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ब्रिक्स में बढ़ते विकल्प और कूटनीति की जीत

ब्रिक्स का बदलता महत्व

  • वर्तमान समय में वैश्विक राजनीति तेजी से बदल रही है। विभिन्न देशों के बीच तनाव, युद्ध, व्यापारिक प्रतिस्पर्धा, आर्थिक प्रतिबंध और शक्ति-संतुलन में बदलाव ने बहुपक्षीय संस्थाओं के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। ऐसे समय में ब्रिक्स जैसे बहुपक्षीय मंचों की उपयोगिता पर अलग-अलग मत सामने आते हैं।
  • एक विचार यह है कि ऐसे अंतरराष्ट्रीय मंच केवल औपचारिक बैठकें और राजनीतिक प्रदर्शन बनकर रह गए हैं, जबकि दूसरा विचार मानता है कि इनका उपयोग बड़ी शक्तियां अपने प्रभुत्व और प्रभाव के क्षेत्र को बढ़ाने के लिए करती हैं।
  • लेकिन नई दिल्ली घोषणा-पत्र 2026 इन दोनों धारणाओं से अलग तीसरा दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। इसके अनुसार, कूटनीति, सहयोग और विचारों, वस्तुओं तथा सेवाओं का आदान-प्रदान केवल बड़ी शक्तियों की विचारधारा या हितों पर निर्भर नहीं होना चाहिए।

अलग-अलग विचारधारा वाले देशों के लिए संवाद का मंच

  • ब्रिक्स की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि अलग-अलग राजनीतिक व्यवस्थाओं और अलग-अलग राष्ट्रीय हितों वाले देश एक ही मंच पर बैठ सकते हैं।
  • यहां तक कि ऐसे देश भी एक साथ संवाद कर सकते हैं जो किसी सैन्य संघर्ष में एक-दूसरे के विरोधी पक्षों के साथ खड़े हों। वे कुछ मुद्दों पर सहमत हो सकते हैं और कुछ मुद्दों पर असहमति बनाए रखते हुए भी बातचीत जारी रख सकते हैं।
  • यही “सहमत होना और असहमत होने पर भी साथ संवाद करना” कूटनीति की मूल भावना है।
  • नई दिल्ली घोषणा-पत्र की सफलता केवल उसमें शामिल बातों में नहीं, बल्कि उन मुद्दों में भी दिखाई देती है जिन्हें लेकर कोई बड़ा विवाद या सनसनीखेज सुर्खी नहीं बनी। इसने सामान्य और निरंतर कूटनीतिक संवाद के महत्व को फिर से स्थापित किया है।

पश्चिम एशिया में कूटनीति की भूमिका

  • पश्चिम एशिया लंबे समय से अनेक संघर्षों से जूझ रहा है। इजरायल-फिलिस्तीन, ईरान-लेबनान और यमन से जुड़े संघर्षों ने क्षेत्रीय स्थिरता को प्रभावित किया है।
  • ऐसी स्थिति में ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के बीच अधिकतम संयम बरतने तथा ऐसे कदमों से बचने पर सहमति, जो स्थिति को और खराब कर सकते हैं, कूटनीति की महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा सकती है।
  • इस प्रकार ब्रिक्स ने केवल आर्थिक या व्यापारिक मुद्दों तक स्वयं को सीमित नहीं रखा, बल्कि संवेदनशील भू-राजनीतिक परिस्थितियों में संवाद और संयम का संदेश भी दिया।

एकतरफा प्रतिबंधों का विरोध

  • नई दिल्ली घोषणा-पत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा एकतरफा दंडात्मक उपायों, एकतरफा प्रतिबंधों और एकतरफा नाकेबंदियों से संबंधित है।
  • 45 पृष्ठों के घोषणा-पत्र में 130 से अधिक अनुच्छेद इन विषयों से जुड़े हैं। इसमें ऐसी नीतियों के प्रति चिंता व्यक्त की गई है, जिनके माध्यम से कोई एक देश अपनी आर्थिक या राजनीतिक शक्ति का इस्तेमाल दूसरे देशों पर दबाव डालने के लिए करता है।
  • यह दृष्टिकोण विशेष रूप से विकासशील देशों के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि एकतरफा प्रतिबंधों का प्रभाव अक्सर व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता पर पड़ता है।

आपूर्ति शृंखलाओं को हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए

  • घोषणा-पत्र का स्पष्ट संदेश है कि आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति शृंखलाओं और व्यापार मार्गों को राजनीतिक हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए।
  • तेल और प्राकृतिक गैस जैसे ऊर्जा संसाधन इस संदर्भ में विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। यदि ऊर्जा आपूर्ति या उसके परिवहन मार्गों को राजनीतिक दबाव के लिए इस्तेमाल किया जाता है, तो इसका सबसे अधिक प्रभाव विकासशील देशों पर पड़ सकता है।
  • ऊर्जा की कीमत बढ़ने से आयात बिल बढ़ता है, महंगाई बढ़ सकती है और आर्थिक विकास प्रभावित हो सकता है। इसलिए वैश्विक ऊर्जा व्यापार को स्थिर और सुरक्षित रखना विकासशील देशों के हित में है।

वैश्विक दक्षिण के लिए ऊर्जा सुरक्षा का महत्व

  • वैश्विक दक्षिण में एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और अन्य विकासशील एवं उभरती अर्थव्यवस्थाओं के अनेक देश शामिल हैं।
  • इन देशों के लिए ऊर्जा सुरक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण है। कच्चे तेल और गैस की कीमतों में अचानक वृद्धि से इन देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर गंभीर दबाव पड़ सकता है।
  • इसलिए ब्रिक्स द्वारा ऊर्जा आपूर्ति, व्यापार मार्गों और आपूर्ति शृंखलाओं के राजनीतिकरण का विरोध वैश्विक दक्षिण की आर्थिक चिंताओं को सामने लाता है।

ब्रिक्स मुद्रा के बजाय भुगतान प्रणाली पर जोर

  • ब्रिक्स के संदर्भ में अक्सर एक साझा ब्रिक्स मुद्रा बनाने की चर्चा होती रही है। हालांकि नई दिल्ली घोषणा-पत्र ने तत्काल साझा मुद्रा बनाने के बजाय सदस्य देशों के बीच भुगतान प्रणालियों को आपस में जोड़ने पर अधिक व्यावहारिक ध्यान दिया है।
  • यह दृष्टिकोण अधिक व्यावहारिक माना जा सकता है, क्योंकि अलग-अलग देशों की मौद्रिक नीतियां, आर्थिक संरचनाएं और वित्तीय प्रणालियां काफी अलग हैं।
  • यदि सदस्य देशों की भुगतान प्रणालियां बेहतर तरीके से जुड़ती हैं, तो आपसी व्यापार के भुगतान को आसान, तेज और कम लागत वाला बनाया जा सकता है।

भारत की यूपीआई प्रणाली की संभावनाएं

  • इस क्षेत्र में भारत की यूपीआई आधारित डिजिटल भुगतान व्यवस्था महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
  • भारत ने डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में एक मजबूत और व्यापक प्रणाली विकसित की है। ब्रिक्स देशों के बीच भुगतान प्रणालियों को जोड़ने में भारतीय अनुभव उपयोगी हो सकता है।
  • इससे सीमा-पार भुगतान को सरल बनाने, लेन-देन की लागत घटाने और सदस्य देशों के बीच व्यापार को बढ़ावा देने में मदद मिल सकती है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल लचीलापन

  • नई दिल्ली घोषणा-पत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) क्षमता निर्माण और डिजिटल लचीलेपन पर भी जोर दिया गया है।
  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता अब केवल तकनीकी क्षेत्र का विषय नहीं रह गई है। इसका प्रभाव अर्थव्यवस्था, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, रक्षा, उद्योग और प्रशासन सहित लगभग हर क्षेत्र पर पड़ रहा है।
  • विकासशील देशों के लिए यह आवश्यक है कि वे केवल एआई तकनीक के उपभोक्ता न बनें, बल्कि उसके विकास और उपयोग की क्षमता भी विकसित करें।
  • भारत का डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और तकनीकी क्षेत्र में अनुभव इस एजेंडे में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका को दर्शाता है।

2006 में ब्रिक्स की स्थापना का उद्देश्य

  • ब्रिक्स का गठन 2006 में हुआ था। अपने शुरुआती वर्षों में इसका उद्देश्य उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं को एक ऐसा मंच उपलब्ध कराना था, जहां वे एकध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था में अपने साझा हितों को प्रभावी ढंग से सामने रख सकें।
  • बाद में ब्रिक्स के एजेंडे में वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में सुधार, बहुध्रुवीयता और अंतरराष्ट्रीय व्यापार तथा वित्तीय व्यवस्था में विविधता जैसे विषय प्रमुख होते गए।

डॉलर पर निर्भरता कम करने की बहस

  • ब्रिक्स के साथ डी-डॉलराइजेशन अर्थात अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वित्त में अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने की चर्चा भी जुड़ी रही है।
  • इसके आलोचकों ने कभी-कभी ब्रिक्स को पश्चिम-विरोधी समूह के रूप में प्रस्तुत किया है। लेकिन वास्तविक स्थिति इससे अधिक जटिल है।
  • ब्रिक्स के सदस्य देशों के अमेरिका और यूरोप के साथ अपने-अपने आर्थिक एवं रणनीतिक संबंध हैं। इसलिए सभी सदस्य देशों को एक समान पश्चिम-विरोधी दृष्टिकोण वाला समूह मानना उचित नहीं है।

ब्रिक्स का अमेरिका-विरोधी समूह होना क्यों उचित नहीं

वर्तमान परिस्थितियों में ब्रिक्स के कई सदस्य अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ आर्थिक या रणनीतिक संबंध बनाए हुए हैं।

  • चीन अमेरिका के साथ अपने संबंधों में किसी प्रकार की समझ और संतुलन की तलाश करता है।
  • पश्चिम एशिया के कई देश अमेरिका के साथ रणनीतिक रूप से जुड़े हुए हैं।
  • रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच व्यक्तिगत संपर्क और संवाद के संबंध रहे हैं।
  • भारत अमेरिका के साथ व्यापारिक समझौते मजबूत करने तथा यूरोप के साथ व्यापार बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

इसलिए ब्रिक्स को केवल “पश्चिम-विरोधी संगठन” के रूप में देखना इसकी वास्तविक प्रकृति को बहुत सरल बना देना होगा।

विस्तारित ब्रिक्स का नया स्वरूप

  • 2026 में विस्तारित ब्रिक्स के सामने सबसे बड़ी चुनौती विभिन्न सदस्य देशों के हितों और प्राथमिकताओं के बीच संतुलन बनाने की है।
  • विस्तार के साथ संगठन में राजनीतिक व्यवस्था, आर्थिक हित, क्षेत्रीय प्राथमिकताएं और विदेश नीति के दृष्टिकोण अधिक विविध हो गए हैं।
  • ऐसे में ब्रिक्स की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह किसी एक देश या समूह की विचारधारा को थोपने के बजाय सभी सदस्यों की आवाज को कितना महत्व देता है।

भारत के लिए नई दिल्ली घोषणा-पत्र का महत्व

  • नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन और उससे संबंधित घोषणा-पत्र भारत की बहुपक्षीय कूटनीति को भी दर्शाता है।
  • भारत एक ओर अमेरिका और यूरोप के साथ अपने आर्थिक एवं रणनीतिक संबंधों को मजबूत करना चाहता है, वहीं दूसरी ओर रूस, चीन और वैश्विक दक्षिण के देशों के साथ भी संवाद बनाए रखना चाहता है।
  • भारत के लिए ब्रिक्स ऐसा मंच बन सकता है जहां वह रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए विभिन्न शक्तियों के साथ संवाद कर सके।

बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की दिशा में कदम

  • नई दिल्ली घोषणा-पत्र का मूल संदेश यह है कि वैश्विक व्यवस्था में केवल कुछ बड़ी शक्तियों का प्रभाव ही निर्णायक नहीं होना चाहिए।
  • विभिन्न देशों की आवाज, आर्थिक हित और राजनीतिक दृष्टिकोण भी वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में स्थान पाने चाहिए।
  • इसी कारण घोषणा-पत्र में बहुलतावादी दृष्टिकोण पर जोर दिया गया है। इसका अर्थ है कि विभिन्न विचारों और हितों को सुना और उनका सम्मान किया जाए।

निष्कर्ष

  • नई दिल्ली घोषणा-पत्र 2026 ब्रिक्स को केवल पश्चिम-विरोधी या डॉलर-विरोधी मंच के रूप में देखने के बजाय उसे संवाद, सहयोग और बहुपक्षीय कूटनीति के मंच के रूप में प्रस्तुत करता है।
  • इसका महत्व विशेष रूप से इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि वर्तमान विश्व युद्ध, व्यापारिक तनाव, प्रतिबंध, ऊर्जा संकट और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से गुजर रहा है।
  • ब्रिक्स का वास्तविक सामर्थ्य किसी एक साझा विचारधारा में नहीं, बल्कि विभिन्न विचारों वाले देशों को एक मंच पर लाकर संवाद जारी रखने की क्षमता में है।

मुख्य संदेश:
ब्रिक्स → बहुपक्षीय सहयोग → संवाद और कूटनीति → आपसी व्यापार → भुगतान प्रणालियों का जुड़ाव → ऊर्जा सुरक्षा → डिजिटल लचीलापन → बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था

परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण तथ्य:

  • ब्रिक्स की स्थापना — 2006
  • नई दिल्ली घोषणा-पत्र — 2026
  • प्रमुख जोर — कूटनीति, सहयोग और बहुलतावादी दृष्टिकोण
  • महत्वपूर्ण मुद्दे — एकतरफा प्रतिबंध, आपूर्ति शृंखला, ऊर्जा सुरक्षा, भुगतान प्रणाली, एआई और डिजिटल लचीलापन
  • भारत की प्रमुख भूमिका — यूपीआई, डिजिटल अवसंरचना और बहुपक्षीय कूटनीति
  • प्रमुख विचार — ब्रिक्स को केवल पश्चिम-विरोधी मंच के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

🧠

Practice MCQs

3 Questions
Q1. BRICS की स्थापना मूल रूप से किस वर्ष हुई थी?
A 2001
B 2005
C 2006
D 2009
✅ Correct Answer: C
Q2. BRICS के संदर्भ में ‘बहुध्रुवीयता’ का अर्थ क्या है?
A केवल एक देश का प्रभुत्व
B अनेक वैश्विक शक्तियों और केंद्रों का अस्तित्व
C सैन्य गठबंधनों का विस्तार
D केवल पश्चिमी देशों का सहयोग
✅ Correct Answer: B
Q3. निम्नलिखित में से कौन-सा विकल्प नई दिल्ली घोषणा-पत्र 2026 में BRICS की कूटनीतिक भूमिका को सर्वाधिक सटीक रूप से दर्शाता है?
A सदस्य देशों की विदेश नीतियों में पूर्ण समानता स्थापित करना
B बड़ी शक्तियों के नेतृत्व में एक वैकल्पिक सैन्य गठबंधन बनाना C.
C पश्चिमी देशों के साथ सभी आर्थिक संबंध समाप्त करना
D विविध राजनीतिक व्यवस्थाओं के बीच संवाद और असहमति के बावजूद सहयोग को बढ़ावा देना
✅ Correct Answer: D