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रबी फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में वृद्धि को मंजूरी

National 📅 October 11, 2026

केंद्र सरकार ने रबी विपणन सत्र 2027-28 के लिए सभी अनिवार्य रबी फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (Minimum Support Price—MSP) में वृद्धि को मंजूरी दी है। इस संबंध में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (Cabinet Committee on Economic Affairs—CCEA) ने निर्णय लिया।

इस निर्णय का उद्देश्य किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य सुनिश्चित करना, कृषि उत्पादन को प्रोत्साहित करना तथा किसानों की आय को स्थिरता प्रदान करना है। न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि से विशेष रूप से गेहूँ, जौ, चना, मसूर, सरसों और कुसुम जैसी प्रमुख रबी फसलों की खेती करने वाले किसानों को लाभ मिलने की अपेक्षा है।

सरकार के अनुसार, वर्ष 2027-28 के विपणन सत्र में लगभग 324 लाख टन कृषि उपज की खरीद के लिए कुल ₹90,962 करोड़ के भुगतान का अनुमान है।

न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) क्या है?

न्यूनतम समर्थन मूल्य वह निर्धारित मूल्य है, जिस पर सरकार किसानों की कुछ अधिसूचित कृषि उपज की खरीद के लिए मूल्य समर्थन प्रदान करती है। इसका प्रमुख उद्देश्य किसानों को बाजार में कीमतों में होने वाली अत्यधिक गिरावट से सुरक्षा देना और उन्हें खेती के लिए उचित आर्थिक प्रोत्साहन उपलब्ध कराना है।

जब किसी फसल का उत्पादन अधिक होता है और बाजार में उसकी आपूर्ति बढ़ जाती है, तो उसकी कीमतों में गिरावट आ सकती है। ऐसी स्थिति में किसानों को अपनी उपज कम कीमत पर बेचने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। MSP की व्यवस्था इस जोखिम को कम करने में सहायता करती है।

हालाँकि, MSP की घोषणा का अर्थ यह नहीं है कि सरकार प्रत्येक किसान की पूरी उपज अनिवार्य रूप से खरीदती है। वास्तविक खरीद संबंधित फसल, लागू खरीद व्यवस्था, गुणवत्ता मानकों और अन्य निर्धारित शर्तों पर निर्भर करती है।

रबी विपणन सत्र 2027-28 के लिए MSP में प्रमुख वृद्धि

सरकार ने विभिन्न रबी फसलों के MSP में अलग-अलग मात्रा में वृद्धि की है। गेहूँ के न्यूनतम समर्थन मूल्य में ₹25 प्रति क्विंटल की वृद्धि की गई है, जबकि मसूर, सरसों और कुसुम जैसी फसलों में अपेक्षाकृत अधिक वृद्धि की गई है।

फसल 2026-27 का MSP (₹/क्विंटल) 2027-28 का MSP (₹/क्विंटल) वृद्धि (₹/क्विंटल)
गेहूँ 2,585 2,610 25
जौ 2,150 2,286 136
चना 5,875 5,958 83
मसूर 7,000 7,390 390
सरसों एवं रेपसीड 6,200 6,613 413
कुसुम 6,540 7,215 675

उपरोक्त आँकड़ों के अनुसार, कुसुम के MSP में सबसे अधिक ₹675 प्रति क्विंटल की वृद्धि की गई है। इसके बाद सरसों एवं रेपसीड में ₹413 तथा मसूर में ₹390 प्रति क्विंटल की वृद्धि हुई है।

गेहूँ के MSP में वृद्धि

गेहूँ भारत की प्रमुख खाद्यान्न फसलों में से एक है। इसकी खेती मुख्य रूप से रबी मौसम में की जाती है। गेहूँ देश की खाद्य सुरक्षा, सार्वजनिक वितरण प्रणाली और किसानों की आय के लिए महत्त्वपूर्ण है।

वर्ष 2027-28 के लिए गेहूँ का MSP ₹2,585 से बढ़ाकर ₹2,610 प्रति क्विंटल कर दिया गया है। इस प्रकार इसमें ₹25 प्रति क्विंटल की वृद्धि हुई है।

इस वृद्धि से गेहूँ उत्पादक किसानों को निर्धारित समर्थन मूल्य में कुछ अतिरिक्त लाभ मिलेगा। गेहूँ की सरकारी खरीद का उपयोग खाद्यान्न भंडार बनाए रखने तथा राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने में भी किया जाता है।

जौ के MSP में वृद्धि

जौ एक महत्त्वपूर्ण रबी फसल है, जिसका उपयोग खाद्य पदार्थों, पशु आहार तथा विभिन्न औद्योगिक गतिविधियों में किया जाता है।

जौ का MSP वर्ष 2026-27 के ₹2,150 प्रति क्विंटल से बढ़ाकर वर्ष 2027-28 के लिए ₹2,286 प्रति क्विंटल किया गया है। इसमें ₹136 प्रति क्विंटल की वृद्धि हुई है।

इस निर्णय से जौ की खेती करने वाले किसानों को बेहतर मूल्य समर्थन मिलने की संभावना है। साथ ही, यह फसल विविधीकरण को प्रोत्साहित करने में भी सहायक हो सकता है।

दलहनी फसलों के MSP में वृद्धि

दलहन भारतीय कृषि और पोषण सुरक्षा का महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं। चना और मसूर प्रोटीन के प्रमुख स्रोत हैं तथा इनका घरेलू खाद्य उपभोग में व्यापक उपयोग होता है।

चना: चने का MSP ₹5,875 से बढ़ाकर ₹5,958 प्रति क्विंटल किया गया है। इसमें ₹83 प्रति क्विंटल की वृद्धि हुई है।

मसूर: मसूर का MSP ₹7,000 से बढ़ाकर ₹7,390 प्रति क्विंटल किया गया है। इसमें ₹390 प्रति क्विंटल की वृद्धि हुई है।

दलहनों के MSP में वृद्धि से किसानों को इन फसलों की खेती के लिए प्रोत्साहन मिल सकता है। इससे देश में दलहन उत्पादन बढ़ाने, आयात पर निर्भरता कम करने और प्रोटीनयुक्त खाद्य पदार्थों की उपलब्धता मजबूत करने के प्रयासों को सहायता मिल सकती है।

हालाँकि, दलहन उत्पादन में वास्तविक वृद्धि मौसम, सिंचाई सुविधाओं, बीजों की गुणवत्ता, उत्पादन लागत और बाजार की स्थितियों पर भी निर्भर करती है।

तिलहनी फसलों के MSP में वृद्धि

तिलहनी फसलें खाद्य तेलों के उत्पादन के लिए महत्त्वपूर्ण हैं। भारत में खाद्य तेलों की घरेलू माँग अधिक है, इसलिए सरसों और अन्य तिलहनी फसलों का उत्पादन बढ़ाना कृषि नीति का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य है।

सरसों एवं रेपसीड: इनका MSP ₹6,200 से बढ़ाकर ₹6,613 प्रति क्विंटल किया गया है। इसमें ₹413 प्रति क्विंटल की वृद्धि हुई है।

कुसुम: कुसुम का MSP ₹6,540 से बढ़ाकर ₹7,215 प्रति क्विंटल कर दिया गया है। इसमें ₹675 प्रति क्विंटल की वृद्धि हुई है, जो सूचीबद्ध फसलों में सर्वाधिक है।

तिलहनी फसलों के लिए बेहतर मूल्य समर्थन किसानों को इनकी खेती में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है। इससे घरेलू खाद्य तेल उत्पादन को बढ़ावा देने और आयात पर निर्भरता कम करने के व्यापक लक्ष्य में योगदान मिल सकता है।

MSP वृद्धि के लिए अनुमानित सरकारी भुगतान

सरकार ने रबी विपणन सत्र 2027-28 में लगभग 324 लाख टन उपज की खरीद के लिए ₹90,962 करोड़ के कुल भुगतान का अनुमान व्यक्त किया है।

यह राशि सरकारी खरीद व्यवस्था के माध्यम से किसानों को भुगतान किए जाने वाले अनुमानित मूल्य को दर्शाती है। इससे कृषि खरीद के आर्थिक महत्त्व और खाद्यान्न तथा अन्य प्रमुख फसलों के मूल्य समर्थन में सरकार की भूमिका का पता चलता है।

यह ध्यान रखना आवश्यक है कि अनुमानित खरीद और भुगतान वास्तविक खरीद की मात्रा, किसानों द्वारा बाजार में लाई गई उपज तथा संबंधित फसलों की खरीद व्यवस्था के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं।

MSP की शुरुआत और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

स्वतंत्रता के समय भारत की अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्त्वपूर्ण स्थान था। देश की बड़ी आबादी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर थी। इसके बावजूद कृषि उत्पादन, उत्पादकता और खाद्यान्न उपलब्धता से जुड़ी अनेक चुनौतियाँ मौजूद थीं।

1960 के दशक के मध्य में भारत को खाद्यान्न की कमी जैसी गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ा। इससे देश में खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने और खाद्य सुरक्षा मजबूत करने के लिए कृषि नीतियों में बदलाव की आवश्यकता महसूस हुई।

इसके बाद कृषि क्षेत्र में कई महत्त्वपूर्ण कदम उठाए गए, जिनमें भूमि सुधार, कृषि विस्तार सेवाओं का विकास, कृषि अनुसंधान को प्रोत्साहन, आधुनिक तकनीकों का उपयोग और मूल्य समर्थन नीतियों की शुरुआत शामिल थी।

इसी व्यापक नीति परिवर्तन के अंतर्गत न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था विकसित हुई। इसका उद्देश्य किसानों को उत्पादन संबंधी निर्णय लेते समय मूल्य संबंधी आश्वासन देना और देश को खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने के प्रयासों को समर्थन प्रदान करना था।

हरित क्रांति के दौरान उन्नत बीजों, उर्वरकों, सिंचाई और आधुनिक कृषि तकनीकों के उपयोग ने विशेष रूप से गेहूँ तथा चावल के उत्पादन में वृद्धि में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। मूल्य समर्थन व्यवस्था ने भी किसानों के लिए उत्पादन बढ़ाने के आर्थिक प्रोत्साहनों को मजबूत करने में योगदान दिया।

MSP का महत्त्व

1. किसानों को मूल्य सुरक्षा: कृषि उपज की कीमतें मौसम, उत्पादन और बाजार की माँग के अनुसार बदलती रहती हैं। MSP किसानों को कीमतों में अत्यधिक गिरावट के जोखिम से सुरक्षा देने के लिए एक महत्त्वपूर्ण साधन है।

2. कृषि निवेश को प्रोत्साहन: यदि किसानों को अपनी उपज के लिए उचित मूल्य मिलने की संभावना दिखाई देती है, तो वे उन्नत बीजों, सिंचाई, कृषि यंत्रों और अन्य उत्पादन साधनों में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित हो सकते हैं।

3. खाद्य सुरक्षा को मजबूती: सरकारी खरीद के माध्यम से गेहूँ और अन्य खाद्यान्नों के भंडार बनाए रखने में सहायता मिलती है। इन भंडारों का उपयोग सार्वजनिक वितरण प्रणाली और खाद्य सुरक्षा संबंधी कार्यक्रमों में किया जा सकता है।

4. फसल विविधीकरण को बढ़ावा: विभिन्न फसलों के MSP में वृद्धि से किसानों को केवल एक या दो फसलों पर निर्भर रहने के बजाय दलहन और तिलहन जैसी फसलों की खेती पर विचार करने के लिए प्रोत्साहन मिल सकता है।

5. बाजार में कीमतों को स्थिर करने में सहायता: अच्छी फसल होने पर बाजार में आपूर्ति बढ़ सकती है और कीमतें गिर सकती हैं। प्रभावी मूल्य समर्थन और खरीद व्यवस्था ऐसी परिस्थितियों में किसानों पर पड़ने वाले दबाव को कम कर सकती है।

6. ग्रामीण अर्थव्यवस्था को समर्थन: कृषि से होने वाली आय ग्रामीण क्षेत्रों में वस्तुओं और सेवाओं की माँग को प्रभावित करती है। किसानों की आय में सुधार से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी लाभ मिल सकता है।

MSP निर्धारित करने की प्रक्रिया

भारत में MSP निर्धारित करने की प्रक्रिया में कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (Commission for Agricultural Costs and Prices—CACP) की प्रमुख भूमिका होती है।

CACP की स्थापना जनवरी 1965 में की गई थी। यह कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय से संबद्ध कार्यालय है। इसका प्रमुख कार्य कृषि जिंसों के न्यूनतम समर्थन मूल्य के संबंध में सरकार को सिफारिशें देना है।

MSP निर्धारित करने की प्रक्रिया के प्रमुख चरण निम्नलिखित हैं:

1. कृषि लागत एवं मूल्य आयोग की समीक्षा: आयोग संबंधित फसलों की उत्पादन लागत, बाजार की स्थिति और कृषि क्षेत्र की आवश्यकताओं का अध्ययन करता है।

2. राज्य सरकारों से विचार-विमर्श: आयोग विभिन्न राज्य सरकारों, संबंधित मंत्रालयों और राष्ट्रीय संगठनों से सुझाव प्राप्त करता है। इससे अलग-अलग क्षेत्रों की कृषि परिस्थितियों को समझने में सहायता मिलती है।

3. किसानों और अन्य हितधारकों से परामर्श: आयोग किसानों, कृषि व्यापार से जुड़े संगठनों, प्रसंस्करण उद्योगों और संबंधित संस्थाओं के साथ बैठकें करता है। आवश्यकता के अनुसार राज्यों का दौरा कर जमीनी परिस्थितियों का भी आकलन किया जाता है।

4. उत्पादन लागत का आकलन: फसल उगाने में लगने वाले बीज, उर्वरक, श्रम, सिंचाई, मशीनरी तथा अन्य लागत संबंधी पहलुओं पर विचार किया जाता है। साथ ही, कृषि निवेश और किसानों के लिए उचित प्रतिफल से जुड़े प्रश्नों का मूल्यांकन किया जाता है।

5. मूल्य नीति रिपोर्ट तैयार करना: प्राप्त जानकारी और विश्लेषण के आधार पर CACP विभिन्न फसलों के MSP के संबंध में अपनी सिफारिशें सरकार को प्रस्तुत करता है।

6. सरकार द्वारा अंतिम निर्णय: CACP की सिफारिशों पर विचार करने के बाद केंद्र सरकार MSP का अंतिम निर्णय लेती है। प्रमुख नीतिगत निर्णयों में आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (CCEA) की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है।

CACP विभिन्न कृषि जिंसों के लिए सिफारिशें देता है, जिनमें अनाज, दलहन, तिलहन तथा कुछ वाणिज्यिक फसलें शामिल हैं। आयोग की मूल्य नीति रिपोर्टें अलग-अलग फसल समूहों के लिए तैयार की जाती हैं।

MSP तय करते समय किन कारकों पर विचार किया जाता है?

MSP निर्धारित करना केवल उत्पादन लागत की गणना तक सीमित नहीं है। इसमें कृषि क्षेत्र, बाजार और उपभोक्ताओं से संबंधित अनेक पहलुओं को ध्यान में रखा जाता है।

प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं:

  • उत्पादन लागत: फसल उगाने में होने वाले विभिन्न खर्चों का आकलन।

  • माँग और आपूर्ति: देश में संबंधित कृषि उपज की उपलब्धता और आवश्यकता।

  • घरेलू तथा अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति: कृषि जिंसों की कीमतों और व्यापार से संबंधित परिस्थितियाँ।

  • फसलों के बीच मूल्य संतुलन: अलग-अलग फसलों के MSP में ऐसा संतुलन बनाए रखने का प्रयास, जिससे कृषि संसाधनों का उपयोग प्रभावित न हो।

  • किसानों और उपभोक्ताओं के हित: किसानों को उचित मूल्य देने के साथ खाद्य पदार्थों की कीमतों और उपलब्धता पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन।

  • कृषि उत्पादकता और निवेश: आधुनिक तकनीकों को अपनाने तथा कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन।

  • राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा: प्रमुख खाद्यान्नों की पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखने की आवश्यकता।

MSP, कृषि लागत और किसानों के लाभ के बीच संबंध

MSP में वृद्धि से किसानों को लाभ मिलने की संभावना होती है, लेकिन वास्तविक लाभ का निर्धारण कई कारकों पर निर्भर करता है।

यदि किसी किसान की उपज निर्धारित MSP पर खरीदी जाती है, तो उसे घोषित मूल्य के अनुसार भुगतान मिल सकता है। लेकिन यदि बाजार में कीमतें MSP से अधिक हैं, तो किसान खुले बाजार में बिक्री करना पसंद कर सकता है। दूसरी ओर, यदि बाजार मूल्य MSP से नीचे चला जाता है और प्रभावी सरकारी खरीद उपलब्ध नहीं है, तो किसान को अपेक्षित लाभ नहीं मिल सकता।

इसके अतिरिक्त, डीजल, उर्वरक, बीज, मजदूरी और सिंचाई की लागत में वृद्धि से MSP बढ़ने के बावजूद किसानों का शुद्ध लाभ सीमित रह सकता है। इसलिए किसानों की वास्तविक आय का आकलन करने के लिए MSP के साथ उत्पादन लागत, उपज, खरीद तक पहुँच और बाजार कीमतों को भी देखना आवश्यक है।

MSP व्यवस्था की प्रमुख चुनौतियाँ

MSP किसानों के लिए महत्त्वपूर्ण मूल्य समर्थन व्यवस्था है, लेकिन इसके प्रभावी क्रियान्वयन में कुछ चुनौतियाँ भी मौजूद हैं।

1. सरकारी खरीद का असमान वितरण: विभिन्न फसलों और राज्यों में खरीद की मात्रा तथा सरकारी खरीद तक किसानों की पहुँच अलग-अलग हो सकती है।

2. फसल विविधीकरण की सीमाएँ: कुछ क्षेत्रों में सिंचाई, भंडारण, प्रसंस्करण और विपणन सुविधाओं की कमी के कारण किसानों के लिए वैकल्पिक फसलों की खेती अपनाना कठिन होता है।

3. उत्पादन लागत में वृद्धि: कृषि में उपयोग होने वाले संसाधनों की कीमतें बढ़ने पर किसानों का लाभ प्रभावित हो सकता है।

4. भंडारण और परिवहन की समस्याएँ: उचित भंडारण सुविधाओं के अभाव में किसान फसल कटाई के तुरंत बाद अपनी उपज बेचने के लिए मजबूर हो सकते हैं।

5. बाजार संबंधी जानकारी की कमी: सभी किसानों को बाजार भाव, खरीद केंद्रों, गुणवत्ता मानकों और सरकारी योजनाओं की पर्याप्त जानकारी नहीं मिल पाती।

इन चुनौतियों को दूर करने के लिए सरकारी खरीद व्यवस्था को बेहतर बनाने, कृषि विपणन ढाँचे को मजबूत करने, भंडारण सुविधाएँ बढ़ाने और किसानों को बाजार संबंधी जानकारी उपलब्ध कराने की आवश्यकता है।

MSP वृद्धि का कृषि अर्थव्यवस्था पर संभावित प्रभाव

रबी फसलों के MSP में वृद्धि से कृषि उत्पादन, फसल चयन और किसानों के निवेश संबंधी निर्णय प्रभावित हो सकते हैं। विशेष रूप से दलहन और तिलहन के MSP में अपेक्षाकृत अधिक वृद्धि से इन फसलों की खेती को प्रोत्साहन मिलने की संभावना है।

यदि किसान बेहतर मूल्य समर्थन के कारण दलहन और तिलहन का उत्पादन बढ़ाते हैं, तो इससे देश की पोषण सुरक्षा तथा खाद्य तेलों और दलहनों की घरेलू उपलब्धता में सुधार हो सकता है। इसके साथ ही, प्रभावी खरीद और प्रसंस्करण सुविधाओं के विकास से कृषि उपज के विपणन को भी सहायता मिल सकती है।

हालाँकि, MSP वृद्धि का वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि किसान कितनी मात्रा में इन फसलों की खेती करते हैं, उत्पादन लागत में कितना बदलाव आता है और घोषित समर्थन मूल्य पर खरीद की व्यवस्था कितनी प्रभावी रहती है।

रबी फसलें क्या हैं?

रबी फसलें वे फसलें हैं, जिनकी बुवाई सामान्यतः शरद ऋतु में की जाती है और कटाई वसंत या गर्मियों की शुरुआत में होती है। भारत में इनकी बुवाई प्रायः अक्टूबर से शुरू होती है, जबकि कटाई सामान्यतः मार्च से अप्रैल के बीच होती है। वास्तविक समय क्षेत्र, मौसम और फसल के अनुसार बदल सकता है।

प्रमुख रबी फसलों में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • गेहूँ: देश की प्रमुख खाद्यान्न फसल।

  • जौ: खाद्य पदार्थों, पशु आहार और औद्योगिक उपयोग के लिए महत्त्वपूर्ण।

  • चना: प्रमुख दलहन और प्रोटीन का स्रोत।

  • मसूर: पोषण की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण दलहन।

  • सरसों एवं रेपसीड: खाद्य तेल उत्पादन के लिए महत्त्वपूर्ण तिलहनी फसलें।

  • कुसुम: तेल उत्पादन के लिए उगाई जाने वाली तिलहनी फसल।

रबी फसलों का उत्पादन सर्दियों के तापमान, वर्षा, सिंचाई सुविधाओं और कटाई के समय मौसम की परिस्थितियों से प्रभावित होता है।

निष्कर्ष

रबी विपणन सत्र 2027-28 के लिए MSP में वृद्धि किसानों को मूल्य समर्थन देने तथा कृषि उत्पादन को प्रोत्साहित करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण नीतिगत कदम है। विशेष रूप से मसूर, सरसों और कुसुम जैसी फसलों के MSP में उल्लेखनीय वृद्धि से दलहन और तिलहन उत्पादन को प्रोत्साहन मिलने की संभावना है।

हालाँकि, MSP की प्रभावशीलता केवल घोषित मूल्य पर निर्भर नहीं करती। इसके लिए किसानों की सरकारी खरीद तक पहुँच, उत्पादन लागत पर नियंत्रण, भंडारण सुविधाओं का विकास, कृषि विपणन में सुधार और फसल विविधीकरण को बढ़ावा देना भी आवश्यक है। इन उपायों के साथ MSP व्यवस्था किसानों की आय को अधिक स्थिर बनाने, कृषि उत्पादन को प्रोत्साहित करने और देश की खाद्य सुरक्षा मजबूत करने में योगदान दे सकती है।