कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में हाल के दिनों में तेज वृद्धि देखने को मिली है। बुधवार को ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई। सप्ताह के दौरान यह लगभग 110 डॉलर प्रति बैरल तक गई और बाद में 104.6 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुई। यह 26 मई के बाद पहली बार था जब ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर के स्तर से ऊपर गया।
तेल की कीमतों में इस तेजी का प्रमुख कारण पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव और लाल सागर क्षेत्र में समुद्री परिवहन पर बढ़ता खतरा है। यमन के अधिकांश लाल सागर तट पर ईरान समर्थित हूती मिलिशिया के कब्जे और गतिविधियों ने बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य से होने वाले जहाजों के आवागमन को प्रभावित किया है।
बाब-अल-मंदेब विश्व के महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। यहां किसी भी प्रकार का व्यवधान तेल तथा अन्य वस्तुओं की वैश्विक आपूर्ति और परिवहन लागत को प्रभावित कर सकता है।
अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दर पर नजर
इसी बीच अमेरिका का फेडरल रिजर्व 15–16 सितंबर को अपनी खुली बाजार समिति की बैठक करने वाला है। बाजार में ब्याज दर बढ़ने की संभावना पहले से ही काफी हद तक शामिल हो चुकी है।
तेल की कीमतों के विपरीत फेड की संभावित ब्याज दर वृद्धि बाजार के लिए अचानक घटना नहीं है। निवेशकों ने पहले से ही इसकी संभावना को ध्यान में रखते हुए अपने निवेश निर्णय लेने शुरू कर दिए हैं।
अमेरिका में 10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड की प्रतिफल दर लगभग 5 प्रतिशत पहुंच गई है, जो अक्टूबर 2023 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है। जब अमेरिका जैसे सुरक्षित बाजारों में निवेशकों को अपेक्षाकृत अधिक प्रतिफल मिलने लगता है, तो उभरती अर्थव्यवस्थाओं से विदेशी पूंजी के बाहर जाने का खतरा बढ़ जाता है।
अमेरिका में महंगाई का दबाव
पश्चिम एशिया के संघर्ष का प्रभाव अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई दे रहा है। अगस्त में अमेरिका की उत्पादक मूल्य मुद्रास्फीति 5.4 प्रतिशत सालाना रही। इसके अलावा डीजल की कीमत बढ़कर 6.20 डॉलर प्रति गैलन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई।
तेल और ईंधन की महंगी कीमतें परिवहन तथा उत्पादन लागत बढ़ाती हैं। इससे कंपनियों के खर्च बढ़ते हैं और अंततः वस्तुओं तथा सेवाओं की कीमतों पर भी दबाव पड़ सकता है।
भारत के लिए यह स्थिति क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत इस परिस्थिति से विशेष रूप से प्रभावित हो सकता है क्योंकि भारत की अर्थव्यवस्था ऊर्जा और विदेशी पूंजी दोनों के लिए काफी हद तक अंतरराष्ट्रीय बाजार पर निर्भर है।
भारत अपनी घरेलू जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने पर भारत के लिए आयात बिल बढ़ जाता है।
तेल की कीमत जितनी अधिक होगी और वह जितने लंबे समय तक ऊंची रहेगी, भारत पर उतना ही अधिक दबाव पड़ेगा।
इसके दो प्रमुख प्रभाव हो सकते हैं:
- महंगाई में वृद्धि
- आर्थिक विकास की गति में कमी
महंगे ईंधन से परिवहन, बिजली, विनिर्माण और कृषि सहित कई क्षेत्रों की लागत बढ़ सकती है। इसका असर आम उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति पर भी पड़ सकता है।
वैश्विक ब्याज दरों का भारत पर प्रभाव
भारत के लिए दूसरी बड़ी चुनौती वैश्विक ब्याज दरों का बढ़ना है।
यदि जापान में 10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड की प्रतिफल दर लगभग 3 प्रतिशत, अमेरिका में 5 प्रतिशत और ब्रिटेन में 5.4 प्रतिशत है, तो विदेशी निवेशकों के लिए भारत जैसे उभरते बाजारों की तुलना में विकसित देशों में निवेश अधिक आकर्षक हो सकता है।
भारत में निवेश करने पर विदेशी निवेशकों को केवल ब्याज या निवेश से मिलने वाले लाभ को नहीं देखना पड़ता, बल्कि रुपये की संभावित गिरावट का जोखिम भी ध्यान में रखना पड़ता है।
यदि भारत में निवेश से मिलने वाला प्रतिफल मुद्रा में गिरावट के बाद कम हो जाए, तो विदेशी निवेशक अमेरिका या अन्य विकसित अर्थव्यवस्थाओं के सुरक्षित परिसंपत्तियों को प्राथमिकता दे सकते हैं।
चालू खाते के घाटे पर दबाव
कच्चे तेल की ऊंची कीमत भारत के चालू खाते के घाटे को भी बढ़ा सकती है।
भारत को महंगे तेल के लिए अधिक विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है। इससे आयात का मूल्य बढ़ता है और निर्यात की तुलना में आयात अधिक बढ़ने पर चालू खाते का घाटा बढ़ सकता है।
ऐसे समय में जब दुनिया भर में ब्याज दरें बढ़ रही हों, इस घाटे को वित्तपोषित करना और कठिन हो सकता है क्योंकि विदेशी पूंजी सुरक्षित माने जाने वाले विकसित देशों की परिसंपत्तियों की ओर स्थानांतरित हो सकती है।
रुपये पर संभावित दबाव
तेल की कीमतों में वृद्धि और विदेशी पूंजी के बाहर निकलने की स्थिति में भारतीय रुपये पर भी दबाव बढ़ सकता है।
भारत को तेल आयात के भुगतान के लिए बड़ी मात्रा में डॉलर की आवश्यकता होती है। यदि डॉलर की मांग बढ़ती है और विदेशी निवेशक भारतीय बाजारों से पूंजी निकालते हैं, तो रुपये के कमजोर होने की संभावना बढ़ सकती है।
हालांकि, भारत ने अब तक ईरान युद्ध से उत्पन्न ऊर्जा आपूर्ति के झटके को अपेक्षाकृत अच्छी तरह संभाला है।
इसके अलावा, आरबीआई की विशेष डॉलर-रुपया अदला-बदली सुविधा के माध्यम से जुटाई गई 127.2 अरब डॉलर की एफसीएनआर (बी) जमा राशि ने रुपये पर पड़ने वाले दबाव को कम करने में मदद की है।
समुद्री मार्गों का संकट
भारत के लिए तत्काल चुनौती पश्चिम एशिया के महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में व्यवधान से जुड़ी है।
एक ओर हॉर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से होने वाले जहाजों के आवागमन को लेकर चिंता है, वहीं दूसरी ओर बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य भी खतरे में है।
ये दोनों मार्ग वैश्विक ऊर्जा व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। यदि इन मार्गों पर लंबे समय तक व्यवधान रहता है, तो:
- तेल की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है।
- समुद्री परिवहन लागत बढ़ सकती है।
- बीमा लागत बढ़ सकती है।
- जहाजों को लंबे वैकल्पिक मार्ग अपनाने पड़ सकते हैं।
- आयातित वस्तुओं की कीमत बढ़ सकती है।
- भारत का आयात बिल बढ़ सकता है।
भारत के लिए दीर्घकालिक समाधान
अल्पकाल में भारत को उम्मीद है कि हॉर्मुज और बाब-अल-मंदेब जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों से जहाजों के सुरक्षित आवागमन के लिए किसी प्रकार की व्यवस्था या समझौता हो सकता है।
लेकिन वास्तविक चुनौती केवल मौजूदा तेल संकट से निपटना नहीं है। भारत को अपनी अर्थव्यवस्था को ऐसी स्थिति के लिए अधिक मजबूत बनाना होगा, जिसमें वैश्विक तेल कीमतें और ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची रह सकती हैं।
निर्यात प्रतिस्पर्धा बढ़ाना आवश्यक
भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण उपायों में से एक निर्यात प्रतिस्पर्धा बढ़ाना है।
भारत को अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपने उत्पादों को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए उत्पादन लागत कम करनी होगी। इसके लिए आयातित कच्चे माल और कलपुर्जों पर शुल्क हटाने या कम करने की आवश्यकता हो सकती है।
यदि भारतीय कंपनियां सस्ते और बेहतर गुणवत्ता वाले कच्चे माल तथा घटक आयात कर सकें, तो उनके उत्पादन की लागत कम होगी और वे वैश्विक बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी बन सकेंगी।
बुनियादी ढांचे में निवेश
निर्यात को बढ़ावा देने के लिए केवल शुल्क में कमी पर्याप्त नहीं है। देश में मजबूत परिवहन और लॉजिस्टिक व्यवस्था भी आवश्यक है।
इसके लिए लगातार निवेश की जरूरत है:
- सड़क परिवहन
- रेल नेटवर्क
- अंतर्देशीय जलमार्ग
- तटीय जल परिवहन
- बंदरगाहों का आधुनिकीकरण
- माल ढुलाई और भंडारण व्यवस्था
बेहतर बुनियादी ढांचा माल को कम समय और कम लागत में देश के भीतर तथा अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचाने में मदद करेगा।
दीर्घकालिक विदेशी निवेश आकर्षित करना
भारत के लिए दूसरी बड़ी प्राथमिकता दीर्घकालिक विदेशी निवेश आकर्षित करना है।
विदेशी निवेशक केवल तेज आर्थिक विकास की संभावना नहीं देखते, बल्कि वे यह भी देखते हैं कि किसी देश में:
- नीतियां कितनी स्थिर हैं,
- नियम कितने स्पष्ट हैं,
- सरकार की नीतियों में कितनी निरंतरता है,
- निवेशकों के लिए कारोबारी वातावरण कितना अनुकूल है।
इसलिए भारत को ऐसी नीतियां बनानी होंगी जिनसे विदेशी निवेशकों का विश्वास मजबूत हो और वे अल्पकालिक लाभ के बजाय लंबे समय के लिए भारत में पूंजी लगाएं।
राजकोषीय अनुशासन भी जरूरी
इस पूरी परिस्थिति में राजकोषीय अनुशासन का महत्व भी बढ़ जाता है।
सरकार को अनावश्यक या अत्यधिक खर्च से बचना होगा। यदि सरकारी खर्च बहुत तेजी से बढ़ता है, तो अर्थव्यवस्था में मांग और आयात बढ़ सकते हैं। इससे चालू खाते के घाटे पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
इसलिए सरकार को विकास के लिए आवश्यक खर्च और वित्तीय अनुशासन के बीच संतुलन बनाए रखना होगा।
निष्कर्ष
भारत के सामने वर्तमान चुनौती केवल कच्चे तेल की कीमत बढ़ने या अमेरिकी फेड द्वारा ब्याज दर बढ़ाने तक सीमित नहीं है। इन दोनों घटनाओं का संयुक्त प्रभाव महंगाई, आर्थिक विकास, रुपये की विनिमय दर, विदेशी निवेश और चालू खाते के घाटे पर पड़ सकता है।
हालांकि भारत ने पिछले ऊर्जा झटकों से निपटने की क्षमता दिखाई है, लेकिन लंबे समय में मजबूत स्थिति बनाए रखने के लिए निर्यात प्रतिस्पर्धा बढ़ाना, आयात लागत घटाना, बुनियादी ढांचे को मजबूत करना, दीर्घकालिक विदेशी निवेश आकर्षित करना और राजकोषीय अनुशासन बनाए रखना आवश्यक होगा।
Source: Indian Express