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उत्तर भारत में कपास का घटता रकबा: किसान क्यों छोड़ रहे हैं कपास की खेती?

कपास कभी उत्तर भारत की खरीफ अर्थव्यवस्था की प्रमुख नकदी फसलों में शामिल थी, लेकिन अब पंजाब, हरियाणा और राजस्थान जैसे प्रमुख कपास उत्पादक राज्यों में इसका क्षेत्र लगातार घट रहा है। इन तीनों राज्यों में पिछले वर्ष लगभग 11.83 लाख हेक्टेयर भूमि पर कपास की खेती हुई थी, जो इस वर्ष घटकर लगभग 9.09 लाख हेक्टेयर रह गई है। यानी एक वर्ष में लगभग 2.74 लाख हेक्टेयर या 23.2 प्रतिशत की कमी आई है। यह कमी लगभग 6.77 लाख एकड़ के बराबर है। उत्तर भारत के कपास क्षेत्र में यह गिरावट केवल एक मौसमी घटना नहीं है, बल्कि इसके पीछे कीट प्रकोप, घटती उत्पादकता, बढ़ती लागत, बाजार संबंधी अनिश्चितता और किसानों का धान की ओर बढ़ता रुझान जैसे दीर्घकालिक कारण हैं।

पंजाब में कपास की स्थिति

पंजाब में कपास के रकबे में सबसे तेज गिरावट दर्ज की गई है। पिछले वर्ष राज्य में लगभग 1.28 लाख हेक्टेयर भूमि पर कपास बोई गई थी, जो इस वर्ष घटकर लगभग 80,000 हेक्टेयर रह गई है। इस प्रकार एक ही मौसम में करीब 48,000 हेक्टेयर, यानी लगभग 37.5 प्रतिशत की कमी हुई है। यह पंजाब में कपास के क्षेत्र का अब तक का सबसे निचला स्तर माना जा रहा है।

पंजाब का पारंपरिक कपास क्षेत्र मुख्य रूप से बठिंडा, मानसा, मुक्तसर साहिब, फाजिल्का, फरीदकोट, फिरोजपुर तथा संगरूर और बरनाला के कुछ हिस्सों में फैला हुआ है। इन क्षेत्रों में पिछले कुछ वर्षों से कपास के स्थान पर धान और अन्य फसलों का रकबा बढ़ रहा है।

पंजाब में कपास की वर्तमान स्थिति को उसके ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो गिरावट और भी स्पष्ट दिखाई देती है। 1980 के दशक के अंत में पंजाब में लगभग 7 लाख हेक्टेयर भूमि पर कपास की खेती होती थी। इसके बाद भी कई वर्षों तक कपास का क्षेत्र 4–5 लाख हेक्टेयर के आसपास रहा। वर्ष 2014-15 के आसपास यह लगभग 6.69 लाख हेक्टेयर तक पहुँच गया था। लेकिन इसके बाद कपास क्षेत्र में लगातार गिरावट शुरू हुई।

इस गिरावट में 2015 के सफेद मक्खी (Whitefly) के प्रकोप ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके बाद वर्ष 2021 से गुलाबी सुंडी (Pink Bollworm) के बार-बार होने वाले प्रकोप ने किसानों की परेशानी बढ़ा दी। कीटों से होने वाले नुकसान के कारण उत्पादन घटा, कीटनाशकों पर खर्च बढ़ा और किसानों का कपास की खेती से विश्वास कमजोर हुआ।

हरियाणा में भी कपास का क्षेत्र घटा

हरियाणा भी कपास के घटते रकबे की समस्या से जूझ रहा है। राज्य में पहले कपास का क्षेत्र 6 लाख हेक्टेयर से अधिक रहा है। पिछले वर्ष इसका वास्तविक क्षेत्र लगभग 3.80 लाख हेक्टेयर था, जो इस वर्ष घटकर लगभग 2.95 लाख हेक्टेयर रह गया है। यानी लगभग 85,000 हेक्टेयर की कमी हुई है।

विशेष रूप से हिसार, चरखी दादरी और भिवानी जैसे पारंपरिक कपास उत्पादक जिलों में इसका प्रभाव अधिक दिखाई दे रहा है। हालांकि अधिकारियों के अनुसार इस वर्ष बारिश और मानसून की परिस्थितियों ने भी कपास के रकबे में कमी को प्रभावित किया है।

हरियाणा में दीर्घकालीन फसल पैटर्न में भी बड़ा बदलाव आया है। 2020 से 2025 के बीच राज्य में धान का क्षेत्र लगभग 15.26 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 18.68 लाख हेक्टेयर हो गया, जबकि कपास का क्षेत्र लगभग 7.20 लाख हेक्टेयर से घटकर 4.01 लाख हेक्टेयर रह गया। इससे स्पष्ट है कि किसान धीरे-धीरे कपास से हटकर धान की ओर जा रहे हैं।

राजस्थान में सबसे अधिक कपास क्षेत्र, फिर भी गिरावट

पंजाब और हरियाणा की तुलना में राजस्थान में अभी भी उत्तर भारत का सबसे बड़ा कपास क्षेत्र है। लेकिन यहाँ भी कपास की खेती में उल्लेखनीय कमी आई है। पिछले वर्ष राजस्थान में लगभग 6.55 लाख हेक्टेयर भूमि पर कपास की खेती हुई थी, जो इस वर्ष घटकर लगभग 5.34 लाख हेक्टेयर रह गई है। यानी लगभग 1.21 लाख हेक्टेयर या 18.5 प्रतिशत की कमी हुई है।

ऊपरी राजस्थान, विशेष रूप से श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़, में कपास का क्षेत्र लगभग 4.14 लाख हेक्टेयर से घटकर 3.44 लाख हेक्टेयर रह गया है। इसी प्रकार भीलवाड़ा क्षेत्र में यह लगभग 2.41 लाख हेक्टेयर से घटकर 1.90 लाख हेक्टेयर रह गया है।

इस वर्ष राजस्थान और हरियाणा में अधिकारियों ने बारिश और मानसून की परिस्थितियों को भी कपास के रकबे में कमी का एक महत्वपूर्ण कारण बताया है।

किसान कपास छोड़कर धान की ओर क्यों जा रहे हैं?

कपास की खेती से किसानों के दूर होने का सबसे महत्वपूर्ण कारण आय की अनिश्चितता है। इसके विपरीत धान में सरकारी खरीद, न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP), मंडी व्यवस्था और समय पर भुगतान जैसी सुविधाएँ किसानों को अपेक्षाकृत अधिक आय-सुरक्षा प्रदान करती हैं।

कपास में किसानों को कई प्रकार के जोखिमों का सामना करना पड़ता है। इनमें कीटों का प्रकोप, उत्पादन में उतार-चढ़ाव, महंगे बीज और कीटनाशक, बढ़ती कृषि लागत, बाजार मूल्य की अनिश्चितता और कमजोर लाभ मार्जिन प्रमुख हैं।

इसके विपरीत धान के लिए कई क्षेत्रों में किसानों को MSP पर सरकारी खरीद, व्यापक मंडी नेटवर्क, समय पर भुगतान और मुफ्त बिजली जैसी सुविधाएँ प्राप्त हैं। परिणामस्वरूप किसान ऐसी फसल को प्राथमिकता देने लगे हैं जिसमें बाजार जोखिम अपेक्षाकृत कम हो।

Bt-कपास की प्रभावशीलता में कमी

भारत में Bt-कपास को अपनाने का एक प्रमुख उद्देश्य कपास को नुकसान पहुँचाने वाले कीटों, विशेषकर कुछ प्रमुख bollworm प्रजातियों से सुरक्षा प्रदान करना था। शुरुआती वर्षों में Bt-कपास ने भारत में कपास उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि में योगदान दिया।

हालाँकि समय के साथ कीटों में प्रतिरोधक क्षमता विकसित होने लगी। विशेष रूप से गुलाबी सुंडी के प्रकोप ने कपास किसानों की समस्या बढ़ाई है। कई क्षेत्रों में किसान कीट नियंत्रण के लिए अधिक मात्रा में कीटनाशकों का प्रयोग कर रहे हैं, फिर भी अपेक्षित उत्पादन प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं।

कुछ किसानों को केवल लगभग 2 क्विंटल प्रति एकड़ की उपज प्राप्त हो रही है, जबकि लाभकारी उत्पादन के लिए लगभग 8 क्विंटल प्रति एकड़ तक की उपज आवश्यक बताई जाती है। ऐसी स्थिति में किसान को लगभग 15,000 रुपये प्रति एकड़ तक का नुकसान हो सकता है।

पंजाब में सिंचाई सुविधा बढ़ना भी कपास के लिए चुनौती

पंजाब में पिछले लगभग एक दशक में एक लाख से अधिक नए ट्यूबवेल कनेक्शन दिए गए हैं, विशेष रूप से मालवा क्षेत्र में। इसका एक अप्रत्यक्ष प्रभाव कपास की खेती पर पड़ा है।

परंपरागत रूप से पंजाब के कुछ क्षेत्रों में किसान कपास की खेती इसलिए करते थे क्योंकि वहाँ भूजल की उपलब्धता सीमित थी और धान की खेती करना कठिन था। लेकिन सिंचाई सुविधाओं के विस्तार के बाद अब इन क्षेत्रों में भी धान की खेती संभव हो गई है।

इस प्रकार सिंचाई विस्तार ने जहाँ किसानों की कृषि क्षमता बढ़ाई है, वहीं दूसरी ओर उसने धान की ओर फसल विविधीकरण के बजाय धान की ओर फसल-स्थानांतरण को भी प्रोत्साहित किया है।

कपास की गिरती उत्पादकता और आय

पंजाब के कपास क्षेत्र में पहले किसानों को लगभग 8–12 क्विंटल प्रति एकड़ तक की उपज प्राप्त होती थी। अब कई क्षेत्रों में यह घटकर लगभग 5–7 क्विंटल प्रति एकड़ रह गई है।

यदि कपास का मूल्य लगभग 7,000–8,000 रुपये प्रति क्विंटल हो, तो किसान को कुल प्राप्ति लगभग 35,000–40,000 रुपये से 50,000–55,000 रुपये प्रति एकड़ के बीच हो सकती है। जब इसमें बीज, खाद, कीटनाशक, मजदूरी, सिंचाई और अन्य लागतों को घटाया जाता है, तो किसान का वास्तविक लाभ बहुत कम रह जाता है।

इसलिए किसान के सामने विकल्प स्पष्ट हो जाता है—अधिक जोखिम वाली कपास या अपेक्षाकृत सुनिश्चित बाजार वाली धान की खेती।

भारत में कपास का कृषि एवं आर्थिक महत्व

कपास केवल एक कृषि फसल नहीं है, बल्कि यह भारत के वस्त्र उद्योग की प्रमुख कच्ची सामग्री है। कपास की खेती से किसानों के साथ-साथ जिनिंग, स्पिनिंग, टेक्सटाइल, परिधान और निर्यात क्षेत्र को भी रोजगार और आय प्राप्त होती है।

भारत में आनुवंशिक रूप से संशोधित (GM) Bt-कपास को अपनाने के बाद कपास उत्पादन में काफी वृद्धि हुई। 2002-03 से 2013-14 के बीच कपास उत्पादन में लगभग तीन गुना वृद्धि और निर्यात में भी भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई। लेकिन बाद के वर्षों में भारत के कपास निर्यात में गिरावट आई है और आयात में वृद्धि हुई है। यह स्थिति भारत के कपास क्षेत्र की उत्पादकता, गुणवत्ता, लागत और प्रतिस्पर्धात्मकता से जुड़े प्रश्नों को सामने लाती है।

कपास की खेती के लिए भौगोलिक परिस्थितियाँ

कपास एक अर्ध-शुष्क पौधा (Semi-xerophyte) है और मुख्य रूप से उष्णकटिबंधीय तथा उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में उगाया जाता है। इसके बेहतर अंकुरण के लिए खेत की परिस्थितियों में न्यूनतम लगभग 15°C तापमान आवश्यक माना जाता है।

कपास की वनस्पतिक वृद्धि के लिए लगभग 21–27°C तापमान उपयुक्त है। यह लगभग 43°C तक के तापमान को सहन कर सकता है, लेकिन 21°C से कम तापमान इसकी वृद्धि को प्रभावित कर सकता है। फलन और बॉल विकास के समय गर्म दिन तथा अपेक्षाकृत ठंडी रातें, अर्थात दिन-रात के तापमान में पर्याप्त अंतर, कपास के boll और fibre development के लिए अनुकूल होता है।

कपास विभिन्न प्रकार की अच्छी जल-निकास वाली मिट्टी में उगाया जा सकता है। यह कुछ हद तक लवणता सहन कर सकता है, लेकिन जलभराव के प्रति संवेदनशील है। उत्तर भारत में अच्छी जल-निकास वाली जलोढ़ मिट्टी, मध्य भारत में काली चिकनी मिट्टी तथा दक्षिण भारत में काली एवं मिश्रित काली-लाल मिट्टी कपास उत्पादन के लिए उपयुक्त मानी जाती है।

भारत के प्रमुख कपास उत्पादक राज्य

भारत में कपास उत्पादन करने वाले प्रमुख राज्यों को तीन कृषि-पारिस्थितिक क्षेत्रों में विभाजित किया जाता है।

1. उत्तरी क्षेत्र

इसमें शामिल हैं— पंजाब, हरियाणा, राजस्थान

2. मध्य क्षेत्र

इसमें शामिल हैं— गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश

3. दक्षिणी क्षेत्र

इसमें शामिल हैं— तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक

इस प्रकार भारत में कपास का उत्पादन देश के विभिन्न agro-climatic क्षेत्रों में होता है।

भारत में कपास की चारों प्रमुख प्रजातियाँ

भारत की एक विशेषता यह है कि यहाँ कपास की चारों प्रमुख प्रजातियों की खेती की जाती है। इनमें शामिल हैं—

  1. Gossypium arboreum — एशियाई कपास
  2. Gossypium herbaceum — एशियाई कपास
  3. Gossypium barbadense — मिस्री कपास
  4. Gossypium hirsutum — अमेरिकन अपलैंड कपास

यह जैव-विविधता भारत को वैश्विक कपास क्षेत्र में विशिष्ट स्थान प्रदान करती है।

सरकार द्वारा कपास उत्पादन बढ़ाने के प्रयास

कपास के घटते उत्पादन और रकबे को देखते हुए केंद्र सरकार ने किसानों को सहायता देने के लिए कई कदम उठाए हैं। इनमें न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के माध्यम से किसानों को मूल्य समर्थन तथा Bt-कपास जैसी तकनीकों को अनुमति देना शामिल है।

कपास की MSP खरीद व्यवस्था को अधिक सुगम बनाने के लिए Kapas Kisan App शुरू किया गया है। इसका उद्देश्य किसानों से MSP के अंतर्गत कपास की खरीद की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और सुविधाजनक बनाना है।

मिशन फॉर कॉटन प्रोडक्टिविटी

अप्रैल 2026 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने Mission for Cotton Productivity को मंजूरी दी। इस मिशन के लिए 5,659 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है और इसे 2026-27 से 2030-31 तक लागू किया जाना है।

इसका प्रमुख उद्देश्य कपास की lint productivity को बढ़ाना है। इसे वर्तमान लगभग 441 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से बढ़ाकर वर्ष 2031 तक लगभग 755 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर करने का लक्ष्य रखा गया है।

मिशन का उद्देश्य किसानों को विज्ञान और प्रौद्योगिकी आधारित सहायता देना तथा भारतीय वस्त्र उद्योग के लिए गुणवत्तापूर्ण कपास की स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित करना है।

यह सरकार के वस्त्र क्षेत्र के 5F Vision—Farm to Fibre to Factory to Fashion to Foreign से भी जुड़ा हुआ है।

मिशन फॉर कॉटन प्रोडक्टिविटी की प्रमुख विशेषताएँ

इस मिशन के तहत उच्च उत्पादकता वाले बीजों के विकास और प्रसार पर जोर दिया जाएगा। साथ ही High Density Planting System (HDPS) और Closer Spacing (CS) जैसी आधुनिक उत्पादन तकनीकों को बढ़ावा दिया जाएगा। इन तकनीकों का उद्देश्य प्रति इकाई क्षेत्र में उत्पादकता बढ़ाना है।

इसके अतिरिक्त कपास की जिनिंग और प्रोसेसिंग इकाइयों के आधुनिकीकरण, वैज्ञानिक गुणवत्ता परीक्षण तथा मानकीकृत गुणवत्ता आकलन पर भी जोर दिया जाएगा।

सरकार Kasturi Cotton Bharat पहल के माध्यम से भारतीय कपास की ब्रांडिंग और गुणवत्ता को वैश्विक बाजार में मजबूत करने का प्रयास कर रही है। मंडियों के डिजिटल एकीकरण पर भी जोर दिया जा रहा है, ताकि किसानों और बाजार के बीच सूचना एवं लेन-देन की प्रक्रिया अधिक पारदर्शी हो सके।

Cotton Corporation of India (CCI) की भूमिका

Cotton Corporation of India (CCI) को सरकार द्वारा कपास के MSP संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका दी गई है। जब बाजार में कपास यानी कपास (Kapas) का मूल्य MSP से नीचे चला जाता है, तब CCI किसानों से MSP पर कपास की खरीद करने के लिए हस्तक्षेप कर सकती है।

इस व्यवस्था का उद्देश्य किसानों को बाजार मूल्य में अत्यधिक गिरावट से सुरक्षा प्रदान करना और उन्हें न्यूनतम सुनिश्चित मूल्य उपलब्ध कराना है।

निष्कर्ष

उत्तर भारत में कपास का घटता रकबा भारत के कृषि क्षेत्र में हो रहे संरचनात्मक बदलाव का संकेत है। किसान वही फसल चुन रहे हैं जिसमें जोखिम कम और आय की निश्चितता अधिक हो। कपास को पुनः प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए सरकार को उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने के साथ-साथ किसानों के जोखिम और बाजार संबंधी अनिश्चितता को कम करना होगा। Mission for Cotton Productivity, Kapas Kisan App, CCI की MSP खरीद और Kasturi Cotton Bharat जैसी पहलों को प्रभावी ढंग से लागू करके भारत एक ओर किसानों की आय और कपास उत्पादन बढ़ा सकता है, वहीं दूसरी ओर अपने विशाल वस्त्र उद्योग के लिए गुणवत्तापूर्ण घरेलू कच्चे माल की स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित कर सकता है।

Source: Indian Express