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ऑप्टोजेनेटिक्स पर शोध के लिए तीन वैज्ञानिकों को मिला वर्ष 2026 का चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार

Science & Technology 📅 October 11, 2026

नोबेल पुरस्कार 2026 की घोषणा

वर्ष 2026 का शरीर क्रिया विज्ञान या चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार (Nobel Prize in Physiology or Medicine) तीन वैज्ञानिकों—अमेरिका के कार्ल डाइसेरोथ (Karl Deisseroth) तथा जर्मनी के पीटर हेगेमन (Peter Hegemann) और जॉर्ज नागेल (Georg Nagel)—को संयुक्त रूप से प्रदान किया गया। इन वैज्ञानिकों को यह सम्मान प्रकाश-संवेदनशील आयन चैनलों और ऑप्टोजेनेटिक्स से संबंधित उनकी खोजों के लिए दिया गया।

इन खोजों ने तंत्रिका विज्ञान (Neuroscience) के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव लाया है। इनके माध्यम से वैज्ञानिकों के लिए जीवित मस्तिष्क में विशिष्ट तंत्रिका कोशिकाओं की गतिविधियों को प्रकाश की सहायता से नियंत्रित करना संभव हुआ है। इससे मस्तिष्क में स्मृति, भावनाओं, व्यवहार और शारीरिक कार्यों को नियंत्रित करने वाली प्रक्रियाओं को समझने के नए रास्ते खुले हैं।

इस शोध का महत्त्व केवल मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को समझने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भविष्य में कई तंत्रिका संबंधी और मानसिक विकारों के उपचार के लिए भी नई संभावनाएँ प्रस्तुत करता है।

कौन हैं चिकित्सा के नोबेल पुरस्कार विजेता?

इस वर्ष पुरस्कार पाने वाले तीनों वैज्ञानिकों ने अलग-अलग क्षेत्रों में काम करते हुए ऐसी खोजों में योगदान दिया, जिनके संयोजन से ऑप्टोजेनेटिक्स की आधुनिक तकनीक विकसित हुई।

1. कार्ल डाइसेरोथ (Karl Deisseroth)

कार्ल डाइसेरोथ का जन्म वर्ष 1971 में हुआ था। उन्होंने वर्ष 1998 में पीएचडी और वर्ष 2000 में एमडी की डिग्री अमेरिका के स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय (Stanford University) से प्राप्त की।

वे स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में बायोइंजीनियरिंग तथा मनोचिकित्सा एवं व्यवहार विज्ञान के प्रोफेसर हैं। वे हॉवर्ड ह्यूजेस मेडिकल इंस्टीट्यूट (Howard Hughes Medical Institute) से भी संबद्ध हैं।

कार्ल डाइसेरोथ का प्रमुख योगदान प्रकाश-संवेदनशील प्रोटीन को तंत्रिका कोशिकाओं की गतिविधियों को नियंत्रित करने वाले उपकरण में बदलना था। उन्होंने चैनलरोडोप्सिन (Channelrhodopsin) के जीन को तंत्रिका कोशिकाओं में पहुँचाकर यह प्रदर्शित किया कि नीली रोशनी की सहायता से तंत्रिका संकेतों को सक्रिय किया जा सकता है।

वर्ष 2005 में उनके शोध ने इस दिशा में एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि स्थापित की। इसके बाद वर्ष 2007 में उन्होंने जीवित चूहों के मस्तिष्क में भी प्रकाश की सहायता से तंत्रिका कोशिकाओं की गतिविधियों को नियंत्रित करने की क्षमता प्रदर्शित की।

2. पीटर हेगेमन (Peter Hegemann)

पीटर हेगेमन का जन्म वर्ष 1954 में हुआ था। उन्होंने वर्ष 1984 में जर्मनी के मार्टिन्सरीड स्थित मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट फॉर बायोकैमिस्ट्री (Max Planck Institute for Biochemistry) से पीएचडी की उपाधि प्राप्त की।

वे जर्मनी के हम्बोल्ट विश्वविद्यालय, बर्लिन (Humboldt University of Berlin) में तंत्रिका विज्ञान के वरिष्ठ प्रोफेसर हैं।

पीटर हेगेमन ने एककोशिकीय शैवाल (Single-celled algae) में प्रकाश के प्रति प्रतिक्रिया करने वाले प्रोटीनों के अध्ययन में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। उनकी रुचि इस बात को समझने में थी कि कुछ सूक्ष्म जीव प्रकाश की दिशा को कैसे पहचानते हैं और उसके अनुसार अपनी गति को कैसे नियंत्रित करते हैं।

उनके शोध ने चैनलरोडोप्सिन की पहचान और उसके गुणों को समझने का आधार तैयार किया। यह खोज आगे चलकर तंत्रिका कोशिकाओं को प्रकाश के माध्यम से नियंत्रित करने की तकनीक के विकास में अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुई।

3. जॉर्ज नागेल (Georg Nagel)

जॉर्ज नागेल का जन्म वर्ष 1953 में हुआ था। उन्होंने वर्ष 1988 में जर्मनी के फ्रैंकफर्ट विश्वविद्यालय से पीएचडी प्राप्त की।

वे जर्मनी के वुर्जबर्ग विश्वविद्यालय (University of Würzburg) में आणविक पादप शरीर क्रिया विज्ञान (Molecular Plant Physiology) के प्रोफेसर हैं।

जॉर्ज नागेल ने पीटर हेगेमन के साथ मिलकर चैनलरोडोप्सिन के गुणों को समझने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने यह समझने में योगदान दिया कि प्रकाश के संपर्क में आने पर यह प्रोटीन कोशिका की झिल्ली में आयनों के प्रवाह को कैसे प्रभावित करता है।

इस खोज ने यह स्पष्ट किया कि प्रकाश के प्रति संवेदनशील प्रोटीन को दूसरे प्रकार की कोशिकाओं में भी उपयोग किया जा सकता है। इसी वैज्ञानिक आधार पर तंत्रिका कोशिकाओं को प्रकाश से नियंत्रित करने की तकनीक विकसित हुई।

शरीर क्रिया विज्ञान या चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार क्या है?

शरीर क्रिया विज्ञान या चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार विश्व के सबसे प्रतिष्ठित वैज्ञानिक सम्मानों में से एक है। यह उन वैज्ञानिकों को दिया जाता है जिनकी खोजों ने जीव विज्ञान, मानव शरीर की कार्यप्रणाली या चिकित्सा विज्ञान की समझ को महत्त्वपूर्ण रूप से आगे बढ़ाया हो।

इस पुरस्कार का निर्णय स्वीडन के स्टॉकहोम स्थित कारोलिंस्का संस्थान (Karolinska Institutet) की नोबेल सभा (Nobel Assembly) द्वारा किया जाता है।

वर्ष 2026 के लिए तीनों विजेताओं को कुल 1.2 करोड़ स्वीडिश क्रोनर की पुरस्कार राशि दी गई। उपलब्ध विवरण के अनुसार, यह राशि लगभग 12 लाख अमेरिकी डॉलर के बराबर है।

इस पुरस्कार की शुरुआत स्वीडिश आविष्कारक और उद्योगपति अल्फ्रेड नोबेल की वसीयत के आधार पर हुई थी। वर्ष 1901 से भौतिकी, रसायन विज्ञान, चिकित्सा, साहित्य और शांति के क्षेत्रों में नोबेल पुरस्कार प्रदान किए जा रहे हैं। अर्थशास्त्र के क्षेत्र में पुरस्कार बाद में जोड़ा गया।

ऑप्टोजेनेटिक्स क्या है?

ऑप्टोजेनेटिक्स (Optogenetics) एक आधुनिक जैविक तकनीक है, जिसमें प्रकाश की सहायता से विशिष्ट कोशिकाओं की गतिविधियों को नियंत्रित किया जाता है। तंत्रिका विज्ञान में इसका उपयोग मस्तिष्क की विशेष तंत्रिका कोशिकाओं को सक्रिय करने या उनकी गतिविधि को कम करने के लिए किया जाता है।

इस तकनीक को समझने के लिए मस्तिष्क की तंत्रिका कोशिकाओं की कार्यप्रणाली को समझना आवश्यक है। मस्तिष्क में अरबों तंत्रिका कोशिकाएँ होती हैं, जिन्हें न्यूरॉन (Neuron) कहा जाता है। ये कोशिकाएँ विद्युत और रासायनिक संकेतों के माध्यम से एक-दूसरे से संवाद करती हैं।

यही संवाद हमारी स्मृति, सीखने की क्षमता, भावनाओं, निर्णय लेने की प्रक्रिया, गतिविधियों और व्यवहार को प्रभावित करता है। यदि वैज्ञानिक यह जानना चाहते हैं कि किसी विशेष व्यवहार के दौरान मस्तिष्क की कौन-सी कोशिकाएँ सक्रिय होती हैं, तो उन्हें उन कोशिकाओं की गतिविधि का सटीक अध्ययन करना पड़ता है।

ऑप्टोजेनेटिक्स के माध्यम से वैज्ञानिक चुनिंदा तंत्रिका कोशिकाओं को प्रकाश के प्रति संवेदनशील बना सकते हैं। इसके बाद नियंत्रित प्रकाश डालकर उनकी गतिविधियों को बदला जा सकता है। इससे शोधकर्ता यह जाँच सकते हैं कि किसी विशेष तंत्रिका समूह को सक्रिय करने या निष्क्रिय करने से मस्तिष्क के कार्यों पर क्या प्रभाव पड़ता है।

चैनलरोडोप्सिन की खोज कैसे हुई?

ऑप्टोजेनेटिक्स के विकास में चैनलरोडोप्सिन नामक प्रोटीन की खोज ने निर्णायक भूमिका निभाई।

इस शोध की शुरुआत एक सामान्य लेकिन महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक प्रश्न से हुई। पीटर हेगेमन यह समझना चाहते थे कि क्लैमाइडोमोनास (Chlamydomonas) नामक एककोशिकीय शैवाल प्रकाश की दिशा में तैरने में सक्षम कैसे होता है।

क्लैमाइडोमोनास एक सूक्ष्म जीव है, जो प्रकाश के प्रति प्रतिक्रिया करता है। प्रकाश की दिशा पहचानने की इसकी क्षमता वैज्ञानिकों के लिए रुचि का विषय थी। इस व्यवहार के पीछे मौजूद जैविक तंत्र को समझने के प्रयास में पीटर हेगेमन और जॉर्ज नागेल ने प्रकाश-संवेदनशील प्रोटीनों का अध्ययन किया।

2000 के दशक की शुरुआत में उनके शोध से चैनलरोडोप्सिन की पहचान और उसके विशिष्ट गुणों को समझने में महत्त्वपूर्ण प्रगति हुई।

चैनलरोडोप्सिन एक प्रकाश-संवेदनशील प्रोटीन है, जो कोशिका की झिल्ली में पाया जाता है। जब इस प्रोटीन पर उपयुक्त नीली रोशनी पड़ती है, तो यह आयनों को कोशिका की झिल्ली के पार जाने का मार्ग प्रदान करता है।

आयन विद्युत आवेश वाले कण होते हैं। जब ये कोशिका के भीतर या बाहर प्रवाहित होते हैं, तो कोशिका की विद्युत स्थिति बदल सकती है। तंत्रिका कोशिकाओं में इस प्रकार का बदलाव विद्युत संकेत उत्पन्न करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

इस खोज का सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू यह था कि चैनलरोडोप्सिन को केवल शैवाल तक सीमित नहीं रखना पड़ा। वैज्ञानिकों ने इसका उपयोग अन्य कोशिकाओं को भी प्रकाश के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए किया।

प्रकाश से तंत्रिका कोशिकाओं को नियंत्रित करने की तकनीक का विकास

पीटर हेगेमन और जॉर्ज नागेल के शोध ने चैनलरोडोप्सिन के गुणों को समझने का आधार दिया, जबकि कार्ल डाइसेरोथ ने इस खोज को तंत्रिका विज्ञान में उपयोग करने योग्य तकनीक के रूप में विकसित करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

कार्ल डाइसेरोथ और उनके सहयोगियों ने चैनलरोडोप्सिन के लिए जिम्मेदार जीन को चूहों की तंत्रिका कोशिकाओं में पहुँचाया। इसके बाद इन कोशिकाओं पर नीली रोशनी डाली गई।

प्रकाश के संपर्क में आने पर प्रोटीन सक्रिय हुआ और कोशिकाओं में आयनों का प्रवाह शुरू हुआ। इससे तंत्रिका कोशिकाओं में विद्युत संकेत उत्पन्न करना संभव हुआ।

वर्ष 2005 में प्रकाशित उनके शोध ने यह प्रदर्शित किया कि प्रकाश की सहायता से तंत्रिका कोशिकाओं की गतिविधियों को नियंत्रित किया जा सकता है। वर्ष 2007 में जीवित चूहों के मस्तिष्क में इस तकनीक के प्रयोग ने इसके महत्त्व को और स्पष्ट किया।

इस प्रकार, प्रकाश-संवेदनशील प्रोटीनों की खोज और उन्हें तंत्रिका कोशिकाओं में उपयोग करने की तकनीक ने मिलकर ऑप्टोजेनेटिक्स को जन्म दिया।

मस्तिष्क के अध्ययन में ऑप्टोजेनेटिक्स का महत्त्व

मस्तिष्क मानव शरीर के सबसे जटिल अंगों में से एक है। यह हमारी सोच, याददाश्त, भावनाओं, व्यवहार, संवेदनाओं और शारीरिक गतिविधियों को नियंत्रित करता है। इसके बावजूद लंबे समय तक वैज्ञानिकों के लिए यह स्पष्ट करना कठिन रहा कि मस्तिष्क की कौन-सी विशिष्ट तंत्रिका कोशिकाएँ किसी विशेष कार्य का कारण बनती हैं।

20वीं शताब्दी में वैज्ञानिकों ने मस्तिष्क के विभिन्न क्षेत्रों और उनके कार्यों के बीच संबंधों का अध्ययन किया। इससे उन्हें यह समझने में सहायता मिली कि मस्तिष्क के कुछ हिस्से देखने, सुनने, चलने, याद रखने और भावनाओं से संबंधित प्रक्रियाओं में भूमिका निभाते हैं।

हालाँकि, किसी क्षेत्र में तंत्रिका गतिविधि और किसी व्यवहार के बीच संबंध मिल जाने से यह आवश्यक रूप से सिद्ध नहीं होता कि वही गतिविधि उस व्यवहार का कारण है।

ऑप्टोजेनेटिक्स इस समस्या के अध्ययन के लिए एक अधिक सटीक प्रयोगात्मक तरीका उपलब्ध कराता है। शोधकर्ता किसी विशिष्ट तंत्रिका समूह की गतिविधि को नियंत्रित करके देख सकते हैं कि उससे स्मृति, भावनात्मक प्रतिक्रिया या व्यवहार में क्या परिवर्तन आता है।

इससे मस्तिष्क के तंत्रिका परिपथों (Neural Circuits) और उनके कार्यों के बीच कारणात्मक संबंधों को समझने में मदद मिलती है। यही कारण है कि इस तकनीक ने तंत्रिका विज्ञान के क्षेत्र में एक नए युग की शुरुआत की है।

मानसिक और तंत्रिका संबंधी विकारों के अध्ययन में उपयोग

ऑप्टोजेनेटिक्स ने कई मानसिक और तंत्रिका संबंधी विकारों के पीछे मौजूद जैविक प्रक्रियाओं का अध्ययन करने के नए अवसर प्रदान किए हैं।

शोधकर्ता इस तकनीक की मदद से उन तंत्रिका परिपथों का अध्ययन कर सकते हैं जो अवसाद (Depression), चिंता (Anxiety), सिज़ोफ्रेनिया (Schizophrenia), अल्जाइमर रोग (Alzheimer’s Disease) और पार्किंसन रोग (Parkinson’s Disease) जैसी स्थितियों से संबंधित हो सकते हैं।

उदाहरण के लिए, अवसाद और चिंता से जुड़े शोध में वैज्ञानिक यह समझने का प्रयास कर सकते हैं कि मस्तिष्क के विशिष्ट तंत्रिका परिपथ भावनात्मक प्रतिक्रियाओं और व्यवहार को किस प्रकार प्रभावित करते हैं। इसी तरह, अल्जाइमर रोग में स्मृति से संबंधित तंत्रिका प्रक्रियाओं और पार्किंसन रोग में गति नियंत्रण से संबंधित तंत्रिका परिपथों का अध्ययन किया जा सकता है।

यह ध्यान रखना आवश्यक है कि इन बीमारियों के संदर्भ में ऑप्टोजेनेटिक्स का महत्त्व मुख्यतः शोध और जैविक प्रक्रियाओं की बेहतर समझ से जुड़ा है। इस तकनीक के सभी संभावित उपयोग अभी नियमित नैदानिक उपचार के रूप में स्थापित नहीं हैं।

दृष्टि बहाल करने में ऑप्टोजेनेटिक्स की संभावनाएँ

ऑप्टोजेनेटिक्स का एक महत्त्वपूर्ण संभावित उपयोग दृष्टिबाधित लोगों की दृष्टि बहाल करने से संबंधित है।

दृष्टि की प्रक्रिया में आँखें प्रकाश को ग्रहण करती हैं और रेटिना (Retina) में मौजूद प्रकाश-संवेदनशील कोशिकाएँ उसे तंत्रिका संकेतों में बदलती हैं। ये संकेत मस्तिष्क तक पहुँचते हैं, जहाँ उनका प्रसंस्करण करके दृश्य अनुभव उत्पन्न होता है।

कुछ नेत्र रोगों में रेटिना की प्रकाश-संवेदनशील कोशिकाएँ क्षतिग्रस्त हो जाती हैं, जिससे देखने की क्षमता प्रभावित होती है। वैज्ञानिक यह जाँच रहे हैं कि क्या ऑप्टोजेनेटिक्स की मदद से रेटिना की कुछ अन्य कोशिकाओं को प्रकाश के प्रति संवेदनशील बनाया जा सकता है, ताकि वे दृश्य संकेतों को आगे भेजने में सहायता कर सकें।

इस दृष्टिकोण का उद्देश्य क्षतिग्रस्त दृश्य तंत्र के कुछ कार्यों को वैकल्पिक तरीके से सक्रिय करना है। हालाँकि, इसके परिणाम रोग की प्रकृति, क्षति की गंभीरता और उपयोग की जाने वाली तकनीक पर निर्भर करते हैं। इसलिए इसे सभी प्रकार के दृष्टिबाधित लोगों के लिए सुनिश्चित उपचार नहीं माना जा सकता।

कॉक्लियर इम्प्लांट को बेहतर बनाने की संभावना

ऑप्टोजेनेटिक्स का एक अन्य संभावित उपयोग कॉक्लियर इम्प्लांट (Cochlear Implant) को अधिक सटीक बनाने से संबंधित है।

कॉक्लियर इम्प्लांट एक ऐसा इलेक्ट्रॉनिक उपकरण है, जिसका उपयोग कुछ प्रकार की गंभीर श्रवण हानि वाले लोगों को ध्वनि संकेतों को समझने में सहायता देने के लिए किया जाता है। यह सामान्य सुनने की प्रक्रिया के कुछ हिस्सों को दरकिनार करते हुए श्रवण तंत्रिका (Auditory Nerve) को विद्युत संकेतों से उत्तेजित करता है।

वर्तमान तकनीकों में विद्युत उत्तेजना के कारण आसपास की कई तंत्रिका संरचनाएँ एक साथ सक्रिय हो सकती हैं। इससे ध्वनि के विभिन्न घटकों को अलग-अलग पहचानने की क्षमता सीमित हो सकती है।

शोधकर्ताओं को आशा है कि प्रकाश के माध्यम से श्रवण तंत्रिका से संबंधित कोशिकाओं को अधिक सटीकता से सक्रिय करने वाली तकनीक विकसित की जा सकेगी। यदि यह दृष्टिकोण प्रभावी सिद्ध होता है, तो भविष्य में कॉक्लियर इम्प्लांट से प्राप्त ध्वनि की गुणवत्ता और स्पष्टता में सुधार की संभावना हो सकती है।

हालाँकि, इस क्षेत्र में अभी और अनुसंधान तथा तकनीकी विकास की आवश्यकता है।

ऑप्टोजेनेटिक्स की सीमाएँ और भविष्य की दिशा

ऑप्टोजेनेटिक्स ने मस्तिष्क के अध्ययन को अधिक सटीक बनाया है, लेकिन इसके उपयोग में कुछ चुनौतियाँ भी हैं। इस तकनीक के लिए संबंधित कोशिकाओं को प्रकाश-संवेदनशील प्रोटीन उपलब्ध कराना और उन तक नियंत्रित प्रकाश पहुँचाना आवश्यक हो सकता है।

मस्तिष्क के भीतर गहराई में स्थित कोशिकाओं तक प्रकाश पहुँचाना आसान नहीं होता। इसके अतिरिक्त, जीन पहुँचाने की विधियों की सुरक्षा, प्रकाश के प्रभाव, तकनीक की दीर्घकालिक विश्वसनीयता और मानव शरीर में इसके उपयोग से जुड़े प्रश्नों का सावधानीपूर्वक अध्ययन करना आवश्यक है।

प्रयोगशाला में पशुओं पर सफल प्रयोग होना और मनुष्यों के लिए सुरक्षित तथा प्रभावी चिकित्सा विकसित हो जाना दो अलग-अलग चरण हैं। इसलिए ऑप्टोजेनेटिक्स की कई संभावनाएँ अभी अनुसंधान के स्तर पर हैं।

फिर भी, यह तकनीक वैज्ञानिकों को मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को समझने के लिए एक शक्तिशाली उपकरण प्रदान करती है। भविष्य में इससे तंत्रिका विज्ञान, मानसिक स्वास्थ्य अनुसंधान, दृष्टि बहाली और श्रवण तकनीक जैसे क्षेत्रों में नए विकास की संभावनाएँ बनी हुई हैं।

नोबेल पुरस्कार 2026 की खोज का व्यापक महत्त्व

कार्ल डाइसेरोथ, पीटर हेगेमन और जॉर्ज नागेल के कार्य का महत्त्व इस बात में निहित है कि इसने प्रकाश, कोशिकीय जीव विज्ञान और तंत्रिका विज्ञान के बीच एक प्रभावशाली संबंध स्थापित किया।

एककोशिकीय शैवाल की प्रकाश के प्रति प्रतिक्रिया को समझने से शुरू हुआ शोध आगे चलकर जीवित मस्तिष्क की विशिष्ट तंत्रिका कोशिकाओं को नियंत्रित करने की तकनीक तक पहुँचा। इससे वैज्ञानिकों को केवल यह देखने में ही नहीं, बल्कि यह जाँचने में भी सहायता मिली कि किसी विशिष्ट तंत्रिका गतिविधि का व्यवहार और मस्तिष्क के कार्यों पर क्या प्रभाव पड़ता है।

इस उपलब्धि ने मस्तिष्क की जटिल कार्यप्रणाली को समझने के लिए नए रास्ते खोले हैं। साथ ही, इसने भविष्य में तंत्रिका संबंधी और मानसिक विकारों के बेहतर अध्ययन तथा संभावित उपचारों के विकास के लिए वैज्ञानिक आधार को मजबूत किया है।