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फ्रांस के हेनरी कागन और जापान के केन्सो सोआई को रसायन विज्ञान का नोबेल पुरस्कार 2026

Science & Technology 📅 October 11, 2026

रसायन विज्ञान के नोबेल पुरस्कार 2026 की घोषणा

वर्ष 2026 का रसायन विज्ञान का नोबेल पुरस्कार (Nobel Prize in Chemistry) फ्रांस के वैज्ञानिक हेनरी कागन (Henri Kagan) और जापान के वैज्ञानिक केन्सो सोआई (Kenso Soai) को संयुक्त रूप से प्रदान किया गया। उन्हें यह सम्मान असममित कार्बनिक संश्लेषण (Asymmetric Organic Synthesis) में अरैखिक प्रभावों (Non-linear Effects) और स्व-उत्प्रेरण (Autocatalysis) की खोजों के लिए दिया गया।

इन वैज्ञानिकों के शोध ने रसायन विज्ञान की एक महत्त्वपूर्ण समस्या को समझने में सहायता की है। कई अणु ऐसे होते हैं जो एक-दूसरे के दर्पण प्रतिबिंब जैसे दो रूपों में पाए जाते हैं। इन दोनों रूपों की रासायनिक संरचना समान हो सकती है, लेकिन उनकी स्थानिक व्यवस्था अलग होती है। जीवित प्राणियों में कुछ विशेष प्रकार के अणुओं का केवल एक रूप प्रमुखता से पाया जाता है।

लंबे समय तक वैज्ञानिकों के सामने यह प्रश्न बना रहा कि प्रकृति में ऐसी रासायनिक असममिति कैसे उत्पन्न हुई। हेनरी कागन और केन्सो सोआई के शोध ने इस समस्या को समझने के लिए महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक आधार प्रदान किया। उनकी खोजें दवाओं, सुगंध, स्वाद, कृषि रसायनों और अन्य उपयोगी रासायनिक पदार्थों के निर्माण में भी महत्त्वपूर्ण हैं।

कौन हैं हेनरी कागन?

हेनरी कागन का जन्म वर्ष 1930 में फ्रांस के बोलोन-बियांकूर (Boulogne-Billancourt) शहर में हुआ था। उन्होंने वर्ष 1960 में फ्रांस के कॉलेज डी फ्रांस (Collège de France) से पीएचडी प्राप्त की। वे फ्रांस के ऑर्से स्थित यूनिवर्सिटी पेरिस-सूद (Université Paris-Sud) से संबद्ध रहे हैं।

हेनरी कागन का प्रमुख योगदान असममित कार्बनिक संश्लेषण में होने वाले अरैखिक प्रभावों को समझने से संबंधित है। उनके शोध ने यह स्पष्ट करने में सहायता की कि किसी रासायनिक अभिक्रिया में बनने वाले दो दर्पण-प्रतिबिंब अणुओं की मात्रा हमेशा एक समान होना आवश्यक नहीं है।

कुछ परिस्थितियों में अभिक्रिया की प्रक्रिया इस प्रकार नियंत्रित की जा सकती है कि उत्पाद के रूप में एक दर्पण-प्रतिबिंब दूसरे की तुलना में अधिक मात्रा में प्राप्त हो। इससे रसायनज्ञों को वांछित अणु को अधिक शुद्धता के साथ तैयार करने की बेहतर संभावनाएँ मिलीं।

यह उपलब्धि औषधि निर्माण सहित उन उद्योगों के लिए महत्त्वपूर्ण है, जहाँ अणु की त्रिविमीय संरचना उसके कार्य को प्रभावित करती है।

कौन हैं केन्सो सोआई?

केन्सो सोआई का जन्म वर्ष 1950 में जापान के हिरोशिमा शहर में हुआ था। उन्होंने वर्ष 1979 में टोक्यो विश्वविद्यालय (University of Tokyo) से पीएचडी प्राप्त की। वे टोक्यो यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस (Tokyo University of Science) में प्रोफेसर एमेरिटस रहे हैं।

केन्सो सोआई ने स्व-उत्प्रेरण से संबंधित रासायनिक अभिक्रियाओं के अध्ययन में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। स्व-उत्प्रेरण ऐसी प्रक्रिया है जिसमें किसी अभिक्रिया के दौरान बनने वाला उत्पाद उसी अभिक्रिया को आगे बढ़ाने में उत्प्रेरक की भूमिका निभाता है।

उनके शोध ने यह प्रदर्शित किया कि कुछ परिस्थितियों में ऐसी अभिक्रिया विकसित की जा सकती है जिसमें एक विशेष दर्पण-प्रतिबिंब अणु का निर्माण दूसरे की तुलना में अत्यधिक प्राथमिकता से होता है। इस प्रकार की अभिक्रिया को आगे चलकर सोआई अभिक्रिया (Soai Reaction) के नाम से जाना गया।

यह खोज रसायन विज्ञान में असममिति उत्पन्न करने और उसे बढ़ाने की प्रक्रिया को समझने के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुई। इसने वैज्ञानिकों को यह भी विचार करने के लिए प्रेरित किया कि प्रकृति में जीवन से संबंधित अणुओं में एक ही प्रकार की संरचना की प्रधानता कैसे विकसित हुई होगी।

रसायन विज्ञान में असममिति क्या है?

रसायन विज्ञान में असममिति को समझने के लिए दर्पण प्रतिबिंब का उदाहरण उपयोगी है।

अपने दोनों हाथों को देखिए। बायाँ और दायाँ हाथ लगभग एक जैसे दिखाई देते हैं, लेकिन वे एक-दूसरे के पूर्णतः समान नहीं हैं। यदि एक हाथ को दर्पण में देखा जाए, तो उसका प्रतिबिंब दूसरे हाथ जैसा दिखाई देता है। इसके बावजूद दोनों हाथों को हर स्थिति में एक-दूसरे पर पूरी तरह आरोपित नहीं किया जा सकता।

इसी प्रकार, कुछ अणु भी दो ऐसे रूपों में पाए जाते हैं जो एक-दूसरे के दर्पण प्रतिबिंब होते हैं, लेकिन उन्हें केवल घुमाकर एक-दूसरे के ऊपर पूरी तरह नहीं रखा जा सकता। ऐसे अणुओं की इस विशेषता को काइरलता (Chirality) कहा जाता है।

काइरल अणुओं के दोनों रूपों को एनैन्टियोमर (Enantiomers) कहते हैं। इनकी रासायनिक संरचना में परमाणुओं के जुड़ने का क्रम समान हो सकता है, लेकिन अंतरिक्ष में उनकी व्यवस्था अलग होती है।

यह अंतर जीवित प्रणालियों में अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो सकता है, क्योंकि प्रोटीन, एंजाइम और अन्य जैविक अणु स्वयं विशिष्ट त्रिविमीय संरचनाएँ रखते हैं। इसलिए वे किसी काइरल अणु के एक रूप के साथ दूसरे रूप की तुलना में अलग व्यवहार कर सकते हैं।

होमो-काइरलता क्या है?

होमो-काइरलता (Homochirality) वह स्थिति है जिसमें किसी जैविक प्रणाली में किसी विशेष प्रकार के काइरल अणु का एक ही दर्पण-प्रतिबिंब रूप प्रमुखता से पाया जाता है।

जीवित प्राणियों में इसका महत्त्व स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। उदाहरण के लिए, प्रोटीन बनाने में उपयोग होने वाले अधिकांश अमीनो अम्ल एल-रूप (L-form) में पाए जाते हैं। दूसरी ओर, जैविक शर्कराओं में डी-रूप (D-form) की प्रधानता होती है। यह उदाहरण जैविक अणुओं की विशिष्ट काइरल व्यवस्था को दर्शाता है।

हालाँकि, यह कहना सही नहीं होगा कि प्रकृति में किसी अणु का दूसरा रूप बिल्कुल नहीं मिलता। वास्तविक जैविक प्रणालियों में कुछ अपवाद भी पाए जाते हैं। मुख्य बात यह है कि जीवन की प्रमुख जैव-रासायनिक प्रक्रियाएँ विशिष्ट दर्पण-प्रतिबिंब रूपों पर निर्भर करती हैं।

वैज्ञानिक लंबे समय से यह समझने का प्रयास कर रहे हैं कि जीवन की शुरुआत के समय यह चयनात्मकता कैसे विकसित हुई। यदि प्रारंभिक पृथ्वी पर रासायनिक अभिक्रियाओं से दोनों रूप बन सकते थे, तो अंततः जीवन की प्रमुख प्रक्रियाओं में एक विशेष रूप की प्रधानता कैसे स्थापित हुई?

हेनरी कागन और केन्सो सोआई की खोजों ने इस प्रश्न की जाँच के लिए उपयोगी रासायनिक विधियाँ और सिद्धांत उपलब्ध कराए।

दवाओं के निर्माण में काइरलता का महत्त्व

काइरलता केवल सैद्धांतिक रसायन विज्ञान का विषय नहीं है। इसका व्यावहारिक महत्त्व दवा उद्योग में विशेष रूप से दिखाई देता है।

किसी दवा के अणु का एक दर्पण-प्रतिबिंब शरीर में वांछित चिकित्सीय प्रभाव उत्पन्न कर सकता है, जबकि उसका दूसरा रूप अलग प्रभाव दिखा सकता है। कुछ मामलों में दूसरा रूप कम प्रभावी हो सकता है या उसके प्रभाव और सुरक्षा संबंधी गुण अलग हो सकते हैं।

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि मानव शरीर में मौजूद एंजाइम, प्रोटीन और जैविक रिसेप्टर स्वयं त्रिविमीय संरचना वाले होते हैं। वे किसी दवा के एक रूप को दूसरे की तुलना में अधिक प्रभावी ढंग से पहचान सकते हैं।

इसे समझने के लिए ताले और चाबी का उदाहरण लिया जा सकता है। मान लीजिए कि किसी ताले के लिए एक विशेष आकार की चाबी बनाई जाती है। यदि चाबी का दर्पण-प्रतिबिंब रूप तैयार हो जाए, तो वह दिखने में समान होने के बावजूद ताले में सही ढंग से काम नहीं कर सकता।

इसी प्रकार, किसी जैविक रिसेप्टर के साथ दवा के दोनों दर्पण-प्रतिबिंब रूप समान व्यवहार करें, यह आवश्यक नहीं है।

इसी कारण दवा निर्माण में केवल यह जानना पर्याप्त नहीं होता कि कौन-सा रासायनिक पदार्थ बनाया गया है। यह भी महत्त्वपूर्ण है कि उसके कौन-से दर्पण-प्रतिबिंब रूप का निर्माण हुआ है और प्रत्येक रूप के जैविक प्रभाव क्या हैं।

हेनरी कागन की खोज: अरैखिक प्रभावों का महत्त्व

हेनरी कागन ने वर्ष 1986 में असममित रासायनिक अभिक्रियाओं को नियंत्रित करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने अरैखिक प्रभावों के महत्त्व को स्पष्ट करने में भूमिका निभाई।

सामान्यतः किसी रासायनिक प्रक्रिया में अभिकारकों की मात्रा और उत्पाद की मात्रा के बीच एक सरल संबंध होने की अपेक्षा की जा सकती है। लेकिन कुछ जटिल रासायनिक अभिक्रियाओं में ऐसा नहीं होता। उनमें एक घटक की मात्रा में थोड़ा-सा बदलाव भी उत्पाद के दर्पण-प्रतिबिंब रूपों के अनुपात में अपेक्षा से अधिक या अलग प्रकार का परिवर्तन उत्पन्न कर सकता है।

इसी प्रकार के व्यवहार को अरैखिक प्रभाव कहा जाता है।

असममित संश्लेषण में इसका अर्थ यह हो सकता है कि किसी उत्प्रेरक में एक दर्पण-प्रतिबिंब रूप की मात्रा में छोटा परिवर्तन होने पर भी अंतिम उत्पाद में दोनों एनैन्टियोमर का अनुपात उल्लेखनीय रूप से बदल जाए।

इस खोज से रसायनज्ञों को यह समझने में मदद मिली कि रासायनिक अभिक्रिया में दर्पण-प्रतिबिंब रूपों का अनुपात किन कारकों पर निर्भर करता है। इससे अभिक्रियाओं को अधिक प्रभावी बनाने और वांछित एनैन्टियोमर की अधिक मात्रा प्राप्त करने की रणनीतियाँ विकसित करने में सहायता मिली।

केन्सो सोआई की खोज: स्व-उत्प्रेरण और सोआई अभिक्रिया

केन्सो सोआई के शोध ने असममित रासायनिक अभिक्रियाओं में स्व-उत्प्रेरण की भूमिका को समझने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

स्व-उत्प्रेरण में अभिक्रिया के दौरान बनने वाला उत्पाद उसी प्रकार की आगे की अभिक्रिया को तेज करने में सहायता कर सकता है। यदि बनने वाला उत्पाद किसी एक दर्पण-प्रतिबिंब रूप में अधिक मात्रा में मौजूद हो, तो वह आगे बनने वाले उत्पाद के अनुपात को भी प्रभावित कर सकता है।

इससे एक प्रकार की सकारात्मक प्रतिक्रिया (Positive Feedback) उत्पन्न हो सकती है। शुरुआत में किसी एक रूप की थोड़ी-सी प्रधानता समय के साथ बढ़ सकती है और अंततः उत्पाद में उसी रूप की मात्रा बहुत अधिक हो सकती है।

सोआई अभिक्रिया इस सिद्धांत का एक उल्लेखनीय उदाहरण है। इसने यह दिखाने में सहायता की कि एक रासायनिक प्रणाली में असममिति किस प्रकार उत्पन्न हो सकती है और किस प्रकार बढ़ सकती है।

यहाँ ध्यान देना आवश्यक है कि स्व-उत्प्रेरण का अर्थ यह नहीं है कि हर अभिक्रिया अपने आप केवल एक ही उत्पाद बनाएगी। परिणाम अभिक्रिया की संरचना, प्रारंभिक परिस्थितियों और संबंधित रासायनिक तंत्र पर निर्भर करते हैं।

जीवन की उत्पत्ति के रहस्य को समझने में योगदान

जीवन की उत्पत्ति से जुड़े प्रमुख वैज्ञानिक प्रश्नों में से एक यह है कि जीवित प्रणालियों में कुछ विशिष्ट दर्पण-प्रतिबिंब अणुओं की प्रधानता कैसे विकसित हुई।

यदि किसी सरल रासायनिक प्रक्रिया में दोनों एनैन्टियोमर बनने की संभावना हो, तो यह समझना आवश्यक है कि प्रकृति में एक विशेष रूप अधिक मात्रा में कैसे जमा हुआ। क्या प्रारंभिक परिस्थितियों में कोई छोटा-सा अंतर था? क्या किसी उत्प्रेरक ने एक रूप के निर्माण को बढ़ावा दिया? क्या स्व-उत्प्रेरण के माध्यम से यह अंतर आगे बढ़ा?

हेनरी कागन के अरैखिक प्रभावों से जुड़े शोध और केन्सो सोआई की स्व-उत्प्रेरण संबंधी खोजें ऐसे प्रश्नों की प्रयोगात्मक जाँच में उपयोगी हैं।

सोआई अभिक्रिया कृत्रिम रूप से विकसित की गई रासायनिक प्रक्रिया है। यह सीधे तौर पर यह सिद्ध नहीं करती कि पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत इसी प्रकार हुई थी। फिर भी, यह दिखाती है कि कुछ परिस्थितियों में रासायनिक प्रणालियाँ एक विशेष काइरल रूप की प्रधानता को उत्पन्न और बढ़ा सकती हैं।

इससे जीवन की उत्पत्ति पर शोध करने वाले वैज्ञानिकों को नए प्रयोग करने और संभावित रासायनिक प्रक्रियाओं की तुलना करने के अवसर मिले हैं।

औषधि, सुगंध और स्वाद उद्योग में उपयोग

असममित संश्लेषण की तकनीकें कई औद्योगिक क्षेत्रों के लिए महत्त्वपूर्ण हैं। दवाओं के अलावा, सुगंध, स्वाद, कृषि रसायन और कुछ उन्नत पदार्थों के निर्माण में भी अणुओं की त्रिविमीय संरचना निर्णायक हो सकती है।

औषधि उद्योग: दवा के वांछित एनैन्टियोमर को अधिक शुद्धता के साथ तैयार करना उसकी प्रभावकारिता और सुरक्षा का मूल्यांकन करने के लिए आवश्यक हो सकता है।

सुगंध उद्योग: कुछ काइरल अणुओं के दोनों रूपों की गंध अलग-अलग हो सकती है। इसलिए किसी विशेष सुगंध को तैयार करने में एक रूप की प्रधानता महत्त्वपूर्ण हो सकती है।

स्वाद उद्योग: स्वाद से जुड़े कुछ अणुओं के दर्पण-प्रतिबिंब रूप अलग-अलग संवेदी प्रभाव उत्पन्न कर सकते हैं। ऐसे मामलों में नियंत्रित संश्लेषण उपयोगी होता है।

कृषि रसायन: कीटनाशकों और अन्य कृषि रसायनों के जैविक प्रभाव भी उनकी आणविक संरचना से प्रभावित हो सकते हैं। वांछित रूप का चयन उनके उपयोग और गुणों के मूल्यांकन में सहायक हो सकता है।

नए पदार्थ: कुछ उन्नत पदार्थों के गुण भी उनकी त्रिविमीय संरचना पर निर्भर करते हैं। असममित संश्लेषण ऐसी संरचनाओं को नियंत्रित तरीके से तैयार करने में योगदान दे सकता है।

रसायन विज्ञान के नोबेल पुरस्कार का व्यापक महत्त्व

हेनरी कागन और केन्सो सोआई की खोजों ने रसायनज्ञों को काइरल अणुओं के निर्माण और नियंत्रण को समझने के लिए महत्त्वपूर्ण उपकरण प्रदान किए हैं।

कागन के शोध ने अरैखिक प्रभावों के माध्यम से असममित अभिक्रियाओं के व्यवहार को समझने में मदद की, जबकि सोआई की अभिक्रिया ने स्व-उत्प्रेरण के जरिए एक विशेष दर्पण-प्रतिबिंब रूप की प्रधानता बढ़ने की संभावनाओं को प्रदर्शित किया।

इन खोजों का महत्त्व प्रयोगशाला तक सीमित नहीं है। इनसे ऐसी रासायनिक प्रक्रियाओं को बेहतर बनाने की संभावनाएँ विकसित हुई हैं, जिनका उपयोग दवाओं, सुगंधों, स्वाद पदार्थों और कृषि रसायनों के निर्माण में होता है।

साथ ही, इन खोजों ने जीवन की उत्पत्ति से जुड़े एक मूलभूत प्रश्न—जीवित प्रणालियों में विशिष्ट काइरल रूपों की प्रधानता कैसे विकसित हुई—पर नए दृष्टिकोण से विचार करने का अवसर दिया है।