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भारत और नीदरलैंड के बीच कालपासर परियोजना के लिए समझौता

भारत-नीदरलैंड के बीच दो त्रिपक्षीय समझौते

24 सितंबर 2026 को जल शक्ति मंत्रालय ने गुजरात की कालपासर परियोजना (Kalpasar Project) के लिए तकनीकी सहयोग और क्षमता निर्माण के उद्देश्य से नीदरलैंड के साथ दो त्रिपक्षीय समझौता ज्ञापनों (MoUs) पर हस्ताक्षर किए।

इन समझौतों का उद्देश्य कालपासर परियोजना से जुड़े तकनीकी पहलुओं में सहयोग बढ़ाना, विशेषज्ञता साझा करना तथा परियोजना के लिए आवश्यक क्षमता निर्माण को मजबूत करना है।

इन MoUs पर केंद्रीय जल आयोग (CWC), गुजरात सरकार के कालपासर विभाग तथा नीदरलैंड की ज्ञान संस्थाओं Deltares और TU Delft के बीच समझौता हुआ।

कालपासर परियोजना क्या है?

कालपासर परियोजना का आधिकारिक नाम Gulf of Khambhat Development Project है। इसे सामान्य रूप से कालपासर परियोजना के नाम से जाना जाता है।

इस परियोजना की परिकल्पना खंभात की खाड़ी (Gulf of Khambhat) में एक बांध का निर्माण करके एक विशाल मीठे पानी का जलाशय बनाने की है।

इस जलाशय में विभिन्न नदियों से प्राप्त अतिरिक्त जल को एकत्र किया जाएगा। परियोजना का प्रमुख उद्देश्य गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में जल की कमी को कम करना है।

कालपासर परियोजना का मुख्य उद्देश्य

कालपासर परियोजना का मुख्य उद्देश्य खंभात की खाड़ी में बांध बनाकर एक बड़े तटीय मीठे पानी के जलाशय का निर्माण करना है।

इस जलाशय से उपलब्ध पानी का उपयोग मुख्य रूप से सिंचाई और अन्य जल आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए किया जा सकेगा।

सौराष्ट्र क्षेत्र में जल की उपलब्धता एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। इस परियोजना के माध्यम से क्षेत्र को अधिक विश्वसनीय जल स्रोत उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है।

जलाशय में पानी कहां से आएगा?

प्रस्तावित कालपासर जलाशय को मुख्य रूप से साबरमती, माही और धाधर नदियों के प्रवाह से प्राप्त जल से भरा जाएगा।

इसके अतिरिक्त, जलाशय में पानी की उपलब्धता बढ़ाने के लिए नर्मदा नदी से भी पानी पहुंचाया जाएगा।

इस प्रकार परियोजना में कई जल स्रोतों को एकीकृत करके एक बड़े मीठे पानी के भंडार का निर्माण करने की योजना है।

सौराष्ट्र क्षेत्र के लिए महत्व

गुजरात का सौराष्ट्र क्षेत्र जल की उपलब्धता के संबंध में विभिन्न चुनौतियों का सामना करता है। कालपासर परियोजना का उद्देश्य इस क्षेत्र में जल की कमी को कम करना और सिंचाई के लिए अधिक विश्वसनीय जल स्रोत उपलब्ध कराना है।

यदि परियोजना अपने निर्धारित उद्देश्यों के अनुसार विकसित होती है, तो इससे क्षेत्र में कृषि और अन्य जल-आधारित गतिविधियों को आवश्यक जल उपलब्ध कराने में सहायता मिल सकती है।

नीदरलैंड के साथ तकनीकी सहयोग

कालपासर परियोजना एक बड़े और जटिल जल एवं तटीय बुनियादी ढांचे से संबंधित परियोजना है। इसलिए इसके लिए उन्नत तकनीकी विशेषज्ञता और क्षमता निर्माण महत्वपूर्ण हैं।

इसी उद्देश्य से भारत ने नीदरलैंड के साथ तकनीकी सहयोग स्थापित किया है। नीदरलैंड जल प्रबंधन से संबंधित ज्ञान और विशेषज्ञता के लिए जाना जाता है।

MoUs के माध्यम से परियोजना से जुड़े तकनीकी विषयों पर ज्ञान एवं विशेषज्ञता के आदान-प्रदान तथा क्षमता निर्माण को बढ़ावा दिया जाएगा।

Deltares और TU Delft की भूमिका

इन समझौतों में नीदरलैंड की दो प्रमुख ज्ञान संस्थाएं शामिल हैं—

  • Deltares
  • TU Delft (Delft University of Technology)

ये संस्थाएं जल प्रबंधन, तटीय क्षेत्रों, इंजीनियरिंग और संबंधित तकनीकी क्षेत्रों में ज्ञान एवं विशेषज्ञता उपलब्ध कराने में भूमिका निभाएंगी।

इनके साथ सहयोग से कालपासर परियोजना से जुड़े तकनीकी अध्ययन और क्षमता निर्माण को मजबूती मिलने की उम्मीद है।

केंद्रीय जल आयोग की भूमिका

केंद्रीय जल आयोग (CWC) भारत सरकार के जल संसाधन क्षेत्र से संबंधित प्रमुख तकनीकी संस्थानों में से एक है।

कालपासर परियोजना से संबंधित त्रिपक्षीय MoUs में CWC की भागीदारी केंद्र सरकार, गुजरात सरकार और अंतरराष्ट्रीय ज्ञान संस्थानों के बीच तकनीकी सहयोग को व्यवस्थित करने में महत्वपूर्ण है।

भारत इंटरनेशनल वाटर वीक के दौरान समझौते

इन MoUs पर हस्ताक्षर नौवें India International Water Week (IIWW) के अवसर पर किए गए।

नौवां India International Water Week 22 से 26 सितंबर 2026 तक भारत मंडपम, नई दिल्ली में आयोजित किया जा रहा है।

इस आयोजन की मुख्य थीम “Climate Resilient Water Management” यानी जलवायु-सहनीय जल प्रबंधन है।

कालपासर जैसी परियोजनाओं में जल प्रबंधन, तटीय क्षेत्र और जलवायु से संबंधित चुनौतियों को ध्यान में रखना महत्वपूर्ण है। इसलिए इस अंतरराष्ट्रीय जल सम्मेलन के दौरान हुआ यह सहयोग विशेष महत्व रखता है।

जलवायु-सहनीय जल प्रबंधन का महत्व

जलवायु परिवर्तन के कारण कई क्षेत्रों में वर्षा के स्वरूप, जल उपलब्धता और बाढ़ तथा सूखे जैसी परिस्थितियों पर प्रभाव पड़ सकता है।

ऐसे में जल संसाधनों के प्रबंधन के लिए ऐसी व्यवस्थाओं की आवश्यकता होती है जो बदलती जलवायु परिस्थितियों के बीच भी प्रभावी ढंग से कार्य कर सकें।

कालपासर परियोजना के लिए तकनीकी सहयोग और क्षमता निर्माण इसी व्यापक संदर्भ में महत्वपूर्ण है।

कालपासर परियोजना का नवीकरणीय ऊर्जा घटक

कालपासर परियोजना में केवल जलाशय निर्माण की योजना ही नहीं है, बल्कि इसके साथ नवीकरणीय ऊर्जा का एक महत्वपूर्ण घटक भी प्रस्तावित है।

परियोजना के तहत पुनः प्राप्त भूमि पर लगभग 2,470 मेगावाट की हाइब्रिड नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता विकसित करने की योजना है।

इससे परियोजना में जल प्रबंधन और ऊर्जा उत्पादन को एक साथ जोड़ने का प्रयास दिखाई देता है।

नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग

प्रस्तावित नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग तटीय सिंचाई क्षेत्रों तक मीठा पानी पहुंचाने के लिए पंपिंग में किया जाएगा।

इस प्रकार परियोजना में जलाशय से प्राप्त पानी को आवश्यक क्षेत्रों तक पहुंचाने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता को नवीकरणीय ऊर्जा से पूरा करने की योजना है।

यह जल एवं ऊर्जा दोनों आवश्यकताओं को एकीकृत करने वाली व्यवस्था के रूप में देखी जा सकती है।

बांध के ऊपर हाईवे-कम-रेल कॉरिडोर

कालपासर परियोजना में एक महत्वपूर्ण परिवहन बुनियादी ढांचा घटक भी प्रस्तावित है।

योजना के अनुसार खंभात की खाड़ी पर बनने वाले बांध के ऊपर हाईवे-कम-रेल कॉरिडोर विकसित किया जाएगा।

इससे गुजरात के विभिन्न क्षेत्रों के बीच सड़क और रेल संपर्क को बढ़ाने में सहायता मिलने की संभावना है।

संपर्क और क्षेत्रीय विकास में संभावित योगदान

हाईवे-कम-रेल कॉरिडोर परियोजना का उद्देश्य केवल परिवहन सुविधा उपलब्ध कराना नहीं है, बल्कि क्षेत्रीय संपर्क को बेहतर बनाने से आर्थिक गतिविधियों को भी बढ़ावा मिल सकता है।

बेहतर सड़क और रेल संपर्क से लोगों तथा वस्तुओं की आवाजाही आसान हो सकती है और खाड़ी के दोनों ओर स्थित क्षेत्रों के बीच संपर्क मजबूत हो सकता है।

कालपासर परियोजना के प्रमुख घटक

कालपासर परियोजना को व्यापक रूप से तीन प्रमुख घटकों के रूप में समझा जा सकता है—

जल संसाधन घटक: खंभात की खाड़ी में बांध बनाकर विशाल मीठे पानी का जलाशय तैयार करना।

नवीकरणीय ऊर्जा घटक: पुनः प्राप्त भूमि पर लगभग 2,470 मेगावाट की हाइब्रिड नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता विकसित करना।

परिवहन घटक: बांध के ऊपर हाईवे-कम-रेल कॉरिडोर का निर्माण करना।

भारत-नीदरलैंड सहयोग का व्यापक महत्व

कालपासर परियोजना के लिए भारत और नीदरलैंड के बीच तकनीकी सहयोग जल संसाधन प्रबंधन में अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञता के उपयोग का उदाहरण है।

इस सहयोग से परियोजना के लिए तकनीकी ज्ञान, क्षमता निर्माण और विशेषज्ञ संस्थानों के साथ साझेदारी को मजबूत करने का प्रयास किया जा रहा है।

साथ ही, यह सहयोग भारत और नीदरलैंड के बीच जल प्रबंधन एवं तकनीकी सहयोग को आगे बढ़ाने का अवसर प्रदान करता है।

परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य

  • परियोजना का नाम: Gulf of Khambhat Development Project
  • लोकप्रिय नाम: कालपासर परियोजना (Kalpasar Project)
  • स्थान: गुजरात, खंभात की खाड़ी
  • मुख्य उद्देश्य: विशाल तटीय मीठे पानी का जलाशय बनाना
  • प्रमुख जल स्रोत: साबरमती, माही और धाधर नदियां
  • अतिरिक्त जल स्रोत: नर्मदा नदी
  • प्रमुख लाभ: सौराष्ट्र क्षेत्र में जल की कमी को कम करना
  • समझौते की तारीख: 24 सितंबर 2026
  • भारत का पक्ष: केंद्रीय जल आयोग और गुजरात सरकार का कालपासर विभाग
  • नीदरलैंड के संस्थान: Deltares और TU Delft
  • समझौते का उद्देश्य: तकनीकी सहयोग और क्षमता निर्माण
  • India International Water Week: 22–26 सितंबर 2026
  • आयोजन स्थल: भारत मंडपम, नई दिल्ली
  • IIWW 2026 की थीम: “Climate Resilient Water Management”
  • प्रस्तावित नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता: लगभग 2,470 मेगावाट
  • ऊर्जा का उपयोग: तटीय सिंचाई क्षेत्रों तक मीठा पानी पहुंचाने के लिए पंपिंग
  • परिवहन अवसंरचना: हाईवे-कम-रेल कॉरिडोर
  • कॉरिडोर का स्थान: खंभात की खाड़ी पर प्रस्तावित बांध के ऊपर