JOSH टीमों का शुभारंभ
भारत में क्षय रोग (Tuberculosis या TB) के उन्मूलन के प्रयासों को अधिक प्रभावी बनाने के लिए केंद्र सरकार ने युवाओं की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण पहल की है। 8 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जे.पी. नड्डा ने टीबी मुक्त भारत अभियान के अंतर्गत JOSH (Joint Squad for Health) टीमों का शुभारंभ किया।
इस पहल का मुख्य उद्देश्य युवाओं की ऊर्जा, सक्रियता और सामाजिक पहुँच का उपयोग करके समुदायों में टीबी के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। इसके माध्यम से लोगों को टीबी की रोकथाम, शुरुआती पहचान, समय पर उपचार और बीमारी से जुड़े सामाजिक भेदभाव को समाप्त करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा।
JOSH टीमों की शुरुआत भारत में टीबी उन्मूलन के प्रयासों को जमीनी स्तर तक पहुँचाने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है। इस पहल में युवाओं को केवल जागरूकता फैलाने वाले स्वयंसेवकों के रूप में ही नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रम में सक्रिय भागीदार के रूप में शामिल किया गया है।
JOSH का पूरा नाम और इसका उद्देश्य
JOSH का पूरा नाम Joint Squad for Health (जॉइंट स्क्वॉड फॉर हेल्थ) है। यह पहल युवाओं को संगठित करके स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता और सामुदायिक भागीदारी को मजबूत करने पर केंद्रित है।
इस पहल को स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय तथा रक्षा मंत्रालय के सहयोग से लागू किया जा रहा है।
JOSH टीमों के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं:
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टीबी के प्रति जागरूकता: लोगों को टीबी के लक्षणों, संक्रमण के तरीके, रोकथाम और उपचार के बारे में जानकारी देना।
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शीघ्र निदान को प्रोत्साहन: संभावित लक्षणों वाले लोगों को समय पर जाँच कराने के लिए प्रेरित करना।
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समय पर उपचार: टीबी से पीड़ित व्यक्तियों को निर्धारित उपचार पूरा करने के महत्त्व के बारे में जागरूक करना।
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भ्रांतियों को दूर करना: टीबी से संबंधित गलत धारणाओं, भय और सामाजिक कलंक को कम करना।
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सामुदायिक भागीदारी: स्थानीय समुदायों को टीबी उन्मूलन के प्रयासों में सक्रिय रूप से शामिल करना।
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जमीनी स्तर पर पहुँच: जिले, ब्लॉक और वार्ड स्तर पर स्वास्थ्य संबंधी संदेशों को अधिक प्रभावी ढंग से पहुँचाना।
इस प्रकार, JOSH पहल का उद्देश्य सरकारी स्वास्थ्य कार्यक्रमों और आम नागरिकों के बीच एक मजबूत संपर्क स्थापित करना है।
JOSH टीमों की संरचना और प्रमुख आँकड़े
JOSH पहल के अंतर्गत युवाओं और राष्ट्रीय कैडेट कोर (NCC) के कैडेटों को मिलाकर विशेष टीमें गठित की गई हैं। इन टीमों को स्थानीय स्तर पर लोगों तक स्वास्थ्य संबंधी जानकारी पहुँचाने और टीबी उन्मूलन अभियान में भागीदारी बढ़ाने की जिम्मेदारी दी गई है।
इस पहल से संबंधित प्रमुख आँकड़े निम्नलिखित हैं:
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प्रमुख बिंदु |
विवरण |
|---|---|
| गठित JOSH स्क्वॉड | 6,347 |
| MY Bharat स्वयंसेवक | 31,429 |
| NCC कैडेट | 26,794 |
| प्रत्येक टीम में MY Bharat स्वयंसेवक | 5 |
| प्रत्येक टीम में NCC कैडेट | 5 |
| प्रथम चरण का दायरा | 11 राज्यों के 55 जिले |
प्रत्येक JOSH टीम में पाँच MY Bharat स्वयंसेवक और पाँच NCC कैडेट शामिल होंगे। इस प्रकार, प्रत्येक टीम में कुल 10 युवा सदस्य होंगे। टीम का नेतृत्व ब्लॉक या वार्ड स्तर पर नामित प्रथम श्रेणी के अधिकारी द्वारा किया जाएगा।
इन टीमों की संरचना में युवाओं की सामाजिक पहुँच, अनुशासन और सामुदायिक कार्य करने की क्षमता का उपयोग करने पर जोर दिया गया है।
प्रथम चरण में 55 जिलों में होगा क्रियान्वयन
JOSH पहल का पहला चरण 11 राज्यों के 55 जिलों में लागू किया जाएगा। इसके बाद धीरे-धीरे इसका विस्तार अन्य क्षेत्रों में किया जाएगा, ताकि टीबी उन्मूलन अभियान की पहुँच जमीनी स्तर पर अधिक व्यापक हो सके।
टीमें जिला और ब्लॉक स्तर पर कार्य करेंगी। उनके कामकाज, गतिविधियों और क्रियान्वयन की निगरानी के लिए डिजिटल व्यवस्थाओं का भी उपयोग किया जाएगा।
डिजिटल निगरानी से टीमों की गतिविधियों का रिकॉर्ड रखने, कार्यों की प्रगति पर नजर रखने और अभियान के क्रियान्वयन को व्यवस्थित बनाने में सहायता मिल सकती है।
इस व्यवस्था के माध्यम से स्थानीय स्तर पर टीबी जागरूकता कार्यक्रमों को अधिक संगठित बनाने और जरूरतमंद समुदायों तक स्वास्थ्य संबंधी संदेश पहुँचाने का प्रयास किया जाएगा।
टीबी उन्मूलन में युवाओं की भूमिका
भारत जैसे विशाल और जनसंख्या की दृष्टि से विविध देश में किसी भी सार्वजनिक स्वास्थ्य अभियान की सफलता के लिए जनभागीदारी आवश्यक है। केवल अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों के माध्यम से बीमारी का नियंत्रण करना पर्याप्त नहीं होता; लोगों में जागरूकता, समय पर जाँच और उपचार के प्रति विश्वास भी विकसित करना पड़ता है।
युवा समाज के विभिन्न वर्गों तक आसानी से पहुँच सकते हैं। वे स्थानीय कार्यक्रमों, जनसंपर्क गतिविधियों और सामुदायिक संवाद के माध्यम से टीबी के बारे में सही जानकारी प्रसारित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
JOSH टीमों के माध्यम से युवाओं को निम्नलिखित कार्यों में शामिल किया जाएगा:
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नियमित जनसंपर्क और क्षेत्रीय जागरूकता गतिविधियाँ आयोजित करना।
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टीबी के संभावित लक्षणों के प्रति लोगों को जागरूक करना।
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लोगों को समय पर स्वास्थ्य जाँच कराने के लिए प्रेरित करना।
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टीबी से संबंधित गलत धारणाओं और सामाजिक कलंक को कम करना।
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टीबी से पीड़ित व्यक्तियों के प्रति संवेदनशील और सहयोगात्मक व्यवहार को प्रोत्साहित करना।
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समुदायों को टीबी उन्मूलन अभियान में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित करना।
इस पहल का मूल विचार यह है कि युवा केवल सरकारी योजनाओं के लाभार्थी न रहें, बल्कि देश की सार्वजनिक स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों के समाधान में सक्रिय योगदानकर्ता भी बनें।
क्षय रोग (TB) क्या है?
क्षय रोग, जिसे टीबी या तपेदिक भी कहा जाता है, एक संक्रामक बीमारी है। यह मुख्य रूप से Mycobacterium tuberculosis नामक जीवाणु के कारण होती है। यह बीमारी सामान्यतः फेफड़ों को प्रभावित करती है, लेकिन शरीर के अन्य अंगों को भी प्रभावित कर सकती है।
फेफड़ों की टीबी से पीड़ित व्यक्ति जब खाँसता है या बीमारी उत्पन्न करने वाले जीवाणुओं को हवा में छोड़ता है, तो आसपास मौजूद अन्य लोग संक्रमित हो सकते हैं।
टीबी के प्रमुख लक्षणों में लंबे समय तक खाँसी रहना, बुखार, रात में पसीना आना, वजन कम होना और कमजोरी महसूस होना शामिल हो सकते हैं। हालाँकि, केवल लक्षणों के आधार पर टीबी की पुष्टि नहीं की जा सकती। इसके लिए उचित चिकित्सकीय जाँच आवश्यक है।
समय पर पहचान और सही उपचार से टीबी को ठीक किया जा सकता है। इसलिए संभावित लक्षण दिखाई देने पर स्वास्थ्य केंद्र से संपर्क करना और चिकित्सकीय सलाह के अनुसार जाँच कराना महत्त्वपूर्ण है।
टीबी से संबंधित वैश्विक स्थिति
टीबी आज भी विश्व की प्रमुख संक्रामक बीमारियों में से एक है। यह बीमारी रोकी जा सकती है और इसका उपचार संभव है, फिर भी दुनिया भर में इससे बड़ी संख्या में लोग प्रभावित होते हैं।
दिए गए आँकड़ों के अनुसार, प्रत्येक वर्ष लगभग एक करोड़ लोग टीबी से बीमार पड़ते हैं और करीब 15 लाख लोगों की मृत्यु इस बीमारी के कारण होती है।
टीबी का प्रभाव केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। बीमारी के कारण मरीजों को लंबे समय तक उपचार कराना पड़ सकता है, जिससे परिवारों पर आर्थिक और सामाजिक दबाव भी बढ़ता है।
टीबी और HIV संक्रमण के बीच भी महत्त्वपूर्ण संबंध है। HIV से प्रभावित लोगों में कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली के कारण टीबी विकसित होने का जोखिम बढ़ जाता है। टीबी HIV से पीड़ित लोगों में मृत्यु के प्रमुख कारणों में से एक है।
इसके अतिरिक्त, टीबी का उपचार करते समय रोगाणुरोधी दवाओं के प्रति प्रतिरोध (Antimicrobial Resistance) की चुनौती भी सामने आती है। इसलिए टीबी की समय पर पहचान, उचित दवाओं का उपयोग और उपचार का पूरा कोर्स करना अत्यंत आवश्यक है।
टीबी की रोकथाम और उपचार का महत्त्व
टीबी की रोकथाम के लिए जागरूकता, शीघ्र निदान और उचित उपचार तीनों आवश्यक हैं। बीमारी की पहचान में देरी होने पर संक्रमण अन्य लोगों तक फैल सकता है और मरीज की स्वास्थ्य स्थिति भी गंभीर हो सकती है।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, टीबी से पीड़ित लगभग 85 प्रतिशत लोगों का चार या छह महीने के दवा उपचार से सफलतापूर्वक इलाज किया जा सकता है। उपचार की अवधि मरीज की बीमारी, दवाओं और चिकित्सकीय निर्देशों पर निर्भर करती है।
टीबी के उपचार में नियमितता अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। मरीज को चिकित्सकीय सलाह के बिना दवाएँ बंद नहीं करनी चाहिए, क्योंकि इससे उपचार असफल होने और दवा-प्रतिरोधी टीबी विकसित होने का जोखिम बढ़ सकता है।
इसके साथ ही, बीमारी से जुड़े सामाजिक कलंक को दूर करना भी आवश्यक है। टीबी से पीड़ित लोगों के साथ भेदभाव करने के बजाय उन्हें जाँच, उपचार और स्वस्थ होने की प्रक्रिया में सहयोग देना चाहिए।
राष्ट्रीय क्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम (NTEP)
भारत में टीबी नियंत्रण और उन्मूलन के प्रयासों को व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय क्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम (National Tuberculosis Elimination Programme—NTEP) संचालित किया जा रहा है।
इस कार्यक्रम का उद्देश्य टीबी के मामलों की पहचान करना, मरीजों को उपचार उपलब्ध कराना, बीमारी से होने वाली मृत्यु को कम करना और संक्रमण के प्रसार पर नियंत्रण स्थापित करना है।
कार्यक्रम के अंतर्गत जाँच सेवाओं का विस्तार, नई तकनीकों का उपयोग, स्वास्थ्य सेवाओं का विकेंद्रीकरण और सामुदायिक भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया गया है।
JOSH टीमों की शुरुआत इसी व्यापक प्रयास को समुदायों तक पहुँचाने की दिशा में एक अतिरिक्त कदम है। इन टीमों के माध्यम से लोगों को टीबी की पहचान और उपचार के प्रति जागरूक बनाने तथा स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँचने के लिए प्रोत्साहित करने का प्रयास किया जाएगा।
भारत में टीबी के मामलों में कमी
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की वैश्विक टीबी रिपोर्ट के अनुसार, भारत में टीबी की वार्षिक घटना दर (Incidence Rate) में कमी दर्ज की गई है।
टीबी की घटना दर का अर्थ किसी निर्धारित अवधि में जनसंख्या के भीतर सामने आने वाले नए मामलों की संख्या से है।
प्रमुख आँकड़े निम्नलिखित हैं:
| वर्ष | प्रति लाख जनसंख्या पर टीबी की घटना दर |
|---|---|
| 2015 | 237 |
| 2024 | 187 |
इन आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2015 से 2024 के बीच भारत में टीबी की घटना दर में लगभग 21 प्रतिशत की कमी आई है। यह गिरावट टीबी नियंत्रण के प्रयासों में हुई प्रगति को दर्शाती है।
प्रदान की गई जानकारी के अनुसार, भारत में टीबी की घटना दर में आई यह कमी कई अन्य उच्च टीबी-भार वाले देशों की तुलना में उल्लेखनीय रही है।
हालाँकि, टीबी के उन्मूलन के लिए केवल नए मामलों की संख्या कम करना पर्याप्त नहीं है। मरीजों की समय पर पहचान, उपचार की निरंतरता और संक्रमण के प्रसार को रोकना भी उतना ही आवश्यक है।
टीबी मरीजों की पहचान और उपचार कवरेज में वृद्धि
भारत में टीबी के मामलों की पहचान बढ़ाने के लिए नई तकनीकों, जाँच सुविधाओं के विस्तार और समुदाय-आधारित गतिविधियों का उपयोग किया गया है।
उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार, भारत में टीबी उपचार कवरेज वर्ष 2015 के लगभग 53 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2024 में 92 प्रतिशत से अधिक हो गया।
वर्ष 2024 में भारत में लगभग 27 लाख अनुमानित टीबी मामलों में से 26.18 लाख मरीजों का निदान किया गया।
मरीजों की पहचान बढ़ने से ऐसे मामलों की संख्या में भी कमी आई है, जिनमें व्यक्ति को टीबी तो थी, लेकिन उसकी जानकारी संबंधित कार्यक्रम को नहीं दी गई थी। ऐसे मामलों को सामान्यतः ‘मिसिंग केस’ (Missing Cases) कहा जाता है।
| प्रमुख संकेतक | 2015 | 2024 |
|---|---|---|
| उपचार कवरेज | 53% | 92% से अधिक |
| अनुमानित मिसिंग केस | लगभग 15 लाख | 1 लाख से कम |
| टीबी से मृत्यु दर, प्रति लाख जनसंख्या | 28 | 21 |
इन आँकड़ों से स्पष्ट होता है कि मरीजों की पहचान और उपचार सेवाओं तक पहुँच बढ़ाने के प्रयासों ने टीबी नियंत्रण में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है।
टीबी से होने वाली मृत्यु दर में कमी
टीबी के कारण होने वाली मृत्यु दर में कमी लाना भारत के टीबी उन्मूलन प्रयासों का एक महत्त्वपूर्ण लक्ष्य है।
उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार, भारत में टीबी से मृत्यु दर वर्ष 2015 में प्रति लाख जनसंख्या पर 28 थी, जो वर्ष 2024 में घटकर 21 रह गई।
मृत्यु दर में यह कमी समय पर जाँच, उपचार की उपलब्धता और स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के महत्त्व को दर्शाती है।
फिर भी, टीबी से होने वाली मौतों को और कम करने के लिए बीमारी की शीघ्र पहचान, मरीजों को नियमित उपचार उपलब्ध कराना और गंभीर मामलों की समय पर चिकित्सकीय देखभाल सुनिश्चित करना आवश्यक है।
टीबी मुक्त भारत अभियान की उपलब्धियाँ
टीबी मुक्त भारत अभियान का उद्देश्य देश में टीबी के मामलों को कम करना, कमजोर वर्गों तक जाँच सुविधाएँ पहुँचाना और मरीजों को उपचार के दौरान आवश्यक सहायता उपलब्ध कराना है।
दिए गए विवरण के अनुसार, दिसंबर 2024 में शुरू किए गए अभियान के अंतर्गत देशभर में 19 करोड़ से अधिक संवेदनशील व्यक्तियों की टीबी के लिए स्क्रीनिंग की गई।
इस प्रक्रिया में 24.5 लाख से अधिक टीबी मरीजों की पहचान की गई, जिनमें 8.61 लाख ऐसे मामले शामिल थे जिनमें मरीजों में स्पष्ट लक्षण नहीं थे।
लक्षणरहित टीबी मामलों की पहचान विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि कुछ संक्रमित व्यक्तियों में स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। उपयुक्त जाँच के माध्यम से ऐसे मामलों की पहचान होने पर समय पर उपचार शुरू किया जा सकता है।
इस प्रकार, व्यापक स्क्रीनिंग और सामुदायिक स्तर पर जागरूकता टीबी के संक्रमण को नियंत्रित करने में सहायक हो सकती है।
निक्षय पोषण योजना के अंतर्गत वित्तीय सहायता
टीबी के उपचार के दौरान मरीजों को पौष्टिक भोजन और आर्थिक सहायता की आवश्यकता हो सकती है। बीमारी के कारण कई परिवारों की आय प्रभावित होती है, जबकि जाँच, उपचार, यात्रा और पोषण पर अतिरिक्त खर्च भी हो सकता है।
इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए सरकार द्वारा निक्षय पोषण योजना (Ni-kshay Poshan Yojana—NPY) के अंतर्गत टीबी मरीजों को पोषण सहायता प्रदान की जाती है।
दिए गए विवरण के अनुसार, इस योजना के अंतर्गत प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (Direct Benefit Transfer—DBT) की राशि ₹500 प्रति माह से बढ़ाकर ₹1,000 प्रति माह प्रति मरीज कर दी गई है। यह सहायता उपचार की पूरी अवधि के दौरान प्रदान की जाती है।
इस योजना से संबंधित प्रमुख आँकड़े निम्नलिखित हैं:
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योजना की शुरुआत: अप्रैल 2018।
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मासिक सहायता: ₹1,000 प्रति मरीज।
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कुल वितरित राशि: ₹4,406 करोड़।
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लाभार्थियों की संख्या: 1.37 करोड़।
इस सहायता का उद्देश्य टीबी मरीजों को उपचार के दौरान पोषण संबंधी जरूरतों को पूरा करने में मदद देना है। आर्थिक सहायता से मरीजों और उनके परिवारों पर पड़ने वाले वित्तीय दबाव को कम करने में भी योगदान मिल सकता है।
टीबी उन्मूलन में सामाजिक सुरक्षा और सामुदायिक सहयोग
टीबी का प्रभाव केवल मरीज के स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहता। बीमारी के कारण रोजगार, आय, शिक्षा और परिवार की आर्थिक स्थिति भी प्रभावित हो सकती है।
कई परिवारों को इलाज के दौरान यात्रा, भोजन और अन्य आवश्यकताओं पर अतिरिक्त खर्च करना पड़ता है। आर्थिक कठिनाइयों के कारण कुछ मरीज उपचार पूरा करने में भी परेशानी का सामना कर सकते हैं।
इसलिए टीबी उन्मूलन के लिए स्वास्थ्य सेवाओं के साथ-साथ सामाजिक सुरक्षा, पोषण सहायता और आर्थिक सहयोग भी महत्त्वपूर्ण हैं।
JOSH टीमों के माध्यम से समुदायों में जागरूकता बढ़ाकर मरीजों को उपचार के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है। इसके साथ ही, टीबी से जुड़े भेदभाव को कम करने और मरीजों को सामाजिक समर्थन देने में भी सहायता मिल सकती है।
JOSH पहल का समग्र महत्त्व
JOSH टीमों की शुरुआत भारत में टीबी उन्मूलन के प्रयासों में युवाओं की भागीदारी को संस्थागत रूप देने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है। MY Bharat स्वयंसेवकों और NCC कैडेटों को एक मंच पर लाकर सरकार ने सामुदायिक जागरूकता, जनसंपर्क और सार्वजनिक स्वास्थ्य गतिविधियों को मजबूत करने का प्रयास किया है।
इस पहल की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि टीमें स्थानीय स्तर पर कितनी प्रभावी ढंग से काम करती हैं, लोगों को जाँच और उपचार के लिए कितना प्रेरित कर पाती हैं तथा टीबी से जुड़े सामाजिक कलंक को कम करने में कितना योगदान देती हैं।
यदि जागरूकता, शीघ्र निदान, उचित उपचार, पोषण सहायता और सामुदायिक सहयोग को एक साथ आगे बढ़ाया जाता है, तो भारत में टीबी के बोझ को कम करने के प्रयासों को अधिक गति मिल सकती है।
यह पहल इस विचार को मजबूत करती है कि टीबी उन्मूलन केवल स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि इसमें सरकार, युवा, स्वास्थ्यकर्मी, स्थानीय समुदाय और समाज के प्रत्येक वर्ग की भागीदारी आवश्यक है।