आर्टेमिस समझौते में शामिल हुए चार नए देश
• अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) ने अल्बानिया, क्रोएशिया, आइवरी कोस्ट और सैन मैरिनो का आर्टेमिस समझौते में स्वागत किया। इसके साथ ही इस समझौते में शामिल देशों की कुल संख्या बढ़कर 76 हो गई।
• अब विश्व के लगभग 40% देश नासा के साथ मिलकर अंतरिक्ष अन्वेषण के लिए पारदर्शी, शांतिपूर्ण, जिम्मेदार और सुरक्षित दृष्टिकोण विकसित करने की दिशा में सहयोग कर रहे हैं।
• वर्ष 1967 की बाह्य अंतरिक्ष संधि (Outer Space Treaty) पर हस्ताक्षर करने वाले देशों में से लगभग दो-तिहाई देश आर्टेमिस समझौते पर भी हस्ताक्षर कर चुके हैं।
• आने वाले समय में और अधिक देशों के इस समझौते से जुड़ने की उम्मीद है।
आर्टेमिस समझौता (Artemis Accords)
आर्टेमिस समझौते का परिचय
• आर्टेमिस समझौता वर्ष 1967 की बाह्य अंतरिक्ष संधि (OST) पर आधारित सिद्धांतों का एक गैर-बाध्यकारी समूह है। इसका उद्देश्य 21वीं सदी में नागरिक अंतरिक्ष अन्वेषण और अंतरिक्ष के उपयोग को दिशा प्रदान करना है।
• इस समझौते में पारदर्शिता, शांतिपूर्ण उद्देश्यों, अंतरिक्ष वस्तुओं के पंजीकरण और वैज्ञानिक आँकड़ों को सार्वजनिक करने जैसे सिद्धांत शामिल हैं।
• ये सिद्धांत अंतरिक्ष गतिविधियों को अधिक सुरक्षित और पूर्वानुमेय बनाने में सहायता करते हैं। इनके माध्यम से उन देशों को भी अंतरिक्ष से प्राप्त वैज्ञानिक आँकड़ों का लाभ मिल सकता है, जिनके पास अपना अंतरिक्ष कार्यक्रम नहीं है।
• अमेरिका की ओर से अमेरिकी विदेश विभाग और राष्ट्रीय वैमानिकी एवं अंतरिक्ष प्रशासन (NASA) ने संयुक्त रूप से इस समझौते का नेतृत्व किया।
• आर्टेमिस समझौते की शुरुआत 13 अक्टूबर 2020 को आठ देशों के साथ हुई थी। ये देश थे—ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, इटली, जापान, लक्जमबर्ग, संयुक्त अरब अमीरात, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका।
• वर्ष 2020 में केवल आठ देशों से शुरू हुआ यह समझौता अब विश्व के विभिन्न क्षेत्रों तक पहुँच चुका है। इसमें शामिल देशों की अंतरिक्ष संबंधी क्षमताएँ और हित भी अलग-अलग हैं।
• आर्टेमिस समझौते के सिद्धांत बाह्य अंतरिक्ष के अन्वेषण और उपयोग में पारस्परिक रूप से लाभकारी गतिविधियों के संबंध में एक साझा राजनीतिक समझ विकसित करते हैं। इनमें नासा के आर्टेमिस कार्यक्रम के समर्थन में की जाने वाली गतिविधियाँ भी शामिल हैं।
नासा का आर्टेमिस कार्यक्रम
• नासा के आर्टेमिस मिशनों का उद्देश्य चंद्रमा की सतह पर पहली महिला को उतारना और वहाँ दीर्घकालिक मानव उपस्थिति स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ना है।
• यह कार्यक्रम भविष्य में मंगल ग्रह तक अंतरिक्ष यात्रियों को भेजने की दिशा में भी एक महत्त्वपूर्ण कदम माना जाता है।
• भारत ने 21 जून 2023 को आर्टेमिस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे।
• हालाँकि, भारत नासा के नेतृत्व वाले आर्टेमिस कार्यक्रम में सहभागी देश नहीं है। आर्टेमिस समझौते पर हस्ताक्षर करना और नासा के आर्टेमिस मिशनों में भाग लेना दो अलग-अलग बातें हैं।
• भारत ने वर्ष 2047 तक अंतरिक्ष अन्वेषण के लिए अपना महत्त्वाकांक्षी दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है, जिसे स्पेस विजन 2047 (Space Vision 2047) के रूप में जाना जाता है।
आर्टेमिस समझौते के हस्ताक्षरकर्ता देशों की प्रतिबद्धताएँ
इस समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले देश निम्नलिखित प्रमुख सिद्धांतों का पालन करने के लिए प्रतिबद्ध होते हैं:
1. शांतिपूर्ण और पारदर्शी अन्वेषण: अंतरिक्ष गतिविधियों को शांतिपूर्ण तरीके से और पारदर्शिता के साथ संचालित करना।
2. जरूरतमंदों की सहायता: संकट या आवश्यकता की स्थिति में अंतरिक्ष यात्रियों और अन्य संबंधित व्यक्तियों को सहायता प्रदान करना।
3. वैज्ञानिक आँकड़ों तक पहुँच: अंतरिक्ष अन्वेषण से प्राप्त वैज्ञानिक आँकड़ों को उपलब्ध कराने में सहयोग करना।
4. अन्य देशों की गतिविधियों में हस्तक्षेप न करना: अंतरिक्ष में अपनी गतिविधियों का संचालन इस प्रकार करना कि दूसरे देशों की गतिविधियों में अनावश्यक बाधा उत्पन्न न हो।
5. ऐतिहासिक स्थलों और कलाकृतियों का संरक्षण: अंतरिक्ष अन्वेषण से जुड़े ऐतिहासिक महत्त्व के स्थलों और वस्तुओं की सुरक्षा के लिए सर्वोत्तम कार्यप्रणालियाँ विकसित करना।
आर्टेमिस कार्यक्रम का नाम आर्टेमिस क्यों रखा गया?
• चंद्रमा पर अंतरिक्ष यात्रियों को पहुँचाने वाले शुरुआती अमेरिकी मिशनों को अपोलो कार्यक्रम (Apollo Programme) के नाम से जाना जाता था। वर्ष 1969 में अपोलो कार्यक्रम के अंतर्गत पहली बार मानव ने चंद्रमा पर कदम रखा था।
• यूनानी पौराणिक कथाओं में आर्टेमिस, अपोलो की जुड़वाँ बहन और चंद्रमा की देवी मानी जाती हैं।
• इसी पौराणिक संबंध के कारण नासा ने अपने नए चंद्र अन्वेषण कार्यक्रम का नाम आर्टेमिस रखा। यह नाम अपोलो कार्यक्रम की विरासत को आगे बढ़ाने और चंद्रमा पर मानव की दीर्घकालिक उपस्थिति स्थापित करने के उद्देश्य को दर्शाता है।
बाह्य अंतरिक्ष संधि (Outer Space Treaty)
बाह्य अंतरिक्ष संधि की पृष्ठभूमि
• बाह्य अंतरिक्ष और खगोलीय पिंडों के लिए एक विशेष अंतरराष्ट्रीय कानूनी व्यवस्था की आवश्यकता तब महसूस हुई, जब अंतरराष्ट्रीय भूभौतिकीय वर्ष (International Geophysical Year, 1957–1958) के दौरान पृथ्वी के पहले कृत्रिम उपग्रहों का प्रक्षेपण किया गया।
• इसी अवधि में रॉकेट प्रौद्योगिकी का तेजी से विकास हुआ। इन घटनाओं के कारण अंतरिक्ष गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय नियम और सिद्धांत विकसित करना आवश्यक हो गया।
बाह्य अंतरिक्ष संधि का परिचय
• इस संधि का आधिकारिक नाम है— चंद्रमा और अन्य खगोलीय पिंडों सहित बाह्य अंतरिक्ष के अन्वेषण और उपयोग में राज्यों की गतिविधियों को नियंत्रित करने वाले सिद्धांतों पर संधि (Treaty on Principles Governing the Activities of States in the Exploration and Use of Outer Space, Including the Moon and Other Celestial Bodies)।
• इसे सामान्यतः बाह्य अंतरिक्ष संधि (Outer Space Treaty—OST) कहा जाता है। यह 20वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में संपन्न सबसे महत्त्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय कानून-निर्माण संधियों में से एक है।
• संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 19 दिसंबर 1966 को इसे अपनाया।
• इस संधि को 27 जनवरी 1967 को लंदन, मॉस्को और वॉशिंगटन में हस्ताक्षर के लिए खोला गया।
• यह संधि 10 अक्टूबर 1967 को प्रभावी हुई।
बाह्य अंतरिक्ष संधि का महत्त्व
• बाह्य अंतरिक्ष संधि ने अंतरिक्ष गतिविधियों के अंतरराष्ट्रीय नियमन की नींव रखी। इसने बाह्य अंतरिक्ष और खगोलीय पिंडों से संबंधित वर्तमान अंतरराष्ट्रीय कानूनी व्यवस्था के लिए आधार तैयार किया।
• यह संधि अंतरिक्ष के अन्वेषण और उपयोग के संबंध में देशों के आचरण को निर्देशित करने वाले महत्त्वपूर्ण सिद्धांत प्रदान करती है।
• 100 से अधिक देश इस संधि के पक्षकार हैं।
• भारत ने मार्च 1967 में इस संधि पर हस्ताक्षर किए और वर्ष 1982 में इसका अनुसमर्थन (Ratification) किया।