एथेनॉल मिश्रण को लेकर नई नीति पहल
भारत सरकार के सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव जारी किया है, जिसमें 85% एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (E85) और 100% एथेनॉल (E100) को ऑटोमोबाइल ईंधन के रूप में मान्यता देने की बात कही गई है। यह प्रस्ताव उस समय सामने आया है जब देश में पहले ही 20% एथेनॉल मिश्रण (E20) को अप्रैल 2026 से अनिवार्य रूप से लागू कर दिया गया है। यदि यह मसौदा अधिसूचना स्वीकृत हो जाती है, तो यह फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों के लिए मार्ग प्रशस्त करेगा, जो E85 या उससे अधिक एथेनॉल मिश्रण पर भी चल सकेंगे।
फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों की आवश्यकता और तकनीकी चुनौतियाँ
फ्लेक्स-फ्यूल वाहन ऐसे वाहन होते हैं जो विभिन्न अनुपातों में पेट्रोल और एथेनॉल के मिश्रण पर चल सकते हैं। हालांकि, वर्तमान में अप्रैल 2023 के बाद निर्मित वाहन केवल E20 तक ही अनुकूल हैं। इससे अधिक एथेनॉल मिश्रण के उपयोग के लिए इंजन और ऑटो पार्ट्स में व्यापक बदलाव की आवश्यकता होगी। एथेनॉल की हाइग्रोस्कोपिक (नमी को अवशोषित करने वाली) प्रकृति के कारण धातु के हिस्सों में जंग लगने की संभावना बढ़ जाती है, जिससे इंजन की दीर्घकालिक कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है।
वैश्विक ऊर्जा संकट और नीति का समय
यह नीति ऐसे समय में लाई गई है जब पश्चिम एशिया में संघर्ष और होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ा है। इसके परिणामस्वरूप कच्चे तेल की कीमतों में भारी वृद्धि हुई है। भारत में तेल विपणन कंपनियाँ (OMCs) प्रति लीटर पेट्रोल पर लगभग ₹14 का नुकसान उठा रही हैं, जबकि उन्हें पेट्रोल की लागत को संतुलित करने के लिए कम से कम ₹89 प्रति लीटर का एक्स-रिफाइनरी मूल्य चाहिए।
एथेनॉल: सस्ता और व्यवहारिक विकल्प
इसके विपरीत, एथेनॉल की कीमत ₹60.73 से ₹71.86 प्रति लीटर के बीच है, जो इसे पेट्रोल की तुलना में सस्ता विकल्प बनाती है। एथेनॉल का उत्पादन गन्ना, मक्का और चावल जैसे कृषि उत्पादों से किया जाता है, जिससे यह घरेलू रूप से उपलब्ध और आयात पर निर्भरता कम करने वाला ईंधन बन जाता है। यह आर्थिक दृष्टि से भी लाभकारी है और ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करता है।
कृषि और उत्पादन से जुड़ी चुनौतियाँ
हालांकि एथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए कई चुनौतियाँ भी मौजूद हैं। गन्ना और चावल जैसी फसलें अधिक पानी की मांग करती हैं, जिससे जल संसाधनों पर दबाव बढ़ता है। इसके अलावा, सरकार द्वारा खाद्य निगम (FCI) के गोदामों से सब्सिडी वाले चावल का उपयोग एथेनॉल उत्पादन के लिए करना दीर्घकालिक रूप से उचित नहीं माना जा सकता। इसलिए, उत्पादन को टिकाऊ बनाने के लिए उच्च उत्पादकता वाली फसलों और बेहतर किस्मों के विकास पर ध्यान देना आवश्यक है।
वैकल्पिक फीडस्टॉक: मिलेट्स की भूमिका
एथेनॉल उत्पादन के लिए बाजरा, ज्वार और अन्य मोटे अनाज (मिलेट्स) को बढ़ावा देना एक व्यवहारिक समाधान हो सकता है। ये फसलें कम पानी में उगाई जा सकती हैं और इनकी फर्मेंटेशन क्षमता भी मक्का और गन्ने के बराबर होती है। इससे न केवल पर्यावरणीय संतुलन बना रहेगा बल्कि किसानों को भी नए अवसर मिलेंगे।
भविष्य की दिशा और नीति का महत्व
हालांकि वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें भविष्य में स्थिर हो सकती हैं, लेकिन वर्तमान ऊर्जा संकट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत को वैकल्पिक ईंधनों की दिशा में तेजी से आगे बढ़ना होगा। एथेनॉल और फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों की ओर यह कदम केवल एक अल्पकालिक समाधान नहीं, बल्कि दीर्घकालिक ऊर्जा रणनीति का हिस्सा है। यह भारत को आत्मनिर्भर ऊर्जा प्रणाली की ओर ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।