ग्रेट इंडियन बस्टर्ड संरक्षण कार्यक्रम का उद्देश्य
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के संरक्षण के लिए भारत सरकार ने राजस्थान में एक व्यापक संरक्षण एवं पुनर्प्राप्ति कार्यक्रम संचालित किया है। इसका उद्देश्य इस पक्षी को विलुप्त होने से बचाना, उसकी संख्या बढ़ाना और उसके प्राकृतिक घास के मैदानों को सुरक्षित करना है। इस कार्यक्रम में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, राजस्थान वन विभाग और भारतीय वन्यजीव संस्थान (Wildlife Institute of India—WII) की प्रमुख भूमिका है। इसके अतिरिक्त, इंटरनेशनल फंड फॉर हौबारा कंजर्वेशन से तकनीकी सहयोग तथा प्रतिपूरक वनीकरण निधि प्रबंधन एवं योजना प्राधिकरण (CAMPA) से वित्तीय सहायता प्राप्त होती है। कार्यक्रम के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं:
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संरक्षण प्रजनन: नियंत्रित और सुरक्षित परिस्थितियों में पक्षियों का प्रजनन कर उनकी संख्या बढ़ाना।
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आवास प्रबंधन: घास के मैदानों और रेगिस्तानी पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षण करना।
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खतरों में कमी: बिजली की तारों से टकराव, आवास विनाश और अन्य मानवीय गतिविधियों से होने वाली मृत्यु को कम करना।
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आवास की बहाली: क्षतिग्रस्त प्राकृतिक क्षेत्रों को पुनर्स्थापित करना।
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सामुदायिक भागीदारी: स्थानीय समुदायों को संरक्षण गतिविधियों में शामिल करना और जागरूकता बढ़ाना।
जैसलमेर के संरक्षण केंद्रों में ग्रेट इंडियन बस्टर्ड की स्थिति
जैसलमेर जिले के सम और रामदेवरा स्थित संरक्षण प्रजनन केंद्र इस कार्यक्रम के प्रमुख केंद्र हैं। उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार, इन दोनों केंद्रों में कुल 97 ग्रेट इंडियन बस्टर्ड रखे गए हैं। इनमें से 40 पक्षी जंगल में दिए गए अंडों से प्राप्त हुए थे, जबकि 57 पक्षियों का जन्म बंदी प्रजनन कार्यक्रम के अंतर्गत हुआ। इन 97 पक्षियों में से 86 को संरक्षण प्रजनन के लिए रखा गया है, जबकि 11 पक्षियों को भविष्य में जंगल में छोड़ने के लिए निर्धारित किया गया है। यह व्यवस्था संरक्षण कार्यक्रम के दो महत्त्वपूर्ण पहलुओं को दर्शाती है—पहला, सुरक्षित परिस्थितियों में पक्षियों की संख्या बढ़ाना और दूसरा, उपयुक्त पक्षियों को धीरे-धीरे प्राकृतिक आवास में वापस भेजना।
कृत्रिम प्रजनन में सफलता और ‘जंपस्टार्ट’ तकनीक
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड का प्रजनन अपेक्षाकृत धीमा होता है। इसलिए इसकी आबादी को तेजी से बढ़ाना संरक्षण विशेषज्ञों के लिए एक बड़ी चुनौती है। कृत्रिम प्रजनन और वैज्ञानिक देखभाल की मदद से इस दिशा में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। दिए गए आँकड़ों के अनुसार, बंदी प्रजनन कार्यक्रम के तहत वर्ष 2025 में 24 जीवित चूजे और वर्ष 2026 में 29 जीवित चूजे प्राप्त हुए। इससे संरक्षण केंद्रों में पक्षियों की संख्या बढ़ाने और भविष्य में जंगल में छोड़े जाने योग्य पक्षियों की उपलब्धता में मदद मिली है। इस कार्यक्रम में अपनाई गई एक उल्लेखनीय वैज्ञानिक तकनीक ‘जंपस्टार्ट’ (Jumpstart) दृष्टिकोण है। इसके अंतर्गत बंदी अवस्था में दिए गए अंडों को प्राकृतिक आवास में पक्षियों के घोंसलों में रखा जाता है। यदि उन्हें प्राकृतिक रूप से अंडों पर बैठी मादा स्वीकार कर लेती है, तो वह उनका ऊष्मायन करती है और उनसे चूजे निकल सकते हैं। इस तकनीक के प्रयोग से राजस्थान में छह और गुजरात में दो चूजे निकलने में सफलता मिली। इससे संकेत मिलता है कि वैज्ञानिक प्रजनन तकनीकों और प्राकृतिक व्यवहार के संयोजन से इस प्रजाति के संरक्षण में सहायता मिल सकती है।
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड: प्रमुख तथ्य
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड का वैज्ञानिक नाम Ardeotis nigriceps है। यह भारत के सबसे महत्त्वपूर्ण संकटग्रस्त पक्षियों में से एक है और इसे अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) की रेड लिस्ट में ‘गंभीर रूप से संकटग्रस्त’ (Critically Endangered) श्रेणी में रखा गया है।
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आवास: यह मुख्यतः शुष्क घास के मैदानों और अर्ध-रेगिस्तानी क्षेत्रों में पाया जाता है। राजस्थान इसका प्रमुख प्राकृतिक आवास है।
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आकार: यह दुनिया के सबसे भारी उड़ने वाले पक्षियों में से एक है। इसकी ऊँचाई लगभग एक मीटर और पंखों का फैलाव करीब सात फीट तक हो सकता है।
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प्रजनन: इसकी प्रजनन दर कम होती है, इसलिए आबादी में गिरावट आने पर उसकी भरपाई करना कठिन होता है।
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पारिस्थितिक महत्त्व: यह घास के मैदानों की जैव विविधता का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। इसका संरक्षण अन्य घासभूमि प्रजातियों और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा में भी सहायक है।
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड की आबादी में गिरावट के प्रमुख कारण
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड की आबादी में कमी के पीछे प्राकृतिक और मानवीय, दोनों प्रकार के कारक हैं। इनमें प्रमुख हैं: 1. प्राकृतिक आवास का विनाश: घास के मैदानों को कृषि भूमि, निर्माण क्षेत्रों और अन्य उपयोगों में बदलने से पक्षी के रहने, भोजन प्राप्त करने और प्रजनन करने के लिए उपयुक्त क्षेत्र कम हो रहे हैं। 2. आवास की गुणवत्ता में गिरावट: प्राकृतिक घासभूमि में बदलाव, मानवीय गतिविधियों और भूमि उपयोग में परिवर्तन से इस पक्षी के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ प्रभावित होती हैं। 3. कृषि गतिविधियों का विस्तार: कृषि के विस्तार से घास के मैदान छोटे और अलग-अलग हिस्सों में बँट जाते हैं, जिससे पक्षियों के प्राकृतिक व्यवहार और प्रजनन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। 4. शिकारी जीवों का खतरा: आवारा तथा पालतू कुत्तों और अन्य मांसाहारी जीवों द्वारा अंडों, चूजों अथवा पक्षियों पर हमला भी आबादी के लिए खतरा है। 5. बिजली की तारों से टकराव: ऊँची बिजली की लाइनें इस प्रजाति के लिए सबसे गंभीर मानवीय खतरों में से एक हैं। उड़ान के दौरान तार दिखाई न देने के कारण पक्षियों की मृत्यु हो सकती है। 6. पवन ऊर्जा संयंत्र और अन्य मानवीय गतिविधियाँ: ऊर्जा अवसंरचना का विस्तार तथा प्राकृतिक आवासों में बढ़ती गतिविधियाँ पक्षियों की सुरक्षा और उनके आवास को प्रभावित कर सकती हैं।
बिजली की तारें: ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के अस्तित्व के लिए बड़ा खतरा
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड की मृत्यु के प्रमुख कारणों में से एक बिजली की ऊपरी तारों से टकराना है। भारतीय वन्यजीव संस्थान की वर्ष 2018 की Power Line Mitigation रिपोर्ट में बिजली की तारों से टकराने के कारण हर वर्ष बड़ी संख्या में पक्षियों की मृत्यु होने की समस्या को रेखांकित किया गया था। ग्रेट इंडियन बस्टर्ड विशेष रूप से इस खतरे के प्रति संवेदनशील है। इसके कुछ प्रमुख कारण हैं:
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सीमित सामने की दृष्टि: इसकी आँखों की स्थिति के कारण सामने की दिशा में दूर स्थित पतली तारों को पहचानना कठिन हो सकता है।
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भारी शरीर: इसका भारी शरीर और उड़ान की विशेषताएँ निकट आने पर तेजी से दिशा बदलने की क्षमता को सीमित कर सकती हैं।
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तारों की कम दृश्यता: पतली बिजली की तारें खुले रेगिस्तानी परिदृश्य में उड़ते समय आसानी से दिखाई नहीं देतीं।
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कम वोल्टेज वाली लाइनों से करंट लगने का खतरा: कुछ विद्युत लाइनों में तारों के बीच कम दूरी होने के कारण संपर्क की स्थिति में करंट लग सकता है। यदि बिजली की तारों से होने वाली मृत्यु को प्रभावी ढंग से नियंत्रित नहीं किया गया, तो इस प्रजाति के दीर्घकालिक अस्तित्व पर गंभीर संकट बना रह सकता है।
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के संरक्षण के लिए सरकार के प्रमुख कदम
भारत सरकार ने ग्रेट इंडियन बस्टर्ड की सुरक्षा के लिए कानूनी, वैज्ञानिक और प्रशासनिक स्तर पर कई कदम उठाए हैं। 1. वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के अंतर्गत सुरक्षा: ग्रेट इंडियन बस्टर्ड को वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची-I में शामिल किया गया है। इससे इसे शिकार और अन्य निषिद्ध गतिविधियों से उच्चतम स्तर की कानूनी सुरक्षा प्राप्त होती है। 2. राष्ट्रीय उद्यान और अभयारण्य: इसके महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक आवासों को संरक्षित क्षेत्रों के रूप में सुरक्षा देने पर जोर दिया गया है। राजस्थान का डेजर्ट नेशनल पार्क इसके संरक्षण के लिए विशेष महत्त्व रखता है। 3. प्रजाति पुनर्प्राप्ति कार्यक्रम: केंद्र प्रायोजित योजना ‘वन्यजीव आवासों का विकास’ (Development of Wildlife Habitat) के अंतर्गत इस प्रजाति के संरक्षण के लिए विशेष प्रयास किए जाते हैं। इसके तहत राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को वित्तीय तथा तकनीकी सहायता दी जाती है। 4. संरक्षण प्रजनन केंद्रों की स्थापना: राजस्थान के जैसलमेर जिले में सम और रामदेवरा में संरक्षण प्रजनन केंद्र स्थापित किए गए हैं। इन केंद्रों में कृत्रिम अंडा ऊष्मायन, चूजों का पालन-पोषण, बंदी प्रजनन और पक्षियों की देखभाल से जुड़ी तकनीकें विकसित की गई हैं। 5. राज्यों के बीच सहयोग: संरक्षण प्रजनन कार्यक्रम में राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र के वन विभागों तथा भारतीय वन्यजीव संस्थान का सहयोग शामिल है। 6. प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण पर अंतरराष्ट्रीय सहयोग: ग्रेट इंडियन बस्टर्ड को भारत के प्रस्ताव के आधार पर प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण संबंधी अभिसमय (Convention on Migratory Species—CMS) के परिशिष्ट-I में शामिल किया गया है।
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड और अंतरराष्ट्रीय संरक्षण
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड का संरक्षण केवल भारत के लिए जैव विविधता का मुद्दा नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर संकटग्रस्त प्रजातियों की रक्षा के प्रयासों का भी हिस्सा है। CMS के परिशिष्ट-I में शामिल होने से इसके संरक्षण और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के महत्त्व को मान्यता मिलती है। हालाँकि इस पक्षी का संरक्षण मुख्यतः भारत में इसके प्राकृतिक आवासों की सुरक्षा पर निर्भर करता है। इसलिए घास के मैदानों का संरक्षण, बिजली की तारों से होने वाली मृत्यु में कमी, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और वैज्ञानिक निगरानी अत्यंत आवश्यक हैं।
जंगल में पक्षियों को छोड़ने की उपलब्धि का महत्त्व
दो ग्रेट इंडियन बस्टर्ड को प्राकृतिक आवास में छोड़ना संरक्षण कार्यक्रम के लिए एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव है। यह दर्शाता है कि संरक्षण प्रजनन केंद्रों में पक्षियों की संख्या बढ़ाने के साथ-साथ उन्हें जंगल में पुनः स्थापित करने की दिशा में भी प्रयास किए जा रहे हैं। हालाँकि केवल पक्षियों को छोड़ देना पर्याप्त नहीं है। उनकी अनुकूलन क्षमता, भोजन प्राप्त करने की स्थिति, जीवित रहने की दर, प्राकृतिक व्यवहार और भविष्य में प्रजनन की सफलता की वैज्ञानिक निगरानी करना भी आवश्यक होगा। इसी प्रकार बिजली की तारों तथा आवास विनाश जैसे खतरों को कम करना भी जरूरी है। निष्कर्षतः, ग्रेट इंडियन बस्टर्ड संरक्षण कार्यक्रम भारत में संकटग्रस्त वन्यजीवों की रक्षा के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान, सरकारी सहयोग और दीर्घकालिक संरक्षण प्रयासों का उदाहरण है। यदि प्राकृतिक आवासों की रक्षा, प्रजनन कार्यक्रम और खतरों के प्रभावी प्रबंधन को साथ-साथ आगे बढ़ाया जाए, तो राजस्थान के रेगिस्तानी क्षेत्रों में इस दुर्लभ पक्षी की आबादी को पुनः स्थापित करने की संभावनाएँ मजबूत हो सकती हैं।