहिए। प्राकृतिक वनों की गुणवत्ता, जैव विविधता, वनस्पतियों की प्रजातिगत संरचना और पारिस्थितिक तंत्र की दीर्घकालिक स्थिरता भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।

भारत के लिए वन एवं भूमि पुनर्स्थापन का व्यापक महत्व

भारत में वन एवं वृक्ष आवरण का विस्तार पर्यावरण संरक्षण, प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन और सतत विकास के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है। वन संरक्षण से जैव विविधता को सुरक्षित रखने, भूमि क्षरण को कम करने और जलवायु परिवर्तन से निपटने के प्रयासों को मजबूती मिल सकती है।

भारत वन स्थिति रिपोर्ट 2023 में दर्ज 25.17 प्रतिशत वन एवं वृक्ष आवरण तथा वर्ष 2021 की तुलना में 1,445.81 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि इस दिशा में हुई प्रगति को दर्शाती है। वहीं, कार्बन सिंक बढ़ाने और बॉन चैलेंज के अंतर्गत क्षरित भूमि के पुनर्स्थापन के लक्ष्य भारत की दीर्घकालिक पर्यावरणीय प्रतिबद्धताओं को रेखांकित करते हैं।

इन लक्ष्यों की सफलता के लिए वृक्षारोपण के साथ-साथ पौधों का संरक्षण, प्राकृतिक वनों की सुरक्षा, क्षरित भूमि का वैज्ञानिक पुनर्स्थापन और स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है।