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आदित्य-L1 ने सौर ज्वालाओं से पहले सूर्य के शुरुआती संकेत पकड़े

भारत के पहले अंतरिक्ष-आधारित सौर वेधशाला मिशन आदित्य-L1 ने सूर्य की गतिविधियों को समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। वैज्ञानिकों ने आदित्य-L1 से प्राप्त आंकड़ों का अध्ययन करके सूर्य के वातावरण में होने वाली ऐसी छोटी और अल्पकालिक चमक का पता लगाया है, जो एक बड़ी सौर ज्वाला (Solar Flare) के उत्पन्न होने से कुछ घंटे पहले दिखाई देती है।

विशेष रूप से महत्वपूर्ण बात यह है कि ये चमक सूर्य के उसी क्षेत्र के आसपास केंद्रित पाई गईं, जहाँ बाद में सौर ज्वाला उत्पन्न हुई। यह खोज भविष्य में सौर ज्वालाओं की अधिक विश्वसनीय भविष्यवाणी करने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।

आदित्य-L1 ने क्या खोजा?

वैज्ञानिकों ने पाया कि बड़ी सौर ज्वाला के फूटने से कई घंटे पहले सूर्य के वातावरण में छोटे-छोटे और थोड़े समय के लिए दिखाई देने वाले चमकीले क्षेत्र बनते हैं।

इन शुरुआती चमकीले संकेतों की कुछ प्रमुख विशेषताएँ हैं—

  • ये चमक बहुत छोटे समय के लिए दिखाई देती हैं।
  • ये बड़ी सौर ज्वाला आने से कुछ घंटे पहले देखी जा सकती हैं।
  • इनका समूह अक्सर उसी क्षेत्र के आसपास पाया जाता है, जहाँ बाद में सौर ज्वाला उत्पन्न होती है।
  • इससे संकेत मिलता है कि सौर ज्वाला के अचानक दिखाई देने से पहले सूर्य के वातावरण में कुछ प्रारंभिक प्रक्रियाएँ शुरू हो जाती हैं।

इस खोज से वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिल सकती है कि सौर ज्वाला उत्पन्न होने से पहले सूर्य के वातावरण में ऊर्जा किस प्रकार एकत्रित और मुक्त होती है।

एक ही वेधशाला से UV और X-ray अवलोकन

इस अध्ययन की एक प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें आदित्य-L1 के तीन पेलोड से प्राप्त पराबैंगनी (Ultraviolet) और एक्स-रे अवलोकनों का एक साथ उपयोग किया गया।

यह सौर ज्वाला से पहले की गतिविधियों के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सूर्य के विभिन्न स्तरों पर होने वाली प्रक्रियाओं को अलग-अलग तरंगदैर्ध्यों में देखा जा सकता है।

वैज्ञानिकों ने इन आंकड़ों को मिलाकर यह समझने का प्रयास किया कि—

  • सूर्य के निचले वायुमंडल में गतिविधियाँ कैसे शुरू होती हैं।
  • इन गतिविधियों का संबंध सूर्य के कोरोना से कैसे जुड़ता है।
  • सौर ज्वाला से पहले ऊर्जा किस प्रकार जमा होती है।
  • अंततः यह ऊर्जा किस प्रक्रिया के माध्यम से मुक्त होती है।

यह अध्ययन एक ही अंतरिक्ष वेधशाला से एक साथ UV इमेजिंग और X-ray अवलोकनों के माध्यम से प्री-फ्लेयर गतिविधि की व्यवस्थित जाँच के शुरुआती महत्वपूर्ण अध्ययनों में से एक है।

सौर ज्वाला की भविष्यवाणी में मदद

सौर ज्वालाओं की सही समय पर भविष्यवाणी करना वैज्ञानिकों के लिए बड़ी चुनौती है।

यदि वैज्ञानिक यह पहचानने में सक्षम हो जाते हैं कि कौन-से संकेत किसी बड़ी सौर ज्वाला के आने की चेतावनी देते हैं, तो भविष्य में सौर ज्वालाओं का पूर्वानुमान अधिक सटीक बनाया जा सकता है।

इससे बेहतर Space Weather Forecasting यानी अंतरिक्ष मौसम पूर्वानुमान विकसित करने में मदद मिलेगी।

सटीक पूर्वानुमान से निम्नलिखित को संभावित जोखिमों से बचाने में सहायता मिल सकती है—

  • संचार उपग्रह
  • नेविगेशन प्रणालियाँ
  • अंतरिक्ष यात्री
  • अंतरिक्ष यान
  • रेडियो संचार व्यवस्था
  • अन्य महत्वपूर्ण अंतरिक्ष एवं डिजिटल तकनीकें

आदित्य-L1 मिशन क्या है?

आदित्य-L1 भारत का पहला अंतरिक्ष-आधारित वेधशाला श्रेणी का सौर मिशन है, जिसका मुख्य उद्देश्य सूर्य का विस्तृत अध्ययन करना है।

मिशन का नाम संस्कृत के ‘आदित्य’ शब्द से लिया गया है, जिसका अर्थ सूर्य है।

‘L1’ सूर्य-पृथ्वी प्रणाली के Lagrange Point 1 को दर्शाता है।

आदित्य-L1 का प्रक्षेपण

  • आदित्य-L1 का प्रक्षेपण 2 सितंबर 2023 को किया गया था।
  • इसे श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से लॉन्च किया गया।
  • यह भारत का पहला अंतरिक्ष-आधारित सौर वेधशाला मिशन है।
  • मिशन का उद्देश्य सूर्य की विभिन्न परतों और उससे निकलने वाली ऊर्जा तथा विकिरण का अध्ययन करना है।

L1 बिंदु क्या है?

L1 सूर्य और पृथ्वी के बीच स्थित एक विशेष लैग्रेंज बिंदु है।

यह ऐसा स्थान है जहाँ सूर्य और पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बलों का प्रभाव इस प्रकार संतुलित होता है कि वहाँ स्थित अंतरिक्ष यान को दोनों पिंडों के संदर्भ में अपेक्षाकृत स्थिर स्थिति बनाए रखने में सुविधा होती है।

सूर्य-पृथ्वी प्रणाली का L1 बिंदु पृथ्वी से लगभग 15 लाख किलोमीटर दूर है।

यह दूरी पृथ्वी और सूर्य के बीच की कुल दूरी का लगभग 1 प्रतिशत है।

L1 पर आदित्य-L1 रखने का लाभ

आदित्य-L1 को सूर्य-पृथ्वी के L1 बिंदु के चारों ओर हेलो ऑर्बिट में स्थापित किया गया है।

इस स्थिति का सबसे बड़ा लाभ यह है कि अंतरिक्ष यान सूर्य को लगभग लगातार देख सकता है।

पृथ्वी की कक्षा से सूर्य के अवलोकन के दौरान कुछ परिस्थितियों में पृथ्वी या चंद्रमा के कारण अवरोध हो सकता है। लेकिन L1 के आसपास हेलो ऑर्बिट से सूर्य की लगातार निगरानी करना संभव होता है।

इससे वैज्ञानिकों को सूर्य की गतिविधियों का निरंतर अध्ययन करने में महत्वपूर्ण लाभ मिलता है।

आदित्य-L1 की पहली हेलो ऑर्बिट

आदित्य-L1 ने सूर्य-पृथ्वी L1 बिंदु के चारों ओर अपनी पहली हेलो ऑर्बिट 2 जुलाई 2024 को पूरी की।

यह मिशन की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी और इससे अंतरिक्ष यान की L1 क्षेत्र में सफल संचालन क्षमता प्रदर्शित हुई।

आदित्य-L1 का प्रमुख पेलोड: VELC

आदित्य-L1 का प्राथमिक पेलोड Visible Emission Line Coronagraph (VELC) है।

इसे Indian Institute of Astrophysics (IIA), Bengaluru द्वारा विकसित किया गया है।

VELC का मुख्य उद्देश्य सूर्य के बाहरी वातावरण यानी कोरोना का अध्ययन करना है।

सौर कोरोना में होने वाली गतिविधियाँ सौर ज्वालाओं और अंतरिक्ष मौसम से जुड़ी महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं को समझने में महत्वपूर्ण हैं।

सौर ज्वाला क्या है?

सौर ज्वाला यानी Solar Flare सूर्य से अचानक निकलने वाली अत्यधिक तीव्र विद्युतचुंबकीय विकिरण की चमक है।

ये घटनाएँ सूर्य के चुंबकीय क्षेत्र में जमा ऊर्जा के अचानक मुक्त होने के कारण उत्पन्न होती हैं।

सौर ज्वालाएँ सूर्य के वातावरण में बहुत शक्तिशाली ऊर्जा-विस्फोट जैसी घटनाएँ होती हैं।

सौर ज्वालाएँ क्यों महत्वपूर्ण हैं?

बड़ी सौर ज्वालाएँ पृथ्वी के आसपास के अंतरिक्ष वातावरण को प्रभावित कर सकती हैं।

इनके कारण—

  • रेडियो संचार बाधित हो सकता है।
  • नेविगेशन प्रणालियों पर असर पड़ सकता है।
  • उपग्रहों के इलेक्ट्रॉनिक उपकरण प्रभावित हो सकते हैं।
  • अंतरिक्ष यात्रियों के लिए विकिरण संबंधी जोखिम बढ़ सकता है।
  • अंतरिक्ष यानों के संचालन पर प्रभाव पड़ सकता है।
  • अंतरिक्ष मौसम में महत्वपूर्ण परिवर्तन हो सकते हैं।

इसी कारण सौर ज्वालाओं के उत्पन्न होने की प्रक्रिया को समझना आधुनिक तकनीकी अवसंरचना की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।

आदित्य-L1 सूर्य का अवलोकन कैसे करता है?

आदित्य-L1 सूर्य को अलग-अलग तरंगदैर्ध्यों में देखने वाले कई वैज्ञानिक उपकरणों से लैस है।

इससे वैज्ञानिक सूर्य के अलग-अलग वायुमंडलीय स्तरों और उनमें होने वाली प्रक्रियाओं का अध्ययन कर सकते हैं।

इस मिशन में विशेष रूप से UV और X-ray अवलोकन सौर गतिविधियों को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

SUIT: पराबैंगनी में सूर्य का अध्ययन

Solar Ultraviolet Imaging Telescope (SUIT) आदित्य-L1 का एक महत्वपूर्ण उपकरण है।

SUIT सूर्य का अवलोकन 11 Near-Ultraviolet (NUV) फिल्टरों के माध्यम से करता है।

इसके द्वारा सूर्य की ऊपरी प्रकाशमंडल (Photosphere) से लेकर वर्णमंडल (Chromosphere) तक की विभिन्न परतों का अध्ययन किया जा सकता है।

NUV का महत्व

पृथ्वी से सूर्य के निकट-पराबैंगनी विकिरण का अध्ययन सीमित है क्योंकि पृथ्वी का वायुमंडल अधिकांश पराबैंगनी विकिरण को अवशोषित कर लेता है।

इसलिए अंतरिक्ष में स्थापित SUIT जैसे उपकरणों के माध्यम से इन तरंगदैर्ध्यों का अध्ययन वैज्ञानिकों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है।

X-ray उपकरण: SoLEXS और HEL1OS

आदित्य-L1 में दो महत्वपूर्ण X-ray उपकरण भी हैं—

1. SoLEXS

पूरा नाम: Solar Low Energy X-ray Spectrometer

यह सूर्य से निकलने वाले कम-ऊर्जा X-ray विकिरण का अध्ययन करता है।

2. HEL1OS

पूरा नाम: High Energy L1 Orbiting X-ray Spectrometer

यह सूर्य में होने वाली ऊर्जावान प्रक्रियाओं से उत्पन्न उच्च-ऊर्जा X-ray विकिरण का अध्ययन करता है।

इन दोनों उपकरणों से प्राप्त जानकारी सूर्य के कोरोना में होने वाली ऊर्जावान घटनाओं को समझने में सहायता करती है।

UV और X-ray डेटा को एक साथ देखने का महत्व

SUIT से प्राप्त UV डेटा और SoLEXS तथा HEL1OS से प्राप्त X-ray डेटा को एक साथ देखने से वैज्ञानिकों को सूर्य के विभिन्न स्तरों में होने वाली गतिविधियों के बीच संबंध समझने का अवसर मिलता है।

विशेष रूप से यह पता लगाने में मदद मिलती है कि—

सूर्य के निचले वायुमंडल में गतिविधि → ऊर्जा का संचय → कोरोना में ऊर्जा का मुक्त होना → सौर ज्वाला

जैसी प्रक्रिया किस प्रकार विकसित होती है।

इसी कारण आदित्य-L1 के बहु-तरंगदैर्ध्य अवलोकन सौर ज्वालाओं की उत्पत्ति को समझने में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

अंतरिक्ष मौसम क्या है?

अंतरिक्ष मौसम (Space Weather) से तात्पर्य सूर्य की गतिविधियों के कारण अंतरिक्ष वातावरण में होने वाले परिवर्तनों से है।

सौर ज्वालाएँ, कोरोनल मास इजेक्शन (CME) और सूर्य से निकलने वाले ऊर्जावान कण अंतरिक्ष मौसम को प्रभावित कर सकते हैं।

इनका प्रभाव पृथ्वी की तकनीकी प्रणालियों पर पड़ सकता है।

इसलिए सूर्य की गतिविधियों की निरंतर निगरानी करके संभावित अंतरिक्ष मौसम घटनाओं का पूर्वानुमान लगाने का प्रयास किया जाता है।

भारत के लिए आदित्य-L1 का महत्व

आदित्य-L1 भारत की अंतरिक्ष एवं सौर अनुसंधान क्षमताओं को मजबूत करने वाला महत्वपूर्ण मिशन है।

इससे भारत को—

  • सूर्य की सतह और वायुमंडल का विस्तृत अध्ययन करने,
  • सौर ज्वालाओं को समझने,
  • अंतरिक्ष मौसम का अध्ययन करने,
  • सौर गतिविधियों के शुरुआती संकेतों की पहचान करने,
  • उपग्रहों और अंतरिक्ष प्रणालियों की सुरक्षा में योगदान देने

में सहायता मिलती है।

हालिया अध्ययन विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि सौर ज्वाला से पहले दिखाई देने वाले शुरुआती संकेतों की पहचान भविष्य में अधिक विश्वसनीय सौर ज्वाला पूर्वानुमान प्रणाली विकसित करने में मदद कर सकती है।

परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण तथ्य

विषय महत्वपूर्ण तथ्य
मिशन आदित्य-L1
मिशन का उद्देश्य सूर्य का अध्ययन
प्रक्षेपण 2 सितंबर 2023
प्रक्षेपण स्थल सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र, श्रीहरिकोटा
भारत का पहला अंतरिक्ष-आधारित वेधशाला श्रेणी का सौर मिशन
L1 की पृथ्वी से दूरी लगभग 15 लाख किमी
L1 सूर्य-पृथ्वी प्रणाली का लैग्रेंज बिंदु
पहली हेलो ऑर्बिट पूरी 2 जुलाई 2024
प्राथमिक पेलोड VELC
VELC का विकास Indian Institute of Astrophysics, Bengaluru
SUIT Solar Ultraviolet Imaging Telescope
SUIT फिल्टर 11 NUV फिल्टर
SoLEXS Solar Low Energy X-ray Spectrometer
HEL1OS High Energy L1 Orbiting X-ray Spectrometer
प्रमुख अध्ययन सौर ज्वाला से पहले की गतिविधियों की पहचान
सौर ज्वाला सूर्य से विद्युतचुंबकीय विकिरण का अचानक एवं तीव्र विस्फोट
प्रमुख लाभ सौर ज्वाला एवं अंतरिक्ष मौसम के पूर्वानुमान में सुधार

निष्कर्ष

आदित्य-L1 से प्राप्त नए अवलोकनों ने वैज्ञानिकों को सौर ज्वालाओं से पहले होने वाली गतिविधियों को समझने का एक महत्वपूर्ण अवसर दिया है। सूर्य के वातावरण में दिखाई देने वाली छोटी और अल्पकालिक चमक, जो बड़ी सौर ज्वाला से कुछ घंटे पहले उसी क्षेत्र में दिखाई देती है, भविष्य के सौर ज्वाला पूर्वानुमान के लिए संभावित शुरुआती संकेत हो सकती है।

UV और X-ray अवलोकनों को एक साथ उपयोग करने वाली यह शोध पद्धति सूर्य में ऊर्जा के संचय और उसके बाद होने वाले विस्फोटक ऊर्जा-विमोचन को समझने में मदद करती है। इससे भविष्य में अंतरिक्ष मौसम की बेहतर भविष्यवाणी की जा सकती है और उपग्रहों, संचार प्रणालियों, नेविगेशन, अंतरिक्ष यात्रियों तथा अन्य महत्वपूर्ण तकनीकी प्रणालियों को सौर गतिविधियों से होने वाले संभावित नुकसान से बचाने की क्षमता मजबूत हो सकती है।