केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 7 सितंबर को गोवा के पणजी में पश्चिमी क्षेत्रीय परिषद की 28वीं बैठक की अध्यक्षता की।
बैठक में कौन-कौन शामिल हुए?
बैठक में गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल तथा दादरा एवं नगर हवेली और दमन एवं दीव के प्रशासक प्रफुल्ल पटेल ने भाग लिया।
बैठक में प्रमुख मुद्दे
बैठक में कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की गई, जिनमें प्रमुख हैं—
- महिलाओं और बच्चों के साथ बलात्कार के मामलों की त्वरित जांच और शीघ्र निपटारे के लिए त्वरित विशेष न्यायालयों के क्रियान्वयन की समीक्षा।
- आपातकालीन प्रतिक्रिया सहायता प्रणाली (ईआरएसएस-112) से संबंधित मुद्दे।
- खाद्य सुरक्षा मानकों से जुड़े विषय।
- प्रत्येक गांव से निर्धारित दूरी के भीतर ईंट-पत्थर से बने स्थायी बैंकिंग केंद्रों की सुविधा उपलब्ध कराना।
- रेलवे विकास परियोजनाओं से संबंधित मुद्दे।
- पर्यावरणीय स्वीकृतियों से संबंधित विषय।
- इसके अतिरिक्त राष्ट्रीय महत्व के विभिन्न मुद्दों पर भी चर्चा की गई।
क्षेत्रीय परिषद क्या है?
क्षेत्रीय परिषदों के गठन का विचार प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने वर्ष 1956 में राज्यों के पुनर्गठन आयोग की रिपोर्ट पर चर्चा के दौरान प्रस्तुत किया था। उन्होंने सुझाव दिया था कि पुनर्गठित किए जाने वाले राज्यों को चार या पाँच क्षेत्रों में बांटा जाए और प्रत्येक क्षेत्र के लिए एक सलाहकार परिषद बनाई जाए, ताकि राज्यों के बीच सहयोग की भावना विकसित हो।
यह सुझाव ऐसे समय दिया गया था, जब भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन के कारण उत्पन्न भाषाई तनाव और कटुता देश की एकता के लिए चुनौती बन रही थी। इन परिस्थितियों के समाधान के लिए एक उच्चस्तरीय सलाहकारी मंच की आवश्यकता महसूस की गई, जो इन तनावों को कम करने, केंद्र और राज्यों तथा विभिन्न राज्यों के बीच स्वस्थ संबंध विकसित करने, अंतर्राज्यीय समस्याओं का समाधान करने और संबंधित क्षेत्रों के संतुलित सामाजिक-आर्थिक विकास को बढ़ावा देने में सहायक हो।
राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 की धारा 15 से 22 के तहत वर्ष 1957 में पाँच क्षेत्रीय परिषदों का गठन किया गया।
पाँच क्षेत्रीय परिषदें
- उत्तरी क्षेत्रीय परिषद – हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, पंजाब, राजस्थान, दिल्ली और चंडीगढ़।
- केंद्रीय क्षेत्रीय परिषद – छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश।
- पूर्वी क्षेत्रीय परिषद – बिहार, झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल।
- पश्चिमी क्षेत्रीय परिषद – गोवा, गुजरात, महाराष्ट्र तथा दादरा एवं नगर हवेली और दमन एवं दीव।
- दक्षिणी क्षेत्रीय परिषद – आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी।
पूर्वोत्तर राज्यों—असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, त्रिपुरा, मिजोरम, मेघालय और नागालैंड—को क्षेत्रीय परिषदों में शामिल नहीं किया गया है। इन राज्यों की विशेष समस्याओं के समाधान के लिए उत्तर-पूर्वी परिषद का गठन उत्तर-पूर्वी परिषद अधिनियम, 1972 के तहत किया गया। सिक्किम को भी उत्तर-पूर्वी परिषद में शामिल किया गया है।
संगठनात्मक संरचना
- केंद्रीय गृह मंत्री पाँचों क्षेत्रीय परिषदों के अध्यक्ष होते हैं।
- संबंधित क्षेत्र के राज्यों के मुख्यमंत्री बारी-बारी से उपाध्यक्ष का पद संभालते हैं। प्रत्येक मुख्यमंत्री एक वर्ष के लिए उपाध्यक्ष रहता है।
- परिषद के सदस्यों में प्रत्येक राज्य के मुख्यमंत्री तथा राज्यपाल द्वारा नामित दो अन्य मंत्री शामिल होते हैं। संबंधित क्षेत्र में शामिल केंद्रशासित प्रदेशों से दो सदस्य भी परिषद में होते हैं।
- प्रत्येक क्षेत्रीय परिषद ने सदस्य राज्यों के मुख्य सचिवों की एक स्थायी समिति गठित की है। ये समितियां समय-समय पर बैठक करके विभिन्न मुद्दों का समाधान करती हैं तथा क्षेत्रीय परिषद की आगामी बैठकों के लिए आवश्यक कार्य करती हैं।
क्षेत्रीय परिषदों का महत्व
क्षेत्रीय परिषदें निरंतर संवाद और चर्चा के लिए एक संरचित मंच उपलब्ध कराती हैं। इनके माध्यम से दो या अधिक राज्यों अथवा केंद्र और राज्यों से जुड़े मुद्दों पर सहयोग को बढ़ावा दिया जाता है। इनका मूल उद्देश्य “मजबूत राज्य, मजबूत राष्ट्र” की भावना को बढ़ावा देना है।
क्षेत्रीय परिषदें केंद्र और राज्यों तथा एक या अधिक राज्यों के बीच उत्पन्न समस्याओं को उठाती हैं। इस प्रकार वे केंद्र-राज्य और अंतर्राज्यीय विवादों तथा मतभेदों के समाधान के लिए महत्वपूर्ण मंच प्रदान करती हैं।
इन परिषदों में विभिन्न विषयों पर चर्चा की जाती है, जैसे—
- सीमा संबंधी विवाद
- आंतरिक सुरक्षा
- सड़क एवं परिवहन
- उद्योग
- जल एवं बिजली
- वन एवं पर्यावरण
- आवास
- शिक्षा
- खाद्य सुरक्षा
- पर्यटन
- परिवहन एवं आधारभूत संरचना
क्षेत्रीय परिषदें सलाहकारी निकाय हैं। इसलिए इनकी बैठकों में विभिन्न पक्षों को अपने विचार स्वतंत्र एवं स्पष्ट रूप से रखने का अवसर मिलता है।
राष्ट्रीय विकास परिषद, अंतर्राज्यीय परिषद, राज्यपालों एवं मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन तथा केंद्र सरकार द्वारा आयोजित अन्य उच्चस्तरीय बैठकों के अतिरिक्त क्षेत्रीय परिषदों की अपनी विशिष्ट भूमिका है। ये परिषदें ऐसे राज्यों के बीच क्षेत्रीय सहयोग का मंच हैं, जो आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक रूप से एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
ये परिषदें छोटे और उच्चस्तरीय क्षेत्रीय निकाय होने के कारण अपने-अपने क्षेत्रों के विशिष्ट मुद्दों पर विशेष ध्यान केंद्रित कर सकती हैं। साथ ही, क्षेत्रीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय हित और व्यापक राष्ट्रीय दृष्टिकोण को भी बनाए रखती हैं।