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रॉबर्ट हॉल और माइकल वुडफोर्ड को 2026 का अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार

Awards & Honors 📅 October 19, 2026
अमेरिकी अर्थशास्त्रियों रॉबर्ट ई. हॉल (Robert E. Hall) और माइकल वुडफोर्ड (Michael Woodford) को 12 अक्टूबर 2026 को अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज ने इन दोनों अर्थशास्त्रियों को “समष्टि आर्थिक स्थिरीकरण की सूक्ष्म आर्थिक नींव” (Microeconomic Foundations of Macroeconomic Stabilisation) विकसित करने में उनके योगदान के लिए चुना।

इस पुरस्कार का आधिकारिक नाम अल्फ्रेड नोबेल की स्मृति में आर्थिक विज्ञान में स्वेरिगेस रिक्सबैंक पुरस्कार (Sveriges Riksbank Prize in Economic Sciences in Memory of Alfred Nobel) है। यह वर्ष 2026 के नोबेल पुरस्कारों की श्रृंखला में घोषित किया जाने वाला अंतिम पुरस्कार है।

दोनों विजेताओं के बीच पुरस्कार राशि 1.2 करोड़ स्वीडिश क्रोना बराबर-बराबर बाँटी जाएगी।

इस वर्ष के पुरस्कार विजेता

1. रॉबर्ट ई. हॉल (Robert E. Hall)

रॉबर्ट ई. हॉल का जन्म वर्ष 1943 में अमेरिका के कैलिफोर्निया राज्य के पालो ऑल्टो (Palo Alto) में हुआ था। उन्होंने वर्ष 1967 में मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT), कैम्ब्रिज, अमेरिका से पीएचडी की उपाधि प्राप्त की।

वे कैलिफोर्निया स्थित स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय (Stanford University) से संबद्ध हैं।

2. माइकल वुडफोर्ड (Michael Woodford)

माइकल वुडफोर्ड का जन्म वर्ष 1955 में अमेरिका के मैसाचुसेट्स राज्य के चिकोपी (Chicopee) में हुआ था। उन्होंने वर्ष 1983 में मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT), कैम्ब्रिज, अमेरिका से पीएचडी की उपाधि प्राप्त की।

वे न्यूयॉर्क स्थित कोलंबिया विश्वविद्यालय (Columbia University) से संबद्ध हैं।

आर्थिक स्थिरीकरण नीति में प्रतिमान परिवर्तन

आर्थिक उतार-चढ़ाव और स्थिरीकरण नीति

किसी भी अर्थव्यवस्था में समय-समय पर तेजी और मंदी के दौर आते रहते हैं। कभी उत्पादन, निवेश और रोजगार में वृद्धि होती है, तो कभी आर्थिक गतिविधियाँ धीमी पड़ जाती हैं। अर्थव्यवस्था में होने वाले इन उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए आर्थिक स्थिरीकरण नीति (Stabilisation Policy) का उपयोग किया जाता है।

लगभग एक शताब्दी पहले अर्थशास्त्री जॉन मेनार्ड कीन्स (John Maynard Keynes) ने अपने आर्थिक सिद्धांतों के माध्यम से यह समझाने का प्रयास किया कि सरकार की नीतियाँ आर्थिक मंदी और बेरोजगारी से निपटने में किस प्रकार सहायता कर सकती हैं।

परंपरागत कीन्सवादी दृष्टिकोण के अनुसार, आर्थिक मंदी के दौरान सरकार और केंद्रीय बैंक विभिन्न उपाय अपनाकर अर्थव्यवस्था को गति देने का प्रयास करते हैं। इसके विपरीत, जब अर्थव्यवस्था में अत्यधिक तेजी आती है और महँगाई बढ़ने लगती है, तब माँग को नियंत्रित करने के उपाय किए जा सकते हैं।

1970 के दशक का आर्थिक संकट

1970 के दशक में तेल संकट के दौरान पश्चिमी देशों की अर्थव्यवस्थाओं को गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ा। इस अवधि में कई देशों में आर्थिक विकास की दर कम रही, बेरोजगारी बढ़ी और महँगाई भी ऊँचे स्तर पर बनी रही।

इस स्थिति को मुद्रास्फीतिजनित मंदी (Stagflation) कहा जाता है। इसमें आर्थिक विकास धीमा होने या ठहरने के साथ-साथ महँगाई और बेरोजगारी जैसी समस्याएँ बनी रहती हैं।

उस समय प्रचलित कीन्सवादी आर्थिक मॉडलों की प्रभावशीलता पर सवाल उठने लगे। कुछ नीतिगत उपाय अपेक्षित परिणाम नहीं दे पा रहे थे और कई परिस्थितियों में महँगाई पर नियंत्रण करना कठिन हो रहा था।

इसके परिणामस्वरूप अनेक अर्थशास्त्रियों ने यह सवाल उठाया कि क्या प्रचलित आर्थिक स्थिरीकरण नीतियाँ वास्तव में अर्थव्यवस्था को स्थिर बनाने में मदद कर रही हैं या कुछ परिस्थितियों में समस्याओं को और बढ़ा रही हैं।

रॉबर्ट हॉल और माइकल वुडफोर्ड का योगदान

रॉबर्ट हॉल और माइकल वुडफोर्ड ने ऐसे नए समष्टि आर्थिक मॉडल विकसित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया, जिन्होंने आर्थिक स्थिरीकरण नीति को अधिक प्रभावी बनाने के लिए एक मजबूत सैद्धांतिक आधार प्रदान किया।

इन मॉडलों की विशेषता यह है कि वे केवल महँगाई, उत्पादन और उपभोग जैसे व्यापक आर्थिक संकेतकों के बीच दिखाई देने वाले सांख्यिकीय संबंधों पर निर्भर नहीं करते। इसके बजाय, वे यह समझने का प्रयास करते हैं कि व्यक्तिगत परिवार और व्यवसाय अपने निर्णय किस प्रकार लेते हैं और इन निर्णयों का पूरी अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ता है।

इस दृष्टिकोण को सूक्ष्म आर्थिक नींव (Microeconomic Foundations) कहा जाता है।

सूक्ष्म आर्थिक नींव का अर्थ

सूक्ष्म आर्थिक नींव का अर्थ है कि व्यापक अर्थव्यवस्था को समझने के लिए व्यक्तिगत उपभोक्ताओं, परिवारों और कंपनियों के व्यवहार तथा उनके निर्णयों का अध्ययन किया जाए।

उदाहरण के लिए, परिवार यह तय करते हैं कि उन्हें अपनी आय का कितना हिस्सा खर्च करना है और कितना बचाना है। इसी प्रकार, कंपनियाँ यह निर्णय लेती हैं कि उन्हें कितना उत्पादन करना है, कितने कर्मचारियों को नियुक्त करना है और अपने उत्पादों की कीमतें किस स्तर पर रखनी हैं।

इन सभी व्यक्तिगत निर्णयों का संयुक्त प्रभाव उपभोग, निवेश, उत्पादन, रोजगार और महँगाई जैसे व्यापक आर्थिक संकेतकों पर पड़ता है।

हॉल और वुडफोर्ड के योगदान ने आर्थिक मॉडलों में इन निर्णयों को बेहतर ढंग से शामिल करने और आर्थिक नीतियों के प्रभाव को समझने में सहायता की।

भविष्य के प्रति लोगों की अपेक्षाओं की भूमिका

इन मॉडलों का एक प्रमुख पहलू यह है कि परिवार और व्यवसाय केवल वर्तमान परिस्थितियों के आधार पर निर्णय नहीं लेते, बल्कि भविष्य की आर्थिक स्थिति को भी ध्यान में रखते हैं।

उदाहरण के लिए, यदि परिवारों को लगता है कि भविष्य में उनकी आय कम हो सकती है, तो वे वर्तमान में अधिक बचत करने का निर्णय ले सकते हैं। इसी प्रकार, यदि कंपनियों को भविष्य में उत्पादन लागत बढ़ने की आशंका होती है, तो वे अपने उत्पादों की कीमतों में बदलाव कर सकती हैं।

इसलिए सरकार और केंद्रीय बैंक द्वारा भविष्य की आर्थिक नीतियों के बारे में दिए गए संकेत भी लोगों की अपेक्षाओं को प्रभावित करते हैं।

यदि केंद्रीय बैंक अपनी मौद्रिक नीति के बारे में स्पष्ट जानकारी देता है, तो परिवारों और कंपनियों के निर्णय बदल सकते हैं। इससे उपभोग, निवेश, उत्पादन और महँगाई की दिशा प्रभावित हो सकती है।

मौद्रिक और राजकोषीय नीतियों की प्रभावशीलता

हॉल और वुडफोर्ड के कार्य ने यह समझने में मदद की कि आर्थिक स्थिरीकरण के लिए नीतिगत उपायों का समय और उनकी विश्वसनीयता क्यों महत्वपूर्ण हैं।

मौद्रिक नीति (Monetary Policy) के अंतर्गत केंद्रीय बैंक ब्याज दरों और अन्य मौद्रिक साधनों के माध्यम से आर्थिक गतिविधियों तथा महँगाई को प्रभावित करता है।

वहीं, राजकोषीय नीति (Fiscal Policy) के अंतर्गत सरकार करों, सार्वजनिक व्यय और बजट संबंधी निर्णयों के माध्यम से अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती है।

जब इन नीतियों को आर्थिक परिस्थितियों और लोगों की भविष्य संबंधी अपेक्षाओं को ध्यान में रखकर तैयार किया जाता है, तो मंदी के दौरान आर्थिक गतिविधियों को समर्थन देने और अत्यधिक तेजी के दौरान अर्थव्यवस्था को संतुलित करने में मदद मिल सकती है।

हॉल और वुडफोर्ड के शोध ने इन नीतियों के प्रभाव को समझने के लिए एक स्थिर सैद्धांतिक आधार उपलब्ध कराया। उनके कार्य से विकसित आर्थिक मॉडलों ने केंद्रीय बैंकों और सरकारों को मौद्रिक तथा राजकोषीय नीतियों के संभावित परिणामों का विश्लेषण करने में सहायता दी है।

वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए महत्व

रॉबर्ट हॉल और माइकल वुडफोर्ड का योगदान आधुनिक समष्टि अर्थशास्त्र के विकास में महत्वपूर्ण माना जाता है। उनके शोध ने यह स्पष्ट करने में मदद की कि अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने के लिए केवल वर्तमान आर्थिक आँकड़ों का अध्ययन पर्याप्त नहीं है, बल्कि परिवारों और व्यवसायों की अपेक्षाओं तथा उनके निर्णयों को समझना भी आवश्यक है।

उनके कार्य ने आर्थिक नीति निर्माण के लिए ऐसे सैद्धांतिक मॉडल उपलब्ध कराने में योगदान दिया, जिनका उपयोग दुनिया भर के केंद्रीय बैंक और सरकारें आर्थिक उतार-चढ़ाव, महँगाई, उत्पादन और रोजगार से संबंधित समस्याओं का विश्लेषण करने में करती हैं।

इस प्रकार, उनका शोध आर्थिक स्थिरीकरण नीति को अधिक व्यवस्थित, प्रभावी और भविष्य की परिस्थितियों के प्रति संवेदनशील बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान प्रस्तुत करता है।