भारत और चीन के बीच सीमा विवाद को लेकर लंबे समय से चली आ रही तनातनी के बीच 25 अगस्त 2026 को बीजिंग में विशेष प्रतिनिधियों (Special Representatives) की 25वीं वार्ता आयोजित हुई। भारत की ओर से राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और चीन की ओर से विदेश मंत्री वांग यी ने सीमा प्रश्न पर बातचीत की। वार्ता के बाद 26 अगस्त को जारी आठ सूत्रीय सहमति दस्तावेज में दोनों देशों ने वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के संबंध में एक-दूसरे की धारणाओं को बेहतर ढंग से समझने की आवश्यकता पर सहमति जताई। दोनों पक्षों ने माना कि LAC के कुछ क्षेत्रों में उसकी स्थिति और संरेखण को लेकर अलग-अलग धारणाएँ सीमा पर तनाव का एक प्रमुख कारण रही हैं। इसलिए उपयुक्त क्षेत्रों में LAC की बेहतर समझ विकसित करने को सीमा प्रबंधन में सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना गया है।
इस वार्ता का एक महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि भारत और चीन ने जमीन पर उत्पन्न होने वाली किसी भी स्थिति को मौजूदा कूटनीतिक और सैन्य संवाद तंत्रों के माध्यम से शीघ्रता से सुलझाने पर सहमति व्यक्त की। इसके अंतर्गत वर्किंग मैकेनिज्म फॉर कंसल्टेशन एंड कोऑर्डिनेशन (WMCC), स्थानीय सैन्य कमांडर स्तर की बैठकें तथा अन्य सहमत तंत्र शामिल हैं। इसका उद्देश्य सीमा पर किसी घटना को गलतफहमी या गलत आकलन के कारण बड़े तनाव में बदलने से रोकना है। यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि LAC पर कई स्थानों पर दोनों देशों की गश्त संबंधी धारणाएँ अलग-अलग रही हैं।
वार्ता में सीमा निर्धारण से संबंधित विशेषज्ञ समूह (Expert Group on Boundary Delimitation) को भी आगे बढ़ाने पर सहमति बनी। यह समूह सीमा के निर्धारण से जुड़ी बातचीत में तथाकथित “Early and Substantial Harvest” की दिशा में काम करेगा। इसकी शुरुआत दोनों पक्षों द्वारा इसके कार्यक्षेत्र और संदर्भ की शर्तों (Terms of Reference) पर सहमति से होगी। प्रारंभिक रूप से उन क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किए जाने की संभावना है, जहाँ भारत और चीन के बीच सीमा के संरेखण को लेकर बहुत अधिक मतभेद नहीं हैं। इससे जटिल क्षेत्रों पर सीधे टकराव के बजाय अपेक्षाकृत सहमति वाले क्षेत्रों में प्रगति करने का अवसर मिल सकता है।
भारत लंबे समय से LAC की स्पष्टता (clarification) की मांग करता रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य उन क्षेत्रों में गश्ती दलों के बीच टकराव की संभावना कम करना है, जहाँ दोनों देशों के सीमा दावे एक-दूसरे से मिलते या ओवरलैप करते हैं। वर्ष 1996 के भारत-चीन समझौते में भी LAC के संरेखण की साझा समझ विकसित करने और उसकी स्पष्टता तथा पुष्टि की प्रक्रिया को तेज करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया था। बाद में दोनों देशों ने LAC की अपनी-अपनी धारणाओं को दर्शाने वाले नक्शों के आदान-प्रदान पर सहमति बनाई। मध्य क्षेत्र में कुछ वर्ष बाद नक्शों का आदान-प्रदान हुआ, लेकिन पश्चिमी क्षेत्र में सीमा के संरेखण को लेकर गंभीर मतभेद सामने आने के कारण यह प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी और अंततः पश्चिमी तथा पूर्वी क्षेत्रों में इसे छोड़ दिया गया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2015 में अपनी चीन यात्रा के दौरान सार्वजनिक रूप से LAC की स्पष्टता की प्रक्रिया को फिर से शुरू करने की आवश्यकता पर जोर दिया था। हालांकि, चीन ने उस समय यह तर्क दिया कि LAC के संरेखण को स्पष्ट करने की प्रक्रिया सीमा विवाद के समाधान को आसान बनाने के बजाय और अधिक जटिल बना सकती है। इसलिए भारत की इस पहल पर उस समय कोई ठोस प्रगति नहीं हुई। लेकिन अप्रैल 2020 से पूर्वी लद्दाख में उत्पन्न सैन्य तनाव ने LAC की अलग-अलग धारणाओं से जुड़े जोखिम को बेहद स्पष्ट कर दिया। 1962 के बाद यह LAC पर शांति और स्थिरता के लिए सबसे गंभीर व्यवधानों में से एक था। अरुणाचल प्रदेश सहित पूर्वी क्षेत्र में भी LAC की अलग-अलग धारणाओं को तनाव का एक कारण माना गया है।
पूर्वी लद्दाख में सैन्य गतिरोध के बाद दोनों देशों ने कई दौर की सैन्य और कूटनीतिक वार्ताओं के माध्यम से विभिन्न टकराव वाले स्थानों से सैनिकों की वापसी (disengagement) की दिशा में कदम उठाए। इसके बाद सीमा पर शांति बनाए रखने के लिए कुछ व्यावहारिक व्यवस्थाएँ विकसित की गईं, जिनमें कुछ विवादित क्षेत्रों में गश्त पर रोक वाले क्षेत्र (no-patrolling zones) तथा कुछ स्थानों पर समन्वित गश्त जैसी व्यवस्थाएँ शामिल हैं। हालांकि, इन व्यवस्थाओं का विस्तृत स्वरूप दोनों देशों ने सार्वजनिक नहीं किया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि LAC की वास्तविक स्थिति को लेकर दोनों पक्ष फिलहाल व्यापक राजनीतिक समाधान की तुलना में व्यावहारिक सीमा प्रबंधन पर अधिक जोर दे रहे हैं।
फिर भी, वर्तमान वार्ता में “LAC clarification” यानी LAC की औपचारिक स्पष्टता जैसे शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया। इसका कारण इस शब्द से जुड़ा पुराना और संवेदनशील विवाद माना जा सकता है। इसलिए 1996 में परिकल्पित पूरी LAC-clarification प्रक्रिया के तत्काल पुनरारंभ की संभावना अभी कम दिखाई देती है। इसके बावजूद, दोनों विशेष प्रतिनिधियों द्वारा “उपयुक्त क्षेत्रों में LAC की समझ को बेहतर बनाने” की राजनीतिक स्वीकृति महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ यह है कि भारत और चीन कम से कम उन क्षेत्रों में एक-दूसरे की सीमा संबंधी धारणाओं को समझने की प्रक्रिया शुरू कर सकते हैं, जहाँ इससे तत्काल कोई बड़ा राजनीतिक या क्षेत्रीय विवाद उत्पन्न न हो।
कुल मिलाकर, यह वार्ता भारत-चीन सीमा विवाद के अंतिम समाधान की दिशा में कोई निर्णायक कदम नहीं है, लेकिन सीमा पर गलतफहमी, गलत आकलन और आकस्मिक सैन्य टकराव को कम करने की दिशा में एक व्यावहारिक पहल अवश्य है। यदि दोनों देश LAC के अलग-अलग क्षेत्रों में एक-दूसरे की धारणाओं को व्यवस्थित रूप से समझने, सैन्य संचार को मजबूत करने और सीमा प्रबंधन के मौजूदा तंत्रों को प्रभावी बनाने में सफल होते हैं, तो इससे भविष्य में तनाव कम करने और सीमा पर स्थिरता बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
Source: The Hindu