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यूएई–भारत आर्थिक गलियारा एक नई विकास गाथा को जन्म दे रहा है

भारत और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के बीच आर्थिक संबंधों में हाल के वर्षों में एक उल्लेखनीय परिवर्तन देखने को मिला है। जब वर्ष 2022 में समग्र आर्थिक साझेदारी समझौते (CEPA) पर हस्ताक्षर किए गए थे, तब दोनों देशों ने 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 100 अरब डॉलर तक पहुँचाने का लक्ष्य तय किया था। यह लक्ष्य तय समय से पाँच वर्ष पहले ही पूरा हो गया। जनवरी 2026 में दोनों देशों के नेतृत्व ने अब 2032 तक 200 अरब डॉलर के व्यापार का नया लक्ष्य निर्धारित किया है। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में बहुत कम ऐसे आर्थिक गलियारे हैं, जो इतनी तेज़ी और महत्वाकांक्षा के साथ आगे बढ़ रहे हों।

आँकड़े इस साझेदारी की कहानी का एक हिस्सा बताते हैं। दोनों देशों के बीच गैर-तेल व्यापार पिछले वर्ष लगभग 20 प्रतिशत बढ़कर 65 अरब डॉलर तक पहुँच गया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह संबंध अब केवल ऊर्जा तक सीमित नहीं रह गया है। वर्ष 2000 से अब तक यूएई की संस्थाओं ने भारत में 22 अरब डॉलर से अधिक का निवेश किया है, जबकि भारतीय कंपनियों ने यूएई में 16 अरब डॉलर से अधिक का निवेश किया है। लगभग 50 लाख भारतीय नागरिक यूएई में रहते और काम करते हैं, जो वहाँ का सबसे बड़ा प्रवासी समुदाय है। यही मानव आधार इस आर्थिक गलियारे की रीढ़ है, जिसे हर सप्ताह 1,200 से अधिक उड़ानों का समर्थन प्राप्त है — यह दुनिया के सबसे व्यस्त हवाई मार्गों में से एक है।

लेकिन इस साझेदारी की सबसे महत्वपूर्ण बात केवल इसका आकार नहीं, बल्कि इसकी दिशा है। यह गलियारा अब उन्नत विनिर्माण, वित्तीय सेवाओं, प्रौद्योगिकी और लॉजिस्टिक्स द्वारा नया रूप ले रहा है। रिलायंस इंडस्ट्रीज़ ने अबू धाबी में कम-कार्बन रसायन विनिर्माण के लिए TA’ZIZ के साथ 2 अरब डॉलर से अधिक की साझेदारी की है। अशोक लेलैंड ने अपने इलेक्ट्रिक बस उत्पादन को यूनाइटेड किंगडम से स्थानांतरित कर यूएई में स्थापित किया है। लार्सन एंड टुब्रो को अबू धाबी की दुनिया की सबसे महत्वाकांक्षी सोलर-प्लस-स्टोरेज परियोजनाओं में से एक के लिए पसंदीदा ठेकेदार चुना गया है। भारतीय बैंक, प्रौद्योगिकी कंपनियाँ और स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र की कंपनियाँ यूएई में वास्तविक और स्थायी परिचालन उपस्थिति बना रही हैं। ये अस्थायी या प्रयोगात्मक कदम नहीं हैं, बल्कि दीर्घकालिक औद्योगिक प्रतिबद्धताएँ हैं।

दूसरी दिशा में भी निवेश उतने ही भरोसे के साथ प्रवाहित हो रहा है। DP World ने भारत में बुनियादी ढाँचे के लिए अतिरिक्त 5 अरब डॉलर के निवेश की घोषणा की है, जिससे बंदरगाहों और लॉजिस्टिक्स पार्कों का उसका नेटवर्क और विस्तृत होगा। Emirates NBD द्वारा RBL बैंक में बहुमत हिस्सेदारी का अधिग्रहण भारतीय बैंकिंग इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा एकल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश है। ADNOC ने इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड के साथ अरबों डॉलर के दीर्घकालिक LNG आपूर्ति समझौते किए हैं। Mubadala ने भारतीय स्वास्थ्य सेवा, नवीकरणीय ऊर्जा और प्रौद्योगिकी प्लेटफॉर्म्स में 4 अरब डॉलर से अधिक का निवेश किया है। अबू धाबी इन्वेस्टमेंट अथॉरिटी भारत के GIFT City में आधार स्थापित करने वाला पहला संप्रभु संपत्ति कोष बना है।

इन सभी पहलों के पीछे दशकों में बना आपसी विश्वास है, जिसे मानवीय संबंधों ने मजबूत किया है और एक सुदृढ़ नीतिगत ढाँचे ने समर्थन दिया है। CEPA के तहत लगभग 90 प्रतिशत टैरिफ लाइनों पर शुल्क समाप्त कर दिया गया है। वर्ष 2024 का द्विपक्षीय निवेश संधि और अब एक रणनीतिक रक्षा साझेदारी ने व्यवसायों को दीर्घकालिक निवेश के लिए आवश्यक भरोसा और स्थिरता प्रदान की है।

अब यह महत्वाकांक्षा तीसरे बाज़ारों तक भी फैल रही है। यूएई में निर्माणाधीन भारत मार्ट अफ्रीका, पश्चिम एशिया और यूरेशिया के लिए भारतीय वस्तुओं का थोक केंद्र बनेगा, जिसका उद्देश्य इन क्षेत्रों में भारत के निर्यात को दोगुना करना है। भारत और यूएई अफ्रीका में संयुक्त डिजिटल अवसंरचना और क्षमता निर्माण पहलों की भी संभावनाएँ तलाश रहे हैं। यह गलियारा अब केवल द्विपक्षीय व्यापार का माध्यम नहीं, बल्कि वैश्विक पहुँच का मंच बनता जा रहा है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) इस साझेदारी की अगली बड़ी सीमा के रूप में उभर रही है। भारत फरवरी 2026 में नई दिल्ली में AI Impact Summit की मेजबानी कर रहा है, जो वैश्विक दक्षिण में आयोजित पहला वैश्विक AI शिखर सम्मेलन है। यह इस बात का प्रतीक है कि भारत अब इस तकनीक के विकास और उसके शासन ढाँचे को आकार देने में अग्रणी भूमिका निभा रहा है। यूएई, जिसने 2017 में दुनिया का पहला AI राज्य मंत्री नियुक्त किया था और तब से AI अवसंरचना व अनुसंधान में भारी निवेश किया है, इस क्षेत्र में भारत का स्वाभाविक साझेदार है। दोनों देश उन्नत कंप्यूटिंग क्षमता, डेटा केंद्रों और AI-आधारित नवाचार में सहयोग की संभावनाओं पर काम कर रहे हैं। ऐसी तकनीक में, जो हर क्षेत्र और हर अर्थव्यवस्था को बदल देगी, नेतृत्व वही देश करेंगे जो अकेले तेज़ी से नहीं, बल्कि समझदारी से साझेदारियाँ बनाकर आगे बढ़ेंगे।

भारत का वैश्विक क्षण अब सामने है। लगभग 4 ट्रिलियन डॉलर की GDP के साथ, दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में भारत उद्यमशील ऊर्जा, विनिर्माण महत्वाकांक्षा और विश्वस्तरीय डिजिटल अवसंरचना से संचालित है। भारतीय व्यापार जगत के नेताओं से बातचीत में एक बात स्पष्ट रूप से उभरकर आती है — अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विस्तार करने की उनकी इच्छा पहले से कहीं अधिक मजबूत है। अब प्रश्न यह नहीं है कि भारतीय उद्यम वैश्विक होंगे या नहीं, बल्कि यह है कि सही आर्थिक गलियारे उस यात्रा को कितनी प्रभावी ढंग से गति दे सकते हैं।

यह सब एक व्यापक वैश्विक पुनर्संयोजन का भी हिस्सा है। हालिया दिल्ली घोषणा, जो भारत और अरब विदेश मंत्रियों के बीच हुई, ने 2028 तक राजनीति, अर्थव्यवस्था, ऊर्जा, प्रौद्योगिकी और सुरक्षा में सहयोग का एक महत्वाकांक्षी कार्यक्रम प्रस्तुत किया है। भारत–यूएई आर्थिक गलियारा इस व्यापक अभिसरण की अग्रिम पंक्ति में है।

भारत और यूएई यह दिखा रहे हैं कि जब दो देश साझा दृष्टि के तहत नीति, पूँजी और क्रियान्वयन को संरेखित करते हैं, तो क्या-क्या संभव हो सकता है। पहला 100 अरब डॉलर अपेक्षा से कहीं पहले हासिल हुआ। अगला अध्याय केवल आँकड़ों से नहीं, बल्कि इस बात से तय होगा कि दोनों अर्थव्यवस्थाएँ कितनी गहराई से एक-दूसरे में एकीकृत होती हैं और वह एकीकरण कितनी दूर तक पहुँचता है।

— बद्र जाफ़र
(संयुक्त अरब अमीरात के विदेश मंत्री के विशेष दूत — व्यापार एवं परोपकार)

Source: The Hindu

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