Skip to content

केंद्र सरकार ने नए कॉर्पोरेट एवरेज फ्यूल इकोनॉमी (CAFE-III) मानदंड अधिसूचित किए

Environment 📅 October 11, 2026
केंद्र सरकार ने देश में यात्री वाहनों की ईंधन दक्षता बढ़ाने और कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) उत्सर्जन को कम करने के उद्देश्य से कॉर्पोरेट एवरेज फ्यूल इकोनॉमी (Corporate Average Fuel Economy—CAFE) के तीसरे चरण के मानदंडों को अधिसूचित किया है। ये नए मानदंड 1 अप्रैल 2027 से लागू होंगे और 31 मार्च 2032 तक प्रभावी रहेंगे।

नए CAFE-III मानदंडों के अंतर्गत वाहन निर्माताओं को अपने द्वारा बेचे जाने वाले यात्री वाहनों के औसत ईंधन उपभोग को निर्धारित सीमा के भीतर रखना होगा। इसके लिए वाहन निर्माताओं को अधिक ईंधन-कुशल तकनीकों, वैकल्पिक ईंधनों, हाइब्रिड प्रणालियों और इलेक्ट्रिक वाहनों जैसी स्वच्छ प्रौद्योगिकियों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा।

इन मानदंडों का प्रमुख उद्देश्य भारत की आयातित पेट्रोलियम पर निर्भरता कम करना, परिवहन क्षेत्र से होने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करना तथा ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरणीय स्थिरता को बढ़ावा देना है।

कॉर्पोरेट एवरेज फ्यूल इकोनॉमी (CAFE) मानदंड क्या हैं?

कॉर्पोरेट एवरेज फ्यूल इकोनॉमी मानदंड ऐसे नियामक मानक हैं, जिनके माध्यम से किसी वाहन निर्माता द्वारा एक वित्तीय वर्ष में बेचे गए सभी संबंधित यात्री वाहनों की औसत ईंधन खपत को नियंत्रित किया जाता है।

इन मानदंडों के अंतर्गत किसी एक कार की ईंधन दक्षता के बजाय निर्माता के संपूर्ण वाहन बेड़े की औसत ईंधन खपत को महत्त्व दिया जाता है। इसका अर्थ है कि कंपनी को अपने सभी संबंधित वाहनों की संयुक्त औसत ईंधन खपत निर्धारित मानकों के अनुरूप रखनी होती है।

उदाहरण के लिए, यदि कोई कंपनी अधिक ईंधन खपत करने वाली बड़ी कारों के साथ-साथ कम ईंधन खपत करने वाली छोटी कारें और इलेक्ट्रिक वाहन भी बेचती है, तो उसके पूरे वाहन बेड़े के औसत प्रदर्शन का आकलन निर्धारित नियमों के अनुसार किया जाता है।

CAFE मानकों का संबंध ईंधन खपत और कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन से है, क्योंकि सामान्य परिस्थितियों में पेट्रोल और डीजल जैसे जीवाश्म ईंधनों के दहन से होने वाला CO₂ उत्सर्जन प्रयुक्त ईंधन की मात्रा के साथ बढ़ता है। इस प्रकार, ईंधन दक्षता में सुधार से उत्सर्जन कम करने में सहायता मिलती है।

भारत में CAFE मानदंडों की आवश्यकता क्यों है?

भारत अपनी पेट्रोलियम आवश्यकताओं के एक बड़े हिस्से के लिए आयात पर निर्भर है। घरेलू स्तर पर पेट्रोलियम संसाधनों की सीमित उपलब्धता और परिवहन क्षेत्र में ईंधन की बढ़ती मांग के कारण यह निर्भरता देश की ऊर्जा सुरक्षा के लिए एक महत्त्वपूर्ण चुनौती है।

भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा पेट्रोलियम उपभोक्ता है। सड़क परिवहन में पेट्रोल और डीजल की व्यापक खपत के कारण यात्री वाहन इस क्षेत्र की ऊर्जा मांग में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

CAFE मानदंडों की आवश्यकता के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:

  • पेट्रोलियम आयात में कमी: वाहनों की ईंधन दक्षता बढ़ने से समान दूरी तय करने के लिए कम ईंधन की आवश्यकता होती है, जिससे पेट्रोलियम की कुल मांग कम करने में मदद मिल सकती है।

  • कार्बन उत्सर्जन में कमी: कम ईंधन खपत से पारंपरिक आंतरिक दहन इंजन वाले वाहनों से होने वाले CO₂ उत्सर्जन को कम किया जा सकता है।

  • ऊर्जा सुरक्षा: आयातित जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता घटने से वैश्विक तेल कीमतों और आपूर्ति में होने वाले उतार-चढ़ाव के प्रति अर्थव्यवस्था की संवेदनशीलता कम हो सकती है।

  • तकनीकी नवाचार: वाहन निर्माताओं को बेहतर इंजन, हल्की वाहन संरचना, हाइब्रिड तकनीक और इलेक्ट्रिक प्रणालियों के विकास के लिए प्रोत्साहन मिलता है।

  • पर्यावरण संरक्षण: ईंधन की खपत में कमी और स्वच्छ प्रौद्योगिकियों के विस्तार से परिवहन क्षेत्र के पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने में सहायता मिलती है।

भारत में CAFE मानदंडों का विकास

भारत में यात्री वाहनों की ईंधन खपत को नियंत्रित करने के लिए ऊर्जा दक्षता से संबंधित मानकों को चरणबद्ध तरीके से लागू किया गया है। इनका विकास वाहन प्रौद्योगिकी, औसत वाहन भार और पर्यावरणीय आवश्यकताओं में हो रहे बदलावों को ध्यान में रखकर किया गया है।

प्रथम चरण (2017-18 से 2021-22): इस चरण में यात्री वाहनों की औसत ईंधन खपत को नियंत्रित करने के लिए प्रारंभिक मानक लागू किए गए। उपलब्ध विवरण के अनुसार, इस चरण में 1,037 किलोग्राम के औसत संदर्भ भार के आधार पर ईंधन खपत का मानक 5.49 लीटर प्रति 100 किलोमीटर से कम निर्धारित किया गया था।

द्वितीय चरण (अप्रैल 2022 से): दूसरे चरण में मानकों को अधिक कठोर बनाया गया। इसके लिए संदर्भ औसत वाहन भार लगभग 1,082 किलोग्राम माना गया। इस चरण का उद्देश्य वाहन निर्माताओं को अधिक ईंधन-कुशल वाहन विकसित करने के लिए प्रोत्साहित करना था।

तृतीय चरण (अप्रैल 2027 से मार्च 2032): CAFE-III के तहत ईंधन खपत के मानकों को और कठोर किया जाएगा। साथ ही, वाहनों के भार के अनुसार लक्ष्य निर्धारित करने की व्यवस्था को संशोधित किया गया है, ताकि विभिन्न प्रकार के यात्री वाहनों की विशेषताओं को ध्यान में रखा जा सके।

CAFE-III मानदंडों की प्रमुख विशेषताएँ

नए मानदंडों में ईंधन खपत के लक्ष्यों, संदर्भ वाहन भार और तकनीकी विकल्पों से संबंधित कई महत्त्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं।

1. लागू होने की अवधि

CAFE-III मानदंड 1 अप्रैल 2027 से 31 मार्च 2032 तक लागू रहेंगे। इनका उद्देश्य इस अवधि के दौरान यात्री वाहन निर्माताओं की औसत ईंधन खपत को निर्धारित सीमा के भीतर रखना है।

ये मानदंड भारत में बिक्री के लिए निर्मित या आयातित नए यात्री वाहनों पर लागू होंगे, जैसा कि संबंधित अधिसूचना में निर्धारित किया गया है।

2. औसत ईंधन खपत के लक्ष्य में क्रमिक कमी

नए मानकों के अंतर्गत औसत ईंधन खपत की निर्धारित सीमा को प्रत्येक वर्ष अधिक कठोर बनाया जाएगा। उपलब्ध अधिसूचना के विवरण के अनुसार, प्रमुख लक्ष्य निम्नलिखित हैं:

वित्तीय वर्ष औसत ईंधन खपत का निर्धारित मानक
2027-28 3.996 लीटर प्रति 100 किमी
2031-32 3.327 लीटर प्रति 100 किमी

इन दोनों लक्ष्यों से स्पष्ट होता है कि निर्धारित औसत ईंधन खपत में लगभग 16.7 प्रतिशत की कमी का लक्ष्य रखा गया है।

यहाँ ध्यान देना आवश्यक है कि ये मानक निर्माता के संबंधित वाहन बेड़े की औसत ईंधन खपत से जुड़े हैं। इनका अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक व्यक्तिगत कार को अनिवार्य रूप से समान ईंधन खपत हासिल करनी होगी। अलग-अलग वाहनों के लिए लागू आवश्यकताएँ संबंधित नियामक गणना और भार-आधारित व्यवस्था पर निर्भर करेंगी।

3. संदर्भ वाहन भार में वृद्धि

CAFE-III के अंतर्गत संदर्भ वाहन भार को मौजूदा 1,082 किलोग्राम से बढ़ाकर 1,229 किलोग्राम किया गया है। यह लगभग 13.6 प्रतिशत की वृद्धि है।

संदर्भ भार वह आधार है, जिसका उपयोग वाहन के भार और निर्धारित ईंधन दक्षता लक्ष्य के बीच संबंध तय करने में किया जाता है। आधुनिक यात्री वाहनों में सुरक्षा सुविधाओं, अतिरिक्त उपकरणों, आकार और अन्य तकनीकी विशेषताओं के कारण औसत भार में बदलाव आया है। नए संदर्भ भार का उद्देश्य वाहन बेड़े की बदलती संरचना को मानकों में समायोजित करना है।

हालाँकि, संदर्भ भार में वृद्धि का अर्थ यह नहीं है कि सभी कारों को भारी बनाया जा सकता है या उनके लिए ईंधन खपत की सीमा स्वतः बढ़ जाएगी। वास्तविक आवश्यकताएँ लागू लक्ष्य रेखा और नियामक गणना पर निर्भर करती हैं।

4. हल्के और भारी वाहनों के लिए अलग-अलग प्रभाव

नए मानकों में लक्ष्य रेखा को अधिक समतल बनाया गया है। इसके परिणामस्वरूप हल्के वाहनों के लिए अपेक्षाकृत कम कठोर लक्ष्य और भारी वाहनों के लिए अधिक ईंधन दक्षता की आवश्यकता निर्धारित करने का दृष्टिकोण अपनाया गया है।

इस व्यवस्था का उद्देश्य विभिन्न भार वर्गों के वाहनों के बीच नियामक आवश्यकताओं को अधिक संतुलित बनाना है। बड़ी एसयूवी और अन्य भारी यात्री कारों के निर्माताओं को ईंधन दक्षता सुधारने के लिए अधिक प्रयास करने पड़ सकते हैं।

यह बदलाव विशेष रूप से इसलिए महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि भारतीय बाजार में एसयूवी और बड़े आकार के यात्री वाहनों की लोकप्रियता बढ़ रही है।

5. स्वच्छ प्रौद्योगिकियों को अपनाने की स्वतंत्रता

CAFE-III वाहन निर्माताओं को ईंधन दक्षता बढ़ाने के लिए विभिन्न तकनीकी विकल्प अपनाने की सुविधा प्रदान करता है। इनमें बेहतर इंजन, हाइब्रिड प्रणालियाँ, उन्नत वायुगतिकीय डिजाइन, हल्की सामग्री और वैकल्पिक ईंधनों का उपयोग शामिल हो सकता है।

इससे कंपनियों को अपनी तकनीकी क्षमता, उत्पादन लागत और बाजार की मांग के अनुसार समाधान विकसित करने का अवसर मिलता है।

CAFE-III मानदंड किन वाहनों पर लागू होंगे?

CAFE मानकों का दायरा यात्री वाहन क्षेत्र तक विस्तृत है। इसमें संबंधित नियामक परिभाषाओं के अंतर्गत आने वाले पेट्रोल, डीजल, LPG, CNG, हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक यात्री वाहन शामिल हैं।

हालाँकि, विभिन्न प्रकार के वाहनों के लिए ऊर्जा खपत की गणना एक जैसी नहीं होती। पारंपरिक ईंधन से चलने वाले वाहनों में ईंधन की खपत को लीटर प्रति 100 किलोमीटर के आधार पर मापा जा सकता है, जबकि इलेक्ट्रिक वाहनों की ऊर्जा खपत और नियामक समतुल्यता का आकलन लागू नियमों के अनुसार किया जाता है।

इसलिए, CAFE मानकों का उद्देश्य केवल पेट्रोल और डीजल कारों की दक्षता बढ़ाना नहीं, बल्कि यात्री वाहन उद्योग को समग्र रूप से अधिक ऊर्जा-कुशल बनाना है।

CAFE मानकों के अंतर्गत ईंधन खपत का आकलन कैसे किया जाता है?

CAFE व्यवस्था में किसी वाहन निर्माता द्वारा एक वित्तीय वर्ष के दौरान बेचे गए संबंधित यात्री वाहनों की औसत ईंधन खपत का निर्धारण किया जाता है।

इसके लिए वाहनों के निर्धारित ईंधन खपत संबंधी आंकड़ों और नियामक गणना पद्धति का उपयोग किया जाता है। परीक्षण मानकीकृत परिस्थितियों में मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं में किए जाते हैं, ताकि विभिन्न वाहनों के प्रदर्शन की तुलना एक समान आधार पर की जा सके।

औसत ईंधन खपत के आकलन में वाहन निर्माता के संपूर्ण संबंधित वाहन बेड़े के प्रदर्शन को ध्यान में रखा जाता है। इसलिए, केवल एक मॉडल की ईंधन दक्षता के बजाय कंपनी द्वारा बेचे जाने वाले विभिन्न मॉडलों का संयुक्त प्रदर्शन महत्त्वपूर्ण होता है।

CAFE मानकों का आधार यह है कि ईंधन की खपत और CO₂ उत्सर्जन के बीच प्रत्यक्ष संबंध होता है। पेट्रोल या डीजल के दहन से सामान्यतः कार्बन डाइऑक्साइड उत्पन्न होती है। अतः ईंधन दक्षता में सुधार करने से वाहन के उपयोग के दौरान होने वाले उत्सर्जन को कम करने में सहायता मिल सकती है।

नई तकनीकों और नवाचार को मिलेगा प्रोत्साहन

CAFE-III मानदंड केवल पारंपरिक इंजन की दक्षता सुधारने तक सीमित नहीं हैं। इनके माध्यम से वाहन निर्माताओं को ऐसे नवाचार अपनाने के लिए भी प्रोत्साहित किया जाएगा, जो वाहनों की ऊर्जा खपत कम कर सकते हैं।

प्रमुख तकनीकी उपाय निम्नलिखित हैं:

  • सौर परावर्तक पेंट: ऐसे पेंट का उपयोग, जो सूर्य की ऊर्जा के अधिक हिस्से को परावर्तित करके वाहन के बाहरी हिस्से का तापमान कम रखने में सहायता कर सकते हैं।

  • उन्नत ग्लेजिंग: बेहतर काँच और ग्लेजिंग तकनीकें, जो वाहन के केबिन में प्रवेश करने वाली गर्मी को कम कर सकती हैं।

  • उच्च दक्षता वाली एयर-कंडीशनिंग: कम ऊर्जा खपत करने वाली वातानुकूलन प्रणालियाँ, जिनसे केबिन को ठंडा रखने के लिए इंजन या बैटरी पर पड़ने वाला अतिरिक्त भार कम हो सकता है।

  • हाइब्रिड तकनीक: पारंपरिक इंजन और इलेक्ट्रिक मोटर के संयोजन से ईंधन की खपत कम करने की संभावना बढ़ती है।

  • हल्की सामग्री और बेहतर डिजाइन: वाहन के भार तथा वायु प्रतिरोध में कमी लाकर ऊर्जा दक्षता में सुधार किया जा सकता है।

  • वैकल्पिक ईंधन: CNG, LPG और अन्य उपयुक्त वैकल्पिक ईंधनों के उपयोग से ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाई जा सकती है।

इन तकनीकों का वास्तविक लाभ वाहन के डिजाइन, उपयोग की परिस्थितियों, लागत और अपनाई गई प्रणाली की दक्षता पर निर्भर करेगा।

भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर CAFE-III का प्रभाव

भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा का अर्थ केवल पर्याप्त ऊर्जा उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि ऊर्जा की विश्वसनीय, किफायती और टिकाऊ आपूर्ति सुनिश्चित करना भी है।

चूँकि देश पेट्रोलियम की बड़ी मात्रा आयात करता है, इसलिए परिवहन क्षेत्र में ईंधन दक्षता बढ़ाना आयात मांग के प्रबंधन का एक महत्त्वपूर्ण उपाय हो सकता है।

यदि वाहन निर्माता नए मानकों के अनुरूप अधिक दक्ष वाहन उपलब्ध कराते हैं और उपभोक्ता उन्हें अपनाते हैं, तो समय के साथ प्रति किलोमीटर ईंधन खपत में कमी आ सकती है। इससे पेट्रोलियम की कुल मांग की वृद्धि को सीमित करने में मदद मिल सकती है।

इसके अतिरिक्त, ऊर्जा-कुशल वाहनों के प्रसार से वैश्विक तेल कीमतों में उतार-चढ़ाव के प्रति भारत की संवेदनशीलता कम करने में सहायता मिल सकती है। हालाँकि, आयात में वास्तविक कमी वाहन बिक्री, कुल वाहन संख्या, यात्रा की दूरी और उपभोक्ताओं के व्यवहार जैसे कारकों पर भी निर्भर करेगी।

पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन पर संभावित प्रभाव

परिवहन क्षेत्र ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है। पारंपरिक पेट्रोल और डीजल वाहनों में ईंधन के दहन से कार्बन डाइऑक्साइड निकलती है, जो वैश्विक तापवृद्धि में योगदान देती है।

CAFE-III मानकों के माध्यम से औसत ईंधन खपत कम करने से वाहनों के परिचालन के दौरान होने वाले CO₂ उत्सर्जन को घटाने में मदद मिल सकती है।

इसके संभावित पर्यावरणीय लाभों में शामिल हैं:

  • यात्री वाहनों से होने वाले प्रत्यक्ष कार्बन उत्सर्जन में कमी।

  • ऊर्जा की कम खपत के माध्यम से परिवहन क्षेत्र की कार्बन तीव्रता घटाने की संभावना।

  • अधिक कुशल और स्वच्छ वाहन तकनीकों के विकास को प्रोत्साहन।

  • भारत के व्यापक ऊर्जा संक्रमण और जलवायु लक्ष्यों को समर्थन।

हालाँकि, CAFE मानकों का प्रत्यक्ष संबंध मुख्यतः ईंधन दक्षता और CO₂ उत्सर्जन से है। स्थानीय वायु प्रदूषकों, जैसे नाइट्रोजन ऑक्साइड और कणीय पदार्थों, में कमी के लिए वाहन तकनीक, उत्सर्जन मानक, ईंधन की गुणवत्ता और रखरखाव जैसे अन्य उपाय भी आवश्यक हैं।

वाहन निर्माताओं पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

नए मानकों के कारण वाहन निर्माताओं को अपने उत्पादों की तकनीकी विशेषताओं, उत्पादन रणनीति और अनुसंधान एवं विकास योजनाओं में बदलाव करने पड़ सकते हैं।

कंपनियों को अपने वाहन बेड़े की औसत ईंधन खपत निर्धारित सीमा के अनुरूप रखने के लिए अधिक दक्ष इंजन, हाइब्रिड प्रणालियाँ, इलेक्ट्रिक वाहन और ऊर्जा-बचत करने वाली अन्य तकनीकों में निवेश करना पड़ सकता है।

इसका प्रभाव विशेष रूप से उन निर्माताओं पर पड़ सकता है, जिनकी बिक्री में भारी और अपेक्षाकृत अधिक ईंधन खपत करने वाले वाहनों का हिस्सा बड़ा है।

दूसरी ओर, जो कंपनियाँ पहले से ही ईंधन-कुशल वाहन और उन्नत तकनीकें विकसित कर रही हैं, उन्हें नए मानकों के अनुरूप ढलने में अपेक्षाकृत आसानी हो सकती है।

नए मानकों के अनुपालन से अनुसंधान एवं विकास, परीक्षण और वाहन डिजाइन की लागत बढ़ने की संभावना भी है। हालाँकि, इन लागतों का वास्तविक प्रभाव प्रत्येक निर्माता की तकनीकी क्षमता, उत्पादन पैमाने और अपनाए गए समाधानों पर निर्भर करेगा।

उपभोक्ताओं पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

CAFE-III मानदंडों का प्रभाव आम उपभोक्ताओं पर मुख्यतः वाहनों की ईंधन दक्षता, तकनीकी सुविधाओं और कीमतों के माध्यम से दिखाई दे सकता है।

संभावित लाभ:

  • अधिक ईंधन-कुशल वाहनों की उपलब्धता बढ़ सकती है।

  • पेट्रोल और डीजल पर होने वाला दीर्घकालीन खर्च कम हो सकता है।

  • हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक वाहनों जैसी तकनीकों का प्रसार बढ़ सकता है।

  • वाहन उद्योग में ऊर्जा दक्षता और तकनीकी नवाचार को बढ़ावा मिल सकता है।

संभावित चुनौतियाँ:

  • नई तकनीकों को अपनाने से कुछ वाहनों की शुरुआती कीमत बढ़ सकती है।

  • उन्नत प्रणालियों के रखरखाव और मरम्मत की लागत वाहन के प्रकार के अनुसार बदल सकती है।

  • ईंधन की वास्तविक बचत ड्राइविंग शैली, यातायात, सड़क की स्थिति और एयर-कंडीशनिंग के उपयोग पर निर्भर करेगी।

इसलिए, यह आवश्यक नहीं है कि सभी वाहनों की कीमतें बढ़ें या प्रत्येक उपभोक्ता को समान बचत हो। अंतिम प्रभाव बाजार में प्रतिस्पर्धा, तकनीकी विकास और कंपनियों की मूल्य निर्धारण रणनीतियों पर निर्भर करेगा।

CAFE-III मानदंडों के कार्यान्वयन में प्रमुख चुनौतियाँ

नए मानकों को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए सरकार और वाहन उद्योग के सामने कुछ महत्त्वपूर्ण चुनौतियाँ होंगी।

पहली चुनौती—तकनीकी निवेश: अधिक ईंधन दक्षता प्राप्त करने के लिए निर्माताओं को नए इंजन, बैटरी, हाइब्रिड प्रणालियों और अन्य तकनीकों पर निवेश करना पड़ सकता है।

दूसरी चुनौती—वाहनों की विविधता: छोटी कारों, सेडान, एसयूवी और अन्य यात्री वाहनों की संरचना तथा उपयोग अलग-अलग होते हैं। इसलिए, सभी प्रकार के वाहनों के लिए उपयुक्त और संतुलित नियामक व्यवस्था बनाए रखना आवश्यक है।

तीसरी चुनौती—किफायती वाहन: नई तकनीकों की लागत को नियंत्रित रखते हुए उपभोक्ताओं के लिए किफायती वाहन उपलब्ध कराना उद्योग के लिए महत्त्वपूर्ण होगा।

चौथी चुनौती—परीक्षण और अनुपालन: मानकीकृत परीक्षण, सटीक आंकड़े और प्रभावी निगरानी आवश्यक होंगे, ताकि सभी निर्माताओं के लिए नियमों का समान रूप से पालन सुनिश्चित किया जा सके।

पाँचवीं चुनौती—ऊर्जा संक्रमण: इलेक्ट्रिक वाहनों का पर्यावरणीय लाभ बिजली उत्पादन के स्रोतों और बैटरी के जीवनचक्र सहित कई कारकों से प्रभावित होता है। इसलिए, स्वच्छ वाहन तकनीकों के साथ-साथ स्वच्छ बिजली और बेहतर ऊर्जा अवसंरचना का विकास भी महत्त्वपूर्ण है।

CAFE-III और भारत के सतत विकास लक्ष्यों के बीच संबंध

CAFE-III मानदंड भारत में ऊर्जा दक्षता बढ़ाने और परिवहन क्षेत्र को अधिक टिकाऊ बनाने की व्यापक नीति का हिस्सा हैं। इनका संबंध ऊर्जा संरक्षण, जलवायु परिवर्तन से निपटने और स्वच्छ प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देने जैसे उद्देश्यों से है।

ये मानदंड विशेष रूप से निम्नलिखित क्षेत्रों में योगदान दे सकते हैं:

  • सतत विकास लक्ष्य 7: स्वच्छ और किफायती ऊर्जा के उपयोग को प्रोत्साहित करना।

  • सतत विकास लक्ष्य 9: औद्योगिक नवाचार और तकनीकी विकास को बढ़ावा देना।

  • सतत विकास लक्ष्य 11: अधिक टिकाऊ परिवहन व्यवस्था और बेहतर शहरी पर्यावरण की दिशा में योगदान देना।

  • सतत विकास लक्ष्य 12: संसाधनों के अधिक कुशल उपयोग को प्रोत्साहित करना।

  • सतत विकास लक्ष्य 13: ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करने के व्यापक प्रयासों को समर्थन देना।

इन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए CAFE मानदंडों के साथ सार्वजनिक परिवहन का विस्तार, इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए चार्जिंग अवसंरचना, स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन और बेहतर शहरी नियोजन भी आवश्यक हैं।

CAFE-III मानदंडों का समग्र महत्त्व

CAFE-III मानदंड भारत के यात्री वाहन उद्योग को अधिक ईंधन-कुशल और तकनीकी रूप से उन्नत बनाने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम हैं। इनके अंतर्गत औसत ईंधन खपत के लक्ष्यों को क्रमशः कठोर बनाया जाएगा तथा वाहन के भार के आधार पर नियामक आवश्यकताओं को अधिक संतुलित बनाने का प्रयास किया गया है।

इन मानदंडों से वाहन निर्माताओं को ऊर्जा-कुशल इंजन, हाइब्रिड प्रणालियों, इलेक्ट्रिक वाहनों और अन्य नवाचारों को अपनाने के लिए प्रोत्साहन मिलने की संभावना है। इसके परिणामस्वरूप पेट्रोलियम की खपत और परिवहन क्षेत्र के कार्बन उत्सर्जन को नियंत्रित करने में सहायता मिल सकती है।

हालाँकि, इन मानदंडों की सफलता केवल निर्धारित लक्ष्य तय करने पर निर्भर नहीं करेगी। प्रभावी अनुपालन, तकनीकी विकास, किफायती वाहन, उपभोक्ताओं की स्वीकार्यता और स्वच्छ ऊर्जा की उपलब्धता भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण होगी।

निष्कर्षतः, CAFE-III भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने, पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता कम करने और यात्री वाहन क्षेत्र में स्वच्छ एवं ऊर्जा-कुशल तकनीकों को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण नीतिगत पहल है। यह भारत के दीर्घकालीन पर्यावरणीय और सतत विकास संबंधी उद्देश्यों को प्राप्त करने में सहायक हो सकती है।