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जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र साइबर अपराध कन्वेंशन पर हस्ताक्षर किए

भारत ने साइबर अपराध के खिलाफ वैश्विक सहयोग को मजबूत किया

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने शुक्रवार को संयुक्त राष्ट्र साइबर अपराध कन्वेंशन (United Nations Convention against Cybercrime) पर भारत की ओर से हस्ताक्षर किए। इस कन्वेंशन का उद्देश्य साइबर अपराधों को रोकने और उनसे प्रभावी ढंग से निपटने के लिए देशों के बीच अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करना है।

साइबर अपराधों की प्रकृति तेजी से अंतरराष्ट्रीय होती जा रही है। अपराधी एक देश में रहकर दूसरे देश में स्थित कंप्यूटर सिस्टम, नेटवर्क या डिजिटल संसाधनों को निशाना बना सकते हैं। ऐसी स्थिति में किसी एक देश की कानून प्रवर्तन एजेंसी के लिए अकेले कार्रवाई करना कठिन हो जाता है। इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए यह कन्वेंशन अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करने पर जोर देता है।

सुरक्षित डिजिटल भविष्य की दिशा में महत्वपूर्ण कदम

कन्वेंशन पर हस्ताक्षर करने के बाद विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि यह कन्वेंशन एक सुरक्षित डिजिटल भविष्य के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करता है।

डिजिटल तकनीक के बढ़ते उपयोग के साथ साइबर अपराधों का खतरा भी बढ़ा है। ऐसे में देशों के बीच सूचनाओं, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों और जांच से संबंधित सहयोग को बेहतर बनाना साइबर अपराधों के खिलाफ कार्रवाई के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

संयुक्त राष्ट्र साइबर अपराध कन्वेंशन क्या है?

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, यह साइबर अपराध पर पहला व्यापक वैश्विक समझौता है। इसका उद्देश्य साइबर अपराधों की रोकथाम और उनसे मुकाबला करने के लिए देशों को विभिन्न कानूनी एवं व्यावहारिक उपाय उपलब्ध कराना है।

कन्वेंशन साइबर अपराध से संबंधित मामलों में अंतरराष्ट्रीय सहयोग के लिए एक व्यापक ढांचा उपलब्ध कराता है। इसके माध्यम से विभिन्न देशों की कानून प्रवर्तन एजेंसियों के बीच सहयोग को अधिक प्रभावी बनाने का प्रयास किया गया है।

इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के आदान-प्रदान पर जोर

इस कन्वेंशन का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य गंभीर अपराधों से संबंधित इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को साझा करने में अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करना है।

आज अनेक अपराधों की जांच में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनमें डिजिटल उपकरणों, ऑनलाइन गतिविधियों और अन्य सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी से संबंधित साक्ष्य शामिल हो सकते हैं।

जब किसी अपराध से संबंधित डिजिटल साक्ष्य अलग-अलग देशों में मौजूद हों, तो उनकी पहचान, प्राप्ति और साझा करने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग आवश्यक हो जाता है। कन्वेंशन इसी प्रकार के सहयोग को मजबूत करने का प्रयास करता है।

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2024 में अपनाया कन्वेंशन

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 2024 में इस कन्वेंशन को अपनाया था।

इसके बाद आवश्यक प्रक्रिया पूरी होने पर यह कन्वेंशन प्रभावी हुआ। इसके लिए कम से कम 40 सदस्य देशों के हस्ताक्षर की आवश्यक सीमा पूरी होना जरूरी था।

यह सीमा पूरी होने के बाद कन्वेंशन 2025 में लागू हुआ।

2025 के अंत तक 93 देशों ने किए हस्ताक्षर

प्राप्त जानकारी के अनुसार, 2025 के अंत तक 93 देशों ने इस कन्वेंशन पर हस्ताक्षर किए थे।

इससे यह स्पष्ट होता है कि साइबर अपराधों से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग की आवश्यकता को व्यापक रूप से स्वीकार किया जा रहा है।

साइबर अपराध की सीमा-पार चुनौती

साइबर अपराध की एक प्रमुख विशेषता यह है कि अपराधी, पीड़ित, डिजिटल बुनियादी ढांचा और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य अलग-अलग देशों में स्थित हो सकते हैं।

उदाहरण के लिए, किसी साइबर अपराध को अंजाम देने वाला व्यक्ति एक देश में हो सकता है, जबकि जिस डिजिटल सिस्टम को निशाना बनाया गया है वह किसी दूसरे देश में स्थित हो। अपराध से संबंधित इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य किसी तीसरे देश में मौजूद हो सकते हैं।

ऐसी परिस्थितियों में जांच एजेंसियों को कई देशों के कानूनों और प्रक्रियाओं के बीच समन्वय करना पड़ता है। कन्वेंशन का उद्देश्य इसी सीमा-पार चुनौती से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करना है।

राष्ट्रीय कानून और अधिकार क्षेत्र की चुनौती

साइबर अपराधों की जांच में एक महत्वपूर्ण चुनौती यह है कि कानून प्रवर्तन एजेंसियां अपने-अपने राष्ट्रीय कानूनों और अधिकार क्षेत्रों की सीमाओं के भीतर काम करती हैं।

वहीं साइबर अपराधी इंटरनेट और सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी का उपयोग करके अलग-अलग देशों की सीमाओं के पार अपराध कर सकते हैं।

कन्वेंशन पारंपरिक आपराधिक जांच के तरीकों को सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (ICT) की वर्तमान वास्तविकताओं के अनुरूप बनाने का प्रयास करता है।

तकनीकी और कानूनी चुनौतियों का समाधान

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, कन्वेंशन साइबर अपराध से जुड़े तकनीकी और कानूनी मुद्दों को संबोधित करता है।

पारंपरिक आपराधिक जांच की प्रक्रियाओं को डिजिटल वातावरण की आवश्यकताओं के अनुरूप ढालना इसके प्रमुख उद्देश्यों में शामिल है। इससे साइबर अपराधों की जांच के दौरान उत्पन्न होने वाली नई प्रकार की तकनीकी चुनौतियों से निपटने में सहायता मिल सकती है।

साइबर अपराध से अर्जित धन की वसूली

कन्वेंशन का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू साइबर अपराध से प्राप्त आय या अपराध की कमाई की वसूली से संबंधित है।

साइबर अपराधों से प्राप्त धन को अलग-अलग माध्यमों या देशों में स्थानांतरित किया जा सकता है। ऐसे मामलों में अपराध से प्राप्त आय की पहचान और उसकी वसूली के लिए सीमा-पार सहयोग आवश्यक होता है।

कन्वेंशन इस क्षेत्र में सहयोग को मजबूत करने का प्रावधान करता है।

सीमा-पार जांच में सहयोग

कन्वेंशन के तहत साइबर अपराधों की जांच में सीमा-पार सहयोग को मजबूत करने का प्रयास किया गया है। इसके साथ ही इसमें समझौते के अंतर्गत आने वाले अपराधों तथा अन्य गंभीर अपराधों की जांच में सहयोग को भी बढ़ावा दिया गया है।

इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि साइबर तकनीक का इस्तेमाल करके अलग-अलग देशों में किए जाने वाले गंभीर अपराधों की जांच अधिक प्रभावी ढंग से की जा सके।

भारत के लिए महत्व

भारत द्वारा इस कन्वेंशन पर हस्ताक्षर करना साइबर अपराधों से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग के महत्व को दर्शाता है।

डिजिटल तकनीक के बढ़ते उपयोग के दौर में साइबर अपराध किसी एक देश तक सीमित नहीं रहते। ऐसे में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को साझा करने, सीमा-पार जांच में सहयोग करने और साइबर अपराध से प्राप्त आय की वसूली जैसे क्षेत्रों में अंतरराष्ट्रीय सहयोग महत्वपूर्ण है।

यह कन्वेंशन साइबर अपराधों के खिलाफ वैश्विक स्तर पर एक साझा सहयोगात्मक ढांचा विकसित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।

परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण तथ्य

  • कन्वेंशन का नाम: संयुक्त राष्ट्र साइबर अपराध कन्वेंशन
  • मुख्य उद्देश्य: साइबर अपराधों की रोकथाम और उनसे मुकाबला करना
  • भारत की ओर से हस्ताक्षर: विदेश मंत्री एस. जयशंकर
  • कन्वेंशन अपनाया गया: 2024
  • लागू हुआ: 2025
  • लागू होने के लिए आवश्यक सीमा: 40 सदस्य देशों के हस्ताक्षर
  • 2025 के अंत तक हस्ताक्षर करने वाले देश: 93
  • प्रमुख क्षेत्र: अंतरराष्ट्रीय सहयोग, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य साझा करना, सीमा-पार जांच और साइबर अपराध से प्राप्त आय की वसूली
  • विशेष महत्व: साइबर अपराध पर पहला व्यापक वैश्विक समझौता