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राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) की क्या भूमिका है?

Legal 📅 October 19, 2026

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का 33वाँ स्थापना दिवस

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (National Human Rights Commission—NHRC) ने 12 अक्टूबर को नई दिल्ली स्थित विज्ञान भवन में अपना 33वाँ स्थापना दिवस मनाया। यह आयोग भारत में मानवाधिकारों के संरक्षण, संवर्धन और उल्लंघन से संबंधित शिकायतों की जाँच करने वाली एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय संस्था है।

पिछले वर्षों में आयोग ने कानून प्रवर्तन, जाँच प्रक्रियाओं और कल्याणकारी योजनाओं में निष्पक्षता, पारदर्शिता तथा जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न नीतिगत सुधारों की सिफारिश की है। इसके अतिरिक्त, आयोग ने जन-केंद्रित शासन व्यवस्था को बढ़ावा देने और सरकारी योजनाओं के जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन की नियमित निगरानी पर भी जोर दिया है।

आयोग पुलिस की जवाबदेही, जेल सुधारों तथा आरोपियों और पीड़ितों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए अनुसंधान, नीतिगत सुझाव और जन-जागरूकता कार्यक्रम संचालित करता है।

यह केंद्र और राज्य सरकारों, शैक्षणिक संस्थानों, गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) तथा मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर समाज के सभी वर्गों, विशेष रूप से कमजोर और वंचित समुदायों के मानवाधिकारों की रक्षा करने का प्रयास करता है।

आयोग के अनुसार, पिछले 33 वर्षों में उसने कुल 24,33,716 मामलों पर कार्रवाई की है। इनमें 3,100 मामले स्वतः संज्ञान (Suo Motu Cognizance) लेकर दर्ज किए गए थे। इसके अतिरिक्त, आयोग ने मानवाधिकार उल्लंघन के पीड़ितों को 9,085 मामलों में 274 करोड़ रुपये से अधिक की आर्थिक राहत देने की सिफारिश की है।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की स्थापना

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की स्थापना 12 अक्टूबर 1993 को की गई थी। इसकी स्थापना मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 (Protection of Human Rights Act—PHRA, 1993) के अंतर्गत हुई थी। इस अधिनियम में वर्ष 2006 में संशोधन भी किया गया।

आयोग की स्थापना मानवाधिकारों के संरक्षण और संवर्धन से संबंधित अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप की गई। यह पेरिस सिद्धांतों (Paris Principles) के अनुरूप कार्य करता है।

पेरिस सिद्धांतों को अक्टूबर 1991 में पेरिस में आयोजित राष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं से संबंधित प्रथम अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला में अपनाया गया था। बाद में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 20 दिसंबर 1993 को अपने संकल्प 48/134 के माध्यम से इन सिद्धांतों का समर्थन किया।

इन सिद्धांतों का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं की स्वतंत्रता, निष्पक्षता और प्रभावशीलता सुनिश्चित करना है।

मानवाधिकार का अर्थ

मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 2(1)(d) के अनुसार, मानवाधिकार वे अधिकार हैं, जो व्यक्ति के जीवन, स्वतंत्रता, समानता और गरिमा से संबंधित हैं तथा भारतीय संविधान द्वारा गारंटीकृत हैं या अंतरराष्ट्रीय संविदाओं में निहित हैं और भारत के न्यायालयों द्वारा लागू किए जा सकते हैं।

सरल शब्दों में, मानवाधिकार वे बुनियादी अधिकार हैं, जो प्रत्येक व्यक्ति को सम्मानपूर्वक और स्वतंत्र रूप से जीवन जीने में सहायता करते हैं।

इनमें जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार, समानता का अधिकार तथा मानवीय गरिमा की रक्षा जैसे महत्वपूर्ण पहलू शामिल हैं।

NHRC की संरचना

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में एक अध्यक्ष, पाँच पूर्णकालिक सदस्य और सात पदेन सदस्य होते हैं, जैसा कि दिए गए विवरण में उल्लेख किया गया है। अधिनियम में अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति के लिए आवश्यक योग्यताओं का प्रावधान किया गया है।

आयोग का उद्देश्य मानवाधिकारों से संबंधित शिकायतों पर विचार करना, आवश्यक जाँच करना और उल्लंघन की स्थिति में उपयुक्त सुधारात्मक उपायों की सिफारिश करना है।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के प्रमुख कार्य

मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम की धारा 12 में आयोग के प्रमुख कार्यों का उल्लेख किया गया है। इसका कार्यक्षेत्र नागरिक और राजनीतिक अधिकारों के साथ-साथ आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक अधिकारों तथा सामूहिक अधिकारों तक विस्तृत है।

1. मानवाधिकार उल्लंघन की जाँच

आयोग स्वयं संज्ञान लेकर, पीड़ित व्यक्ति या उसकी ओर से किसी अन्य व्यक्ति द्वारा प्रस्तुत शिकायत के आधार पर अथवा किसी न्यायालय के निर्देश पर मानवाधिकार उल्लंघन से संबंधित मामलों की जाँच कर सकता है।

इसमें लोक सेवकों द्वारा मानवाधिकारों का उल्लंघन, उल्लंघन के लिए उकसाना या ऐसे उल्लंघन को रोकने में लापरवाही करना शामिल है।

2. न्यायालय की कार्यवाही में हस्तक्षेप

यदि किसी न्यायालय में मानवाधिकार उल्लंघन से संबंधित मामला लंबित है, तो आयोग संबंधित न्यायालय की अनुमति से उस कार्यवाही में हस्तक्षेप कर सकता है।

इसका उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया में मानवाधिकारों से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं को सामने लाना है।

3. जेलों और अन्य संस्थानों का निरीक्षण

आयोग राज्य सरकार के नियंत्रण में आने वाली जेलों और अन्य संस्थानों का दौरा कर सकता है, जहाँ लोगों को उपचार, सुधार या संरक्षण के उद्देश्य से रखा जाता है।

ऐसे निरीक्षणों का उद्देश्य बंदियों के रहने की परिस्थितियों का अध्ययन करना और आवश्यक सुधारों के लिए सरकार को सिफारिशें देना है।

4. संवैधानिक और कानूनी सुरक्षा उपायों की समीक्षा

आयोग संविधान तथा प्रचलित कानूनों के अंतर्गत मानवाधिकारों की रक्षा के लिए उपलब्ध सुरक्षा उपायों की समीक्षा करता है।

इसके बाद वह इन उपायों को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए आवश्यक कदमों की सिफारिश कर सकता है।

5. मानवाधिकारों को प्रभावित करने वाले कारकों की समीक्षा

आयोग आतंकवाद सहित उन विभिन्न कारकों की समीक्षा कर सकता है, जो लोगों को अपने मानवाधिकारों का उपयोग करने से रोकते हैं।

इस आधार पर आयोग संबंधित समस्याओं के समाधान के लिए सुधारात्मक उपाय सुझा सकता है।

6. अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संधियों का अध्ययन

आयोग मानवाधिकारों से संबंधित अंतरराष्ट्रीय संधियों और अन्य दस्तावेजों का अध्ययन करता है तथा भारत में उनके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए सुझाव देता है।

7. मानवाधिकारों के क्षेत्र में अनुसंधान

आयोग मानवाधिकारों से संबंधित समस्याओं, उनके कारणों और संभावित समाधानों पर अनुसंधान करता है। इसका उद्देश्य मानवाधिकार संरक्षण की व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाना है।

8. मानवाधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ाना

आयोग समाज के विभिन्न वर्गों में मानवाधिकारों के प्रति जागरूकता फैलाता है। इसके लिए प्रकाशनों, मीडिया, सेमिनारों और अन्य माध्यमों का उपयोग किया जाता है।

इसका उद्देश्य लोगों को उनके अधिकारों, उपलब्ध कानूनी सुरक्षा और शिकायत निवारण की प्रक्रियाओं के बारे में जानकारी देना है।

9. गैर-सरकारी संगठनों को प्रोत्साहन

आयोग मानवाधिकारों के संरक्षण और संवर्धन के क्षेत्र में कार्य करने वाले गैर-सरकारी संगठनों तथा अन्य संस्थाओं के प्रयासों को प्रोत्साहित करता है।

10. अन्य आवश्यक कार्य

आयोग मानवाधिकारों के संवर्धन और संरक्षण के लिए ऐसे अन्य कार्य भी कर सकता है, जिन्हें वह अपने निर्धारित अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत आवश्यक समझता है।

मानवाधिकार उल्लंघन की जाँच के संबंध में NHRC की शक्तियाँ

मानवाधिकार उल्लंघन से संबंधित शिकायतों की जाँच करते समय आयोग को कुछ महत्वपूर्ण कानूनी शक्तियाँ प्रदान की गई हैं। इनका उद्देश्य शिकायतों की प्रभावी जाँच करना और आवश्यक जानकारी प्राप्त करना है।

1. सूचना और रिपोर्ट माँगने की शक्ति

आयोग केंद्र सरकार, राज्य सरकार या उनके अधीन किसी प्राधिकरण अथवा संगठन से किसी शिकायत के संबंध में सूचना या रिपोर्ट माँग सकता है। इसके लिए आयोग निर्धारित समय-सीमा के भीतर जानकारी प्रस्तुत करने का निर्देश दे सकता है।

2. सिविल न्यायालय जैसी शक्तियाँ

मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत जाँच करते समय आयोग को कुछ मामलों में सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (Code of Civil Procedure, 1908) के अंतर्गत सिविल न्यायालय के समान शक्तियाँ प्राप्त होती हैं।

इनमें प्रमुख शक्तियाँ निम्नलिखित हैं:

  • गवाहों को बुलाना: गवाहों की उपस्थिति सुनिश्चित करना और शपथ पर उनके बयान दर्ज करना।

  • दस्तावेजों की माँग करना: आवश्यक दस्तावेजों की खोज और उन्हें प्रस्तुत कराने का निर्देश देना।

  • शपथपत्र पर साक्ष्य स्वीकार करना: जाँच के दौरान शपथपत्रों के माध्यम से साक्ष्य प्राप्त करना।

  • सार्वजनिक अभिलेख मँगाना: किसी न्यायालय या सरकारी कार्यालय से सार्वजनिक रिकॉर्ड अथवा उसकी प्रति प्राप्त करना।

  • जाँच आयोग नियुक्त करना: गवाहों या दस्तावेजों की जाँच के लिए आवश्यक आयोग जारी करना।

  • अन्य निर्धारित शक्तियाँ: कानून के अंतर्गत निर्धारित अन्य प्रक्रियात्मक शक्तियों का उपयोग करना।

3. स्वयं का जाँच तंत्र

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के पास शिकायतों की जाँच के लिए अपना जाँच स्टाफ भी है। इस जाँच तंत्र का नेतृत्व पुलिस महानिदेशक (Director General of Police) स्तर का अधिकारी करता है।

यह व्यवस्था आयोग को मानवाधिकार उल्लंघन से जुड़ी शिकायतों की जाँच में सहायता प्रदान करती है।

मानवाधिकार संरक्षण में NHRC का महत्व

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग भारत में मानवाधिकारों के संरक्षण और संवर्धन के लिए एक महत्वपूर्ण संस्थागत व्यवस्था है। यह सरकारी अधिकारियों की जवाबदेही बढ़ाने, पीड़ितों को राहत दिलाने के लिए सिफारिशें करने, जेलों की परिस्थितियों में सुधार का सुझाव देने और समाज में मानवाधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ाने में भूमिका निभाता है।

हालाँकि, आयोग की भूमिका मुख्यतः जाँच, समीक्षा और सिफारिशों पर आधारित है। इसकी सिफारिशें अपने आप में न्यायालय के बाध्यकारी आदेश के समान नहीं होतीं। मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों में आयोग की प्रभावशीलता उसके निष्कर्षों पर संबंधित अधिकारियों की कार्रवाई और कानून के प्रभावी क्रियान्वयन पर भी निर्भर करती है।