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कैलिफोर्निया बाल विवाह पर प्रतिबंध लगाने वाला अमेरिका का 18वाँ राज्य बना

International 📅 October 11, 2026
कैलिफोर्निया में बाल विवाह पर प्रतिबंध

कैलिफोर्निया के गवर्नर गैविन न्यूसम ने राज्य में बाल विवाह पर प्रतिबंध लगाने वाले विधेयक पर हस्ताक्षर किए।

इस विधेयक के माध्यम से उन कानूनी प्रावधानों को समाप्त कर दिया गया है, जो माता-पिता की सहमति से नाबालिगों को विवाह करने या घरेलू साझेदारी (Domestic Partnership) में प्रवेश करने की अनुमति देते थे। इसके साथ ही राज्य में विवाह और घरेलू साझेदारी के लिए न्यूनतम आयु 18 वर्ष निर्धारित की गई है।

अमेरिका में बाल विवाह को लेकर कोई संघीय कानून नहीं है। प्रत्येक राज्य विवाह से संबंधित अपनी आवश्यकताएँ निर्धारित करता है। कुछ राज्यों में विवाह के लिए न्यूनतम आयु भी निर्धारित नहीं की गई थी।

वर्ष 2018 में डेलावेयर और न्यू जर्सी बिना किसी अपवाद के 18 वर्ष से कम आयु में विवाह पर प्रतिबंध लगाने वाले अमेरिका के पहले राज्य बने।

इसके बाद निम्नलिखित राज्यों ने भी बाल विवाह पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया:

  • 2020: मिनेसोटा और पेंसिल्वेनिया।

  • 2021: न्यूयॉर्क और रोड आइलैंड।

  • 2022: मैसाचुसेट्स।

  • 2023: कनेक्टिकट, मिशिगन और वर्मोंट।

  • 2024: न्यू हैम्पशायर, वर्जीनिया और वॉशिंगटन।

  • 2025: मेन, मिसौरी और ओरेगन।

  • 2026: ओक्लाहोमा।

• कैलिफोर्निया के इस निर्णय के बाद वह अमेरिका का 18वाँ राज्य बन गया है, जहाँ 18 वर्ष से कम आयु में विवाह पर प्रतिबंध लगाया गया है।

भारत में बाल विवाह की स्थिति

बाल विवाह से संबंधित आँकड़े

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 (Prohibition of Child Marriage Act—PCMA) के अंतर्गत दर्ज बाल विवाह के मामलों के आँकड़े संकलित और प्रकाशित करता है। ये आँकड़े इसकी वार्षिक रिपोर्ट क्राइम इन इंडिया (Crime in India) में उपलब्ध होते हैं।

• NCRB के अनुसार, बाल विवाह निषेध अधिनियम के अंतर्गत दर्ज मामलों की संख्या निम्नलिखित रही:

वर्ष

दर्ज मामले

2020 785
2021 1,050
2022 1,002

भारत में बाल विवाह की व्यापकता में लगातार गिरावट दर्ज की गई है। वर्ष 2006 में बाल विवाह की व्यापकता लगभग 47% थी, जो वर्ष 2015-16 में घटकर 27% और वर्ष 2019-2021 में 23.3% रह गई।

भारत में बाल विवाह में आई यह गिरावट वैश्विक प्रवृत्ति के अनुरूप है। पिछले दशक में बाल विवाह के रूप में विवाहित लड़कियों का अनुपात वैश्विक स्तर पर 15% कम हुआ है।

हालाँकि, भारत और विश्व स्तर पर इस दिशा में उल्लेखनीय प्रगति हुई है, फिर भी दुनिया का कोई भी क्षेत्र सतत विकास लक्ष्य-5 (SDG-5), अर्थात् लैंगिक समानता, को प्राप्त करने की निर्धारित राह पर नहीं है।

अनुमान है कि SDG-5 के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए बाल विवाह में कमी लाने की गति पिछले दशक में दर्ज गति से 12 गुना अधिक करनी होगी।

बाल विवाह क्या है और इसके प्रमुख कारण क्या हैं?

बाल विवाह की परिभाषा

बाल विवाह एक सामाजिक बुराई है और कानून के अंतर्गत इसका आयोजन या इसमें संलिप्तता दंडनीय अपराध हो सकता है।

बाल विवाह वह विवाह है, जिसमें विवाह करने वाले पक्षों में से कोई एक या दोनों कानून द्वारा निर्धारित न्यूनतम विवाह आयु प्राप्त करने से पहले विवाह कर लेते हैं। कानूनी प्रावधानों के बावजूद, विश्व के अनेक हिस्सों में बच्चों का विवाह 18 वर्ष की आयु से पहले कर दिया जाता है।

विश्व स्तर पर प्रत्येक पाँच लड़कियों में से लगभग एक लड़की का विवाह 18 वर्ष की आयु प्राप्त करने से पहले औपचारिक रूप से या अनौपचारिक वैवाहिक संबंध के रूप में हो जाता है।

बाल विवाह निषेध अधिनियम (PCMA) की धारा 2 के अनुसार, ऐसा विवाह जिसमें विवाह करने वाले पक्षों में से कोई एक बच्चा हो, बाल विवाह कहलाता है। इस अधिनियम के अंतर्गत 18 वर्ष से कम आयु की लड़की और 21 वर्ष से कम आयु के लड़के को बच्चा माना जाता है।

बाल विवाह के प्रमुख कारण

पितृसत्तात्मक व्यवस्था और लैंगिक असमानता: समाज में लड़कियों को लड़कों के समान अधिकार और अवसर नहीं मिलने से बाल विवाह की समस्या बनी रहती है।

गरीबी: आर्थिक रूप से कमजोर परिवार कई बार लड़कियों का विवाह कम उम्र में कर देते हैं। वे इसे परिवार की आर्थिक जिम्मेदारियों को कम करने का एक तरीका मानते हैं।

शिक्षा का अभाव: कुछ परिवार लड़कियों की शिक्षा में निवेश को कम महत्त्व देते हैं। परिणामस्वरूप, उनकी पढ़ाई बीच में ही छुड़ाकर विवाह कर दिया जाता है।

रोजगार के सीमित अवसर: लड़कियों के लिए शिक्षा, कौशल विकास और रोजगार के पर्याप्त अवसर उपलब्ध नहीं होने से भी बाल विवाह को बढ़ावा मिल सकता है।

सामाजिक मान्यताएँ और आर्थिक दबाव: कई परिवार सामाजिक प्रतिष्ठा, परंपराओं और आर्थिक परिस्थितियों के कारण कम उम्र में लड़कियों का विवाह करना उचित समझते हैं।

लैंगिक रूढ़िवादिता: कुछ माता-पिता लड़कियों के कौमार्य और पारिवारिक प्रतिष्ठा से जुड़ी सामाजिक धारणाओं के कारण उनका विवाह जल्दी कर देना चाहते हैं।

दहेज और विवाह का खर्च: कुछ परिवार विवाह और दहेज से संबंधित आर्थिक दबावों के कारण लड़कियों का विवाह कम उम्र में कर देते हैं।

बाल विवाह और मानवाधिकार

संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार अभिसमय (UN Convention on the Rights of the Child) बाल विवाह को बच्चों के मानवाधिकारों के उल्लंघन से संबंधित विषय मानता है।

भारत सहित 193 देशों ने सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) के लक्ष्य-5 के अंतर्गत बाल विवाह, कम उम्र में विवाह और जबरन विवाह को समाप्त करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की है।

बाल विवाह निषेध अधिनियम (PCMA)

बाल विवाह के विरुद्ध कानून का ऐतिहासिक विकास

1921: राष्ट्र संघ (League of Nations) ने महिलाओं की तस्करी से संबंधित एक सम्मेलन आयोजित किया और लड़कियों की सहमति की आयु 21 वर्ष करने की सिफारिश की।

1922: बख्शी सोहनलाल ने एक विधेयक प्रस्तुत करके सहमति की आयु 14 वर्ष करने का प्रयास किया, लेकिन उनका प्रयास सफल नहीं हुआ। इसके बाद अगले पाँच वर्षों तक सहमति की आयु बढ़ाने के उद्देश्य से कई विधेयक प्रस्तुत किए गए, लेकिन वे पारित नहीं हो सके।

1924: रंगलाल जाजोदिया ने विधान सभा में विवाह की न्यूनतम आयु निर्धारित करने के उद्देश्य से विवाह आयु विधेयक प्रस्तुत करने का प्रयास किया। इस विधेयक का उद्देश्य ऐसी न्यूनतम आयु निर्धारित करना था, जिससे पहले विवाह न किया जा सके।

यह दृष्टिकोण उस समय के अन्य सामाजिक सुधारकों और विधायकों के दृष्टिकोण से अलग था। पहले के प्रयासों में विवाह की आयु में सीधे हस्तक्षेप करने के बजाय दंड कानूनों के माध्यम से लड़कियों को जबरन यौन संबंधों से बचाने के लिए सहमति की आयु बढ़ाने पर अधिक ध्यान दिया जाता था।

1927: रंगलाल जाजोदिया का विधेयक औपचारिक रूप से प्रस्तुत नहीं हो सका। इसके बाद हरिबिलास शारदा ने एक समान विधेयक प्रस्तुत किया। इससे पहले हरि सिंह गौर द्वारा सहमति की आयु बढ़ाने का प्रयास भी असफल रहा था।

1929: शारदा विधेयक को व्यापक विचार-विमर्श और सुझावों के लिए प्रसारित किया गया। बहस के बाद इसे बाल विवाह अवरोध अधिनियम, 1929 (Child Marriage Restraint Act, 1929) के रूप में पारित किया गया। इसे 1 अक्टूबर 1929 को गवर्नर-जनरल की स्वीकृति प्राप्त हुई।

यह अधिनियम संसद द्वारा बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 लागू किए जाने तक विवाह की आयु से संबंधित कानून के रूप में प्रभावी रहा।

बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 के प्रमुख प्रावधान

बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 ने विवाह की न्यूनतम आयु पुरुषों के लिए 21 वर्ष और महिलाओं के लिए 18 वर्ष निर्धारित रखी।

यह अधिनियम बाल विवाह हो जाने के बाद संबंधित पक्षों की स्थिति को नियंत्रित करने, अपराधियों के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई करने तथा बाल विवाह की रोकथाम के लिए प्रावधान करता है।

बाल विवाह के लिए दंड का प्रावधान

इस अधिनियम के अंतर्गत मुख्य रूप से तीन श्रेणियों के व्यक्तियों के लिए दंड का प्रावधान किया गया है:

  1. बाल विवाह में शामिल वयस्क पुरुष, जो निर्धारित कानूनी शर्तों के अंतर्गत दंडनीय हो।

  2. बाल विवाह संपन्न कराने में शामिल व्यक्ति।

  3. बाल विवाह को बढ़ावा देने वाले या उसके आयोजन की अनुमति देने वाले व्यक्ति।

अधिनियम के अंतर्गत इन श्रेणियों के लिए अधिकतम दो वर्ष के कठोर कारावास और एक लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान बताया गया है।

अन्य कई सामाजिक कानूनों के विपरीत, PCMA में अधिनियम के अंतर्गत अपराध करने के लिए अनिवार्य न्यूनतम दंड निर्धारित नहीं किया गया है।

धारा 15: अधिनियम के अंतर्गत सभी अपराध संज्ञेय (Cognizable) और गैर-जमानती (Non-bailable) हैं।

धारा 16: यह धारा राज्य सरकार को पूरे राज्य या उसके किसी निर्दिष्ट क्षेत्र के लिए बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारी (Child Marriage Prohibition Officer—CMPO) नियुक्त करने का अधिकार देती है। इन अधिकारियों को अधिसूचना में निर्धारित क्षेत्र में बाल विवाह की रोकथाम से संबंधित अधिकार-क्षेत्र प्राप्त होता है।